भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 458

इसका मुँह नीचेका है साका अक्षर उसके पत्तेमें है। पुष्पके स्थान स्रोतका अक्षर है। इन दोनोंके बीच रहता है। पूर्वका पत्ता श्वेत वर्णका है, यदि इस पत्तेपर मन बैठे तो धर्म यश कीति बुद्धि होती है। आगेका पत्ता लाल रङ्ग है, यदि इस पत्तेपर मन बैठे तो नींद तथा आलस्यवाली निद्रा हो जाती है। दक्षिणका पत्ता काले रङ्गका है, यदि इस पत्तेपर मन स्थिर होवे तो क्रोध आता है। दक्षिण तथा पश्चिमके बीचवाले कोना अर्थात् नैऋत्य ओरका नीला पत्ता है। जब इन पत्तोंपर हृदय ठहरता है तब ऐसा अनुमान होता है कि, मेरा धन मेरी स्त्री मेरा पुत्र है। पश्चिम ओर कपिल वर्णका पत्ता है। जब इसपर हृदय स्थिर होता है तब हर्ष तथा आनन्द होता है। पश्चिम उत्तर अर्थात् वायव्य कोणका पत्ता श्याम रङ्गका है, जब इसपर हृदय बैठता है तब चित्तका उच्छाटन होता है। पीले रङ्गका पत्ता है जब इस पर बैठता है तब कामातुर होता है, हँसी ठढ़ा करता है। उत्तर और पूर्व अर्थात् ईशान कोणमें जो पत्ता है उसका रङ्ग गुलाबी होता है। इसपर स्थिर होनेसे क्षमा तथा दयाकी समझ होती है। ज्ञान होता है। तीन दोष है वे कफ पित्त वात हैं इन्हें संधि कहते हैं। यहां मैं गन्धादिकोंको समर्पित करता हूँ। यह इस चक्रकी पूजा हुई। ॐ चतुर्थ मणिपूरकं चक्रं नाभिस्थानं नीलवर्ण ओकारं सत्त्वगुणः विष्णुर्देवता लक्ष्मीशक्तिः गरुडवाहनः वायुः ऋषिः समान वायु लिंग देह सुषुम्णा अवस्था पश्यन्ती वाचा यजुर्वेदः दक्षिणाग्निः आगता भूमिका सारूप्यता मोक्ष दश दल १० दश मात्रा १० ङं ञं तं थं दं धं नं पं फं अंतर मात्रा १० बहिर मात्रा १० क्षमा १ मेधा २ माया ३ तीव्रा ४ मेधा ५ प्रस्फुरा ६ हंसगामिनी ७ तन्मया ८ लक्ष्मी ९ देवता अमृता १० घटिका षट् सहस्राणि ६००० पलं ३३ नासिका १६ पूजा मानसी पूजयेत् सोहं भावेन अत्रगंधादिसमर्पयामि नमः। ॐ चौथा मणिपूरक चक्र है यह नाभिके स्थानपर है नीलवर्ण है उसका सत्त्वगुण, विष्णु देवता है। लक्ष्मी शक्ति है। गरुड वाहन है। वायु ऋषि है। समान वायु है। लिङ्ग देह है। सुषुम्णा अवस्था है। पश्यन्ती वाणी है। यजुर्वेद है। दक्षिणा भूमि है, आगता भूमिका है। सारूप्यता मोक्ष है, दश यती है। दश मात्रा है। ङं, ञं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं, बं, अन्तरकी मात्रा है। बाहरली मात्रा १ क्षमा, २ मेधा, ३ माया, ४ तीव्रा, ५ मेधा, ६ प्रस्फुरा, ७ हंसगामिनी, ८ तन्मया, ९ लक्ष्मी, १० देवता अमृता यह छः सहस्र जप होता है। सोलह घड़ी ३३ पलमें होता है। नासिका सोलह, मानसीसे पूजा पूजे। सोहमभाव तथा इतर गंध इत्यादिसे मैं पूजता हूँ। ॐ तृतीयं कुंडलिनीस्थानं सिंदूरवर्ण सर्पकारं अधोमुखी अग्निर्देवता कुहरणी शक्तिः ब्रह्माऋषि कूर्म कला