कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 471, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनन्द है । ज्ञानी पुरुषका देह महलमें रहता है । जब नीचेको दम जाता है तब समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है । जब दम रोकता है तब समस्त संसार हरा भरा होता है । जब श्वास ऊपरको छोड़ता है, तब महाप्रलय होजाता है ।
नाकशाह और जन्दाका सम्बाद ।
नान० — तीन लोककी कहो गोसाईं । कैसे जान परै तनमाहीं ॥
जन्दा० — पीठ चरन हैं शीश अकाशा । तीनलोक देही परकाशा ।
शब्दखण्ड ब्रह्मण्डमें सोई । माया ब्रह्म फैल घट दूई ॥
हमरे पदको लखै न कोई । भली बूझ तुम पारख होई ।
नान० — चार दिशा कहु मोहिं गोसाईं । सात द्वीप मोहिं कहु बुझाईं ॥
जन्दा० — आगा पीछा दक्षिण वामा । चार दिशा देही परमाना ।
साढ़ेतौन हाथकी देही । उनचास कोट विष खाई एही ॥
नवों खण्ड नौ सन्धी जानो । पिण्ड अण्डको लेखा मानो ॥
पर्वत यामें हाड़ लगाया । ढर पानसो ब्रह्मण्ड रचाया ॥
चन्द्र सूर्य दुइ नेत्र जगावा । देखे पीठ सुमेरु बतावा ॥
तिम नदिया तन भीतर जानो । पेट गँडा पिण्डमें मानो ॥
नान० — तत्त्वप्रकार कहे तुम बानी । ताकी सांध शब्द पहचानी ॥
सात समुन्दर कहो बखानी । तुमही पुरुष पुरातन ज्ञानी ॥
जन्दा० — जीभ नासिका नेत्र बखानो । श्रवण नाभि गुद इन्द्री मानो ॥
क्षार मीठ जल सब पहचानो । नौ सौ नदी पिण्डमें मानो ॥
श्वासानदी नासिका वासा । जिह्वा स्वाद करे रसखासा ॥
ये समुद्रमें जाय समानो । है गण्डार नहीं तृप्तानो ॥
नान० — सात समुद्रकी लहर परवानो । उनकी लहर कौन विधि मानो ॥
जन्दा० — काम क्रोध अरु लोभ हँकारा । मनउ मायाकी लहर अपारा ।
अग्नि पवन पानी परचण्डा । पाँच तत्त्व करते नौखण्डा ॥
नान० — वाहि लहर हीरा औ मोती । यामें कहा निकस है सोती ॥
सबहि भेद मोहिं कहु गुरु देवा । नहिं छोड़ूँ अब तुमरी सेवा ॥
जब गुरु मिले बहुरैंग समरङ्गा । ब्रह्म ज्ञान ऊँचे सत्संगा ॥
सुमिरन भजन होय परकासा । अनहद ध्यान पुरुषकी आसा ॥
अर्श गैवमें ध्यान लगावे । तब वा सिध बाह कोई पावे ॥
जाय हंस तहैं डुबकी मारा । तबले निकसी वस्तु अपारा ॥
हीरालाल नाम परकासा । शब्द सुरत हंसाको वासा ॥