भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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भवदर लोक है । बालभोग छोटी महाप्रलय है । प्यास बड़ी महाप्रलय है । हृदय पृथ्वीके ऊपरका स्वर्ग है । इधर वैजयन्ती माला है । उधर नक्षत्रगण वैजयन्ती माला हैं और दाहिना कुच वह है जो भोगनेके पूर्व दान देवे और बाँया कुच वह है जो भोगनेके उपरान्त दान देवे । जहाँ तीनों गुण मिलते हैं वह हृदयकी इच्छा है । वही ब्रह्मा है । पालन करना ही विष्णु है ।

इसमें जो क्रोध है वो रुद्र है । हँसना तथा प्रसन्न होनाही माया है । इसमें ज्ञान है वही दुःखका दूर करनेवाला है । प्राणही हवा है और पीठ बुरी करनी है । जो पीठका हाड़ है सोई पहाड़ है । जो बाएँ दाएँकी पसुलियाँ हैं वेही हिमालयके इधर उधरके पर्वत हैं । दाहिना हाथ उदारता और वृष्टि है । बाँया हाथ कञ्जूसी तथा सूखा है । हाथकी रेखा अर्थात् चिह्न अप्सरागण हैं । हाथके नाखून दूतगण हैं और हाथका जोड़ा आरञ्जपर्व्यन्त सोई अग्निलोकपाल हैं । बाँया जोड़ा इंक देवता पूर्व तथा उत्तरका है । आरञ्जसोई कल्पवृक्ष है । दाहिना मोड़ा सो दाहिना ओर है । बाँया मोड़ा सो बाँया ओर है । ग्रीवाका मोड़ा वरुण देवता है । गला सो महर्लोक ऊपरका स्वर्ग है । अच्छी बुद्धि अनहद शब्द सो महर्लोकके ऊपर है सोई ब्रह्म लोक है । सासारिक कामना सोई कष्ट दुःख है । नीचे का होंठ लालच है । ऊपर का होंठ लालच लज्जा है । तालुवाणी है । जिह्वा अग्नि है । वार्तालाप सरस्वती है अर्थात् जिह्वा है और दाँत सो मोर हैं, समस्त लोग जो खाते हैं वही भोजन है । इधर वाणी है और उधर चारों वेद हैं । इधर हँसी और उधर माया तथा मायाकी रचना है इधर दोनों कान हैं और उधर दिशाएँ हैं । इधर नाकके दो छिद्र हैं और उधर अश्वनीकुमार हैं । जो शरीरकी बू है वह पृथ्वी है । दाहिनी आधी देह सो पाँचवाँ यमलोक है । आधी देह जो उत्तरकी है वो छठवाँ तपलोक है । मस्तक बल अर्थात् मस्तकपरके जो चिह्न हैं सो प्राकृतिक तेज है । जो आरम्भ की उत्पत्ति उसका वह सूर्य है । आँखोंका खुला रहना वो सृष्टिकी रचना है । पलकका जो मारना है वही दिनरात है । जो दाहिनी ओरकी भौँ है सो प्रीत देवता वो महतर है, जो बाईँ ओरकी भौँ हैं वह क्रोध देवता है । जो माथा है सो तपलोक है । वह जन लोकके ऊपर है, सोई लोका लोक है । वह समस्त लोकोंके ऊपर है । जो शिरके बाल हैं वही काले बादल हैं । इधर शरीरके बाल हैं । इधर वृक्ष तथा हरियाली है । जो सौन्दर्य है वही लक्ष्मी है, जो शरीरकी चमक है वोही सूर्यका प्रकाश है । संसारमें जो देह है वो समस्त देह महापुरुषके घर है, आत्मा सोई चिदा-