भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 467, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 467

नहीं मिला जिसके दिलमें कोई फरकही न हो ॥१॥ हमने समझाया पर न समझे, दूसरेके हाथोंमें बिक गये, हमने बारंबार कहा कि, मानजा नहीं तो चौरासीमें भटकता फिरेगा, यम पकड़ कर लेजायगा पर अंतमें ऐसाही हुआ ॥ २ ॥ जब गर्भमें था तब भगवान्से पुकारता था कि, मैं तेराही हूँ पर जब वो ठौर छूट गया गर्भके बाहिर आया कि, हठवायुके लगतेही सब भूल गया । चौरासी लाख योनिके चक्करमें पड़ गया औरका औरही होगया ॥ ३ ॥ वस्तु हैं पर उसके खरीददार नहीं क्योंकि, उसकी कीमतें सबकुछ देना पड़ता है । जिसके पास देनेको दाम नहीं अथवा न देसके वो ढाँवा डोल फिरता है ॥ ४ ॥ यह संसार तो झाड़वामें ही रह गया न भोग कर सका एवम् न योग करसका । इसके जन्म लेनेका सार तो कबीर ने लेलिया है लोग तो छूछके पीछे लगे हुए हैं ॥ ५ ॥ सात द्वीप और इसके नौ खण्डोंमें के सुर नर मुनि और देवता सब भोगीही हैं क्योंकि, जिसप्रारब्धसे जो देह बनेगा उसका फल भोगना ही पड़ेगा ॥ ६ ॥ सबसे छोटा बनके रहना सबसे अच्छा है, उसीसे सब कुछ हो सकता है, जैसे कि, द्वितीयाके बालचांदको सबही प्रणाम करते हैं ॥७॥ जितने मिले सब गुरु मिले कोई भी चेला नहीं मिला, इस कारण छः लाख छानवे रमैनी एकही जीवपर गुजर रहीं हैं ॥८॥ जबतक श्रोता न समझे उस समयतक कथा कहना समयको व्यर्थ खोना है । जब श्रोता बक्ता दोनोंका एक विचार मिलजाय तबही कहनेका आनन्द है ॥ ९ ॥ सुन, न मैं कागज छूता हूँ न कलम पकड़ता हूँ । चारों युगोंकी बातें मुहसे कहनेकी बात है ॥१०॥ यदि शोच और वियोगका दुख न होता तो कोई शोच नहीं था, पर जब सुखमें इनसे दुख मिलता है, दुनियाँके लोग बोली बोलते हैं तो फिर इससे जयावा कोई दुख नहीं होता ॥ ११ ॥

शब्द — अन्तर मैल जो तीरथ न्हावे, उसे वैकुण्ठ न जाना ।

लोक पतीजै कछु नहिं होवै, नाहीं राम अयाना ॥

पूजा राम एक है देवा, सांचा नाम न गुरुकी सेवा ।

जलके न्हाए जो गति होवे, नित नित मेंडक न्हावे ॥

जैसे मेंडक तैसे वह नर, फिर फिर जूनी आवे ।

मन कठोर दोनीसे बना रस, नरक न पांचा जावे ॥

हर गानेसे जोबरे, हड़मिए सगरी सैन तराए ।

दिन नहिं रैन वेद नहि शासतर, तहाँ बसे निरंकारा ॥

कहैं कबीर नर ताको ध्यावो, बाहिरिया संसारा ॥

जिसके दिलमें बुरी वासनोंका मेल भरा हुआ है वो चाहे हजार तीरथ करे