कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 465, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंका भार आगया तो सब बुद्धि दबादी सब बेहोस हो गये हैं यहाँ हुशियारका तो नामही नहीं है । उसकी अर्दलीमें रहनेवाले तो लाख हैं परबो पेश बा एक है । सब जिसकी फौज हैं उस सरदारका पता नहीं है । उसके भूकुटिविलासमें सब फसे पड़े हैं, मेरे प्यारेके वे लचीले जूल्फ कहाँ हैं ? या वो मेरा प्यारा कहाँ है ? निर्द्वन्द्व हुकम करनेवाले अनेको बादशाह हो गये, पर सब मिट गये और मिट जायंगे क्यों कि, उनकी न मिटनेवाली सरकार कहाँ हैं ? सब पीर पैगम्बर आते जाते रहते हैं, जो पीरोंका भी पीर हो वा मालिक कहाँ है ? सब ढोल नगारे बजाते आते हैं, वो शब्द कहाँ है ? जिसकी झनकारसे ये बोल रहे हैं हम उसके चरणोंकी धूलपर तनमनसे कायम हो गये वो कबीर सब संसारका मालिक है, उसका पार किसने पाया है ?
ग्रन्थल ।
आ मेरी गली बुलबुल बीमार हमारे ।
दावत है भली बुलबुल बीमार हमारे ॥
माहे न खिज़ा दाएम जेहि वक्त बहारी ।
गुल है न कली बुलबुल बीमार हमारे ॥
खाली न मेरे कूचः में आ मेरी नज़रला ।
सर हाथ तले बुलबुल बीमार हमारे ॥
जितनी है हवस दिलमें रहे कोई न बाकी ।
इश्क आग जली बुलबुल बीमार हमारे ॥
खिलअत हो अतातर्कतुकर जामए नापाक ।
आफात टली बुलबुल बीमार हमारे ॥
इनसान हो पी प्याला न हो मिस्ल सतूर्राँ ।
मत खाए खुली बुलबुल बीमार हमारे ॥
क्यों सोता पड़ा नालःका वक्त जो आया ।
अब रात ढली बुलबुल बीमार हमारे ॥
अब जाग खबरले तुने जो बोया है आजिज ।
खेतै है फली बुलबुल बीमार हमारे ॥
ए मेरे प्रेमके बीमार बुलबुल ! मेरी गली आ, क्यों कि, वहाँ तेरो खातिरका सामान अच्छा है । तू जानती है कि, फसले बहार सदा नहीं रहा सकती । बहारका समय गया । न तो बागमें फूल है तथा न कलीही है जिसका खिलकर फूल बन जाय । मेरी गली खाली हाथ न आना, कुछ भेंट लेकर आना, अपना शिर हाथपर