कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 464, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर हाथ अपना लेके खरीदार कहाँ हैं ॥
हरचार सिम्त दूढ़ता दीवानः दिल मेरा ।
दिल किसके हाथ दीजे दिल अफगार कहाँ है ॥
सहमूरत और सूरत और सरहा पुजारी ।
अंधेरेमें न सूझ वह करतार कहाँ है ॥
जहाँ पहुँच नहीं अकल वहम क्योंकर जाए ।
उनका कवन रूप निराकार कहाँ है ॥
जब आनपड़ा सहमा सारी अकलको मारा ।
बेहोश सारे होगा हुशियार कहाँ है ॥
दाही हजार लख हैं कोई पेशवा है एक ।
सब जिसकी फौज उसका सरदार कहाँ है ॥
सब उलझ पड़े फासिक जञ्जीर जुल्फ में ।
रह जुल्फ मेरे महरू खमदार कहाँ है ॥
सरकार लाख जगमें हुए सदहा हुकमरों ।
सारे हैं फानी बड़ा सरकार कहाँ है ॥
आते हैं और जाते हैं सह पीर पैगम्बर ।
पीरानका जो पीर सो सालार कहाँ है ॥
गाते बजाते हैं सारे ढोल नकारे ।
अब आरजी हैं शब्दका झनकार कहाँ है ॥
तनमनसे हुए आजिज उसकी खाक कदमको ।
खुद हैं खालिक कबीर वारापार कहाँ है ॥
तात्पर्य—मेरा दिलदार इस दुनियाँके बाहिर है । मैं किससे दिल लगाऊँ ? इस अन्धेर नगरीमें अन्धेरही अन्धेरे है, मैं अपने तरफदारको दूढ़ता हूँ वो यहाँ कहाँ है ? सब पशुही बोल रहे हैं मेरे प्राणोंको बचानेवाली प्यारेकी भीठी आवाज यहाँ कहाँ है ? चारों ओर कांटे लगे हुए हैं, यहाँ गुलाब कहाँ है ? जो दुनियाकी मस्तीके मस्त हैं ? उनकी मस्ती झूठी है, यहाँ प्यारे सत्यपुरुषके इश्कसे हरा भरा कोई नहीं है, सब प्रेमके बाजारमें खाली हाथही आजा रहे हैं । शर हाथमें लेकर इश्कका सौदा खरीदने कोई नहीं आता । मैं मेरे दीवानेको चारों दिशाओंमें दूढ़ता हूँ, मैं अपने दिलको कितने दूँ इसके लेनेका पात्र कहाँ है इस अन्धेर नगरीमें सब एकसेही हैं, अज्ञानके अंधेरेमें नहीं दीखता कि, वो करतार कहाँ है ? जब बुद्धिकी पहुँच नहीं तो वहम कैसे पहुँचे उसका रूप क्या वो निराकार कहाँ है ? जब भ्रम