कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 461, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै वहाँकी पहुँच दुर्लभ है । जितने लोग सांसारिक वासनाओंके आनन्दमें फँसे हैं वे सब इन्हीं चारों श्रेणियोंमें रहते हैं । पर ये चारो श्रेणी बिना सत्यपुरुषकी कृपाके शूलीस्तम्भके सदृश हैं, समस्त जीव इन्हीं चारोंपर लटक रहे हैं । जिनके मनमें वासना है । उनमें कोई न बचेगा । इस भवसागरमें बिलकुल अंधेर हो रहा है । किसीके हृदयपर प्रकाश नहीं, न बल है कि, इस अंधरेसे बाहर निकल सके । परन्तु हों इससे वह मनुष्य बहिर्गत हो सकेगा जिसके निजके दो गुण हों । एक स्वच्छ बुद्धि, दूसरे सोचनेकी शक्ति । जिस मनुष्यमें ये दोनों गुण न होंगे वह अंधकारसे कदापि बहिर्गत नहीं हो सकेगा । यह भवसागर अंधेरपुर नगर है और इसमें चारों ओर अज्ञानता तथा मूर्खताकी लहरें हैं । इसमें समस्त जीव डूबते उछलते रहते हैं, जिसका एक उदाहरण मैं देता हूँ ।
उदाहरण—एक नगर था इसका नाम अंधेरपुर था । इस अंधेरपुर नगरीके राजाका नाम अंधेरी था । इस राजाके राज्यमें महा अंधेर था इस अंधेरपुरमें समस्त पदार्थ टकासेर बिकते थे । साग पात, अन्न घृत, मीठा इत्यादि सभी वस्तुएँ टका सेर बिका करती थीं । दैवात् उस नगरमें दो साधुओंका आगमन हुवा । उनमें से एकका नाम विवेक तथा दूसरेका विचार था । विचारने विवेकसे कहा कि, आओ भाई ! कुछ दिवसों पर्यन्त हमलोग इसी नगरमें निवास करें । कारण यह कि, यहाँकी समस्त वस्तुएँ सस्ती हैं भली भाँति खाएँ पीएँ, चैनसे जीवन व्यतीत करें । दोनोंने ऐसा विचार कर वहाँ रहना आरम्भ किया । भलीभाँति खा पीकर बड़े मोटे हुए । एक रातको उस नगरके एक महाजनके घरमें चोर लगे । उन चोरोंमें से एक चोर दीवारके नीचे दबकर मर गया, तब वे रोते हुए राजा अंधेरीके पास गये, न्यायके प्रार्थी हुए । इस बातके सुनतेही राजाने महाजनको बुलाकर कहा कि, तेरी ही दिवारके नीचे चोर दबकर मर गया अब तू फाँसी पावेगा । यह बात सुनकर उस महाजनने निवेदन किया कि, महाराज मेरा दोष नहीं, दीवार बनाने वालोंका दोष है कारण यह कि, उन्होंने निर्बल दीवार बनाई । तब राजाने राजगीरोंको बुलाया इनको उपस्थित कर राजाने उनसे कहा कि, हे राजगीरो ! तुमने महाजनकी दीवार निर्बल बनाई उसके नीचे चोर दबकर मर गया, इस कारण तुम फाँसी पाओगे, तब राजगीरोंने निवेदन किया कि, महाराज ! हमारा कुछ दोष नहीं इसमें समस्त अपराध मजदूरोंका है कि, उन्होंने हमको नितान्तही निर्बल गारा दिया इस कारणही दीवार निर्बल हो गई । तब राजाने मजदूरोंको बुलाकर कहा कि, तुमने निर्बल गारा बनाया इस कारण महाजनकी दीवार निर्बल होगई ।