कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
समीक्षा, हजरत इब्राहीम हजरत इसहाक
प्रकारके लोग हो गये। जिन्होंने पहले दोनों दण्डवतों की थीं, वे इमानदार होकर जीते एवं ईमानसेही मरते हैं। दूसरे वे जिन्होंने न पहली दण्डवत की और न दूसरी वे काफिर होकर जीते और काफिर होकरही मरते हैं। तीसरे वे लोग हैं जिन्होंने पहली दण्डवत कीनी दूसरी नहीं की वे ईमानदार होकर जीते तथा काफिर होकर मरते हैं। चौथे वे लोग हैं कि, जिन्होंने पहली दण्डवत न की दूसरीकी, वे काफिर होकर जीते और ईमानदार होकर मरते हैं। इसके पीछे संसारके सब उद्यम दिखलाये गये। जिसने जो चुन लिया वही उसका उद्यम होगा। फिर सब आत्मायें गुप्त परदेमें विलुप्त होगईं। एक बार उत्पन्न हो चुकीं दूसरी बार उसीके अनुसार उत्पन्न होकर मरती जाती हैं।
समीक्षा—अब यहाँ विचारना उचित है कि, पूर्व जन्मके कर्मही खुदा तथा बन्दः को पृथक् २ करते हैं। सब मनुष्योंने इस कारण न्यारी न्यारी रीति-योंपर दण्डवतें कीं। क्यों कि, उनकी आत्मा पूर्वकर्मोंसे दूषित थीं। पूर्वकर्मके बिना भिन्न भिन्न प्रकारके विचार नहीं हो सकते कर्म बिना देह भी नहीं हो सकती। अतः वे सब आत्मा पूर्वकर्मोंसे निर्दोष कही नहीं जा सकती। यदि उनमें पूर्वजन्मका दोष न होता तो वे निश्चय एकही रूपसे दण्डवत करते।
सभी जीवोंकी यही दशा है कि, महाप्रलयके समय सब ब्रह्मसे जा मिलते हैं। इसी प्रकार फिर उत्पत्तिके समय ब्रह्म सत्तासे सबकी उत्पत्ति होती है। आदमकी पीठ ही गुप्त संसार है। इसी प्रकार उत्पत्ति स्थिति तथा विनाश हो जाया करता है। सदैव आवागमनका सिलसिला चला जाता है, अब यह बात प्रमाणित हुई कि, खुदाने उनको पत्थर पूजना बताया वह काला पत्थर उनके हाथमें दिया कि वह महाप्रलयके दिवस उनकी भलाई बुराईके हिसाबकी साक्षी देगा। इसी पत्थरकी पूजा आजतक हिन्दू तथा मुसलमानोंमें प्रचलित है, सब पूजते चले आते हैं। मुसलमान उसे सङ्ग आसूदके नामसे पूजते हैं। यद्यपि पूजनेकी रीति न्यारी है। पर दोनोंकी एकही बात है। जो आत्मायें उत्पत्तिके आरम्भसेही मूर्तिपूजक हुईं वे कर्मोंसे पृथक् कैसे मानी जा सकती हैं? सङ्ग आसूदको ही सालिग्राम कहते हैं।
३-४यथार्थ तालपर्य—पहले लिखा है कि, उत्पत्तिसे पचास सहस्र वर्ष पूर्व सर्व आत्माओंका भाग्य ठहराया गया। फिर कहा है कि, महाप्रलयका दिवस पचास सहस्र वर्षका होगा। इन दोनोंका एकही तात्पर्य है कि, महाप्रलयसे पचास सहस्र वर्ष पीछे फिर उत्पत्ति होती है सर्व आत्मायें निजकर्मनुसार जुदी २ योनियोंमें आवागमन किया करती हैं भिन्न भिन्न स्वरूपोंमें वेही सब अत्मायें पुनः दिखाई देती हैं। उसका यथार्थ तात्पर्य यही है।
हजरत याकूब या इसराईल याकूबका ब्याह
३५ वैकुण्ठका पक्षी होना—बीबी आयशा सद्दीकासे कहावत है । आयशा कहती हैं कि, एकबार किसी मित्रकी ताबूतके साथ हजरत रसूलल्लाहको नमाज पढ़नेके लिये बुलाया । उस समय आयशाने कहा कि, ऐ रसूलल्लाह ! हर्षित हो कि, वह बालक वैकुण्ठके पक्षियोंमें से एक है । इस कारण कि, उसने कुछ बुरा काम न किया था तब नबीने उत्तर दिया कदाच ऐसा न हो । क्योंकि, खुदाने उनको पिताके वीर्यके साथ ठहराया है । नरकी तथा वैकुण्ठी वीर्यके साथही ठहरें हैं और उसी भाग्यके अनुसार नरक तथा वैकुण्ठको जावेंगे ।
अब इन कथनोंसे प्रगट हुआ कि, मुहम्मद साहबको मालूम नहीं था कि, वह लड़का वैकुण्ठका पक्षी होगा अथवा नहीं । वह बालक जो अनजान था उसके विषयमें मुहम्मद साहबने अपनेको अनभिज्ञ बताया । फिर कहा है, भोले बच्चे वैकुण्ठको जाते हैं । यह बात भी कुछ ठीक मालूम नहीं होती । दूसरी यह बात भी प्रगट हुई कि, अच्छे मुहम्मदी मर मरकर पक्षी तथा पशु होते हैं । चाहे वे वैकुण्ठके ही क्यों न हों । भलाजी, जब कोई मनुष्यसे पक्षी हो जावेगा तब उसकी दशा अच्छी कैसे समझी जावेगी ? क्योंकि, मनुष्यकी देहमें तो ज्ञान होता है पशु पक्षीकी देह तो पूर्णतया अन्धकारमें रहती हैं । जो वैकुण्ठका पक्षी हुआ तो क्या लाभ हुआ ।
३६ पूर्वके प्रेम आदि—मुहम्मद साहबने प्रेमके विषयमें इस प्रकारसे कहा है । सुन्नरों मशकानुल, बाबुलहब्ब फौअल्लाह, आवशासे मुसल्लसका कहना है कि, संसारमें आने उत्पन्न होनेसे पूर्व सब मनुष्योंके रुहकी एक एकत्रित सैन्य थी । जिन आत्माओंमें वहाँ सम्बन्ध और मैत्री थी । अब यहाँ भी उनमें प्रेम है जिनमें वहाँ वैमनस्यता थी उनमें यहाँ भी मिलाप नहीं होता है ।
यह सोचनेकी बात है कि, रुहमें मैत्री विरोध तथा प्रेमादिका होना सम्भव नहीं हो सकता । क्योंकि, ये सर्व शरीरके धर्म हैं, रुहके नहीं हो सकते, सब कामनायें शरीरमें ही होती हैं, रुहमें नहीं होतीं । पवित्रात्माको कौन वशी-भूत कर सकता है ? इससे प्रमाणित होता है कि, मुसलमान लोग सूक्ष्म शरीर-की ही रुह कहते हैं—जो कि अपने पूर्वकर्मोंसे सदा परिपूर्ण रहता है ।
३७ भाग्य—मुसल्लम बिनयसारका कथन है कि, हजरत रसूलल्लाहने फरमाया कि, वास्तवमें खुदाने आदमको उत्पन्न किया, अपने हाथसे उसकी पीठको छुवा, उससे एक कौम (जाति) निकली । आदमसे कहा कि, मने यह जाति वैकुण्ठके लिये निकाली है । उनके सर्व कार्य वैकुण्ठके जानेवालोंकेसे होंगे, फिर खुदाने आदमकी पीठको दूसरी बेर बांये हाथसे छुआ, उससे दूसरी
हजरत मूसा
जाति निकली, तब खुदाने आदमसे कहा कि, इस जातिको मैंने नरकमें रहनेके लिये निकाली है। इनके सर्वे कार्य नरकमें जानेवालोंके समान होंगे। फिर अबदुल्लाऽइब्र उम्रका कथन है कि, एकबार रसूलल्लाह दो पुस्तकें दोनों हाथोंमें लेकर निकले मुझसे पूछा तुम जानते हो कि, यह कौसी पुस्तकें हैं ? मैंने कहा, नहीं आप मुझको बताइये। आपने कहा कि, जो मेरे दहिने हाथमें किताब है उसमें वैकुण्ठमें रहनेवालोंके नाम हैं। यह खुदाकी ओरसे है, इसमें वैकुण्ठके जानेवाले सर्वे मनुष्योंके नाम, उनके बाप दादोंके नाम और उनकी जातिके लोगोंके नाम इसमें लिखे हैं, साथही संख्या भी लिख दी है, इसमें न्यून तथा अधिक न होंगे। दूसरी पुस्तक जो मेरे बाँये हाथमें है इसमें उनके बाप दादों तथा जातिके नाम सहित नरकमें जानेवालोंके नाम लिखे हैं। नीचे संख्या भी दी है कि, इससे अधिक अथवा न्यून न होंगे, यह पुस्तक भी खुदाकी ओरसे है।
इससे यह तो प्रमाणित हो चुका कि, भाग्य निश्चित है। इसमें बाल बराबर भी विभिन्नता न हो सकेगी। सब मनुष्य स्वस्वभाग्यानुसार बुरे-भले हैं अब किसीको कुछ करना कराना रह नहीं गया। दूसरा सन्देह यह उत्पन्न हुआ कि, जब वैकुण्ठवासी रूहोंके सम्बन्धी और मित्र उनकी सिफारशसे वैकुण्ठ पावें, तो हजरत रसूल अल्लाहके स्वजन बाप दादे माता इत्यादि नरकके योग्य कैसे होंवें ? उनको भी रसूल अल्लाहसे लाभ उठाना उचित है।
वस्तुतः हमारे पूर्वकर्मोंने हमारा भाग्य ठहराया है कर्म करनेके लिये हम पूर्वकालमें शरीर धारण किये हुये थे, पूर्वकर्मानुसारही अब देह हुई है। यदि हमने अपने भाग्यके अनुसार सब कार्य अपने देहके पूरे कर लिये तबतो हमारे ऊपर कोई दोष रह नहीं गया, न हमको महाप्रलयके दिवस किसी प्रकार हिसाब किताब देनेकी आवश्यकता है न हम भले बुरे हैं वरन् हमारे बदले हमारा खुदा भला बुरा ठहरेगा दोष उसी पर थोपे जावेंगे हम बाल बाल बच जावेंगे यदि हम निर्दोषोंको खुदा दोषी ठहरावेगा तो आपही दोषी होगा। न्यायी नहीं कहला सकता। इस कारण यह सब बातें भ्रम और धोखेकी हैं। खुदा कदापि पापी नहीं है। हमारे कर्मही हमें भला बुरा बनाते हैं, खुदाका क्या दोष है ? हम आवागमन करते आये हैं और सदा करते जावेंगे जब तक कि, मोक्ष न होगा।
३८-हजरत शेख सादीका कौल
सगे असहाबे कहफ़ रोज़े चन्द ।
पथेनेकां गिरफ़्त मरदुम शुद ।
हजरत मूसा और ख़ाजा खिज़्र
रोजतुस्सफाके प्रथम भागमें लिखा है कि, जो पहले अलियास था बही फिर अदरीस होगया ।
३९-शेख फरीदुद्दीन अत्तार
हज़ार बार खमों कूजः करदः अन्द मरा ।
हनोज तलख निज़ाजम मर्ग शीरो जे कार ॥
अर्थात् सहस्त्र बार मुझको सुराही तथा प्याला बनाया है तो भी अभी तक मेरा स्वभाव कड़वा है मृत्युके मीठे कार्य्यसे तात्पर्य आवागमन है ।
४०-मीसाक अर्थात् प्रतिमाके विषयमें जो पहले मैं लिख आया हूँ कि, खुदाने जब हजरत आदमको उत्पन्न किया उस समय जादमाकी सब सन्तानोंको उसकी पीठसे निकालकर प्रतिज्ञा ली उनके हाथमें एक काला पत्थर दिया । इससे प्रमाणित हो चुका है कि, हजरत आदमको उत्पत्तिके समय वह काला पत्थर था ।
इब्र अम्बास—कहता था कि, फरमाया रसूलल्लाहने कि, जब उत्तरा हजतुल-आसूद भिहिश्तसे, तब उस समय वह दूधसे भी अधिक श्वेत था । पर मनुष्योंके पापने उसको काला बना दिया ।
संग आसूदका काला होना—रसूलल्लाहने फरमाया कि, वह पत्थर श्वेत था दूधसे भी अधिक । यह बात नहीं जान पड़ती कि, वह पत्थर कब श्वेत था । क्योंकि वह तो हजरत आदमके उत्पत्ति कालसे काला था, कालाही पत्थर खुदाने मनुष्योंको दिया । इससे प्रमाणित हुआ कि, वह पत्थर किसी काल और किसी दूसरी सृष्टिमें जिससे रसूलल्लाह अनभिज्ञ थे दूधसे अधिक श्वेत रहा होगा । परन्तु इस सृष्टि इसके पिता आदमके समयसे तो वह पत्थर कालाही चला आता है । उसके श्वेत होनेका कोई कारण नहीं है । हजरतके इस कथनसे उत्पत्तिके अनेक ढङ्ग और आवागमन प्रमाणित हैं ।
सिद्धिका नाश—बलअम बाऊर जिसका हूदीसमें विवरण है बरन तौरी-तमें भी निम्नलिखित रूपसे वृत्तान्त लिखा है कि, मूसाके पीछे आपका स्थानापन्न ईशू हुआ । वह बनीइसराईलका आचार्य था, खुदाने उसको बरकत देकर कहा था कि, मैं तुझको कनओं देशका राज्य दूंगा । ईशू खुदाके सहायतासे अपने सर्व वैरियोंपर विजय पाता चला आता था । जब बालक शाहसे उसका सामना हुआ तब पूर्वोक्त बालकने बलआम जिसको बलअमबाऊर भी कहते हैं उससे कहा कि, तू मेरे लिये प्रार्थना कर, जिसमें ईशूकी पराजय हो । यद्यपि बलआमने बालकशाहको समझाया कि, इस जातिको खुदाने बरदान दिया है, मैं कैसे उसे
मूसा और मौत
शाप दूँ ? तब बालकशाहने बलआमको बहुतसा द्रव्य तथा उत्तमोत्तम भेंट भेजे । बलआमके मनको अपने वशमें कर लिया । बलआमने ईशको शाप दिया तीन बार ईश परास्त हुआ । उसने खुदासे निवेदन किया कि, ऐ खुदा ! तूने इस जातिको वरदान दिया । अब परास्त क्यों किया ? तब आवाज आई कि, ऐ ईश तेरे लिये बलआम शाप देता है इस कारण तू पराजित हुआ है । ईशने प्रार्थना की, कि ऐ खुदा ! बलआमकी तपस्याका सब बल नष्ट करदे । तब बलआमकी सब सिद्धाई जाती रही ।
पूर्वजन्मका कुत्ता—यह बलआम पूर्वजन्ममें असहाक कहफका कुत्ता था । अपने पूर्वकालके शुभकर्मोंसे बलआमकी देहमें आतेही इसने बड़ी भक्ति की पर्वतोंकी गुफाओंमें जाकर बन्दना करता था तीनसौ बरसका सिद्ध था । ईशके विरुद्ध होनेसे उसकी सिद्धाई तो विलुप्त होगई पर खुदाने उसपर दया की वह वैकुण्ठको गया । मुसलमानी पुस्तकोंमें मैंने पढ़ा था कि, यह मनुष्य बड़ा विद्वान था । इसी प्रकार मनुष्यके शरीरमें पशु आवागमन करते हैं । मनुष्यके शरीरमें आकर सुकर्म करते हैं तो वैकुण्ठको जाते हैं, कुकर्मोंसे चौरासी लाख योनिमें आवागमन किया करते हैं नरकको भी चले जाते हैं । आवागमनके सम्बन्ध कभी भी नहीं टूटता, तुदफये असनाय अशरामें लिखा है यही हदीदमें भी आया है कि, असहाक कहफके कुत्तेकी रूह बल अमबाऊर (जिसमें मूसाके विरुद्ध बनी इसराईलको शाप दिया था) के चोलामें प्रवेश करके विहिश्त गये ।
४१ इस्लामी फिरके—करावत, कामला, मनसूरिया, मुफसिसला आदि सब फिरके तनासुखको मानते हैं उसको सभी स्वीकार किये बैठे हैं मुसलमानोंका मुतना सिखिया फिर्का कहता है कि, आत्माका बराबर आवागमन होता है ।
४२—मुहम्मदियोंका ग्यारहवां फिरका जो राजियाके नामसे प्रसिद्ध है । इस राजीअ जातिके लोग कहते हैं कि, हजरतअली पुनः संसारमें आवेंगे अभी वे बादलमें हैं ।
४३—मुसलमानोंके अठत्तरवें फिर्काका नाम तयारिया है । उनका विश्वास यह है कि, हजरत आदममें खुदाकी आत्मा थी । जब मनुष्यकी आत्मा देहसे निकल जाती है फिर दूसरे शरीरमें होकर संसारमें आया जाया करती है ।
४४—मुहम्मदियोंका छियासीवां फिर्का इसमाईलियाके नामसे प्रख्यात है । तारीखनिगारिस्तान और तारीख गिरिन्दा और विशेषतः जीन तुलतारीखमें लिखा है कि, इस जातिका विश्वास है कि, कुरान मनुष्यकी बनावट है किसी पक्के जालसाजद्वारा बनी है । क्योंकि, इसमें मिथ्याको सत्यके साथ
ऐसा मिलाया है कि, बिना भली प्रकार ध्यान दिये प्रत्येक मनुष्य उसको समझ नहीं सकता, मनुष्यहीकी आत्मा जब एक शरीर छोड़ती है तब दूसरी और तीसरी ओर अनगिनती देह धर धरके पुनः संसारमें आया जाया करती है।
४५ मुहम्मद बोध—कबीर साहबके ग्रन्थ मोहम्मद बोधमें लिखा है कि, मोहम्मद साहब पुनः उत्पन्न होंगे, उनको सत्यगुरुका उपदेश मिलेगा वे मुक्ति पावेंगे। इस बातपर नानक साहबकी साखी है। देखो नानकशाहकी जन्मसाखीमें लिखा है। जब नानकशाह भक्का गये थे उस समय मरदाना मीरासीसे कहा कि, मुहम्मद साहब पन्द्रह सौ वर्ष तक बैकुण्ठ में रहकर फिर पृथ्वीपर आकर एक शूद्रके गृहमें जन्म लेंगे। उनको परलोकी सत्यगुरु मिलेगा। उस गुरुकी दयासे वे परमधाम सिधारेंगे। यहाँ दोनों प्रतिष्ठित महापुरुषोंके कथनानुसार मुहम्मद साहबका आवागमन प्रमाणित होता है।
४६ प्रकृति नहीं बदलती—मनका विचार बदलनेके विषयमें मशकात किताब बाबुल ईमान अजाबुलक़ब्र अहमदसे रवायत अबीदरवासे इस प्रकार लिखा है कि, यदि तुम सुनो कि, एक पर्वत अपने स्थानसे टल गया तब तुम उसका विश्वास कर लेना। यदि सुनो कि, एक मनुष्यकी प्रकृति बदल गई तो कदापि विश्वास न करना। क्योंकि, मनुष्य अपनी प्रकृतिकी ओर झुका करता है। यह बात ठीक है कि, भाग्यने जो बनाया सो बन गया। मनुष्योंकी शिक्षा भी पशु-वोंको मनुष्योंके ढङ्गका बनाती है। कुरानमेंभी आया है कि, खुदा जिसको चाहे ईमान प्रदान करे, जिसको चाहे भटका दे। पूर्वजन्मके कर्मोंने स्वरूप बनाया। वर्तमान कृत्य उनको बदल सकते हैं। तीनों कालके कर्म आवागमनके बन्धनमें फँसे हुए हैं।
४७ अपनी आत्माका डालना—तौरीत तथा कुरान दोनोंसे यह बात प्रमाणित होती है कि, खुदाने आदमको अपने स्वरूपका बनाया। उसमें अपनी आत्मा डालदी। अतः खुदाने मनुष्यमें गमन किया। आदम सब मनुष्योंके भीतर गमन करते गये इस कारण एकसे अनगिनती हो गये। सर्व मनुष्यों का शरीर और आत्मा आदमका शरीर और आत्मा है आदमका शरीर और आत्मा खुदाका शरीर और आत्मा है। इस कारण सब मनुष्योंमें आदम आवागमन कर रहा है। आदममें खुदाने गमन किया। आदम खुदाकी आत्मा तथा शरीर है। देखो कुरानका (१४) सिपारा सूरत हजर (२) रकूअ (२९) आयतमें लिखा है :—
मुहम्मदसाहिब और मुहम्मदे गिजाली हजरत दाऊत नबी समीक्षा, सुलेमान
فَلَا تَأْسَوْيْ عَلَيْهِ وَنَفْسٌ فِي ضَيْقٍ قَفَّارٍ
अर्थात्—जब ठीक करूँ उसको और फूंकदूँ उसमें अपनी जान तो गिर पड़ियो उसके दण्डवत्में।
अर्थात् खुदा परितोसे आज्ञा करता है कि, जब मैं अपनी आत्मा फूंक दूँ तब तुम सब फिरिश्ते उसके दण्डवत्को झुक पड़ना। खुदाने आदममें गमन किया। आदम सब मनुष्योंमें इस कारण सर्व मनुष्यों तथा खुदाओंमें अविद्या तथा विद्याकी विभिन्नता है। यदि मनुष्यको विद्या हो तो खुदा तथा मनुष्यमें किसी प्रकारकी विभिन्नताही नहीं रह सकती।
४८ मनुष्यसे बन्दर—कुरानमें (९) सिपारा सूरए आराफ (२०) रुकूअ (१६२ से १६७) आयत पर्यन्त लिखा है। बदल लिया अन्यायियोंने उनमेंसे और नुकता सिवाय उसके जो कह दिया था। फिर भेजा हमने उनपर अज्ञाव आसमानसे बदला उनकी दुष्टताका। फिर बढ़ने लगी जिस कामसे मना हुआ था तब हमने हुकम किया कि, हो जाओ फटकारे हुये बन्दर।
दाऊदके समय शुक्रवारके दिन यहूदको प्रार्थना करना उचित था पर उन्होंने स्वीकार नहीं किया। शनिवारके दिन बन्दना करने लगे। आज्ञा थी कि, उस दिन मछलीका आखेट न करें, पर कुछ लोग करते रहे। खुदाने उन्हें बन्दर बना दिया। तीन दिन तक वे बन्दर रहे इसके पीछे मर गये। बन्दरोंकी सन्तान इन्हींसे अबतक प्रचलित है।
अब यह बात प्रमाणित हुई कि, पहली देहमें मनुष्य थे फिर बन्दर हुए उनसे बन्दरोंका वंश अबतक प्रचलित है।
नरक स्वर्गका जाना—इसी तरह हदीसोंके अनुसार महाप्रलयके मैदानमें चार प्रकारके मनुष्य प्रगट होंगे। वैकुण्ठके लोग, नरकके लोग, पशु तथा कीड़े मकोड़े। यह सर्व स्वरूप जो दिखाई देंगे अपने अपने कम्मनुसार स्थान पावेंगे। वैकुण्ठके वैकुण्ठ, नरकके नरक और इदं गिदं कीड़े मकोड़े और पशुओंमें गमन करेंगे।
४९ खिलाके अभिध्यामें लिखा है:—
إِنَّ الَّذِينَ سَبَقَتْ لَهُمْ أَمْوَالٌ وَأَوْلَادٌ عَمَّا يَبْعُدُونَ
अर्थात्—जिनके निमित्त हमारी ओरसे भलाई हो चुकी वे लोग नरकसे बचे रहेंगे।
फिर कुरानमें देखो :—
وَإِنَّ مِثْلَهُمْ لَأَوَّلُونَ
अर्थात्—कोई मनुष्य नहीं अर्थात् सब मनुष्य भले तथा बुरे एक बार अवश्यही नरकमें जावेंगे । अतः पहली बात पिछली बात सत्य हो । यह दोनों बातें एक दूसरेके विरुद्ध हैं । यदि एकको सत्य माना तो दूसरी झूठ होती है परन्तु यह दोनों आयतें सत्य हो सकती हैं कि, जिनके कर्म भले हैं वे इस शरीरसे नरकको न जायेंगे, पर किसी दूसरे शरीरमें जावेंगे । उनसे किसी प्रकारका पाप हो तो वास्तवमेंही संसार चक्रमें पड़कर नरकमें चले जायेंगे ।
५० तारीख मुहम्मदी—तालीम मुहम्मदी नामक पुस्तकके अनुसार इस प्रकार लिखा है कि, तजकिरतुलमौलामें काजी सनाउल्लाने इस विषयकी जाँचमें कि, मृत्युके पीछे मनुष्यकी आत्मा कहाँ जाती है कुरान तथा हदीससे बड़े विचारके साथ बहुतसा वृत्तान्त लिखा है । जिसका संक्षेप यह है । दो मकान हैं । एकका नाम सज्जैन है । अरबीमें सज्जैन बन्दीगृहको कहते हैं । अतः सज्जैन अत्युक्तिसे बड़ा जेलखाना है काफिरोंकी आत्मायें उसमें बन्द रहती हैं । दूसरा मकान अल्लैन है अल्लैन अल्लैयाका बहुवचन है । अर्थात् ऊँची खिड़कियाँ । अर्थात् वैकुण्ठ जहाँ मुसलमानोंकी आत्मायें जाती हैं ।
अबुदाऊदअबुहरीरा—का कथन है कि, हजरतने फ़रमाया है कि, वैकुण्ठमें एक पर्वत है वहाँ पर मुसलमानोंके बच्चोंकी आत्मायें जाती हैं । इवराहीम तथा सायरा उनका पालन करते हैं । जब महाप्रलय आवेगी तब उन बच्चोंकी आत्मायें उनके माता पिताको सौंप देंगे ।
मकदूलसे खायत है कि, मुसलमानोंके बच्चे पक्षियोंके सूतमें वैकुण्ठ में उड़ते फिरते हैं, फिरउनके घरानेके बच्चे एक काले रङ्गके पक्षीके समान हैं । जो प्रातःकाल तथा संध्याको नरकके सामने लाये जाते हैं । कुछ हदीसोंमें हैं कि, मुसलमानोंकी आत्मायें पक्षियोंके समान वैकुण्ठके वृक्षों पर उड़ती फिरती हैं । महाप्रलयके दिन शरीरोंमें आयेंगी पर शहीदोंकी आत्मायें एक हरे जानवरके पेटमें प्रविष्ट होती हैं रातके समय यानी बसेरेके समय उन कन्दीलोंके बीच जो कि खुदाके सिंहासनके नीचे लटकती हैं आकर बसेरा लेती हैं ।
समीक्षा—यहाँ यह बात समझना चाहिये कि, आत्माका कैद रहना सम्भव नहीं है शरीरके साथ वह सचमुचही कैद रह सकती है । यह भी ठीक नहीं कि, आत्मा किसीके प्रतिपालनका मुहताज हो । इबराहीम तथा सायरा
घृणाकी दृष्टिसे देखनेका फल
किसका पालन करेंगे क्या सौंपेंगे ? किसको सौंपेंगे ? बँकुण्ठके पर्वतपर मुसलमानोंके बच्चोंकी सब आत्मायें रहेंगी, नहरोंपर पक्षियोंके स्वरूपमें चरा करेंगी, इसको आवागमनके अतिरिक्त और क्या कहा चाहिये ? यदि कोई दूसरी जाति अथवा दूसरे धर्मका मनुष्य कहे कि, मुसलमानकी आत्मा मृत्युके पीछे पशु और पक्षी होता है तो वे असंतुष्ट हों । पर जब वे स्वयम् इस बातको स्वीकार करते हैं तो किससे कहा जावे ? इस बातको मुहम्मदी नहीं समझते कि, जब मानुषिक शरीर छोड़कर पशु पक्षी हो गया तो उससे क्या हीनावस्था होगी । वे लोग स्वजिह्वासे स्वीकार करते हैं मेरे कहनेकी आवश्यकता नहीं, न मैं यह कहना उचित ही समझता हूँ । जिसको वे बँकुण्ठ कहते हैं वह भी एक पृथ्वी है वहाँके वे पशु पक्षी हैं, मुसलमानोंके बच्चे और फिरउनके बच्चे दोनों पशुओंके योनिमें प्रवेश कर गये । फिर काफिर और मुसलमानोंमें क्या विभिन्नता है । शहीदोंकी आत्मायें सब हरे पक्षी होती हैं । हरा-लालश्वेत इत्यादि रङ्गके पशु समान हैं जहाँ उनका भाग्य है चरा करें जहाँ उनका भाग्य राह दिखावे वहाँ बसेरा करें । उनको क्या मालूम कि, खुदा कौन है, कहाँ चरने तथा बसेरा करनेसे क्या लाभ और क्या हानि है । सब प्रकारके पशुओं और पक्षियोंका नियम है कि, दिनभर चरते और साँझको बसेरा लेते हैं । खुदाई सिंहासन हो अथवा मानुषिक सिंहासन हो रातको तो कहीं बसेरा लेनाही पड़ेगा इन ध्यानो तथा विचारोंमें सभी मुसलमान धोखेमें पड़े हुए हैं ।
५१-तारीख मुहम्मदीके अनुसार-हदीसरोजतुलअहबाबके पहले फ़स्लके अन्तमें मुहम्मद साहब कहते हैं—
إِصْلَاحِ طَعْبَةٍ لِي أَرْكَامُهَا
अर्थात् पवित्र पुरुषोंकी पीठोंसे पवित्र माताओंकी पेटोंमें मैं बहुत दिवसोंसे पड़ता चला आता हूँ ।
मुहम्मद साहबका आवागमन—इस प्रकार बराबर होता चला आया है । मुहम्मदी इस प्रकार समझते हैं कि, आदमसे लेकर अबदुल्ला तक सब पिता प्रपितामह आपके पवित्र हों यह बात भी प्रमाणित नहीं होती । क्योंकि, आपके माता पिता पर महाकण्ठ उपस्थित हुआ । यदि कोई विचार करे कि, आदमका वीर्य और मुहम्मदकी आत्मातक इसलाबतअबःसे अरहाम ताहिरामें नुक़ल करता चला आया है तो फिर यह हदीस ठीक न होगी :—
योहन्ना नबी हजरत ईशा
أَوَّلُ مَخَاطِبِ اللَّهِ تَعَالَى
अर्थात् खुदाने सबसे पहले मुहम्मदके तेजको उत्पन्न किया ।
समीक्षा—यदि खुदाने सबसे पहलेही मुहम्मदके तेजको उत्पन्न किया होता तो आदमके वीर्यसे अबदुल्लाके वीर्यतक मुहम्मदकी आत्मा न आती । वरन् मुहम्मदहीका वीर्य तथा मुहम्मदकाही तेज समस्त संसारमें होता । क्योंकि, एकही शरीर तथा एकही प्राण समस्त संसारमें है । एकको छोड़कर दूसरेमें आत्माका प्रवेश करनेहीका नाम आवागमन है । लिखा गया है कि, खुदाने अपनी आत्माको आदममें फूँका । अतः खुदाकी आत्माने आदममें गमन किया । फिर मुहम्मदकी आत्मा खुदाकी आत्मासे पहले क्योंकर हो सकती है ।
५२ नरकमें देखा—मुहम्मद साहबके अनागतवक्ता होनेके तेरह वर्ष पीछे जब हजरतका मआराज (आकाशपर जाना) हुआ सन्स्त आकाशोंकी सैर करके जब आप फिर मक्केमें आये तब अबु-लहब हजरतजीके चचाने (तारीख मुहम्मदीके अनुसार) पूछा कि, तुमने अपने दादा अबदुल मतलबको कहाँ देखा, आपने उत्तर दिया कि, नरकमें देखा । यह बात सुनकर अबु-लहब जलमरा कि, मेरे पिताको यह नरकमें बताता है उसी दिनसे मुहम्मदका बैरी हो गया ।
समीक्षा—अब यहाँ पर विचारना तथा समझना चाहिये कि, जब मुहम्मद साहबने जाकर सब वैकुण्ठ तथा सब नरकोंको देखा तो सबको भरा पाया । वैकुण्ठके लोग वैकुण्ठमें और नरकके नरकमें थे । यदि कयामत (महाप्रलय) के पीछे लोग वैकुण्ठ तथा नरकको जाते तो वे सब स्थान भरे न होते । जब कि, कयामत (महाप्रलय) के पूर्वही नरक तथा वैकुण्ठको भरे तब कयामत (महाप्रलय) के दिनका हिसाब आज्ञानतासे करें । आवागमन अविश्वान्त प्रवाहित रहता है वैकुण्ठ नरक प्रत्येक समय तैयार रहता है ।
५३—मुहम्मदियोंकी कयामत (महाप्रलय) के स्थानोंमें अनेक प्रकारकी मूर्तियाँ दिखाई देंगी, जैसा जिसका स्वरूप है वैसीही योनि उनके लिये ठहराई गई है । इसी प्रकार उनका आवागमन होगा ।
५४—हदीसोंमें आया है कि, जब कयामत (महाप्रलय) में सब कुछ मिट जावेगा तब उसके पीछे अमृतस्त्रोत आकाशसे आवेगा । सब जीव पुनः जीवित हो जायेंगे । जितने जीव होंगे उतनेही छिद्र सब पृथ्वीपर होंगे समस्त छिद्रोंसे निकल निकलकर सब बाहर खड़े होंगे । कयामत (महाप्रलय) के
समीक्षा, मुहम्मद मुस्तफा
स्थानमें न्यायके लिये जावेंगे। हशर (महाप्रलय) गाह सदैवसे प्रचलित हो रहा है। पृथ्वीमें अनगिनती छिद्रसे तात्पर्य्य चौरासी लाख योनिसे है, अनगिनती योनि है सो सब भग है और आवहयात वीर्य है कि, यह आकाश अर्थात् ब्रह्माण्डसे उत्तरता है गर्भमें प्रवेश करके स्वरूप बनाता है। पुरुष आकाश है तथा स्त्री पृथ्वी है जब आरम्भमें पुरुष आकाश तथा पृथ्वी स्त्रीका स्वरूप हुआ तब वीर्य गर्भमें जाकर एकसे अनेक स्वरूप हो गया प्रत्येक छिद्रसे समस्त जीव निकल पड़े। न्याय यही है कि, अपने भाग्यानुसार सबको दण्ड तथा सुख है।
५५—देखो कुरानका चौबीस सिपारा सूरय मोमन (४) रकूअ (४५-४६) आयत पर्यन्त लिखा है कि, फिर बचा लिया खुदाने मूसाको बुरे दावसे जो करते थे और उलट पारी फिरऊनवालोंपर बुरी तरहकी विपत्ति। आग है कि, दिखा देती है उनको संध्यातक प्रातःकाल और जिस दिवस उठेगा कयामत (महाप्रलय) को प्रवेश करावेगा। फिरऊनवालोंको कठिनसे कठिन विपत्तिमें।
समीक्षा—कयामत (महाप्रलय) के पूर्व सहस्रों नरक तथा वैकुण्ठको जा चुके। सो बात पहले प्रमाणित हो गई। कयामत (महाप्रलय) की किसीको आवश्यकता नहीं रही। सकता की मृत्युको कब्रका कण्ट समझा गया। सुकर्मियोंको वैकुण्ठ तथा कुकर्मियोंको उस समय नरक दिखाई देता है। सब पुण्य फल तथा पापफल स्वप्नवत् बीत जाता है यह जीव अपने कर्मोंके अनुसार दुःख तथा सुखमें डाला जाता है। यहाँपर मैं मुसलमानोंकी प्रत्यक्ष गलती दिखाता हूँ। जो कोई सोचेगा समझेगा वो सुख पावेगा।
एक ब्रह्माण्ड है तथा दूसरा पिण्ड है। ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनोंका एक स्वरूप तथा एक अवस्था है, उसमें तनिक भी विभिन्नता नहीं, दोनोंके स्वरूपमें स्वरूप तथा एक अवस्था है, उसमें तनिक भी विभिन्नता नहीं, दोनोंके स्वरूपमें ब्रह्माण्ड पिण्डकी एकता है। सब पृथ्वीके तत्त्ववेत्तागण मानते हैं कि, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंका एकही स्वरूप तथा अवस्था है। जब पिण्ड दोनोंका और ब्रह्माण्ड एकही स्वरूप तथा अवस्था है तो ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनोंको महाप्रलय भी एकही स्वरूपका होना चाहिये। अपने समयपर पिण्डका विनाश होता है अपने समयपर ब्रह्माण्ड नष्ट होता है। एकही स्वरूप नष्ट तथा स्थितिका है। पिण्डकी स्थिति थोड़ी है ब्रह्माण्डका वय अधिक है। दोनों अपने अपने आयुका दौरा पूरा करके नष्ट हो जाते हैं।
इस बातमें यहूदी ईसाई तथा मुसलमान सभी बहुत भूल करते हैं कि, पिण्डके विनाशको ब्रह्माण्डके विनाशके समयका हिसाब लगाते हैं। क्योंकि,
पिण्ड तो अब नष्ट हुआ उसके सुकर्म तथा कुकर्मका हिसाब ब्रह्मांडके विनाश-कालमें होगा । जब पिंडका प्रलय हुआ तब उसी समय उसका हिसाब किताब हो गया । जब ब्रह्मांडका प्रलय होगा तब भी सबका भलीप्रकार हिसाब होगा । सब जीव अपने कर्मोंके साथ परलोकमें दूसरी उत्पत्ति तक रखे जावेंगे, जिसको मृत्युका सकता कहते हैं मुसलमान लोग उसीको कब्रका दुःख कहते हैं । वह जो यथार्थ बात है उसको भूलकर महम्मदी हदीसोंके लिखनेवाले भौति भौतिकी बातें बनाते हैं । कहते हैं कि, जब मनुष्य मर जाता है तब फरिश्ते उसको खुदाके सनीप ले जाते हैं वहाँसे भले बुरेका चिन्ह लेकर फिर उसको कब्रमें ला रखते हैं । यह सब भूल है वे यथार्थ तात्पर्यको न समझकर बातको दूसरे ढङ्गसे कहते हैं । यदि ज्ञानकी स्वच्छता होती तो ऐसी त्रुटी भी न होती । यह क्या बात है कि, रोगी तो मर गया पर उसका कफन दफन सहस्र अथवा लाख बरसके उपरान्त किया जावे । अवश्य ही उसका हिसाब उसी समय होगा ।
५६—कुरान तथा हदीसोंसे प्रगट है कि, जब महाप्रलय हो चुकेगा तो इसके पीछे सबकी भलाई बुराईको तराजूपर धरकर तौलेंगे, प्रत्येक मनुष्य अपनी अपनी भलाई बुराईके अनुसार फल पावेंगा । जिसका पुण्य अधिक होगा वह वैकुण्ठको एवं जिसकी बुराई अधिक होगी वह नरकको जावेगा, जिसकी भलाई-बुराई समान होगी वह मध्यमें जावेगा । मुसलमान लोग नरक तथा वैकुण्ठका वृत्तान्त जैसा उनको कहना आता है वह कहते हैं । वैकुण्ठ तथा नरकके मध्य स्थानको स्पष्ट नहीं कहते । क्योंकि, इस स्थानको पृथिवी कहते हैं । जहाँ पर जीव देह धरता है भौति भौति की योनिमें आवागमन किया करता है । पृथिवी आकाश और नरकवासी सब आवागमनमें संलग्न हैं कोई भी इससे बरी नहीं है ।
५७ बच्चेकी उत्पत्ति—प्रदारजुलनबौअत और तफसीर जलाली इत्यादिमें लिखा है कि, जब बच्चा गर्भमें आता है तब फरिश्ते आत्माको लाकर बच्चेकी मूर्तिमें डाल देते हैं जब यह बालक मातृगर्भसे बहिर्गत होता है तब हँसता है रोता है । जबतक यह बालक अनजान रहता है तबतक उसको वैकुण्ठके सुख दिखाई दिया करते हैं उनको देख देखकर वह हर्षित होता हुआ हँसता है । उसकी दृष्टिसे विलुप्त होनेके पीछे रोता है यह अपनी माताके गर्भसे बहिर्गत होता है उसको संसारकी बुराई तथा पाप घेर लेते हैं वैकुण्ठके पदार्थोंसे परदा हो जाता है । अन्त पूर्णतया अन्धकार घेर लेता है । फिर यह योग्य अवस्थाको प्राप्त कर जप तप करता है जैसी इसकी भक्ति होती है वैसाही प्रकाश प्राप्त कर लेता है ।
कुरानमें मूर्ति पूजा
समीक्षा—यहाँ विचारना उचित है कि, वही भोला बालक आदम था जबतक वह अनजान था यानी अत्यंत मूर्खताकी अवस्थाको अनजान जानना उचित है तब उसके लिये वैकुण्ठके सुख प्राप्त थे। वस्तुतः वैकुण्ठ, नरक, भय, चिन्ता, सुख, दुःख सब मूर्खोंके लिये हैं, बुद्धिमानोंके लिये नहीं हैं। बुद्धिमान तो वैकुण्ठ, नरक, दुःख, सुख सबको तुच्छ समझते हैं। वैकुण्ठ तथा नरकके दुःख सुखको यह आत्मा पूर्वसे ही जाननेवाली है। यदि यह पूर्वकर्मोंसे पवित्र होता तो ऐसा न होता यह बच्चा जितने कार्य करता है वे उसके पूर्वकर्मोंसे सम्बन्ध रखते हैं इसने पूर्व जन्ममें देह धरकर अवश्यही कर्म किये हैं। सब कर्मोंका जाननेवाला और कर्ता है। कोई जीव पशुओंमें हँसना नहीं जानता है। पर जब आत्मा मनुष्यका जामा (शरीर) पहनती है, तब उसको हँसने तथा रोनेका ज्ञान होता है। क्योंकि, उसको जब वैकुण्ठके सुख दिखाई देते हैं तब यह हँसता है, जब अन्तर्धान होते हैं तब यह रोता है। अन्यान्य पशु इस कार्यसे वञ्चित हैं। कहीं कहीं पुस्तकोंमें लिखा है कि, आदम अज्ञानावस्थामें हँसना नहीं जानता था पर जबसे उसने आज्ञा भङ्गकी तबसे उसको हँसना आया। इसका कारण यह है कि, आदम पहला आदमी था अनेक समयतक निर्जीव पदार्थ पत्थर इत्यादिके समान परलोकमें रह आया। हँसना रोना सब भूल गया था। इस कारण आदममें और आदमके बच्चोंमें इतना ही अन्तर है। क्योंकि आदम अनेक कालतक गतिविहीन पड़ा रहा। जब संसारमें आया तब अन्यान्य आदमजादोंके समान दुःख भी न पाया था। क्योंकि, हँसना और रोना भूल गया था। पर जब इसको शौतान गुरु मिला तब तुरन्त ही उसको सब विद्याओंकी सुधि हो गई। उसके पूर्वजन्मके सब कर्म प्रगट हो गये। यद्यपि बच्चा मूर्खता तथा आज्ञाना-वस्थासे अनजान कहलाता है पर उसके पूर्वकर्मके सब चिह्न उसमें प्रगट हो जाते हैं।
जो कहते हैं कि, फरिश्ते वैकुण्ठसे आत्मा लाकर मातृगर्भके पुतलेमें डाल देते हैं इसमें इतनी विभिन्नता है कि, मृत्युके पीछे आत्मा ऊपरको चढ़ती है ऊपरसे फिर किसी भोजन द्वारा जीवके वीर्य पथसे गर्भमें प्रवेश करती है। इस पर केवल इतना कहता है कि, क्या मनुष्य तथा पशुके वीर्यका एकही ढङ्ग है ? सबकी उत्पत्ति एकही स्वरूपसे हुआ करती है ? तनिक भी विभिन्नता नहीं ? क्या केवल मनुष्यकी ही आत्मा वैकुण्ठसे लाई जाती है कि, सब जीवोंकी ? क्या वीर्यको केवल शरीर बनानेकी सामर्थ्य है, रूह डालने का नहीं है ? वीर्य आत्मासे रहित नहीं। क्योंकि कबीर साहबका कथन है : चाममें माँस है
तात्पर्य—समीक्षा विशेष
मांसमें हाड़ है, हाड़में गूद है, गूदमें बिन्द है, बिन्दमें पौन है, पौनमें प्राण है, पौन और प्राण क्या भिन्न गाड़ ।
अतः वीर्यके साथ आत्मा है, आत्माके साथ उसके कर्म हैं । यदि वीर्यमें प्राण न होता तो उससे किसी वस्तुकी उत्पत्ति न होती । यदि आत्मा किसी और स्थानसे लाकर मातृगर्भमें डाला जाता तो शरीर भी किसा और स्थानसे लाकर स्त्रीके पेटमें रखा जाता । यह नहीं कि, आत्मा तो बँकुण्ठसे लाई जावे शरीर आपसे आप पेटमें बन जावे ।
५८ जिनका सर्प होना—मदारजुलनबोवतमें कहा है कि, जिन जब होता है तब अपना यथार्थ स्वरूप छोड़कर सर्प बन जाता है । जब उसके आयुका दौरा पूरा होजाता है तब सर्पकी देहमें गमन करता है । उसका चिह्न यह है कि, जब सापको मारते हैं उस समय ध्यान करना चाहिये कि, जिस सर्पके शरीरसे रक्त निकल उसकी जिन समझना चाहिये । जिसमें जलके स्वरूप कुछ पीला पीला या जल निकल उसको यथार्थ सर्प जानना उचित है । जिन तो आवागमन करे पर मनुष्य बिना आवागमनकेही रहे इस बातमें कोई विशेष प्रमाण दिखाई नहीं देता ।
५९ लौहमहफूजपर भाग्य—मुसलमानोंका विश्वास है कि, सब मनुष्योंका भाग्य पहलेसेही लौहमहफूजपर लिखा है । वह लौहमहफूज आकाशपर है दूसरी रवायतमें है कि, प्रत्येक मनुष्यके लिये पृथक् पृथक् लौहमहफूज है । फिर कहते हैं कि, सबके लिये एकही पुलसरात है । दूसरी रवायतम है कि, प्रत्येक मनुष्यके लिये पृथक् पृथक् पुलसरात है । ऐसेही कहा है कि, सबके लिये एकही तराजू है जिस पर सबकी भलाई बुराई तौली जायगी ; फिर दूसरी रवायतमें लिखा है कि, प्रत्येकके लिये पृथक् २ तराजू हैं । ये सब बातें अविद्याके कारण हैं कि कहने तथा समझनेमें लोगोंकी स्पष्टता नहीं । यह मैं पूर्वमें ही लिख आया हूँ कि, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंमें एकही बात है, कुछ विभिन्नता नहीं । यह कुछ कहा नहीं जाता कि, ब्रह्माण्ड पिण्ड हो गया कि, पिण्ड ब्रह्माण्ड हो गया । आकाश तथा पृथ्वी दोनों स्त्री और पुरुष होगये हैं इनसे समस्त संसारकी रचना हुई है यह दोनों दो हैं अथवा एक ? यह कौन कह सके वह लौहमहफूज कहनेको दो है वही दुबिधा तथा धोखा है वो मायाका खेल है उसे कौन पहचान सकेगा, पूर्वजन्मके सब चिन्ह मनुष्योंके शरीरसे दिखाई देते हैं यही लौहमहफूज है । जैसा कि मैं प्रथम लिख आया हूँ यह हृदय बुद्धिके समीप है बुद्धि आत्माके समीप है । आत्मलाभसे सब लाभ है । मनुष्य देह पाकर यदि अपनी मुक्तिका उपाय
न करे तो वह बड़ा अभाग्य है। ऐसा समय फिर कभी हाथ न लगेगा। इस मनुष्य देहके समान और कौन पदार्थ है? यदि इस शरीरमें चूका तो फिर लगातार आवागमन करताही रहेगा बहुत समयतक छुटकारा न होगा।
६० जीवोंका आनंत्य—आत्माके विषयमें मुहम्मदी इस प्रकार कहते हैं कि, खुदाने अनगिनती रुहेँ बनाई हैं यह बात कुछ कही नहीं जाती कि, एक है अथवा अनगिनती। इसका मकान तथा लामकान कहना उचित नहीं। वह एक है और अनेक भी है। उसके विवरणमें जिह्वा गूँगी है। मनुष्य हो अथवा देवता किसीमें कुछ कहनेकी सामर्थ्य नहीं है। यह बात समझना चाहिये कि, पहले केवल एक आदम था। इससे अनगिनती आदम हो गये। वह आदम न विभक्त हुआ न कुछ कम हुआ एक बीजसे वृक्ष उत्पन्न हुआ अनगिनती बीज तथा वृक्ष उत्पन्न हो गये। इस कारण मैं एक उदाहरण लिखता हूँ।
संन्यासीका उदाहरण—एक संन्यासी अपने योगबलसे अपनी आत्माको शरीरसे बाहर निकाल दूसरे शरीरमें प्रवेश करके अपनानाम जलदत्त रखा। एक समय वह जलदत्त सोया पड़ा था,। उसने उस समय स्वप्नमें देखा कि, एक नगरमें गया वहाँ मैं मदिरा पीकर मदमस्त हुआ। फिर उस स्वप्नावस्थामें गया फिर उसी स्वप्नावस्थामेंही दूसरा स्वप्न देखा कि, मैं एक परगनेका रईस हूँ उस शरीरके स्वप्नमें और स्वप्न देखा कि, मैं एक देशका राजा हो गया हूँ फिर उस स्वप्नमें और एक स्वप्न देखा कि, अब मैं स्त्री हो गया हूँ एक देवताकी पत्नी हूँ। फिर उस शरीरके स्वप्नकी अवस्थामें स्वप्न देखा कि, मैं हिरणीकी देहमें हूँ। उस हिरण्यकी देहमें और स्वप्न देखा कि, अब मैं लता हो गया हूँ और लता होकर एक वृक्षकी डालसे लपट रहा हूँ। फिर मैंने उस लताके शरीरमें और स्वप्न देखा कि, अब मैं जम्बूर (चिऊटी) हो एक कमलके पुष्पसे लपट रहा हूँ। उस देहमें स्वप्न देखा कि, अब मैं हाथी होकर ब्रह्माजीकी सवारीमें हूँ। ब्रह्मा मुझपर सवार होकर महादेवके भेंटके लिये गये हैं। जब मैं महादेवकी सभामें गया तब महादेवके दर्शनके प्रभावसे मुझको ज्ञान हो गया और फिर मैंने उस हाथीकी देहमें जो स्वप्न देखा तो मैं क्या देखता हूँ कि, मैं महादेव हो गया। फिर मैंने अपनेको बहुत बड़ा ज्ञानी पाया जब मैं ज्ञानी हो गया तब मुझको अपने सब आवागमन याद आये तब मैं अपनी पहली देहके पास जो संन्यासीकी थी गया। उस संन्यासीको सोतेसे जगाया, वह संन्यासी उठ खड़ा हुआ और अपने जाग्रत अवस्थाका सब कार्य करने लगा। फिर जलदत्तको जगाया। वह भी जागकर अपना सब कार्य करने लगा। रईसकी देहको सोतेसे जगाया
नबियों और उनके खुदापर एकदृष्टि
वह भी उठ खड़ा हुआ । फिर राजाकी देहको जीवित कर दिया और वह भी उठकर निजकार्यमें संलग्न हुआ । इसी प्रकार इस संन्यासीने अपनी सब देहोंको जगाया । उसने ज्ञानी होकर अपनी सारी देहोंको जीवित किया और अपना सारा समाचार कह सुनाया । प्रथम वह एक संन्यासी था । फिर कितनी जुदी २ मूर्तियाँ भाँति भाँतिके स्वरूप बन गये । एकही शरीर और एक आत्मासे कितनी अनगिनती और भाँति भाँतिके बहुततर शरीर तथा आत्मायें बन गईं । उसी समय उसी घड़ीसे अनेक हो गये । न बहुतेरे शरीर परमेश्वरने उत्पन्न किये थे न बहुतसी आत्मायेंही की थीं, इस कारण एक और अनेक कुछ कहाही नहीं जाता । एक भी है और अनेक भी है । ब्रह्मज्ञानीको अधिकार है कि जैसा स्वरूप चाहे स्वीकार करले । अब जानना चाहिये कि, जिसने यह संसार उत्पन्न किया, वह भी एक बड़ा ज्ञानी है ।
उस संन्यासीका गुरु शिव था और उसका ध्यान शिवमें था । अंतको परिणाम यह हुआ कि, वह स्वयम् शिव हो गया । यही परमेश्वर है यही सेवक है । ज्ञानकी अवस्था परमेश्वरी की है अज्ञानी होकर दास हो रहा है । जैसे मैंने पहले राजा विपश्चितका उदाहरण लिखा था, वैसेही यह उदाहरण संन्यासी और महादेवका है । वैसाही अग्नि देवता और पूर्वोक्त राजाकी अवस्थाको जानना चाहिये । जो कोई जिस देवताकी भक्ति करता है, अन्तको वही हो जाता है । स्वप्नवत् यह आवागमन करता जाता है । सिद्ध साधु तथा सामान्य आदि सभी आवागमनमें फँसे हुये हैं, किसीको कभी छुटकारा नहीं मिलता है ।
स्वप्नकी देह—सन् १८४२ ई० में जब मैं काशी नगरीमें था वहाँके मनुष्योंमें एक ऐसा रोग हुआ कि, कोई कोई रातको खा पीकर अपने पलंगपर लेटे जब सबेरा हुआ तब मुरदा पाये गये । ग्रंथोंमें यह बात विशेष विवरणके साथ लिखी गयी है कि, जो रातको सोता है यदि देरतक उसको स्वप्न आता है बहुत देरतक उसी स्वप्नको देखता रहता है तब उसका वह शरीर छूट जाता है । स्वप्नवाली देह ठीक हो जाती है । उसके स्वप्नमें साथ जो देह थी वही सूक्ष्म शरीर स्थूल होकर जाग पड़ती है । उसका प्रथम शरीर मृतक तथा निर्जीव हो जाती है । इस प्रकार सूक्ष्मसे स्थूल तथा स्थूलसे सूक्ष्म हो जाता है । जिसको वेद पुराणोंमें आधिभौतिक अन्तर्वाहिक देह कहा है ।
६१ मनशूरका सम्स तबरेज और बल्लेशाह होना— मुसलमानोंके फकीर स्पष्ट कहते हैं कि, जो मनशूर था वही शम्स तबरेज हुआ जो शम्सतबरेज था वही सरमद हुआ जो सरमद था वही बुल्लेशाह हुआ ।
६२ भूल— मुहम्मदियोंका ऐसा विश्वास है कि, एक बार उत्पन्न होकर करोगे, मरकर फिर जीवित होंगे, फिर कभी न मरोगे। इससे वे महाप्रलयके जीवनको समझते हैं। वो बात नहीं बरन् यह परमेश्वरमें लीन हो जानेकी बात है।
६३—बहुतरे महम्मदी अज्ञानतावश समझते हैं कि, मुझे निर्दोषकी परमेश्वरने नरकी बनाया। अथवा कष्टोंमें फँसाया।
अमीर खुसरो
न्याव न कीन कीन ठकुराई । विन कीने लिखि दीन बुराई ।
मौलवी रूम
हफ्तसद हफ्ताद कालिब दीदः अम् ।
बारहा चूँ सबजये रुईदः अम् ॥
मगज कुरआं अज जहाँ बरदाश्तम् ।
उस्तख्बों पेशे सगां अन्दा खतम् ॥
अर्थात् सात सौ सत्तर देह मैंने धरी, अनेक बार घास पातके संदूश जमा। कुरानका सार मैंने लिया, उसकी हड़डी (निःसार) कुत्तोंके सामने डालदी
६४—सयद भषशाहका वचन —
लख चौरासी बेलि लगाई । बेलि भरम भूलो मत भाई ॥
६५—इमाम जाफर साहिब—हयातुलकल्लबमें लिखा है हजरत इमाम जाफर साहबने फरमाया है कि, जब खुदाने जिबरईल इत्यादिको पृथ्वी पर मिट्टी लेनेको भेजा जिसमें कि, वह आदमकी प्रतिमा बनावे, उस समय पृथ्वी रोई चिल्लाई, क्योंकि, पृथ्वी अत्यन्त प्राचीन है इससे मनुष्योंके कुकम्मोंको सदैवसे जानती है। नहीं तो यह पृथ्वी कदापि रोती चिल्लाती नहीं। मनुष्योंके कुकम्मोंको यह जानती है।
६६ आदम और बेलकी बात — हदीसोंमें आया है कि, जब हजरत आदमको खुदाने बैकुण्ठसे निकाल दिया। इसके पीछे जिबराईलको भेजा कि, आदमको हल जोतना सिखलावे वँसाही हुआ। आदमने बेलको एक डण्डा मारा। बेलने कहा कि तू मुझको निर्दोषको क्यों मारता है? तू स्वयम् दोषी है। इससे प्रगट हुआ कि, मनुष्यमें पशु तथा पशुमें मनुष्य गमन कर रहा है। दोनोंमें एक, आत्मा है।
मसी हुद्ज्जाल ।
६७—लिखा है कि, महाप्रलयके पूर्व मसीहुद्ज्जाल प्रगट होगा।
उसका स्वरूप ऐसा होगा कि, उसका मूँह मनुष्यकासा और शिरपर गायकी सीगें होंगी, उसकी गायकी पूछ, घोड़ेकी गरदन, चीतेकी पीठ, हरिणकापेट, बन्दरके हाथ, ऊँटके पाँव होंगे और उसके एक हाथमें मुसलमानकी अगूठी तथा दूसरे हाथमें मूसाका ङ्ण्डा होगा । जिसको वह मूसाका सोटा छुलावेगा उसी समय उसका स्वरूप वैकुण्ठवासियोंकासा हो जायगा, जिसके माथेपर मुलेमानकी अगूठीका चिन्ह कर देगा उसी समय वह नरकका हो जावेगा । इस स्वरूपको मसीहूद्दज्जाल और दाबतुलअरज भी कहते हैं । प्रगट हुआ कि इस दाबतुलअरजमें खुदा गमन कर रहा है । नहीं तो उसको ऐसी शक्ति न हो तो यदि खुदा उसमें पैंठा न होता तो यह बल तथा सामर्थ्य कहाँ हो सकता था ?
६८—महाप्रलयका समाचार जड़ तथा चैतन्य सब कहेंगे । इसी कारण जड़में चैतन्य और चैतन्यमें जड़ गमन किया करता है ।
६९—शैतानका नरक जाना—मुसलमान कहते हैं कि, शैतान धिक्कारके योग्य है । भला पहले तो खुदाने कहा था कि, मेरे आतुरिक्त किसीको दण्डवत न करना, फिर खुदाने मिट्टीके पुतलेको दण्डवत करनेको कहा । यह तो खुदाहीकी ओरसे अधिकता थी । यह भी मान लिया कि, खुदाई आज्ञाको मानना उचित था । पर यह भी लिखा है कि, लौहमहफूज पर जब शैतान गया तब वहाँ लिखा हुआ था कि, एक मनुष्य सत्तर सहस्र वर्षतक तपस्या करेगा, अन्तमें वह नरकमें जायगा । शैतान सहस्र वर्ष तक रोता रहा तो भी नरकमें गया । उसकी कोई युक्ति काम न आई ।
मुसद्दस—छः लाख बरस बन्दगी में दिल जो दिया था ।
उस्ताद बदोनेक हयाते आब पिया था ॥
सालह वही इबलीसलकब दोनों लिया था ।
लाहासिल रोना सदहा तोबा किया था ॥
यह देखिले अब अगले करम जीवके जागे ।
तद्बीर नहीं चलती है तकदीर के आगे ॥
आदमसे कहे आदि पुरुष मानलै फरमान ।
हो जाबिता बाहोश व रख साबित ईमान ॥
एकरार खबरदार अदो तेरा है शैतान ।
बेसूद हुआ पन्द जो दुख द्रन्द घेरे आन ॥
दिन आधे ही आदम सो अदन छोड़के भागे ।
तद्बीर नहीं चलती है तकदीरके आगे ॥
जीव योनि. चौरासी लाख योनि
शहाद व नमरुद खुदा खुदको बताई ।
दशकंधर दुयौंधन को सीख सिखाई ॥
इवराहीमने सिखलाने में औकात गँवाई ।
मूसा की नसीहत फिरऊन फहम न आई ॥
टूटे न किसी हाल करम कालके धागे ।
तदवीर नहीं चलती है तकदीर के आगे ॥
दरगह से हुआ चोर करम डोर का बंधा ।
यम बन्द पड़ा है विषयानन्द यह अन्धा ॥
जाने नहि करता आजिज जीव जो बंधा ॥
हों पार निराधार शब्द सारके संधा ॥
पस होगये तापस मूँडचा मौन व नागे ।
तदवीर नहीं चलती है तकदीर के आगे ॥
आवागमननेही तकदीर ठहराया है और दूसरे किसीने नहीं ।
७०—जैसा कि, मैं पहले समाचारोंके अनुसार लिख आया हूँ कि, सब रुहँ मुहम्मदकी आत्माके गिर्द घूमा करती थीं । कारण यह कि, कबीर साहबके कथनानुसार मुहम्मद महादेवका औतार है । महादेव तमोगुण है, तमोगुणसे समस्त संसारकी उत्पत्ति है । सब तमोगुणसे बँधे हुये हैं सब तमोगुणको अपना राजा मानते हैं । इस कारण उसके चारों ओर फेरी करते हैं । वे अनगिनती जन्मोंसे बराबर आवागमन करते चले आते हैं । तमोगुण अर्थात् अन्धकार संसारका गुरु है ।
७१—बंचित रहनेका कारण — जब मुहम्मद साहबको पैगम्बरी मिली, तब आपके लिये खुदाकी ओरसे बही उत्तरा करती थी । उसके द्वारा आप कर्तव्याकर्तव्यकी बात बताते थे । इससे आवागमनका अंतर प्रकाश न रखते थे । सब पश्चिमी देशके पैगम्बर चार कारणसे आवागमनकी विद्याके जाननेके योग्य नहीं हो सके । उनके किसी पूर्व नबीको आवागमनका समाचार नहीं मिला और न कहा । इस कारण उनको इस बातका ध्यान भी नहीं हुआ । आवागमनके ज्ञान न होनेका कारण उनका मास भोजन तथा मदिराका पीना था जो उनके मनमें प्रकाश नहीं होने देता था । मांसाहारियोंसे कठिन तपस्या तथा वासनादमन नहीं हो सकती । इस कारण वे आवागमनकी विद्या जाननेसे वञ्चित रहे ।
अण्डजसे मनुष्य होनेके चिन्ह ऊभजसे मनुष्य होनेका चिन्ह
७२—चारवेद और किताबोंके सब विद्वान शरीयत, तरीकत, हकीकत, मारफतमें फँसे रहे। अल्प विद्या रखते थे इस कारण उनकी स्वच्छता नहीं हुई। आवागमनका ज्ञान हंसको अवस्था बिना प्रगट नहीं होता। मनुष्यकी चारों अवस्थाएँ बन्धन हैं।
अचेतावस्था—सुतरां डाक्टर गोल्डस्मिथके एनिमेटेंड नेचरमें लिखा है कि, एक विद्यार्थीको उसके शिक्षकने कठिन लेख लिखनेको दिया कि, उसको उसका लिखना कठिन हो गया। जब रातके समय अपने घर आया तब प्रदीप जलाकर लिखना चाहा। परन्तु वह इतना कठिन था कि, उसकी समझमें न आया तब विवश होकर सो गया। कुछ कालतक सोकर वह फिर उठा, लैम्प समीप रखकर उचितरूपसे लेख लिखकर फिर सोगया। जब सबेरे उठा तब अपना लेख भली प्रकार ठीक और अपने हस्ताक्षरमें लिखा देख बड़ा आश्चर्यान्वित हुआ। जब पाठशालामें गया तब उसने अपने शिक्षकसे कहा कि, मुझे बड़ा आश्चर्य है कि, मैंने तो इस लेखको लिखा नहीं था बरन् में अचेत होकर सो गया था, न जाने कौन मेरा यह लेख मेरे हस्ताक्षरमें लिख गया? क्या जाने कौन जिन्न या भूत लिख गया? यह बात सुनकर उसके शिक्षकको भी बड़ा आश्चर्य हुआ। चाहा कि, इस बातका यथार्थ जानें। उसने उस दिन और कठिन लेख लिखनेको दिया इसी प्रकार जब वह रातको अपने घर आया, बहुत सोच तथा चिन्ता करके विवश सोगया क्योंकि, उसको लिखना न आया इसी कारण सोगया अपने पलँगसे उठा। पूर्वानुसार उस लेखको अत्यन्त सावधानीसे लिखकर फिर सो गया। जब प्रातःकाल उठा तब वह लेख अपने हस्ताक्षर द्वारा लिखा हुआ पाकर अत्यन्त आश्चर्यान्वित हुआ। जब पाठशालामें गया तब अपने गुरुसे कहा कि, उसी प्रकार मेरा लेख रातको कोई मेरे हस्ताक्षरमें लिखकर चला गया है। उसका शिक्षक रातके समय उसके घरमें आकर छिप रहा। वह विद्यार्थी लैम्प आगे रखकर भलीप्रकार सोचने लगा, परन्तु उसके ध्यानमें कुछ नहीं आया कि, उस लेखको लिखें। अपने पलँगपर अचेत होकर सोगया। कुछ कालके पीछे पुनः अपने पलँगसे उठा। पूर्वानुसार लेख लिखके भली प्रकार प्रस्तुत करके फिर अपने पलँगपर सो गया। फिर सबेरे जब वह अपने पलँगसे उठा, उसके पहले उसका शिक्षक उस कमरेके बाहर निकल गया। वह विद्यार्थी अपना लेख उसी प्रकार लिखकर पाठशालामें गया। शिक्षकसे कहा कि, मेरी दशा तो पूर्वानुसारही हुई। न जाने मेरा लेख मेरे हस्ताक्षरमें कौन लिख जाता है। यह बात सुनकर उसके शिक्षकने कहा कि, ऐ लड़के ! यह सब तेराही कार्य