भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 807, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 807

वह भी उठ खड़ा हुआ । फिर राजाकी देहको जीवित कर दिया और वह भी उठकर निजकार्यमें संलग्न हुआ । इसी प्रकार इस संन्यासीने अपनी सब देहोंको जगाया । उसने ज्ञानी होकर अपनी सारी देहोंको जीवित किया और अपना सारा समाचार कह सुनाया । प्रथम वह एक संन्यासी था । फिर कितनी जुदी २ मूर्तियाँ भाँति भाँतिके स्वरूप बन गये । एकही शरीर और एक आत्मासे कितनी अनगिनती और भाँति भाँतिके बहुततर शरीर तथा आत्मायें बन गईं । उसी समय उसी घड़ीसे अनेक हो गये । न बहुतेरे शरीर परमेश्वरने उत्पन्न किये थे न बहुतसी आत्मायेंही की थीं, इस कारण एक और अनेक कुछ कहाही नहीं जाता । एक भी है और अनेक भी है । ब्रह्मज्ञानीको अधिकार है कि जैसा स्वरूप चाहे स्वीकार करले । अब जानना चाहिये कि, जिसने यह संसार उत्पन्न किया, वह भी एक बड़ा ज्ञानी है ।

उस संन्यासीका गुरु शिव था और उसका ध्यान शिवमें था । अंतको परिणाम यह हुआ कि, वह स्वयम् शिव हो गया । यही परमेश्वर है यही सेवक है । ज्ञानकी अवस्था परमेश्वरी की है अज्ञानी होकर दास हो रहा है । जैसे मैंने पहले राजा विपश्चितका उदाहरण लिखा था, वैसेही यह उदाहरण संन्यासी और महादेवका है । वैसाही अग्नि देवता और पूर्वोक्त राजाकी अवस्थाको जानना चाहिये । जो कोई जिस देवताकी भक्ति करता है, अन्तको वही हो जाता है । स्वप्नवत् यह आवागमन करता जाता है । सिद्ध साधु तथा सामान्य आदि सभी आवागमनमें फँसे हुये हैं, किसीको कभी छुटकारा नहीं मिलता है ।

स्वप्नकी देह—सन् १८४२ ई० में जब मैं काशी नगरीमें था वहाँके मनुष्योंमें एक ऐसा रोग हुआ कि, कोई कोई रातको खा पीकर अपने पलंगपर लेटे जब सबेरा हुआ तब मुरदा पाये गये । ग्रंथोंमें यह बात विशेष विवरणके साथ लिखी गयी है कि, जो रातको सोता है यदि देरतक उसको स्वप्न आता है बहुत देरतक उसी स्वप्नको देखता रहता है तब उसका वह शरीर छूट जाता है । स्वप्नवाली देह ठीक हो जाती है । उसके स्वप्नमें साथ जो देह थी वही सूक्ष्म शरीर स्थूल होकर जाग पड़ती है । उसका प्रथम शरीर मृतक तथा निर्जीव हो जाती है । इस प्रकार सूक्ष्मसे स्थूल तथा स्थूलसे सूक्ष्म हो जाता है । जिसको वेद पुराणोंमें आधिभौतिक अन्तर्वाहिक देह कहा है ।

६१ मनशूरका सम्स तबरेज और बल्लेशाह होना— मुसलमानोंके फकीर स्पष्ट कहते हैं कि, जो मनशूर था वही शम्स तबरेज हुआ जो शम्सतबरेज था वही सरमद हुआ जो सरमद था वही बुल्लेशाह हुआ ।