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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

समीक्षा, कयामतके दिनकी तीन बातें

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हाल लिख रहा था कि, घरके लोग आये उस बन्दरको कुरसीपर बैठकर लिखता हुआ देखकर आश्चर्यान्वित हुये कि, बिना पढ़ाये तथा बिना सिखाये इस बन्दरने कैसे लिखना जाना ? क्या मनुष्य क्या पशु सभी वासनाओंके फन्दमें फँसे हुए हैं । इसी बातको निम्नलिखित गजलमें भी दिखाया है --

नहीं कोई आदमी कोई बन्दर । नचाता रुहको करमें कलन्दर ॥

करमके जालमें यह जीव फन्दा । परीशां हाल यह फिरता है घर घर ॥

हुवा मुफ़लिस शहंशह आलमोंका । कि रि रता माँगते यह भीख दरदर ॥

सिग त तीनों वहम अरवा अनासर । किये घरखास इस अखलास अन्दर ॥

हवस नफसानिये आजिज दबाया । कि शहबतमें फँसा योगी मछिन्दर ॥

आदमी और मनुष्य सबको करम नचा रहा है कभी आदमी बना देता है तो कभी बन्दर बनाकर नचाता है । इससे मत्स्योदर जैसे योगियोंको भी नहीं छोड़ा ।

मृगेन्द्र ।

क्रोधी तथा बदला लेनेवाले मनुष्य शेरकी योनिमें जाते हैं, मृत्युके पीछे शेर तथा चीते आदिकी देह पाते हैं उनकी पहली आदतें उनके साथ होती हैं । शेर बड़ा वीर तथा साहसी होता है । यदि कोई शेरको धमकावे तथा गदहा आदि कहे तो वह बिना विलम्बके तुरन्तही उस पर टूट पड़ता है । या तो उसको मार लेता या उसके मारनेके उद्योगमें आपही मर जाता है । जो शेरको ललकारेगा वो कदापि जिन्दा न बचेगा । मैंने अपनी आखोंसे देखा है कि, गिड़गिड़ाने तथा प्रशंसा करनेसे शेर वशमें हो जाता है, उसका क्रोध ठण्डा पड़ जाता है । शेर बड़े उच्च स्वभावका होता है सुतरां बादशाहों तथा अमीरोंके शेरखानोंमें जो रक्षक रहते हैं वे शेर तथा चीतोंकी खुशामद किया करते हैं कि, आप अत्यन्त श्रेष्ठ हैं, आप उच्च घरानेके हैं, आपके बापदादे बहुत वीर तथा श्रेष्ठ थे वैसे ही आप भी हैं । आप बड़े पिताके पुत्र हैं । ये बस बातें सुनकर शेरका मन प्रसन्न तथा ठण्डा रहता है, यह अपने साथ किये हुए वर्तावको अच्छी तरह जानता है ।

कुमरसिंहजीका सिंह—पूर्वीय भारतके डुमरोंव रियासतके पास जगदीशपुर रियासत है । वहाँके राजाका नाम कुँवरसिंह था । एक समय उनका पालतू शेर छूटकर नगरके चौकमें जा बैठा । उस समय नगरके समस्त द्वार बन्द होगये थे, भयके मारे कोई घरके बाहर न निकलता था । राजाको समाचार मिला कि, आपका मोतीलाल शेर छूट पड़ा है, नगरका द्वार बन्द हो रहा है । राजा कुँवरसिंह स्वयम् ढाल तलवार लेकर जा पहुँचे उसका नाम लेकर कहा कि, ए

सालिग्राम पूजनेकी प्रतिज्ञा

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भोतीलाल ! तुमने बहुत दिनोंसे हमारा अन्न पानी खाया है, तुम आपसे आप चलकर अपने पिंजरेमें घुस जाओ नहीं तो मेरा सामना करो । वह कृतज्ञ व्याघ्र चुपके २ राजाके आगे होकर अपने पिंजरेमें घुस गया । उस दिनसे राजाने उसकी सेवा शुश्रूषाका खर्च बढ़ा दिया ।

कांटानिकालनेवाला—कोट काँगडेके पास एक शेरके पाँवमें लोहेकी ऐसी कील गड़ गयी थी कि, जिसके कारण वह बड़ाही दुःखी हुआ, क्योंकि, उसका पाँव बहुत ही सूज तथा पक गया था । वह एक मनुष्यके सामने बैठ गया अपना पिछला पाँव दिखाया । उसने देखा कि, उस शेरके पाँवमें एक मेख चुभी हुई है जिसके कि, कारण वह चल फिर नहीं सकता है । उस मनुष्यने उसके काँटेको पकड़कर खींच लिया, वह सुखी हो कृतज्ञता दिखाता हुआ चला गया ।

एक अहीरके पास बहुततेरी भेंसें थीं । वह शेर बड़ा बलिष्ठ था । जब भेंसको पकड़कर फेंकता था तो वह दूर जा पड़ती थी । गूजर देखा करता था कि, यह शेर तो हमारी भेंसोंकी बड़ी क्षति करता है । एक दिन उसने देखा कि, शेर भेंसोंके झुण्डमें घुस एक अच्छी भेंसका कान पकड़ उस मनुष्यके घर पर लेगया जिसने कि, उसके पैसे मेख निकाली थी । उसके मकानमें उस भेंसको छोड़कर चला आया । वह गूजर यह कौतुक देखता रहा । जान लिया कि, इस शेरने इस भेंसको इस मनुष्यको दे दिया है । उसने इस बातपर कोई हिचकिचाहट न दिखाई । जिसके घर भेंस गई उसने सानन्द रख लिया । पीछे उस शेरने अहीरकी दूसरी किसी भेंसको कोई भी कष्ट नहीं पहुँचाया ।

इस्पारमनसाहबका मत—अपनी हृष्यदेशकी यात्राके बृत्तान्तमें लिखते हैं कि, यह विचित्र बात है कि, यदि कोई शेरको क्रुद्ध करे तो भी वह सहसा मनुष्यकी हत्या किया नहीं चाहता केवल घायल करके जीवित छोड़ देता है अथवा अत्यन्तही उत्तेजित हो तो भी कुछ विलम्ब करके मारता है ।

होप साहब—का यह कथन है कि, हेमिलटन नगरके रहनेवाले एक धनाढ्य पुरुषकी बेगमके पास एक शेर था, कितने ही लोग उसको देखने आगये । द्वारपालने बेगमको समाचार दिया कि, एक जमादार अन्यान्य मनुष्योंके साथ शेर देखनेके लिये खड़ा है । बेगमकी आज्ञासे जमादार भीतर गया । उस समय शेर शिकारके लिये गुरा रहा था । जमादार शेरसे विज्ञ था, उसने पिंजरेके निकट जाकर उसका नाम लेकर कहा कि, नीरू ! नीरू ! तुम मुझको जानते हो ? उस समय तुरन्त ही वह अपना शिर उठाकर खड़ा हुआ, अपना भोजन छोड़कर पिंजरेके किनारे खड़ा हो दुम हिलाने लगा । उस जमादारने उसपर

समीक्षा, यथार्थ तात्पर्य वैकुण्ठका पक्षी

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थाप दी, अपने हाथसे सुहलाकर कहा कि, तीन वर्ष पीछे इस शोरको देखा है। जिब्राल्टरसे मैं इस शोरकी रक्षा करता आया हूँ। अब मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ कि, इस पशुने अकृतज्ञता नहीं की। एहसान नहीं भूला। वास्तवमें वह शोर उस जमादारको देखकर बहुत प्रसन्न जान पड़ता था। अपने प्राचीन मित्रको देखके इधर उधर फिरता था। उसकी उंगलियाँ चाटता हुआ प्रेम प्रगट करता था।

कच्चे मांस खिलानेका दोष—एक शोरको पक्का मांस तथा अन्यान्य वस्तु खिलाकर पाला था। वह शोर कुत्तोंके समान नम्र था। घरमें फिरा करता था। एक दिन कहीं उसने रक्त लगे मांसका भक्षण कर लिया। उसको खातेही बहुत घातक हो गया। अत्यन्त शीघ्रताके साथ उसने उस मनुष्यको जो समीप खड़ा था फाड़ डाला। भयानक रवसे गरजता हुआ वह बनकी ओर चला गया। फिर उसे किसीके आधीन क्यों रहना था?

शोरका प्रेम—एक शोर बड़ा सुन्दर था, उसकी सुन्दरताके कारण वह सङ्गलसे पेरिस नगरको पहुँचाया गया था। जहाजपर चढ़नेके समय बहुत बीमार हो गया था इस कारण उसे मरनेके लिये लोग पृथ्वी पर छोड़ गये। एक पथिक जो आखेटसे आता था उसने उस शोरको अत्यन्त विवश देख उसपर बड़ी करुणा दिखलाई, कुछ दूध उसके मुँहमें डाला। उससे उसको सन्तोष हुआ। उसको आराम मिला। उस समयसे वह शोर ऐसा हिल गया, एवं अपने ऊपर कृपा दिखानेवालेसे इतना प्रेम करने लगा कि, उसके गलेमें रस्सी डालकर कुत्तोंके समान जिधर चाहता उधर ले जाता था। वह खाना भी उसीके हाथसे खाया करता था। शेरनी शोरका रखवाला तथा सेवा करनेवाला एम. फील्कस नामक एक मनुष्य था, उसे बहुत बीमार हो जानेपर शोरकी सेवासे रहित कर दिया गया। कई दिन बीत गये पर सेवा करने न गया। उनकी सेवाके लिये दूसरा मनुष्य नियुक्त किया गया। पर उनका प्रथम सेवक जो उनको पेरिस नगरमें लाया था बीमार पड़नेसे न आया तो शेर भी खाना पीना सब छोड़ पिंजरेके एक कोनेमें उदास पड़ा रहने लगा। कोई भी अपरिचित मनुष्य उसके समीप जाता तो वो उसपर गुराँता हुआ कोलाहल मचाके अरुचि प्रकट करता था। यहाँ तककी अपनी शेरनीके साथ रहनेसे भी घृणा करता हुआ उससे भी पृथक् रहने लगा। वह पशु रोगी जान पड़ता तो भी भयभीत होकर कोई उसके पास नहीं जाता था। अन्तमें उसका सेवक अरोग्यता प्राप्त करके उसके पास आया। उसने पिंजडेकी छड़ोंके समीप जाकर उसको अपना मुँह दिखलाया जिसमें उसको आश्चर्यान्वित

पूर्वके प्रेम आदि भाग्य

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करें । जब शेरने उसका मुँह देखा तो कूदा उछला और उस छड़के समीप आकर अपने पञ्जेसे उसको प्यार करने लगा तथा मुँह चाटने लगा । मारे प्रसन्नताके कौपने लगा, शेरकी भादा भी उसको प्यार करने दौड़ी । उस शेरने उसको भगा दिया । जिसमें वह भी उसकी आरोग्यतापर प्रसन्नता प्रगट करनेमें भाग न ले । तब वह रखवाला उस पिंजरेके भीतर घुस गया बारी बारी दोनोंको प्यार किया । इसके, पीछे प्रायः उन दोनोंके पास जाया करता था । उनपर उसका पूरा अधिकार था जो चाहे सो करावें वे दोनों उसको बहुत प्यार किया करते थे ।

रीछ और शेरकी मैत्री—निउआरलैंस नामक नगरमें एक बड़ी ही विचित्र घटना हुई । कौतुकी निर्दयी मनुष्योंने सन १८३२ ई० में एक पुराने हन्श देशके शेर बबरके पिंजरेमें एक रीछ डाल दिया । वह जिससे यह रीछके टुकड़े टुकड़े कर दे । इस निर्दयताका तमाशा देखनेके लिये अनेक मनुष्य एकत्रित थे । रीछ लड़नेके विचारसे उस शेरके सामने दौड़ा । पर जैसा लोगोंने अनुमान किया था वैसा नहीं हुआ । रीछने शेरके शिरपर अपना पञ्जा धर दिया मानों उसने अपनी दया प्रगट करके उसके साथ मैत्री करना चाहता हो । शेर इस ध्यानसे कि, यह रीछ मेरी शरण आया है, प्यार करता हुआ अत्यन्त रक्षा करता था । किसीको अपने पिंजड़ेके निकट नहीं आने देता था । अपने नवीन मित्रका बहुत ध्यान रखता था । यहाँ तक कि, आप भूखा रहकर भी उस रीछको भली प्रकार भोजन देता था ।

तेंदुआ—की शेरहीके समान ही आदत होती है । एक मनुष्यसे मालूम पड़ा कि, जब वह पथसे चला जाता था तो देखा कि, एक तेंदुआ उसकी राहके बीच खड़ा है । वह मनुष्य उसको देखते ही घबरा गया । उसको उस समय कोई युक्ति न सूझी पर अपनी टोपी उतारकर सलाम करके कहा कि, ऐ साहब ! सलाम । यह बात सुनते ही वह तेंदुआ उस मुसाफिरसे कुछ न कहकर चला गया ।

शेरका बच्चा—कुछ जहाजी लोग छः सप्ताहके एक शेरके बच्चेको जहाज पर उठा लाये । वह उनके साथ रहने तथा प्रेम करने लगा । यहाँ तक कि, वह उनके पलंगपर लेटा रहता था, जहाजी तकियाके स्थानपर उसको अपने शिरके नीचे रखकर लेटा करते थे । उसके बदले वह शेर जहाजियोंके खानेका मांस चुराकर खा जाया करता था । एक दिन उस शेरने बड़ईके खानेका मांस भी चुराया पर उसके मुँहमेंसे वह बड़ई फिर छीन ले गया । चोरीके बदले, उस शेरको खून मारा । उस शेरने कुत्तोंकी तरह दण्डको सहन कर लिया । वह वृक्षकी डालियोंपर बिल्लियोंकी तरह चढ़ जाया करता था, भाँति भाँतिके

हजरत शेख सादीका कौल

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विचित्र खेल किया करता था। उस जहाजपर एक कुत्ता था। उसके साथ वह खूब खेला करता था। एक बरसका पूरा होनेके पहले इङ्ग्लेण्डमें पहुँचा दिया।

चीता—बिल्लियोंकी तरह अपने बच्चोंको आपही खा जाया करता है कोई कोई प्रेम भी किया करते हैं। कप्तान विलियमसन साहबका कथन है कि, जब वह बाहर शिकार करने गये तो उन्होंने चीतेके चार बच्चे देखे, उनमें से दो को उठा लाये। उनकी माता शेरनी उस समय वहाँ नहीं थी। रातके समय वे दोनों चिल्लाया करते थे। कुछ दिवसोंके पीछे वह बच्चोंको दूँदती हुई उसी अस्तबलके समीप आ ऐसे जोरसे चिल्लाई कि, उसके सारे रखवाले डर गये बच्चोंको द्वारके बाहर निकाल दिया कि कहीं ऐसा न हो कि, वह शेरनी तख्ता तोड़कर भीतर चली आवे। वह शेरनी रातको ही अपने दोनों बच्चोंको लेकर जङ्गलमें चली गई।

हाथी

हाथी बहुत बुद्धिमान पशु है। उसकी अधिक बुद्धिका प्रमाण यह है कि, वह प्रत्येक वस्तुको आजमाकर तब उसपर पाँव रखता है यदि निर्बल हो तो, उसपर पाँव नहीं धरता, बड़ा कौतुक तो यह है कि, हाथी रस्सियोंपर नाचता है।

सिलोनका हाथी—सिलोन टापू जिसको लङ्का भी कहते हैं, वहां जब उसी देशके मनुष्य राज्य करते थे तो उनका भी यही नियम था कि, जो बंधुवा मारे जाने योग्य होता था उसको हाथीके पाँव तले दबाते थे। जब वहाँका हाकीम हाथीको आज्ञा देता था कि, इस कैंदीको भली प्रकार लिथाड़ जिसमें इसको अधिक कष्ट हो, तब वह हाथी उसको भली प्रकार लिथाड़ा करता था। जब-तक दूसरी आज्ञा न हो तबतक कदापि नहीं मारता था। जब हाकिम आज्ञा देता था कि, अब इसको मार दे तो वह उसको मार देता था। उसके शिरपर एक पाँव और दूसरा पाँव पेटे पर धरकर उसके जीवनका अन्त कर देता था।

उम्र—हाथीकी बुद्धि तीक्ष्ण तथा वयस सौ वर्षके लगभग है।

कृतज्ञता—एकबार सुना गया था कि, एक हाथीके पैरमें एक लोहेकी कील गड़ गई थी वह विवश होकर एक स्थानपर पड़ा रहता था। उसकी सुधि लेनेवाला कोई न था उसके जिस पाँवमें कील गड़ी थी उसको ऊपर किये पड़ा रहता था। जो मनुष्य उधरसे जाता तो उससे इशारा करके बताता कि, मेरे पाँवमें कील गड़ी है परंतु जङ्गली हाथी जानकर लोग डरके मारे भाग जाते थे। अन्तमें एक मनुष्य उसका अभिप्राय समझ गया, साहस करके हाथीके निकट गया। हाथीके पाँवको देखा तो उसमें एक लोहेकी कील गड़ी थी। उसने

शेख फरीदुद्दीन अत्तार

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उसके निकालनेकी अनेक युक्तियां की पर वह नहीं निकली । वह दौड़कर बस्तीमें से एक संड़ासी ले आया उसके पांवको खूब जोरसे दबाकर उस संड़ासी द्वारा उस गुलमेखको पकड़ बाहर निकाल दी । उस हाथीको सुख मिला उस मनुष्यको धन्यवाद देनेके बदले उसने उस मनुष्यको अपने सूँडसे पकड़ अपने शिरपर बैठकर उसका आभिवादन किया ।

पुत्रसे प्रेम-बनारसके राजाके पास एक बहुत मस्त हाथी था, उसने किसी अपराधके कारण महावत मार डाला । फीलबानके मरनेपर उसकी स्त्री अत्यन्त क्रुद्ध तथा दुःखी होकर हाथीके निकट अपने छोटे बच्चेको भी उसके सामने डाल कर बोली कि, ले इसको भी मार डाल । क्योंकि, अब इसका पालन कौन करेगा ? उस हाथीने धीरेसे उस बच्चेको उठाकर अपनी गरदन पर बैठकर इशारा किया कि, अपने पिताके स्थान अब यह फीलबानी करेगा ।

बनेलेकी बुद्धिमत्ता—सम्बत् १८६० विक्रमीमें पञ्जाबदेशके आनन्दपुरके चारों ओर बड़ा भारी वन था । वहाँ एक गाँवके समीप मक्काके खेत थे । एक खेतमें मँचान पर एक मनुष्य बैठा रखवाली कर रहा था । रातके समय उसके निकट एक हाथी आया, उसको मँचानसे उतारके पृथ्वी पर रख दिया । उसके सामने उसने अपना एक पांव दिखलाया उस समय चाँदनी रात थी । उसने देखा तो हाथीके पांवमें लकड़ीकी एक मेख गड़ी हुई दिखाई दी । उस मनुष्यने लकड़ीको पकड़कर खींच लिया, जब हाथीको परम सुख मिला तो उसने उसको अपने शिरके ऊपर रखकर उसी मँचान पर रख दिया, उस दिनसे हाथीका यह नियम हुआ कि, प्रति दिन दूसरोंके खेतसे मक्कियाँ उखाड़ उसके मँचानके समीप रखकर चले जाना । अन्यान्य मनुष्य उस मनुष्य पर चोरीका दोष लगा दोहाई मचाने लगे कि, यह मक्काकी चोरी करता है । उस मनुष्यने शपथ की कि, मेरा यह कार्य नहीं है, अन्तमें मनुष्य रातको छिपकर देखने लगे तो देखा कि, एक बनेला हाथी मक्का उखाड़कर उसके मँचानके निकट ढेर कर जाता है लोगोंने आग जला तथा दूसरे २ भय दिखाकर उस हाथीको इस कार्यसे रोका ।

मक्कारीका बदला—एक चित्रकार हाथीको बुला उसके मुँहमें फल तथा चारा देने लगा । वह हाथी अपनी सूँड ऊपर किये खड़ा होता वह उसके मुँहमें डालता जाता । कुछ दिनके पीछे बहुत चारा डालनेके भयसे उसने बन्द कर दिया केवल चारा डालनेका बहाना मात्र करने लगा । हाथीने जाना कि, यह मेरे साथ हँसी करता है । इस बातसे असन्तुष्ट होकर अपनी सूँडमें जल भर उसके चित्रोंपर डालकर नष्ट कर दिये ।

इब्र, अब्बास संग आसूदका काला होना सिद्धिका नाश पूर्व जन्मका कुत्ता, इस्लामी फिरके

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बोरडरका कथन है कि, इङ्ग्लिस्तानमें एक हाथी था। उसके साथ एक मनुष्यने दिल्ली करके डेढ सेंरकी रोटीके साथ अदरकके टुकड़े मिला पकाकर खिला दिये। वह हाथी अज्ञान वश खा गया। कुछ क्षणोंके पीछे उसको बड़ी गर्मी जान पड़ी। उसने अपने महावतसे जल मांगा, उसने छः डोल पानी दिया। वही डोल पकड़कर उस हाथीने जिसने रोटीके साथ अदरक दिया था उस मनुष्यको ऐसा मारा कि, वह मर जावे वरन् वह नहीं मरा। एक वर्ष पीछे वही मनुष्य पुनः उसी हाथीके समीप आया, पुनः दो प्रकारकी रोटियाँ लाया। अच्छी रोटी तो हाथीने खाली जब गरम रोटी देखी तो क्रोधसे उस मनुष्यकी कुरती पकड़ ऊपरको उठाया। कुरती की आस्तीन निकल गई। वह अधमुआ होकर पृथिवीपर गिर पड़ा जो हाथीकी सूँडमें उसके कुरतेकी आस्तीन रह गई भी उसके टुकड़े टुकड़े करके उस मसखरेके सिर पर मारे।

शिकारीको दण्ड—बहुतेरे अंग्रेजी अफसर हृन्शके देशके हाथियोंका आखेट करने गये। उनमें एक अफसर बड़ा निडर शिकारी था, वो ठीक निशाना मारता था। उसने एक हाथीको घायल किया। उसने हाथी पर गोली मारी तो गोलीने इस पर भली प्रकार फल न दिखाया, हाथीके शरीर में ठण्डी हो गई। वह क्रुद्ध हाथी भयानक हो उन अफसरोंकी ओर झपटा। अन्यान्य सब अफसरोंको छोड़कर उसीको पकड़ लिया जिसने कि, उसको गोली मारी थी। उसको पकड़कर ऐसे जोरसे पृथिवी पर पटका कि, उसका प्राण निकल गया। उसके शवको चूर चूर कर धूलमें मिला दिया। यह भयानक काण्ड देखकर समस्त अफसर भाग गये। पर दूसरे दिन पुनः उसी स्थानपर आ उसकी हड्डियोंका चूर्ण एकत्रित करके वहीं गाड़ दिया।

आसक्ति—जार्डनड सप्लाटसमें एक घरैला हाथी रहता था। वह एक छोटी बालिका पर आसक्त था। नित्य प्रातःकाल वह उस स्थानपर उस लड़कीको देखकर प्रसन्न होता था, वह लड़की भी हाथीको देखकर प्रसन्न रहा करती थी। जब वह हाथी आता तो धीरेसे अपनी सूँड लड़की की बगलके भीतर चला इशारा करके चला जाता था।

बच्चेका माँ पर प्रेम—शिकारियोंने एक हथिनीको मारा तो वह मर गई। उसका एक छोटा बच्चा था। वह माताके दुःखके कारण चारों ओर घूम कर चिल्लाने लगा। उस हथिनीके साथी अन्यान्य हाथी तो भाग गये पर उस बच्चेने माताका शव नहीं छोड़ा। शिकारियोंको वह रात वनमें बीती प्रातःकाल वे सब उस बच्चेके निकट आये उसको बहुत कुछ धीरज धराने लगे पर

मुहम्मद बोध

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वह बच्चा सन्तुष्ट न हुआ, अपनी माताके दुःखमें दौड़ता फिरा वह अपनी माता-परसे गिद्धोंको हटाता फिरता था। अत्यन्त उद्योग तथा परिश्रमसे अपनी माँको उठाया चाहता था पर वह मृत देह कैसे उठे ? यद्यपि उस बच्चाको परिश्रमका फल नहीं मिला तो भी उसके प्रेमकी यह प्रशंसा अवश्य है।

शिक्षण—एम् फ्रेडरिक क्वेरे साहब पशुपालन विधिके वर्णनमें लिखते हैं कि, जार्डन डिस्प्लाटसमें एक हाथी था, वह केवल तीन चार वर्षका था तो उसकी सेवा एक युवकको सौंपी गयी। उस हाथीको ऐसे ऐसे कौतुक सिखाये, जिन्हें कि, देखकर मनुष्यका मन मोहित होता था, वह अपनी सेवा करनेवालेको बहुत चाहता था उसकी आज्ञाको कदापि नहीं टालता था। उसकी अनुपस्थितिमें तथा उसको न देखनेसे बहुत अप्रसन्न रहता था। कोई दूसरा उसकी कितनी ही सेवा क्यों न करे पर तो भी वह उसस प्रसन्न न होत था दूसरोंके हाथसे कठिन-नताके साथ खाता पीता था।

दरजीको दण्ड—डाक्टर गोल्डस्मिथ साहबकी नेचरल हिण्ट्रीमें लिखा है कि, दिल्ली नगरीमें एक हाथी चला जाता था। वह एक दरजीकी दूकानके पास होकर गुजरा। उसने दरजीकी दूकानमें अपनी सूँड डाली। दरजीने उसकी सँडमें सूई चुभो दी। उस समय तो वह हाथी चुपचाप चला गया, उस पथसे पलटा तो सँडमें कीचड़ भर लिया, उस दर्जीकी दूकानपर पहुँच उसके कपड़ोंपर डाल दी, जिससे जो जो अच्छे कपड़े उसकी दूकानपर फँल रहे थे कीचड़से भर गये। उसने इस प्रकार अपने सुई चुभानेका बदला उस दरजीसे ले लिया।

लिपी—इसी किताब में लिखा है कि, एक हाथी सँडकी नोकसे लेखनी पकड़कर बहुत उत्तमतासे लाटिनके अक्षर लिखा करता था। हाथी बहुत बुद्धिमान और सचेत पशु है। जब यह बनमें रहता है तो बड़ा हाथी झुण्डके आगे आगे चलता है। हाथीमें यह बड़ा गुण है कि, वह बस्तीमें रहता है तो सम्भोग नहीं करता, हाथीकी बुद्धिमानीकी अनेकों बातें लिखी हुई हैं।

गेंडा

गेंडा भी एक बड़ी जातिका जानवर है, उसके सूँघने सुननेकी बड़ी तीक्ष्ण शक्ति होती है पर उसकी आँखें छोटी हैं इस कारण वह थोड़ी दूरतक देख सकता है, गेंडा हवस देश तथा भारतवर्षमें होता है। उसमें भी हाथीके ही समान बुद्धि होती है उसका आखेट भी लोग करते हैं।

बेफीगाकी सहायता—गेंडा बनमें चरता फिरता है उसके साथ एक

प्रकृति नहीं बदल सकती अपनी आत्माका डालना मनुष्यसे बन्दर

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छोटी चिड़िया होती है। उस चिड़ियाको अंग्रेजी भाषामें बेफीगा बोलते हैं। यह गेंडेकी बड़ी सहायता करती है। यह सर्वत्र गेंडेके ऊपर बैठी रहती है उसके शरीरकी जुवोंको खाया करती है, गेंडेके शरीरको स्वच्छ रखती है। गेंडा थोड़ी ही दूर देख सकता है, इस कारण जगदीश्वरने इस बेफीगाको उसका अङ्गरक्षक बनाया है। क्योंकि, शिकारी लोग इसको मारनेके लिये आते हैं तो यह पक्षी दूसरे देख लिया करता है। शिकारियोंको देखकर उसी मसय ऊपर उड़कर बड़ा कोलाहल मचाता है और गेंडा उसके चिल्लानेके तात्पर्यको खूब समझता है कि, अब शिकारी मुझको मारने आते हैं, तुरंत भाग जाता है शिकारी उसको नहीं पाते। यदि वह अचेत सोया हो आखेट करनेवाले आकर उसे मारना चाहें तो चिड़िया बहुत कोलाहल करके गेंडेको जगा देती है। उसके चिल्लानेसे न जागे तो वह उसके कानके परदेमें चोंच मार मार कर ऐसी चिल्लाती है कि, अन्तमें वह जाग ही जाता है, गेंडा अपने मित्रकी सूचनाका ज्ञान होते ही तुरन्त भागकर घोर बनकी राह ले लेता है।

ऊंट

रेगिस्तानकी एक सवारीका नाम है। इसकी सवारी रेतीमें अच्छा काम देती है, अरब और राजपुतानेके मैदानमें इसका अच्छा प्रचार है। संस्कृतमें इसे उष्ट्र कहते हैं, साहित्यिकोंने इसे करहुला कहा है।

ऊंटकी प्रतिहिंसा—पञ्जाब प्रान्त सिरसा तहसील दण्डावली थानाके चोराला गांवमें एक जमींदारने अपने ऊंटको मारा। वह ऊंट कुछ होकर बदला लेनेको उतारू हो गया। एक रात वह जमींदार अपने खेतमें लेटा था ऊंटको घरके बाड़ेके भीतर जञ्जीरसे बांध गया था। जमींदारका दूसरा भाई उस द्वारके ऊपर चारपाई पर लेटा था। जब सब मनुष्य निद्राके वशीभूत हुये, चारों ओर सन्नाटा छा गया तब ऊंट इतना धीरे २ चला कि, खड़का भी नहीं जान पड़ा। बाड़ेके द्वारपर पहुँचा धीरेसे उस जमींदारके भाईको फांद गया उसको तनिक भी खड़का न जान पड़ा। धीरे धीरे खेतकी ओर चला जहां कि, वह जमींदार लेटा पड़ा था। ऊंटके घुंधरूका शब्द हुआ उस समय जमींदार जाग पड़ा जान गया कि, अब ऊंट अपना प्रतिशोध करने आता है मुझपर अवश्यही चोट करेगा। ऊंट पहुँचा वह जमींदार अपनी चारपाई छोड़कर भाग गया जहां कि, मूंगका ढेर लगा था उसके भीतर छिप गया। ऊंट जमींदारकी खाटके निकट पहुँचा। उसको खाली पाया इधर उधर ढूँढ़ने लगा। ऊंटके संधनेकी शक्ति अधिक होती है। इस कारण वह संधता हुआ उस घासके ढेरके निकट पहुँचा

नरक स्वर्गका जाना तारीख मुहम्मदी

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जहां कि वह जमींदार छिपा हुआ था । मूंगके खलिहानको तितर बितर करके उसको पबड़ लिया पीछे घसीट घसीटकर मारड़ला । अपने मुंहसे उसके अङ्ग प्रत्यङ्ग उखाड़ दिये मांस तथा हड्डियोंको बिखेर दिया । अपने वाड़ेको पलट आया जमींदारके भाईकी चारपाई कूद गया आंगनमें जाकर चुपचाप खड़ा हो गया, जब सबेरा हुआ तो जमींदारके भाईने देखा कि, ऊंटका मुंह तथा पाँव रक्तसे भरे हुये हैं जान लिया कि, इस ऊंटने मेरे भाईको मार डाला है । खेतमें जाकर देखा तो उसके भाईके सब अङ्ग एक स्थानपर नहीं । वहाँसे पलटकर ऊंटका शिर धड़से अलग कर दिया ।

ऊंटनीका मोह—फीरोजपुरके मौजे दूधमें एक ऊंटनीका बच्चा मर गया था तीन रात दिन तक उसके नेत्रोंसे अशुपात होता रहा । उसने तीन दिवसतक कुछ नहीं खाया, केवल बच्चेकी यादमें रोती ही रही ।

चूरचूरकर दिया—ऐसे ही एक जमींदारकी भी कहानी है, उसने अपने ऊंट को मारा, वह उससे अपना प्रतिशोध लेनेको तैयार हुआ । जमींदार सचेत था कि, ऊंटसे मेरा वैर होरहा है । वह घुंघरू बांधकर ऊंटको अपने वाड़ेके आंगनमें छोड़कर खेतमें जाकर चारपाई पर लेट रहा । आधी रातके समय लोग सो गये सब ओर सूनसान हो गया धीरेसे वह ऊंट फलांग मारकर बाड़ेसे बहिर्गत हो वहां जा पहुँचा जहां कि, जमींदार सोया हुआ था । ऊंटके घूँघरूकी आवाज जमींदारके कानोंमें पहुँची उसने जान लिया कि, ऊंट मुझको मारने आता है । उसने एक लकड़ीको अपनी जगह पर लिटा दिया अपनी चादर उसपर डालकर आप कहीं दूर छिप गया ऊंट उस खाटके समीप पहुँचा तो वह उस खाट पर बैठ गया उस चारपाईको चूर चूर कर दिया उस लकड़को तोड़ तथा चादर को फाड़ कर टुकड़े २ करके पलट आया पीछे बाड़ेको आ चुपचाप खड़ा हो गया । जमींदारने ऊंटके वैरका हाल जानकर उसका उचित प्रबन्ध कर दिया ।

घ्राण शक्ति—हन्शदेशमें बड़ा लम्बा चौड़ा बन है, वहाँ दूर २ तक बालू है वहाँ दूर दूर तक जल नहीं मिलता मुसाफिर प्यासा मर जाता है । इस कारण वहाँके मनुष्य ऊंटपर सवार होकर उसी बियाबानको पार किया करते हैं, क्योंकि, ऊंट शीघ्रही प्यासा नहीं होता । प्यासकी तीक्ष्णताको बहुत सहन कर सकता है । वहाँके लोग ऊंटपर खाना पीना रखते हैं । वहाँके ऊंटके नाकमें ऐसा बल है कि, वह दूरसे जान लेता है कि, अमुक स्थानपर जल है । जहां कहीं जल होता है चार पांच कोसके अन्तरसे ऊंटकी नाकमें गन्ध पहुँच जाती है ऊंट भी उसी ओर चला करता है । जब पथ छोड़कर ऊंट उसी ओर चलने लगता है तो सवार

अबू दाऊद अबुहरीरा, समीक्षा मुहम्मद साहिबका आवागमन

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जान लेता है कि, उस ओर कहीं जल है, इस कारण सवार उसको नहीं रोकता ऊंटको इच्छानुसार चला जाने देता है। अन्तमें वह जलके किनारे जा पहुँचता है। उस स्थानपर पहुँचकर ऊंटके सवार तथा ऊंट दोनोंही सन्तुष्ट हो जाते हैं।

हवसियोंकी धाणशक्ति—उस देशके हवसियोंको भी सृष्टनेका अधिक बल है, यदि वे सड़क पर पगका चिन्ह पड़ा देखें, तो घासको सृष्टकर बता देते हैं, कि, हवशीके पौवका चिन्ह है अथवा फारसीके चरणोंका ही चिन्ह होता है मैंने यह हाल गोल्ड स्मिथ साहबके नेचरल हिस्टरीसे लिखा है।

घोड़ा

घोड़े अत्यन्त ही शिक्षाग्राही होते हैं सिखानेसे सब कुछ सीख जाते हैं ये बुद्धिमानोंके बड़े काम किया करते हैं, तीन कोससे बैरीको सृष्टकर केवल गन्धसे जान जाते हैं, जब घोड़े बनमें रहते हैं तो उनके नाकका बल बढ़ जाता है। बैरीको दूरसे पहचानकर दूसरे घोड़ोंको सूचित कर देते हैं। जब बनलें घोड़े चलते हैं तो उनका सरदार आगे आगे चलता है।

गोरखर—भी घोड़ाहीकी जाति है। वह बड़ा सुन्दर होता है गोरखरोंके झुंडके झुंड बनमें चरा करते हैं, उनमेंसे एक चौकीदार खड़ा होकर पहरा दिया करता है। जब दूरसे आपत्ति आती दिखाई देती है तो वह सब चरनेवालोंको सूचित कर देता है। आपत्तिसे सूचित होकर सभी भाग जाते हैं।

घोड़ोंके दो झुंड—एक स्थानमें नहीं चर सकते। दोनों झुण्डोंमें बड़ी लड़ाई होती है। घोड़े घोड़ोंके साथ लड़ते हैं। बछेड़े बछेड़ोंसे तथा घोड़ियों घोड़ियोंसे लड़ जाती हैं। घोड़े अपनी अपनी दुमोंको लहराते हुए घोड़ियोंको खड़ा करते हैं। अपने अपने दुमोंको आपसमें खड़खड़ाते हैं। एक दूसरेको अपने दांतोंसे पकड़ लेते हैं जो झुण्ड लड़ाईमें विजय पाता है वह अनेक घोड़ियोंको ले जाता है।

जंगली घोड़े और भेड़िये—वसन्त ऋतुमें भेड़िये आते हैं, वे बछेड़ा खानेके उत्सुक होते हैं। यदि घोड़ोंका झुण्ड बड़ा हो तो रातको छिपकर आते हैं दिनको नहीं आते। यदि बछेड़ोंको घोड़ोंके झुण्डसे इधर उधर पावें तो तुरन्त मार लेते हैं। जब भेड़िये बछेड़ोंको मारते हैं। तो घोड़े भेड़ियोंके ऊपर बदला लेनेके लिये आक्रमण करते हैं। जिनके सामने से वे भाग जाते हैं। बछेड़ोंको तड़पता देखकर उनकी माता बचानेको दौड़ती है इससे वो स्वयम् मारी जाती है। घोड़े देखते हैं कि, भेड़िये आते हैं तो वे प्रतिशोध लेनेको दौड़ते हैं। घोड़े बहुत सचेत होते हैं। उनकी भेड़ियोंसे लड़ाई होती है उस समय घोड़े अपने

समीक्षा, नरकमें देखा, समीक्षा

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बछेड़ोंको बीचमें कर लेते हैं । चारों ओरसे घेरा बाँधकर लड़नेको तयार होते हैं । भेड़ियोंको मारते तथा अपने दांतोंसे फाड़ डालते हैं । अपने अगले पाँवसे उनको लथाड़ते हैं । नर घोड़े दौड़कर एकही चोटमें भेड़ियोंको मार डालते हैं । जब भेड़िया मर जाता है तो उसकी लाशको अपने दांतसे उठा लाते हैं । घोड़ियोंके सामने डाल देते हैं । घोड़ियां उसकी लाशको ऐसी लथाड़ती हैं कि, उसका प्राकृतिक स्वरूपही बदल जाता है तबही वे उसको छोड़ती हैं । यदि आठ अथवा दश भेड़िये मिलकर एक घोड़ेको पछाड़ लें तो घोड़ोंके समस्त झुण्ड भेड़ियोंसे बदला लेनेको दौड़ते हैं । उन्हें नष्ट कर देते हैं । वे प्रायः उस कठिन युद्धसे बचते हैं । यदि वे घोड़े तथा बछेड़को अकेला पाँवे तो आखेट कर लेते हैं तथा धोखेसे कुत्तोंकी तरह पूँछ हिलाते हुये उनके निकट जाते हैं । एक बारगी झपटकर घोड़ेकी गरदन पकड़ लेते हैं उस समय वे भागते हैं । प्रायः वे इससे अकृतक र्थ होते हैं । क्योंकि, जब वह घोड़ा चिल्लाता है तो उसी समय घोड़ोंका सब झुण्ड दौड़ पड़ता है वे सब तुरन्तही भेड़ियोंको खदेड़कर मार लेते हैं भागकर नहीं जाने देते ।

अरबी सरदारका घोड़ा—एम. डी. लेमरटर साहब, एक अरबी सरदार तथा उसके घोड़ेकी बड़ी मनोहर कहानी वर्णन करते हैं । अरबी लोगोंने अपने सरदारके साथ सौदागरोंके एक झुण्ड पर छापा डाला लूटका माल लेकर चलते हुए । राहमें सवारोंने आकर उनको सहसा घेर लिया । कितनोंको तो जानसे मार डाला, शेषको जंजीरोंसे जकड़कर अपने खेमोंके सामने बाँधके रख दिया । सरदारका शरीर आहत होनेके कारण सारी रात जागता रहा उसने अपने घोड़ेको हिनहिनाते सुना । क्योंकि, वह उस सरदारसे थोडे फासलेपर बाँधा था । उसने चाहा कि, मैं अपने घोड़ेको अन्तिम समयमें प्यार कर लूँ, इस कारण वह अपने को घोड़ेके समीप खींचकर ले गया कहा कि, ऐ मेरे गरीब मित्र ! अब तुम तुकोमें क्या करोगे ? तुम एक पठान पेशा अथवा आगाके मकानमें कैद रहोगे, तुम्हारे लिये स्त्रियां तथा बालक ऊंटका दूध भी न ले आवेंगे, तुम स्वतंत्र होकर वायुकी तरह मैदानोंकी सैर करते न फिरोगे । यदि मैं गुलाम होऊँगा तो भी तुम अभी स्वतंत्र हो । तुम जाकर मेरी स्त्रीसे कहो कि, अब अलमारक न आवेगा । अपने शिरको खेमामें रखना मेरे बच्चोंके हाथोंको चाटना । यह कह कर यद्यपि उस सरदारके हाथ पाँव बाँधे थे तथापि दांतोंसे उसने उस घोड़ेका बन्धन खोल उसको स्वतंत्र कर दिया पर ज्यों ही छुटकारा पाते ही उस घोड़ेने अपने शिरको अपने मालिक पर झुकाया, उसको जंजीरसे बाँधा देखकर उसके कपडेको धीरेसे

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अपने दांतोंसे पकड़ लिया और अपने स्वामीको अपने ऊपर रख घरको ले भागा बीचमें कहीं न ठहरा, पर्वत पर अपने खेममें जा पहुँचा। अपने मालिकको उसकी स्त्री तथा लड़कोंके पाँव पर धर दिया। अपने मालिकको कुशल मङ्गलके साथ उसके घर पर पहुँचा दिया। पथकी थकावटसे स्वयम् आप उसी समय गिरकर मर गया। उस घोड़ेके लिये उस जातिके सब मनुष्य दुःख करने लगे। अरबी सायरोंने उस कृतज्ञ वीर घोड़ेकी प्रशंसामें अनेक कविता बनाई है। अरबमें उस घोड़ेकी भलाईकी चर्चा अब तक चली आती है।

बाजीगरोंके घोड़े—फरीदकोट राज्यमें बजीरसिंहजीके पास फ्रांस देशके ऐसे बाजीगर आये थे, जिनके कि, पास ऐसे घोड़े सिखाये हुये थे जो कि, उन घोड़ोंके कौतुकके सामने मनुष्योंके कौतुककी क्या बात है ? उन्होंने अपने घोड़ोंको अनेक गुण सिखाये थे जिससे देखनेवाले सदा दंग रहा करते थे।

बैल, सांड, बछड़ा और गऊ

बैलसे आदमीकी बातें—गुलजार आदममें मुसलमानोंकी हदीसके अनुसार लिखा है कि, आदम जब बैकुण्ठसे निकाला गया तो जिबराईलने आदमको खेती करना तथा हल जोतना सिखला दिया। आदमने बैलको हल जोतनेमें लगाया, उसने बैलको डण्डा मारा, उस समय बैलने आदमसे कहा कि तूने मुझ निर्दोषको क्यों मारा ? आदमने उत्तर दिया कि, तू आज्ञा नहीं मानता जो आज्ञा नहीं मानता वह मारा जायेगा। बैलने कहा कि, ऐ आदम ! तू स्वयम् आज्ञा नहीं मानता, खुदाकी आज्ञा न माननेके कारण ही बैकुण्ठसे बाहर निकाला गया है, निर्दोष मुझको क्यों मारता है ? यह बात सुनकर आदम दुःखी हुआ। खुदासे दोहाई मचाकर कहने लगा कि, ऐ खुदा ! तू देख, मुझे बैल भी ताने दता है। खुदाकी आज्ञा हुई कि, ऐ जिबराईल ! तू पृथिवी पर जा सब पशुओंकी जिह्वा बन्द करदे, उसी समय जिबराईल पृथिवीपर आये सब पशुओंकी जिह्वा बन्द करदी। सब गँगे हुये, फिर किसीमें वार्तालापकी सामर्थ्य न रही। इससे पहले सभी पशु मनुष्योंके समान बातें चीतें किया करते थे।

पूर्वके साधु—पञ्जाब प्रदेशस्थ फीरोजपुरान्तर्गत मौजे कोयरीवाला जिसको भाईका कोयरीवालात्री भी कहते हैं, यह मोगह तहसीलमें है। सन् १८८६ ई० में यहाँ एक घटना संघटित हुई ऐसा हुआ कि, इस गामके नामके मुसलमान जुलाहेके घरमें एक गाय रहती थी। उस गायने एक साथ दो बच्चे जने थे। दोनों अत्यन्त सुन्दर और काले रङ्गके थे उनका शरीर चमकता था। लोगोंने समझा कि, जो जोड़ा बच्चा उत्पन्न हो उसको पुण्यार्थ देना उचित है।

बच्चेकी उत्पत्ति

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उस जुलाहेने न माना । लोगोंने समझाया कि, हम हिंदू लोग तुझको इन बछड़ोंका मूल्य दे देते हैं, तू इनको हमें दे दे, जुलाहे ने न माना । वे लोग प्रत्येक बछड़ोंका मूल्य पचास पचास रुपया देने लगे । उन बछड़ोंकी सुन्दरता देख मनुष्य दङ्ग हो रहे । दोनों चमकते हुये श्याम रङ्गके थे उनके सींगे हिरणोंके समान पीछेको मुड़ी हुई थीं, उनके माथेपर ऐसे तिलक थे जैसे कि, रामानन्दकी सम्प्रदायके वैरागी बनाते हैं । वैसे ही उनकी छाती तथा दोनों मोड़ोंपर और पीठपर सब चिन्ह थे । उनको लोग वैरागी अथवा ब्राह्मण कहा करते थे । वे दोनों जब युवावस्थापर पहुँचे तो जुलाहेने चाहा कि, उनको हलमें लगावें । लोगोंने बहुत रोका कि, तू ऐसा मत कर, उनका मूल्य हमसे ले ले उनको तू सांड छोड़ दे । सोड़ी प्रतापसिंह ढाई सौ रुपया तथा एक हलकी भूमि दे रहे थे, पर जुलाहेने न माना हठमें आकर कहने लगा कि, इन ब्राह्मणोंको मैं अवश्यही हलमें जोतूंगा । लोग बहुत समझा चुके कि, ये बैल नहीं ये तो सन्त हैं, किसी दोष वश बैल बन गये हैं, तू उनके साथ ऐसा कुकर्म मत कर । जुलाहेने कहा कि, मैं इन ब्राह्मणोंको अवश्यही हलमें जोतूंगा । वे दोनों बैल साधुओंके समान अत्यन्त नरम तथा शान्त स्वभावके थे । छोटे २ लड़के उनसे खेला करते थे उनको जब लड़के पकड़ लेते तो वे अपना सिर झुका देते थे बड़े ही निर्दोष थे, कभी कसीकी कोई हानि न करते थे । प्रत्येक मनुष्य उनको प्यार करता था । जब बैल स्वरूप उन साधुओंको जुलाहे हलमें जोता तो एकबारगीही उसकी देह ढीली होकर ऐसी हो गई कि, जैसी झोला मार जाती है । उसी अवस्थामें जोलाहा मर गया । फिर उसके बेटेने बैलोंको हलमें जोतना चाहा तो लोगोंने मना किया उसने भी कहना न मानकर एक दिन उनको हलमें जोत दिया । उसी दिन उसके पांव में एक ऐसी मेख लगी कि, तलवेको छेदकर पार निकल गई । उस घावपर सेंकड़ों छाले पड़ गये, वह पांव बहुत सूज गया । इसी अवस्थामें तीसरे दिन मर गया । इसी प्रकार उस जुलाहेके घरके सब मनुष्य मर गये । केवल एक आदमी रह गया । तब लोगोंने उसको भी समझाया कि, देख, इन बैलोंको दुःख पहुँचानेसे तेरा घर नष्ट होगया, अब तू इनके साथ अपकार न कर । तब वह जुलाहा उन दोनों बैलोंको दीपमालामें अमृतसरकी मण्डीमें ले गया । सरकारने इन बैलके सौन्दर्यको देखकर सौ रुपये पारितोषिक दिये । एक महाजनने दो सौ रुपया देकर उन बैलोंको खरीद लिया अपने घर ले गया फिर न जाने उन साधुअवतारी बैलोंका क्या हुआ ।

ज्ञानी बैल—एक दूसरा बैल भी उसी गाँवमें एक जमींदारके घर उत्पन्न हो उसीके घर रहता था । उसकी ऐसी अच्छी आदत थी कि, जहाँ उसका स्वामी

समीक्षा

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खड़ा करदे वहीं खड़ा रहता था। बड़ा सुन्दर पीले रङ्गका सुदृढ़ था। कभी किसी की कोई क्षति न करता था, खेतमें जाता परन्तु जो उसके चारों ओर हरियाली खड़ी होती उसमें कदापि मुँह न लगाता, मालिक जो घास दाना उसके सामने रख दिया करता वही खाता दूसरेको हराम जानता था। उसको जमींदार मण्डी में पांच बार लेगया प्रत्येक बार सौ सौ रुपया इनाम पाता रहा। इस बैलको जब हलमें लगाते तो कोई बैल उसकी समता नहीं कर सकता था। सबसे आगे जाता था यह बैल जब किसी गायके पीछे छोड़ा जावे तो वह उसी गायको अपनी स्त्री समझता था। उसके वीर्यसे जो दूसरी गाय उत्पन्न हो उनको अपनी पुत्रीके तुल्य समझता था। कोई कौसी ही युक्ति क्यों न करे पर अपनी पुत्रियोंके निकट न जाता था।

साधवी राम गऊ-पंजाब देशस्थ फीरोजपुरके डरौली मौजेमें कहींसे फिरती हुई बड़ी सुन्दर एक गाय आ गई थी, उसका रङ्ग श्याम श्वेत मिला हुआ था। बड़े डील डौलकी थी, उसके अङ्ग प्रत्यङ्ग ढङ्गले थे। परन्तु उसका मूत्रस्थान अतिलघु तथा नाम मात्रका था। वह केवल मूत्र त्यागनेकेही निमित्त बना था बच्चा जननेके लिये नहीं था। उसका ऐसा अच्छा स्वभाव था कि, रात दिन एक पीपलके तले बैठे रहा करती। एक तो सबेरे आठ बजेके समय, दूसरे सांझको लगभग चार बजे भोजनके लिये ही बस्तीमें जा अपने निश्चित समय पर गांवमें जाकर गृहस्थोंके द्वारपर खड़ी हो जाया करती। अनाज ही खाती भूसा इत्यादि कुछ नहीं खाती। जो कोई कभी उसके सामने कुछ दाना रख दे तो केवल एक बार मुँह डालती, दूसरी बार कदापि मुँह न लगाती थी फिर आगे चली जाती थी दोनों समय अपना काम करके पीपलके वृक्षके नीचे जा बैठती पुघराया करती। वह भी उस गौका नियम था कि, जिस द्वार पर प्रातःकाल जाती वहां फिर सांझ को न जाती। लोग इस गायकी आदत साधुओंकीसी देखकर उसकी सेवा करने लगे। जहां वह गाय बैठती उस स्थानको भलीप्रकार स्वच्छ कर देते तथा बालू इत्यादि बिछा देते थे। पर वह गाय उस गांवमें केवल एक मास तक ही रही फिर दूसरे फिर तीसरे फिर चौथे गांवमें गई। इसी प्रकार फिरती फिरती न जाने कहाँ चली गई। जिस मनुष्यने उस गायको देखा एवं उसकी सेवा की थी उसीने मुझसे यह कहानी कही थी जैसे यह गाय द्वार द्वार भोजनके लिये जाती थी उसी प्रकार मशकवालेके सामने पानीके लिये खड़ी होती अपना मुँह लगाती पानीवाला पानी पिला देता। लोग उसको राम गऊ कहा करते थे।

जंगमोंका बैल-जङ्गम एक प्रकारके फकीर होते हैं। वे लोग अपने बैल

जिनका सर्प होना लोह महफूजपर भाग्य

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को ऐसा सिखाते हैं कि, जो कुछ वे आज्ञा करते हैं, वह वही करता है । बैल उनकी सब बातें समझता है । यदि वे लोग कहें कि, आशीर्वाद दे तो वह शिर उठाकर आशीर्वाद दे देता है । यदि कहें कि, दाहिना पांव उठा तो दाहिना पांव उठाता है । बांयाँ पांव उठा तो बांयाँ पांव उठाता है । अमुक चिन्ह पर अपने पांव रखता चला आ तो वह वैसा ही करता है । बैल चतुराईके अनेक काव्योंको किया करता है ।

ग्वालेकी रखवाली—काठियावार तथा नागौर देशमें गायोंके झुण्ड बनमें चरते फिरते हैं । उनका रक्षक उनके साथ रहता है । जब कभी शेर रक्षक पर आ पड़ता है तो सब गायें इकट्ठी हो जाती हैं । चारों ओरसे चक्र बांधकर अपने रक्षक को मध्यमें कर लेती हैं । जिसमें कि, शेर उसको क्षति न पहुंचा सके, उस समय गायोंका मुँह चारों ओर होता है । जिसमें शेर जिधरसे आवे उधरसे रक्षा कर सके । अपने सींगोंको लड़ाईके लिये तैयार रखती हैं । सब एक बारगीही शेरपर आक्रमण करके शेरको भगा देती हैं । कभी कभी आप भी आखेट बन जाती हैं ।

योग्य गऊ—एक गाय एक स्थानपर चरती फिरती थी, उसके ऊपर एक दुष्ट बालक पत्थर मारा करता था । गाय बहुत सहन करनेके पीछे उस बालक की ओर दौड़ी । उसके वस्त्रोंको सींगोंसे फाड़ डाला पर उसको कुछ कष्ट न पहुंचाया । उस लड़केको पकड़कर दूर धर आई फिर आकर चरने लगी । यह गऊकी पूरी योग्यता थी ।

चीता मारनेवाला सांड—एक सांड था जिसने अपने सींगोंसे कितनेही चौपायोंको मार डाला था । यहां तक कि, उसके सींगोंकी नोक जाती रही थी । एक दिन एक चीते एक गायको मारा उस गायकी सहायताके लिये यह सांड दौड़ा, चीता तथा सांडकी लड़ाई होने लगी । गाय तो मर गई पर सांड लड़ता रहा । जब दिन बीतकर रात हुई, वह चीता अपना भोजन लेने आया । वह सांड फिर लड़ने लगा चीतेको मारकर उसी गायके पास गिरा दिया आप भी बहुत घायल हुआ पर लोगोंने उसके घाव सिये । वो पूर्ण स्वस्थ हो गया ।

राक्षसकी गाय—सन् १८५५ ई० में जम्बू काश्मीरके पर्वतोंके बीच मुझको एक साधु मिला । वह मुझसे कहने लगा कि, आठ साधु भ्रमण करते करते पर्वत के भीतर घुस गये । कुछ दूर जानेपर उनको राह नहीं मिली वे भूलकर इधर उधर फिरने लगे, कुछ पता न लगे कि, किधर जावें जब वे भटकते फिरते थे तो उनको एक बड़ी जातिकी गाय मिली उन साधुओंको देखा तो घेर लिया, जिधर साधू जावें वह उधर ही घेर लेती थी । अन्तमें वो उनको घेर घारकर वहां ले चली जहां कि, आप रहती थी । साधु लोग उस गायके स्थानपर पहुँचे तो उन सबको

जीवोंका आनन्द, संन्यासीका उदाहरण

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एक बार फिर घरके भीतर ले गई आप उस बाड़ेके द्वारपर बैठ गई, जिसमें वे सब भाग न जायें। सांझ होतेही भेड़ बकरियोंका झुण्ड लेकर मनुष्य रूपी राक्षस आया साधारण नहीं, किन्तु हूष्ट पुष्ट लम्बा चौड़ा राक्षस था। उसने मनुष्योंको देखकर एक विशेष स्थानमें बन्द कर दिया। सब बकरियोंका दूध दुहकर एक कड़ाह चढ़ा दिया उसमें दूध गर्म होनेके लिये डाल दिया। दूधके औट जानेपर उनमेंसे दो मनुष्योंको पकड़ शिर टकराकर मार डाला। उसी दूधकी कड़ाहीमें उनको पकाकर खा गया सब दूध पीकर अचेत होकर सो गया। शेषके सब साधुओं ने विचार किया कि, अब तो यह राक्षस हम सबको एक एक करके खा जायगा कदापि न छोड़ेगा। उन लोगोंने यह हिम्मत की कि, बड़े २ चिमटे जो उनके पास थे उनको आगमें लाल किया एक बारगी ही उस दैत्यकी दोनों आँखोंमें चलाकर उसको अन्धा कर दिया। वो दोनों आँखोंके फूट जानेपर घबरा कर उठा और चिल्लाकर इधर उधर पकड़ने दौड़ा। साधु जब उसके हाथ न आये तो वह भेड़ों को पकड़ पकड़कर बाहर फेंकता था। साधु उससे तथा उसकी गायसे किसी प्रकार बच कर निकल भागे।

भिस्तीका बैल—पंजाब देश फिरोजपुर जिलेके भाईकोट कसबामें एक भिस्तीने अपने बैलको ऐसा सिखलाया था कि, आपसे आप वह सब कार्य किया करता था। जल खींचनेके समय आपसे आप ठहर जाता था, जो कोई उसका बैल मोंगकर कार्यके लिये ले जाता और कह जाता कि, मेरा इतना कार्य है तो वह भिस्ती अपने बैलसे कह देता कि, इतने समय तक इसका कार्य करके चले आना। तो वह बैल उनके साथ उतने कालतक ही कार्य करके आ जाता अधिक न करता था, यदि वह मनुष्य अपनी प्रसन्नतासे बैलको भेज दे तो अच्छी बात है, नहीं तो वह आपही भागकर अपने घर चला आता था। वह बैल अपने काम तथा समयको भली भाँति पहचानता था। साधारण समय पर अपना कार्य करता था। सरकारी कारबारियोंकी तरह अपने मनकी घडीमें अपना समय देख लिया करता था।

न्यायकी प्रार्थना—शाहजहाँके रहनेके मकानके पास एक घन्टा बँधा रहता था इसका यह नियम था कि, जो कोई उस घन्टेको बजा देता था उसका उसी समय न्याय किया जाता था। एक बार एक भिस्तीके बैलने आकर घन्टा बजा दिया उसी समय बादशाहने उस बैलको अपने सामने बुलाया उसकी पखाल ढुलाई गई तो वह अधिक वजनदार निकली यह देखकर बादशाहने वजन मुकर्रर कर दिया कि, इससे अधिककी जो कोई बैलपर पखाल रखेगा उसे दण्ड दिया जायगा।

स्वप्नकी देह

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विशेष बात—पूर्वीय भारतमें छोटी जातियोंमें यह नियम है। कहीं २ उच्च जातिके लोगोंमें भी सुना जाता है कि, जब उनका बैल निर्बल तथा दुबला हो जाता है तो उसको सूअरका तेल पिलाते हैं। पिलानेसे वह पुनः मोटा हो जाता है। पर इसके साथ यह भी नियम है कि, जब वे सूअरका तेल पिलाना चाहते हैं तो उस बैलसे पहले पूछते हैं कि, कल तुमको सूअरका तेल पिलावेंगे। सांझको तो बैलस कह देते हैं सबेरे उठकर बैलका मुँह देखते हैं। यदि वह बैल रोता हो आँसू आये हों तो उसको तेल नहीं पिलाते, यदि वह न रोया हो न उसका आकार बिगड़ा हो तो उसको तेल पिला देते हैं। यदि रोया अथवा दुःखी जान पड़ने पर भी तेल पिलावें तो वह बैल दुःखके मारे आपही मर जाता है, यह बैलके विषयमें विशेष बात है।

भैंसा, भैंस

धर्मात्मा भैंसा—एक भैंसा एक जमींदारके घर रहता था। उस घरमें भैंसे तो बहुत थीं पर भैंसा एक ही था। वह अन्यान्य भैंसियोंसे तो जोड़ खाता पर अपनी माके निकट न जाता। उस जमींदारने अनेक युक्तियां की किन्तु उस भैंसाने अपनी मातासे जोड़ नहीं खाया। उस जमींदारने यह युक्ति की कि, उस भैंसके शरीरमें कीचड़ लगा दी कि, पहचानी न जावे उस भैंसेके पास ले गया उसने उसका संग किया। संग करनेके पीछे वह भैंस उसी समय पानीमें जा पड़ी उसकी देहका कीचड़ छूट गया। भैंसने भैंसको भली प्रकार पहचान लिया कि, यह तो मेरी माता है और जान लिया कि, इस जमींदारने मेरे साथ धूर्तता करके मुझसे पाप करवाया है तो वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर जमींदारकी ओर दौड़ा उसको मार डाला तथा उसका पेट सींगोंसे फाड़ डाला। वहाँसे भागकर न जाने कहाँ चला गया।

भैंसकी कामात्मता—फिरोजपुर जिलाके भाटीकोट नामक गांवमें एक बनियेके पास एक भैंस थी, वहाँ कोई भैंसा न था, जब उस भैंसके मनमें काम कामना हुई तो वह भागकर चली। वह मनुष्य बहुत रोकता रहा यह भैंसने कुछ न मानी, वहाँसे पांच कोसपर एक भैंसा था उसके पास जा पहुँची। सब दिन तथारात वह भैंसके पास रही। दूसरे दिन बनिया अपनी भैंसको दूँढ़कर घर ले आया।

भैंसका प्रेम—पंजाब देशस्थ फिरोजपुरके समीप एक जमींदार रहता था। उसके पास सौ रुपयेकी एक भैंस थी, वह बहुत दूध देती थी। एक दिन उस भैंसको चोर लेगये इसका कहीं पता न लगा तब वह उस दुःखमें उसको चारों ओर दूँढ़ता फिरा। उसका नाम भोगमिलानी था। उस भैंसको रोता हुआ दूँढ़ता और फिरता और कहता जाता था कि—

मन्शूरका सम्स तबरेज और बुल्लेशाह होना अमीर खुशरू मोलवी रूप

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रोहीमें घास छपरमें पानी । मोड़ाकर मेरी भाँग मिलानी ॥

उस भैंसके प्रेममें इसी प्रकारका शब्द करता फिरता था । उसका शब्द सुनकर एक पथिकने उससे पूछा कि, तेरी यह दशा क्यों है ? उसने अपनी भैंसका सब हाल कह सुनाया । पचास साठ कोसके ऊपर एक वैसीही भैंस दिखाई दी । पथिकने उस जर्मीदारका सब हाल लोगोंको कह सुनाया । जब वह पथिक कह रहा था—उसी समय उस भैंसने भी अपने स्वामी जर्मीदारका सब वृत्तान्त सुना, तब उसका मन अपने स्वामीकी ओर खिंच आया । जबसे वह भैंस इस जर्मीदार से पृथक् हुई थी तबसे उस समय तक तीन वर्षका समय बीत चुका था । उसने दो बच्चे दिये थे । अब उसने जान लिया कि, मेरा स्वामी मेरे लिये रोता फिरता है । तो उस भैंसके मनमें प्रेम आया अर्ध निशाके समय, अपनी रस्सीको खोल लिया दोनों बच्चों सहित कुशल पूर्वक मालिकके गाँव पहुँच गई । घास चरकर जल पीकर तृप्त होकर बैठी ही थी कि, जर्मीदारने आवाज दी कि—

रोहीमें घास छपरमें पानी । मोटाकर मेरी भाँग मिलानी ।

जब जर्मीदारने ऐसा कहा तो वह भैंस उठकर बोली उसको पहचानकर वह जर्मीदार उसके निकट गया देखा तो उसकी भाँग मिलानी दोनों बच्चों सहित आ पहुँची है । जर्मीदार उसको अपने घर लाकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ ।

महात्मा भैंसा — जिला फिरोजपुर तहसील भोगा डरौली गाँवके समीप एक गाँव छोटे फेरीवालाके नामसे है, इसमें एक भैंसा है । इसका यह हाल है कि, वह जब अपनी माताके गर्भमें था तो नियमित आकारसे अधिक बढ़ गया । इस कारण जब वह उत्पन्न हुआ तो उसकी माताका मूत्रमार्ग फट गया तब वह बाहर निकला । उसकी माता मर गई । वह बिना माताका बच्चा जीवित रह गया भैंसोंके स्वामी ने दो बकरियों मोल लीं उस बच्चेको बकरियोंका दूध पिलाकर पालने लगा । यह बचन कहा कि, यदि यह बच्चा जीवित रहेगा तो मैं उसको छोड़ दूंगा और इससे कोई काम न लूंगा अन्तमें बच्चा पलकर बड़ा हुआ बहुत बलिष्ठ स्वरूपवान और अच्छा भैंसा हुआ । उसके ऊपर छोटे छोटे बच्चे चढ़कर खेला करते थे । वह क्रुद्ध न होता था । कभी किसीको कुछ कष्ट न देता था । प्रायः लोग दूर दूरसे अपनी अपनी भैंसियोंको लाते और उससे गर्भिणी कराके लौटाले जाते । यह भैंसा अन्तर्यामी था । क्योंकि, वह अपनी पुत्रीसे कदापि सम्भोग न करता था । कोई मनुष्य जो अपनी भैंस उससे गर्भिणी कराकर दूर लेकर जाता था उसके वीर्यसे जो भैंस उत्पन्न हुई हो चाहें उसको उस भैंसने कभी देखा भी न हो । यदि वह भैंस उसके सामने आजाय तो भी उसके साथ कदापि सम्भोग न करे । जर्मीदार कितना

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ही बल लगावे तथा कितनी ही युक्ति क्यों न करे पर वह भैंसा अपनी पुत्रीको पहचान अपना मुँह उसके मुँहसे मिलाकर पृथक् हो जाता कदापि सम्भोग न करता था । उस पशुको भविष्यके हाल जाननेकी विद्याके बिना अपनी बेटीकी पहचान कैसे होती थी ? इससे पता चलता है उसे भविष्य जाननेकी विद्या थी वो पूर्वजन्मका कोई महात्मा था ।

एक बस्तीमें एक भैंसा रहता था उसको एक मुसलमानने बेबात बरछी मारी । वह जख्मी होकर भाग गया । वह अपना बदला लेनेपर उद्यत हुआ । मुसलमानने भी जान लिया कि, वह भैंसा मुझसे अपना बदला लेना चाहता है । वह सदैव चौकस रहता था । एक दिनकी घटना है कि, मुसलमान बाहर किसी अन्य-स्थानसे लौटता हुआ बस्तीसे दूर एक मैदानमें पहुँचा, भैंसने उसको उस स्थानपर देखा तो मारनेको दृढ़ा । वहाँसे वह मुसलमान भाग न सका । भैंसने शीघ्रतापूर्वक पहुँचकर उस मुसलमानको दबा लिया अपने सींगोंसे उसका पेट फाड़ डाला । उसके सभी अङ्गोंको पृथक् २ कर दिया । वह इतना क्रुद्ध हुआ कि, उसके किसी अङ्गको एक स्थानपर न रहने दिया । उसके अङ्गः प्रत्यङ्गः तितर बितर करके इधर उधर रख दिये ।

गदहा

गानासुननेका शौकीन—गदहे अच्छे २ कार्य करनेके लिये उत्सुक रहते हैं । एक गदहा था वह प्रायः रागबाजा सुनने जाया करता था । एक स्त्री थी जो बहुत अच्छे सुरोंमें गाया करती थी, जब वह गाने लगती थी तो वह गदहा उसकी खिड़की के निकट आ जाया करता था । बड़े ध्यानसे राग सुना करता था । उस स्त्रीने एक दिन एक ऐसा राग निकाला जिसको कि, उसने पहले कभी नहीं सुना था । उस रागपर वह गदहा मोहित हो गया । उसके मकानके भीतर घुस आया बड़े जोरकी आवाज निकालकर चिल्लाता हुआ अपना राग प्रेम प्रगट करने लगा ।

कुछ कुम्हार अपने २ गदहों को लेकर फरीदकोटकी ओरसे फिरोजपुर को जाते थे । फरीदकोटके निकट एक बच्चा मर गया, जिस गदहीका वह बच्चा था, वह अपने मृत बच्चेके निकट खड़ी हो गई । कुम्हार मारकूट कर अपने साथ ले चले मुर्दा बच्चे को उसी जगह पर छोड़ गये । जब बारह कोशके अन्तपर पहुँचे उस गदहीके मनमें, बच्चेके प्रेमका ऐसा जोश आया कि, वह वहाँसे भागकर अपने मृत बच्चेके निकट खड़ी हो गयी ।

न्यायकी प्रार्थना—मैंने किसी पुस्तकमें पढ़ा था, नौशेर्वा बादशाहने महल के बाहर एक घण्टा बौध दिया था, जो कोई फिरियादी घण्टा बजादे तो उसी समय