कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
४० दिनके बाद काफिर, जीवके देखते जीवहत्याका निषेध
की अटक नहीं थी, न किसी प्रकारका सन्देह था। फिर मूसा क्या पूछे कि, "खुदाका नाम बे फायदा लेना किसको कहते हैं? बे फायदा लेना क्या है?" संसारमें जितने नाम हैं उनमें कौनसा नाम निष्फल और कौनसा सफल है? अथवा सबही नाम निष्फल हैं? किसीमें कुछ लाभ भी है? किस स्थान पर निष्फल है कहां पर सफल है? जबतक इसका स्पष्टीकरण न हो, तबतक तो जीव एकदम अंधेरेमें पड़ा रहेगा। यह मैंने कहीं लिखा न देखा कि, यहाँ खुदाका नाम लेना, यहाँ न लेना। ईश्वरकेही नाम लेनेसे आदमी पापोंसे शुद्ध होता है। जब ईश्वरका नामही लेना निष्फल हुआ तो क्या नाम लेकर भजन करेगा? मुक्तिका कौनसा मार्ग रहा? न खुदाहीने कुछ स्पष्टीकरण किया न मूसानेही स्पष्ट बतलाया। फिर तो सबको भटक भटककर मरना पड़ा। अब बे किस राह चलें? क्या करें? किस प्रकार खुदाका नाम लें? जो निष्फल न हो। कौन पथदर्शक गुरु खोजें? जो सत्य-मार्ग बतलावे, जिससे व्यर्थ ईश्वरका नाम न ले? यह तो पूर्ण गुरुके बिना कदापि नहीं जाना जा सकता क्योंकि, पापोंको नष्ट करनेके लिये केवल नामहीका सहारा है, जब वही व्यर्थ होगया तो छुटकारेका सहाराही न रहा। इसी भूलमें सब मूसबी और ईसाई पड़े हैं क्योंकि, हिन्दू और मूसलमान जब कोई काम आरम्भ करते हैं तो अपने अपने ईश्वरका नाम ले लेते हैं। चाहे कोई अपने गुरुका अथवा ईश्वरका, जिसको वह श्रेष्ठ समझता है उसका नाम लेकरही कार्य आरम्भ करता है। किसी न किसी प्रकार उसका ध्यान परमात्माकी ओर होता है, जिससे अन्तःकरणकी शुद्धता होती है। मैंने किसी ईसाई महाशयको किसी कामके आरम्भमें अथवा किसी पुस्तकके आदिमें नाम लेते और लिखते न देखा, न पढ़ने पढ़ानेके समयही ईश्वरका नाम लेते हैं। इसी तृतीय आज्ञाके अनुसार यह सब काम होते हैं। जिस नामको जपकर भवसागर तर जाते हैं उसी नामका यह रङ्ग ढङ्ग हुआ, तो अब क्या सहारा रहा? असहाय हो गये। मैंने किसी ईसाईकी किताबके आदिमें परमात्माका नाम न देखा। यह विचार उन लोगोंका ऐसा दृढ़ हुआ है कि, जितने अंग्रेजी पढ़नेवाले हैं, प्रायः ईश्वरका नाम नहीं लेते। इस कर्तव्यसे लोगोंके अन्तः-करणपर अन्धकार छा गया। भजन भक्तिकी ओर लोग तनिक भी ध्यान नहीं देते, करणपर अन्धकार छा गया। भजन भक्तिकी ओर लोग तनिक भी ध्यान नहीं देते, सब लोभ और तृष्णाकी ओर झुके हुये हैं। मनुष्यकी मुक्तिका सबसे बड़ा कारण जाता रहा। उदारता, शौर्य, न्याय और शील ये मुक्तिके चार साधन हैं। अब वह उदारता कहां है जो पहिले लोग अपनी आवश्यक और प्यारी वस्तुको भी परमात्माके लिये दे देते थे। अब वह शौर्य (वीरता) कहां गई कि, जिससे भजन
और भक्तितमें, परोपकारमें, सत्यमार्गके ग्रहण करनेमें कट जाते, मर जाते थे, तो भी न हटते थे । हां आजकल इतनी बात तो अवश्य है कि, सांसारिक बुरे काम और आसुरी व्यवहारमें बड़ी शूरता प्रगट करते हैं । वह न्याय भी अब नहीं है, क्योंकि, सबसे पहले न्याय यही है कि, परमात्माके ऋणको अदा करें । माता, पिता अपने पराये सबके साथ अपना कर्तव्य पूरा करें । शील (सदाचरण) में भी दोष आगया । लोग हजारों रुपया कमाते हैं, अपना पेट भरते हैं पर दूसरा दुखिया देखता हो तो उसकी सहायता नहीं करते । ईश्वरके नामसे कुछ देनेमें महा कठिनता बीतती है । अतः उदारताके बदले लोभ, लालच और कृपणता देख पड़ती है । शौर्यताके बदले डरपोकपना निज स्वार्थपना और बेइमानी प्रगट हो रही है । न्यायके बदले अन्याय और हठधरम्मी प्रचलित हो रही है । शीलके बदले कठोरता, परनिन्दा, चुगली, चपारी आदि होगये इस प्रकारसे ईश्वरका नाम छोड़तेही लोगों के अन्तःकरणमें आसुरी सम्पत्तिका वास हो गया । जो नामके अभ्यासी पुरुषोंके साथ ये चारों गुण अवश्य होंगे ।
४ सबतका दिन पाक रखो — प्रगट तो यही अर्थ है कि, छः दिन मनुष्य काम करे सातवें दिन कोई काम न करके केवल भजन करे । पर यथार्थमें वह सबतका दिन है । जिस दिन मनुष्यको संसारसे घृणा और वैराग्य आ जावे । सांसारिक । व्यवहार छोड़कर प्रेममें ऐसा भग्न होवे कि, अपने शरीरकी भी सुधि न रहे, निश्चलतासे भजन करे, भजनमें तनिक भी दोषता हो जाने पर सबतका दिन अशुद्ध हो जायगा ।
५ मातापिताकी प्रतिष्ठा करो — प्रगट तो लोग जो अर्थ समझते हैं वही है, पर उसका यथार्थ अर्थ यह समझना चाहिये कि, हमें वह काम करना चाहिये, जिससे माता पिताकी प्रतिष्ठा और सुकृती बढे । ऐसा कर्म केवल एक सत्य परमात्माकी भक्ति है । जिसका पुत्र ज्ञानी भक्त होगा उसके माता पिता प्रतिष्ठाको प्राप्त करेंगे; जैसे धर्मदासजीके पूर्वज, श्वपच सुदर्शन आदिके माता पिता । अपनी संतानकी भजनसे परंधामको पहुच गये । जिस माताने सन्त उत्पन्न न किया उसने कुछ भी नहीं किया । क्या सब मनुष्य सन्तान पुत्र उत्पन्न नहीं करते ? पर जिसने सन्त पुत्र उत्पन्न किया उसनेही पुत्र उत्पन्न किया बाकी सब कुपुत्र हैं । माता पिताको यथार्थ सुख और प्रतिष्ठा देनेवाले केवल सन्तही हैं । इस कारण सबको उचित है कि, अपने माता पिताको प्रतिष्ठा दें । अब यहांपर मैं थोड़ासा इसका विवरण लिखता हूं । जो कबीर साहबने मातृगर्भके विषयमें कहा है । जब बालक मातृगर्भमें रहता है, तब उस दुःख और कष्टमेंसे व्याकुल होकर बहुत विनय
याकूबको गउका शाप, शिकारीकी हिंसक पशुओंसे तुल्यता, ताक नापाककी समता निष्कर्ष, दोष, नानक, मनुष्यसे भेड़िया
और अधीनता करता है कि, ऐ परमात्मा ! हे दीनदयाल ! मुझे इस नरकसे उद्धार कर । मैं सच्चे अन्तःकरणसे तेरी भक्ति करूंगा । तेरी भक्तिके तुल्य कुछ न जानूंगा । देखो पाटनके राजा जगजीवनकी कथामें लिखा है कि, राजाने कबीर साहबसे पूछा कि, इस संसारमें आपके आनेका क्या कारण है ? उसके उत्तरमें कबीर साहबने कहा कि —
भूलेहु कोल गंभंका बाँधी । अब चकचौंधी आई आँधी ॥
सबहि जीव कौल करि आये । बाहर निकसत सबहि भुलाये ॥
सतगुरु जोव चितावन आये । यहि कारण संसार सिधाये ॥
परमात्मा उस समय उसके समक्ष खड़ा दृष्टि आता है । ऐसे दुःख और विपत्तिमें परमेश्वरके अतिरिक्त उसका कोई भी सहायक नहीं होता । वही जठराग्निके सब दुःखोंसे रक्षा करता है उसके जीवनको अभय करता है । उसके पोषणके लिये नाभिमें एक छिद्र बनाता है उसमें एक नली लगाता है, जिससे उसके पेटमें अन्न पहुँचकर उसकी रक्षा होती है । उसके हाथ, पांव बंधे होते हैं, गन्दगीमें लपटा रहता है, कुछ भी करने योग्य नहीं होता । माता जो कुछ खाती पीती है, उसीके एक भागसे बालकका भी पोषण होता है । जब जन्म होनेका दिन निकट आता है तो माताके स्तनोंमें दूध पहिले भर जाता है । जिस समय बच्चा गर्भसे बाहर होता है उस समय उसकी नाभिका द्वार बन्द हो जाता है, उसके स्थानमें स्तनोंमें छिद्र हो जाता है, जिससे बच्चा दूध पीता है । परमात्मा उसकी सेवा के लिये दो सेवक उपस्थित करता है, जो इस संसारमें माता पिताके नामसे प्रसिद्ध होते हैं दोनों बच्चेसे ऐसा प्रेम करते हैं कि, सदा उसके लिये अपने प्राण निछावर कर देनेके लिये तैयार रहते हैं । जब तक बच्चा युवा नहीं हो जाता, जबतक अपनेको संभालने योग्य नहीं हो जाता, तबतक उसकी रक्षा किया करते हैं । जिस साहबने नाभीमें नल लगाकर स्तनोंमें दूध देकर, दो प्यारे सेवक द्वारा रक्षा की । फिर संसारके सब सुखोंको प्रदान किया सब कठिनाइयोंको सहज कर दिया ऐसे सच्चे पिताको भूलकर उससे विरोधताको खड़ा हुआ प्राणी माता पिताकी क्या प्रतिष्ठा कर सकेगा ? जब मूलही नहीं तो शाखा, पत्र, फल, फूल की तो बात कहाँ है ।
६ खून मत करो — इस आज्ञासे यहूदी और ईसाई लोग केवल “मनुष्य-काही रक्त न बहाना” यह आशय समझते हैं, पर कबीर साहबने कहा है कि, पशु, मनुष्य सबका रक्त बराबर है. दोनोंकाही बदला देना होगा । पशु और मनुष्य सब जीवधारी परस्पर भाई हैं । विशेषकर यह विषय इसी पुस्तकमें पशुओंके ज्ञान
हानिके कारण, उपदेश
और बुद्धिकी बातोंमें लिख दिया है, जिसके पढ़ने सुननेसे मनुष्य और पशुकी समता जान पड़ती है । मनुष्यको खुदाने साग, पात, फल, फूल, आदिके भक्षण की आज्ञा दी, पर नूह और मूसाको धोखा देकर पशुओंकी हत्या कराई मनुष्योंको पापमें फँसाया ।
७ व्यभिचार मत करो — गृहस्तको पराई स्त्री एवं साधुको 'आठों प्रकारके सैथुनका निषेध है ।
८ चोरी मंत करो — जो चोरी करता है उसे हाथ आने पर दंड दिया जाता है जो गुप्तरीतिसे मानसिक चोरी करता है, बुरे संकल्प उठाता है, मिथ्या मनो-राज किया करता है. वह ईश्वरका चोर है अन्तर और बाहर सब प्रकारके बुरे संकल्पों और कम्मोंको छोड़नेसे ही मनुष्यता प्राप्त हो सकती है । जिसका कि, अन्तर और बाहर एकसा हो वही मनुष्य है ।
९ अपने पड़ोसीको प्यार करो — प्रगट तो इसका अर्थ यही है कि, अपने घरके निकट रहनेवालोंको प्यार करो, पर यहां पर समझने की बात है यदि अपना पड़ोसी बदमाश, चोर और डाकू हो. अथवा किसी प्रकारका और भी कोई अधम कर्म करता हो तो हमारा प्यार उसके साथ किस प्रकार हो सकता है ? यदि हम उसको मित्र बनायेंगे तो हम भी उसके साथ पापी ठहरेंगे. क्योंकि, चोर और चोरका सहायक न्यायमें बराबर है । यहां अपने पड़ोसीका यह आशय है कि अपना अर्थात् अपनी आत्मा इन्द्रियोंसे परे मन है, मनसे परे बुद्धि, बुद्धिसे परे आत्मा, अतः आत्माके निकट बुद्धि है इससे बुद्धि अपनी निकटवर्ती पड़ोसी है इस कारण बुद्धिको प्यार करना, उसको उचित कार्यमें लगाना, धर्म, द्वेष, पक्षपात और अन्याय आदि (बुद्धिके शत्रुओं) से बचाना ऐसा प्यार मुक्तका चिह्न है, जो बुद्धिको प्यार करेगा वह सब काम पूरा कर सकेगा । बुद्धिको बिना प्यार करे कोई भी काम ठीक नहीं हो सकता ।
१० झूठी गवाही मत दो — प्रगट तो झूठी गवाही वही समझी जाती है जो जगत्में प्रसिद्ध है । पर उसे भी झूठी गवाही कहते हैं जो कि, बिना जाने सत्य अद्वैत परमात्माके विषयमें गप्पे मारकर लोगोंको जालमें फँसाते हैं ।
इन दश आज्ञाओंके आशयको जो कोई भली प्रकार विचारेगा, उसके अनुसार चलनेका प्रयत्न करेगा वह अज्ञानसागरसे पार हो जायगा ।
जबूर और नबियोंकी किताबोंका भी यही संक्षेप है । इसी मूसाके धर्म की ही उनके पीछेके सब नबी (हजरत ईसा तक) आज्ञा मानते आये हैं ।
तमप्रिय होनेका कारण, अभक्ष्यके कारण, अपूर्णता
इंजीलके मुख्य धर्म
१—आदिमें शब्द था, वह ईश्वरके साथ था, वह शब्द ईश्वर था। २—यही आदिमें ईश्वरके साथ था। ३—सब पदार्थ इसीसे प्रगट हुये, पहले कोई ऐसा पदार्थ नहीं था जो इसके बिना हुआ हो। ४—जीवन उसमें था वह जीवन मनुष्यका प्रकाश था। ५—प्रकाश अन्धकारमें चमकता है अन्धकारने उसे नहीं पहचाना।
आदिमें शब्द था और शब्द ईश्वर था।
कबीर वचन।
नाम कहूँ तो नाम न ताका। नाम राया काल है जाका ॥
है अनाम अक्षरके माहीं। निः अक्षरको जानत नाहीं ॥
शब्द कहो तो शब्दौं नाहीं। शब्द भया मायाके माहीं ॥
दो बिन हो न अधर अवाजा। किये कहा सो काज अकाजा ॥
(भवतारण)
अवघातजन्य — कोई भी शब्द दोके बिना नहीं हो सकता, यह बात पहले भी लिख आया हूँ। जितने वाणी आदि शब्द हैं वे द्वैत बिना प्रगट नहीं होते, जहाँ दो हैं वहाँ माया है। जो शुद्ध निरवयव निराकार चैतन्य ब्रह्म है, वह सर्व प्रकारकी अशुद्धतासे, रहित है। जो भेदसे रहित है वही शुद्ध है। वहाँ पूर्वोक्त शब्द वाणी कुछ भी नहीं, जहाँ किसी प्रकारका भेद न हो वहाँसे वैसे शब्द कदापि प्रगट नहीं होते। कहना सुनना मायामें है, ब्रह्ममें नहीं, संसारकी उत्पत्ति नाश करनेवाली माया है। माया कोही सब ब्रह्म करके पूजते हैं, वह शुद्ध ब्रह्म कैसे हो सकता है? मायाही प्रगट हो रही है सब उसीमें लग रहे हैं।
खुदाको न देखा—देखो योहन्नाकी किताबका —१ बाब १८ आयत, स्पष्ट प्रगट करता है कि, किसीने खुदाको कभी न देखा। अतः नवियोंका खुदाका दर्शन पाना झूठा ठहरा। जो रूप पैगम्बरोंने देखा वह खुदा न था। यह आयत स्पष्ट प्रगट कहती है कि, किसी पैगम्बरने खुदाको नहीं देखा। १८ वे आयतका जो शेष है उसके ऊपर विचार करो, वह यह है (इकलौता बेटा जो पिताकी गोदमें है उसने बतला दिया) इकलौते बेटा हजरत ईसा ठहरे, इकलौते बेटेने क्या बतला दिया? इकलौते बेटेने केवल इतनाही कहाकि, जिसने मुझको देखा उसने मेरे बापको देखा, मुझमें मेरे पितामें कुछ भी भेद नहीं है। इकलौते बेटेने इसकी स्पष्ट व्याख्या कहाँ की है कि, खुदा किस रङ्ग ढङ्गका है। समस्त इंजील देख लो। ईसाइयोंमें ईसाकी आज्ञानुसार जिसने उनको देखा होगा, वे कौन २ महाशय
मोटा छोटेमें, रागसे प्रेम शत्रुको मरानेवाला बच्चोंके लिये क्रोध, रेंट लिंग स्नेक
हैं, उनमें खुदाके देखनेके बाद प्रथमकी अपेक्षा क्या अधिकता हो गई ? मने तो कहीं कुछ देखा न सुना ।
गुणोंका भेद — यदि जो गुण बेटेमें थे वे बापमें होंगे तो निःसन्देह सभीने खुदाको देखलिया, यद जो गुण हजरत ईसामें थे वेही खुदामें ठहरेंगे तो खुदाभी मनुष्योंके समान दीन और अपराधी ठहरेगा, इस कारण गुण भेद भी मानना ही पड़ेगा ।
प्रकाश — १ बाबकी ४ आयत जीवन उसमें था वह मनुष्यका प्रकाश था, वह प्रकाश अन्धकारमें चमकता था उसे अन्धकारने न पहचाना । विद्या और अविद्या, ज्ञान और अज्ञान, प्रकाश और अन्धकार सब मायासे बनाये गये हैं । वह प्रकाश जो मनुष्यके जीवनका प्रकाश है । पांचतत्व और तीन गुणका प्रागटच है । वह अंधेरेमें चमकता है उसको तत्वदर्शी लोग देखते हैं साधूलोग गुफों में बैठते हैं उस प्रकाशको अंधेरेमें देखते हैं । वह अंधेरेमें स्पष्टरूपसे दीख पड़ता है । जो जो स्वरोदय साधते हैं जो उसको पूर्णतातक पहुँचाते हैं उन्हें सब हाल प्रगट हो जाता है । जो जगतके जीव अज्ञानके अन्धकारोंमें फँसे हैं वो उस प्रकाशको नहीं पहचान सकते, वही शब्द समस्त संसारमें प्रकाशित है ।
विभाग—वही शब्द तीन भागोंमें विभक्त हुआ, जिसको “तसलीम बोलते हैं” एक अद्वैत जो है वो अविभाज्य है । जिसका भाग्य होता है वह माया है एक अद्वैत कदापि विभाज्य नहीं । अद्वैत परमात्मा न कभी विभाज्य हुआ न चर्म दृष्टिसे देखा ही जाता है । जिसने देखा उसने अन्तर्दृष्टिसे देखा अन्तरके श्रवणोंसे सुना । ो कुछ आँखोंसे देखा जाता है यह माया है मिथ्या है भ्रम मात्र है । यदि ईसाइयोंसे पूछा जाय कि, वह कौनसा शब्द है ? ओ खुदासे उत्पन्न हुआ, तो कोई कहते हैं कि, वह शब्द ईसा है—भलाजी ! ईसा तो मरियमके गर्भसे उत्पन्न हुये थे. खुदाकी ज्वानसे कहाँ ? यदि ईश्वरके मुखसे निकल पड़े थे तो उस समय उनका रूप क्या था, फिर क्या हुये ? जो शब्द खुदाके मुखसे पहले प्रगट हुआ था उस शब्दको ईसाइयोंमें कौन जानता है कौन मण्डली उसका उपदेश करती है ? ईश्वरके ज्ञानमें बुद्धि अनुमान किसीकी भी पहुँच नहीं । फिर वहां शब्दकी किस प्रकार पहुँच हो सकती है ? मुसल्मानोंका ईश्वरी ज्ञान मूसाके ईश्वरी ज्ञानके ऊपर हो चुका है, वही ईसाका भी है ।
जितनी पोल देख पड़ती है वह सब वायुसे भरी हुई है जब गतिमान होता है तब नानाप्रकारके शब्द होते हैं, जिसको कान सुनता है. क्योंकि, शिथिल वायुमें चञ्चल वायुके प्रवेश करनेसे स्वाभाविकही शब्द निकलता है इसी प्रकार अवघात
जन्य सब शब्द दोके मिलनेसे ही प्रगट होते हैं, एकसे कोई शब्द नहीं होता ।
कुरानके मुख्यधर्म ।
बिसमिष्ठाहरिरहेमानीरहीम
(मीम) (लाम) (अलिफ)
कुराणका स्पष्ट विवरण ये तीन अक्षर हैं जो कोई इन तीन अक्षरोंका अर्थ भली प्रकार समझे बूझे वही मुसलमान है इस (मीम) (लाम) (अलिफ) के बहुत गूढ़ अर्थ हैं । इन तीन अक्षरोंके अतिरिक्त और भी बहुत से अक्षर (मुक़्त आत और मुफ़रदात) हैं, पर यथार्थमें ये तीनही हैं—इस कारण ये तीनहीं सबके प्रथम रखे गये हैं । दूसरी सूरे बकरकी यह पहली आयत है । जितने इमाम और कुरानके टीकाकार हुये, किसीने इन तीनों अक्षरोंकी व्याख्या न की, किसीने इसका अर्थ समझा । हां यदि कुछ समझा हो तो मुहम्मद साहबने समझा हो, जो कुछ समझा होगा वह किसीसे न कहा, न यह भेद किसी पर प्रगट किया । फुकराओ (महात्माओं) में से भी जिसने इसका आशय समझा किसी पर प्रगट न किया, क्योंकि, इन तीन अक्षरोंकी ओटमें ईश्वरी सब भेद भरे हुये हैं, जो कोई प्रगट करेगा दण्ड पावेगा । सब धर्म (मजहब) उसीका है, सब कुछ आपही आप है । ये तीन अक्षर सबके पहिले रखे गये हैं, समस्त कुरानका सार है । इन तीनों अक्षरोंके भेद आशयको जान लेनेसे, फिर हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि किसी धर्मसे धर्मद्वेष अथवा पक्षपातका झगड़ा नहीं रहता । इन तीनों अक्षरोंकी पहचान कोई सच्चा मुसलमानही करेगा ।
सबका एक — कुरानमें लिखा है कि, जो आदम नूह, इबराहीम, इसहाक, याकूब और मूसाका खुदा है, वही मुहम्मदका भी है । फिर उनके ईश्वरी ज्ञानके विषयमें विशेष लिखना और प्रमाणोंका लाना, कुछ आवश्यक नहीं दीखता । हजरत आदमसे लेकर मुहम्मद मुस्तफा तक इसी खुदाके माननेवाले हैं । इसी खुदाकी पूजा करते हैं । सब पश्चिमके पैगम्बरोंका निशाना उसी तरफ है दूसरी तरफ नहीं है । क्या पश्चिम, क्या पूरब, क्या उत्तर, क्या दक्षिण, समस्त संसारके ऋषि, मुनि, सिद्ध, साधु, योगी, यती, तपी, संन्यासी आदि उसी ईश्वरकी उपासना करते आये हैं ।
सबका सार — मूल एक शब्द ॐ है, ॐ कारकी माता केवल एक बिन्दी है । उससे इस बिन्दीका प्रकाश है, जो अगम, अगोचर, अनाम, निःअक्षर आदि है । वही सबका एक पिता है, वही अद्वैत है जब उसकी पहचान हो तभी
मनुष्यता प्राप्त हो, भ्रम छूट जाये। स्वसंवेदके पढ़नेवालोंकी सङ्गति हो, तब सत्य असत्यका ज्ञान होकर उसका ज्ञान हो।
विद्वानोंके भेद — दो प्रकारके विद्वान् हैं। एक लौकिक, दूसरे पारलौकिक। दोनों पुस्तकें पढ़ पढ़करही पूर्णताको पहुँचते हैं। हजारों पुस्तकें छान डालते हैं पर यथार्थको नहीं जान पाते। यदि वे लोग यथार्थको समझते तो संसारमें कभी द्वेष नहीं फैलता।
धार्मिक विद्वानोंमें दो प्रकारके लोग हैं। पहले वे हैं जो अपने गुरु और आचार्यकी आज्ञापर चलते हैं, गुरु शास्त्र पर पूर्ण श्रद्धा रखते हैं। सच्चे अन्तः-करणसे गुरुकी सेवामें लगे रहकर सुकर्म करते हैं दूसरोंको भी कुमार्गसे बचाकर सुमार्गमें प्रवृत्त करते हैं।
दूसरे पण्डित या (उल्मा) — दुष्ट स्वभावके हैं जो स्वयं सत्यपथसे भूलें हैं दूसरोंको भी भटकाते हैं। अपने गुरु और आचार्यके विरुद्ध मार्ग बतलाकर मनुष्योंको बहका २ नरकका मार्ग दिखलाते हैं। अपनी दुष्टतासे कभी नहीं चकते। अच्छे और सरल हृदयके मनुष्योंको भी भटकाकर अश्रद्धालू अधर्मी बना देते हैं। ऐसे शौतानोंसे ईश्वर रक्षा करे।
अर्थ करनेवाले — वेदधर्मके सहस्रों पण्डित इतने अधिक हुये हैं कि, वेदके अर्थको मनमाना करके यथार्थ आशयसे मनुष्यको विमुख रखकर कुमार्गमें डालते हैं। वैदिक कोषमें एक एक शब्दके बहुत अर्थ कहे हैं। इस कारण जिसके मनमें जैसा आता है वैसाही अर्थ करके अपने अनुयायियोंको समझाता है उसीपर दृढ़ करा देता है। इसी प्रकार कुरानके टीकाकारोंने भी किया और करते जाते हैं। अगर इन लोगोंसे पूछा जावे कि, आप जो इस प्रकारसे समझते समझाते हो, इसका क्या कारण है? आपको ऐसे अर्थ करनेके लिये आकाशवाणी हुई है अथवा ईश्वरने स्वयं आकर ऐसा अर्थ करनेके लिये कहा है, आपके अर्थकी कैसे शुद्धि मालूम हो? उसके उत्तरमें सब अपने २ पक्षको सिद्ध करनेके लिये हजारों प्रकारकी बातें बनाते हैं। युक्ति और प्रमाण लाते हैं, पर कोई भी सन्तोषकारक नहीं होता। सब कोई अपने ईश्वरको व्यापक बतलाते हैं, जिसके गुरु और आचार्य को कभी ईश्वरका ज्ञान न हुआ उनके वचनोंसे अज्ञानता टपकती है वे बहुत लम्बी चौड़ी बातें बनाते हैं, अपने वाग्जालमें डालकर सरल हृदयोंको फँसाते हैं। भला ईश्वर व्यापक है तो तत्व और तीनों गुण यह भी तो व्यापक हैं? हां जिसके गुरु और आचार्यमें ज्ञानकी शुद्धता होगी सत्यताको बरतेंगा तो वह अपने अनुयायियोंको कुछ मार्ग बतला सकेगा। यदि आचार्य गुरु और उपदेशक स्वयंही अज्ञानी होंगे तो वे दूसरोंके क्या उपदेश करेंगे?
कर्तव्य - मनुष्यको उचित है कि, मनुष्यत्व (मनुष्यधर्म) को ओर ध्यान दे । उसको भली प्रकार विचारकर आचरण करे जो जान बूझ कर भी मनुष्य धर्ममें प्रवृत्त नहीं होता उसपर शोक और धिक्कार सब धर्मोंके आचार्योंको देखले कि, पहले पुण्यका मार्ग बतलाकर पीछे पाप और निषिद्ध मार्गमें लगा देते हैं ।
बन्ध मोक्षकी विद्या - स्वसम्बेदके पढ़े विचारे बिना किसीको न कभी सुख हुआ है न होगा । जो अपरा विद्यासे अपना कल्याण चाहता है वह महामूर्ख है । परसम्बेद (अपराविद्या) में कदापि मुक्तिकी प्राप्ति नहीं, यह केवल संसार की मर्यादाको स्थिर करनेके लिये है । जिसका मन जिधर चाहे - परसम्बेद (अपराविद्या) पढ़कर बन्धनमें रहे अथवा स्वसम्बेद (पराविद्या- पढ़कर मुक्त हो जाये । बन्धनके लिये अपरा विद्या और मोक्षके लिये परा विद्या है ।
ज्ञानी और अज्ञानी ।
इस संसारमें दो प्रकारके लोग हैं, दोनों एक समान जीवधारी हैं । एकको पण्डित ज्ञानी तथा दूसरेको मूर्ख अनपढ़ कहते हैं । एक मनुष्य, दूसरा पशु बोला जाता है । यद्यपि भिन्न २ रूप बने हैं, पर दोनोंका एकही ढङ्ग हैं। पशु और मनुष्य दोनोंमें पढ़े पण्डित और अनपढ़ मूर्ख दोनों एक समान हैं । इन दोनोंमें मनुष्य श्रेष्ठ है । यही देह भक्ति और मुक्तिके लिये बना है । यही ज्ञान और मुक्तिका द्वार है । इन दोनोंमें ज्ञानी और अज्ञानी एकसे हैं, दोनोंमें भले बुरे एकही रीतिके हैं । जो मनुष्यकी रीति धारण करे, जिसमें मनुष्यत्व पायाजाय वही योग्य है । जिसमें मनुष्यत्व न हो वह त्याज्य है ।
पण्डित और मूर्ख ।
प्रथम मैं संस्कृत भाषाके पढ़े हुये लोगोंका वर्णन करता हूँ । इसमें प्राचीन कालमें बड़े २ विद्वान् ज्ञानी होगये हैं । वे लोग अपनी विद्या बलसे तीनों कालका समाचार कह सकते थे । किसी भी देशका पुरुष उनकी समानता नहीं कर सकता था । जबसे हिन्दुस्थानसे हिन्दुओंका राज्य जाता रहा वे संस्कृतके विद्वान् भी लुप्त हो गये, लोगोंकी स्मरण शक्तिमेंभी निर्बलता आगई । वर्तमान कालके कतिपय पण्डितों विद्वानोंमें कुछ थोड़ा २ ज्ञानका प्रकाश रहता है पर वे बात कहाँ पायें ? जो कोई संस्कृत पढ़ता है, वह पहले संस्कृतकी वर्णमाला सीखता है पीछे व्याकरण वेद, शास्त्र, मन्त्र आदि सीखता है, पर प्रायः दखा जाता है कि, कोई वर्णमालाके अक्षरोंका अर्थ न सीखता है, न सिखलाता है । केवल शब्दोंके ही अर्थ
सिखते सीखलाते हैं । अक्षरोंके अर्थको कोई नहीं जानता, प्रायः कोषादिकोंमें अक्षरोंके अर्थ समझे बिना व्याकरण आदि पढ़ जाते हैं, उनमें वह शुद्धता नहीं होती, जिससे कि, बुद्धि शुद्ध होकर परमात्माको जान जाय ।
मुक्तिका हेतु — सन्त गुरुकी दया होनेपर कर्म उपासना और योग आदिसँ अन्तःकरणको शुद्ध बनाते हैं विधि और निषेध ये दो बाते हैं । वेदों और किताबोंमें इन्हींका वर्णन है । भक्तिके बिना सब पठन पाठन व्यर्थ है, सारी आयु पढ़नेमें बितादें, तो भी भजनके बिना व्यर्थही है । धार्मिक विद्वानोंमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि ऋषियोंने वेदको पढ़ा, पर ऊँकारके भेदको न जाना, इस कारण उनकी मुक्ति नहीं हुई । सबोंने ज्ञानकी सात भूमिका और चार अवस्था ठहराई, परिश्रम करके उससे पार भी हुये तो भी सुख प्राप्त न हुआ । जिस दशामें कि, स्वयंवेद ईश्वरको वर्णन करनेमें अशक्त है. वह कहता है कि—हे प्रभु ! तू अलख करतार है, मेरी पहचानमें नहीं आता । फिर बिना गुरुके वेदोंपर भरोसा करके बैठे रहना व्यर्थ है । सातों भूमिका, चारों अवस्था केवल ब्रह्मरूप हैं, संसारमें सबसे श्रेष्ठपद मनुष्यका है. क्योंकि वह जाग्रत अवस्थाका अधिकारी है । यदि जाग्रत अवस्थाके कार्यको पूरी विधिसे करे तो अवश्य ही मुक्ति पा जायगा ।
किसीका भी भ्रम न गया — दूसरे पशु, जो स्वप्नावस्थामें हैं उनकी कुछ गणना नहीं । तीसरे स्थावर औषधी आदि हैं, जो कि सुषुप्ति अवस्थामें हैं । चौथे होरा, लाल आदि खनिज पदार्थ हैं जो कि घन जड़ सुषुप्तिमें हैं उनकी बातही क्या है ? वे तो अत्यन्त अचेत अवस्थामें हैं । उपरोक्त तीन अवस्थाओंमें सब जीव बन्द हैं । चौथी तुरियावस्था है, उसमें ज्ञानी बन्द हैं । इसके चार प्रकार हैं—१ बर, २ ब्रह्मदत्त, ३ बलिष्ठ, ४ वरियान । चारों प्रकारके ज्ञानी इन चारों श्रेणीमें बन्द हुये अपने ज्ञानसे परमानन्दको प्राप्त कर रहे हैं । तीनों श्रेणियोंके ऊपर तुरियातीतका पद है । इस अवस्थामें ईश्वरके पदको प्राप्त होता है, पर बन्ध नहीं छूटता । अपने कर्मोंसे उसको भी छूटकारा नहीं, यह सब मायासे है । जो जो नाम और ध्यान उनको मिला वे सब मायाकेही ध्यान नाम हैं । उनको जो प्रकाश होता है सब मायाकी ओरसे होता है । इसी कारण उनको यथार्थ स्वरूपका ज्ञान नहीं होता । उनमें जो ज्ञान हैं वो सब नाशमान हैं । जो कर्म, ज्ञान और उपासनासे प्राप्त होता है वो कुछ नहीं है । वे लोग यथार्थसे बहुत बंचित रहे, उनमेंसे किसीका भी भ्रम न छूटा ।
उन सांसारिक विद्वानोंका दूसरी श्रेणीमें वर्णन करता हूँ, जो केवल वेद किताब पढ़ते हैं पर ज्ञानका प्रकाश नहीं रखते, अपनेको ईश्वर ज्ञानी समझते हैं ।
इन पढ़े हुएोंमें वेदपाठियोंकी प्रथम श्रेणी है। वे लोग वैदिक कोष आदिकोंसे अपने मनमाने अर्थ ठहराते हैं। यद्यपि उनका निश्चय झूठ भी हो तो भी उसीको सिद्ध करनेके लिये बहुत प्रयत्न करते हैं। वे अपनी विद्वत्ता दिखलाकर संकड़ोंको अपना अनुयायी बना लेते हैं। उनमेंसे किसीको भी सत्य असत्यका ज्ञान नहीं होता।
वर्णमालापर विचार।
पहले ऐसे लोगोंको चाहिये कि, वर्णमालाके अक्षरोंका अर्थ समझ लें। संस्कृतकी वर्णमालामें सोलह स्वर हैं इनके बाद व्यञ्जन हैं। सोलहों स्वरोंमें बारहसे सब काम चल जाता है। शेष चार व्याकरणके काममें आते हैं। इन सोलहोंमें भी तीन वर्ण मुख्य अ, इ, उ हैं। इन्हीं तीनों स्वरोंसे सब स्वर बने हैं। वे ये हैं—अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, लृ, ॠ, ए, ऐ, ओ औ, अं, अः। येही संस्कृतके सोलह स्वर हैं। इनमें पहला (अ) है—यही सबसे पहिले है इसका अर्थ क्या है?
यह अकार पहले अकेला था, उसके साथ एक दूसरा अ मिल गया, तब ऊँचे स्वरसे उच्चारण किया गया—आ कहलाया। प्रथम जब यह अकेला था तब इसका उच्चारण हलका था। उसके साथ दूसरा मिला तो भारी शब्द हो गया, जब अकेला था तब एक था कि, अनन्त था? यदि एक कहा जायगा तो अद्वैतमें कुछ लिखना कहना आदि नहीं हो सकता। यदि अनन्त कहा जायगा तो उसके साथ साथ क्या था? पहले यह क्या था? दूसरा इसके साथ कौन मिला है। इसके साथ दूसरा मिलानेपर गतिकी शक्ति हुई नानारूप बनने लगे। पहले यह—अ और दूसरा कहोंसे आकर उसके साथ मिला, किस लिये उनके साथ मिला? अकारके पीछे—इ जब अकेला था तब कुछ नहीं कर सकता था। उसके साथ दूसरा आन मिला तो स्वयं गतिमान हुआ, एकसे अनंतकी ओर बढ़ा उसका रूप ई के समान हुआ, ये दोनों मिलकर क्या हुये? इनके पीछे तीसरा प्रगट हुआ—उ—यह क्या हुआ किस वास्ते हुआ? अकेला था तब कुछ न कर सकता था, जब दूसरा उसके साथ सम्मिलित हुआ तब उसका स्वरूप—ऊ—हुआ यह क्या हुआ किस वास्ते हुआ। इस प्रकारसे यह तीनों अक्षर गुप्तसे प्रगट हुये दो दो मिलकर अनेक हो गये, ये सारे संसारमें फैल गये। इसी वर्णमालासे सारे संसारभर की वर्णमाला हुयी।
स्वर क्या है और व्यञ्जन क्या है? वेद पाठियोंको उचित है कि, प्रथम इन तीनों अक्षरोंके आशयको भली प्रकार समझ लें कि ये तीनों क्या चीज हैं। स्वर क्या है और व्यञ्जन क्या है? वेद पाठियोंको उचित है कि, प्रथम
इन तीनों अक्षरोंके आशयको भली प्रकार समझ लें कि ये तीनों क्या चीज हैं कहाँसे हुये ? जब तक इन तीनों अक्षरोंके आशयकी सुधि न हो, तब तक वेद पाठ निष्फल है । यदि शुक्ले रामराम कहना सीख लिया तो क्या हुआ ? जो कोई पण्डित इन तीन अक्षरोंके अर्थको नहीं जानता उसके हृदयमें विद्या प्रकाश उत्पन्न नहीं कर सकती, जब कि अक्षरोंके ही अर्थको न समझे तो शब्दोंके आशयको कैसे समझेगा ? जो शब्दोंके यथार्थ अर्थको न समझे वह वेदके मन्त्रोंके अर्थको नहीं समझ सकता । जो कोई वेद मन्त्रोंके बहुत अर्थ करता हो यथार्थ आशयको न जानता हो, वह मेरे विचारमें वेदपाठी नहीं हो सकता । अपनेको वेदपाठी कहता फिरा इससे क्या हुआ ? वह झूठा है । तीनों लोक और चारों वेद एक शब्द अँ से उत्पन्न हुये हैं । सो अँ अँ तीन अक्षर—अ, अँ, म, के संयोग से बना है । जो कोई इस अँ कारके यथार्थ भेदको सम ता हो वही आत्म ज्ञानका अधिकारी हो सकता है, कहे हुये तीनों अक्षर पांच स्वरूपोंमें प्रगट होते हैं इस प्रकारसे लिखे जाते हैं अथवा ओम् यह इनका यथार्थ स्वरूप है । इस स्वरूपसे पांच स्वरूप बनते हैं—अ—उ—म—ॐ— फिर यह पांचों रूप—ओम् में संयुक्त हैं, जो इन पांचोंकी यथार्थताको जाने उनके अर्थको भलीप्रकार समझ बूझकर व्याख्यान करे, समझे समझावे, वह अवश्य वेदका अर्थ करनेवाला कहा जा सकता है । जो इन पांचोंके यथार्थ भेदसे बेसुध हैं, वे कदापि वेदपाठी नहीं किन्तु मनुष्योंको धोखा देते फिरते हैं । पहले एक—अ—था फिर दूसरा, तीसरा, चौथा और पांचवाँ रूप हुआ । एकसे अनेक हो गया । असल क्या है ? नकल क्या है ? एक क्या है अनेक क्या है ? एक किये कहते हैं ? अनन्त किये कहते हैं ? चार वेदका शिर और सार केवल अँ कार है चार वेद उसकी देह है । इस कारण जो अँ कारके भेदको जानेगा वही ईश्वरी भेदसे विज्ञ होगा । वेदके शिर और भेदको बिना जाने, वेद पाठसे कुछ भी प्राप्त न होगा । साधू लोग केवल एक प्राणकाही अभ्यास करते हैं उसीसे चारों वेदोंका ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं । पण्डितलोग चारों वेद रटतेही रहते हैं पर उसके भेदसे अनभिज्ञही रह जाते हैं । जो कोई वृक्षकी जड़में पानी देता है उसके हाथोंमें समस्त वृक्ष, फूल, फल आदि आजाता है—जो कोई पत्तों २ पर फिरता है उसको वृक्ष नहीं प्राप्त होता । केवल शिरमेंही यथार्थ भेद है, शिर बिना देहके तुच्छ है । शिर सहित देह सत्यपुरुषकी है, शिर रहित देह कालपुरुषकी है । जो वेदके सशिर देहसे ज्ञान प्राप्त करेगा, उसे सर्वोद्धारक मिलेगा । जो बिना शिरके वेदको पढ़ेगा उसको अत्याचारी मिलेगा वेदको बिना — शिर (अँकार) के पढ़नेवाले कालके भक्ष
हैं, प्राचीन कालसे अँकार पर बड़ा शास्त्रार्थ होता आता है पर अबतक निवटेरा नहीं हुआ ।
अंकोंपर विचार ।
पहले मैंने अक्षरोंपर लिखा, अब अंकोंपर लिखता हूँ । सब अंकोंके पहले (१) एक है । यह क्या है ? यह अद्वैत है ? सो द्वैतमें किस प्रकार आता है । इसका माथा गोल और उसके नीचे खड़ी लकीरका स्वरूप क्यों है ? इस खड़ी लकीरके माथेपर गोली किस वास्ते बनाई जाती है । यह एक है, यदि एक है तो दो क्यों बनाया जाता है । एकमें दो रूप होनेका क्या कारण है । यदि दो हैं तो दोनोंके अलग २ क्या नाम हैं ? ये दोनों सच्चे हैं कि, झूठ । यदि ये दोनों सत्य हैं तो जो कुछ कहा सुना जाता है सब सत्य है, यदि झूठ है तो जो सर्व पदार्थ देखनेमें आते हैं झूठ हैं, यदि यह सबझूठ और ठौर ठिकाने हैं तो वेदके उपदेशसे कैसे मुक्ति प्राप्त हो सकती है । यदि ऐसाही है तो मुक्तिके लिये किसी ऐसे पदर्थ की आवश्यकता है जो इनसे भिन्न मार्ग बतलावे, तथा अनिश्चित और नाशमान पदार्थसे जिसका कुछ भी सम्बन्ध न हो ।
मुसलमान विद्वान् ।
अब मैं अरबी, फारसी विद्वानोंके बारेमें विचार करता हूँ, क्योंकि, ये लोग भी संस्कृतके विद्वानोंके समान अपनेको योग्य समझते हैं, थोड़े पढ़े लिखे सिद्ध माहात्माओंको तुच्छ दृष्टिसे देखते हैं । ये लोग अपनेको बड़े अकिलमन्द, जानी समझते हैं । इनमें भी दो प्रकारके लोग होते हैं, एक तो वे हैं जो धार्मिक कार्यसे सम्बन्ध रखते हैं । दूसरे सांसारिक व्यवहारसे सम्बन्ध रखा करते हैं । सो पहले मैं धर्म सम्बन्धी विद्वानोंका वर्णन करता हूँ ।
खुदा और उसका कलाम — जिन्होंने कुरान, हदीस और फ़िक्का आदिक पढ़कर योग्यता प्राप्त की है वे अपनेको पूरा समझते हैं, कुरान और हदीसके वचन को खूब बूझते हैं । कलाम कुद्सी खुदाके वचन (बनवी) नबीका कलाम दोनोंकी टीका करते हैं । हर किसीको पैगम्बरकी शरीअतका उपदेश करते हैं । इन महाशयोंसे केवल इतना पूछना है कि, जो खुदा शहरगसे भी निकट है फिर उसका कलाम जिबराईलके द्वारा क्यों आता था क्योंकि, जो निकट हो उसका वचन दूरसे आवे वह आश्चर्यकी बात है । सत्य तो यह है कि, जहां वचन कहनेवाला हो, वहांही वचन भी होगा । क्या खुदा जुदा उसका कलाम जुदा रहता था ?
शिरके अर्थका अभाव — दूसरी यह बात पूछनी (कुरानमें ११४ सूत्रते हैं सब सूत्रोंपर अक्षर (मुक़तआत या मुफ़रदात) लिखे होते हैं । जिस सूत्रके
शिरपर जो अक्षर (मुक्तआत और मुफर्दात) वही उसका शिर और सार है जो कुरानके सिरपर है वही खुदाका स्थान है । उन्हीं सिरोंमें महत्व भेद है । अतः सब शिरके अक्षर (मुक्तआत और मुफर्दात) ईश्वरके भेदके घर हैं । मैंने देख लिया कि, सब इमाम और मुहम्मदी उल्मा (विद्वान्) टीकाकारोंने ऊपरके अक्षरोंको छोड़कर केवल नीचेकेही सूत्रोंकी टीकाएँ की हैं ।
सबोंने कुरानका शिर छोड़ दिया पर धड़की टीका करनेमें बड़ा प्रयत्न उठाया है, इसके लिये अपना असीम बुद्धिबल खर्च किया है । जो शिरको छोड़ देहकोही सबसे बड़ा जानकर लगा रहै, तो सुख क्यों कर पा सकता है । शिरका भेद जानना ईश्वरी ज्ञान है, धड़का सांसारिक प्रपञ्च और बन्धन है । मुसलमानी सब महात्मा और विद्वान् लोग कुरानके शिरसे बेसुध हैं । कुरानकी देहको पढ़ने पढ़ाने सुनने सुनानेमें खूब लगे रहते हैं । हां, कुरानकी देहके द्वारा नेकी सीखते सिखलाते हैं, यह भी अच्छा है ।
अलिफ लाम और मीम—कुरानकी सूरै बकरके शिरपर पहले जो ये तीन अक्षर अलिफ, लाम, मीम हैं उसकी टीका करनेमें कुरानके सब टीकाकार असमर्थ हैं । सब उल्माओंने बहुत प्रयत्न किया पर एक पहली आयतका भी आशय न मिला । सबी मुसलमान इसका अर्थ न जाननेसे लड़ाई झगड़ा और रक्तपात करते आये । सहस्रों निरपराधोंका खून बहाया, लाखोंके प्राण हनन किये । हां, कोई कोई विरक्त (दुर्वेश) इन अक्षरोंके आशयसे विज्ञ होंगे, संसारी क्या जाने ? यह कुरान अथर्वण वेदसे है । अथर्वण वेदमें ज्ञानकी बहुत बातें हैं । इन अक्षरोंके अर्थको समझनेवालाही विद्वान् हो सकता है ।
प्रश्न—तीसरा—कलमके विषयमें मेरा यह पूछना है ।
لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ مُحَمَّدٌ رَسُولُ اللَّهِ
लाइला अर्थात् है खुदा, इलाह—नहीं खुदा, अरबी और फारसीमें बोलनेका यो महाबिरा है । “नहीं खुदा मगर खुदा” इससे यों समझना चाहिये कि—
नहीं खुदा है खुदा, नहीं खुदा है खुदा । यह तो इसके यथार्थ अर्थ हैं । जिस दशामें कलमामेही भ्रम पड़ा, जो कहता है कि, नहीं और है खुदा । कुछ भी मुतलक खबर न रही तो मुहम्मद रसूल किसका ठहरा ? यह चैतन्यताकी दशा है कि, अचेतताकी । जैसे मुहम्मदका कलमा भ्रम है वैसेही मुक्ति भ्रम है । भ्रम और धोखेके अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है ।
मुसलमानी सांसारिक पंडितोंसे प्रश्न ।
अब मैं मुसलमानी सांसारिक पंडितोंकी ओर फिरता हूँ, जिन लोगोंने अरबी, पारसी, मुक्तिक आदिकी हजारों किताबें छान डालीं । विद्या पूर्णताको पहुँचाई । संसारमें तत्वज्ञानी (फिलसोफी) दोनों (बुद्धिमान) और हकीम प्रसिद्ध हुये । बारीक बीनीमें मशहूर हुशियार हैं ।
प्रथम प्रश्न—इन लोगोंसे केवल इतना पूछना है कि, Huruf तेहज्जी- (अरबी वर्णमाला) का प्रथम अक्षर अलिफ है, सो यह अलिफ कहाँसे आया क्या है ? Huruf इल्लतल (स्वर) तीन हैं (अलिफ, बाव, ये, ये तीनों क्या हैं कहाँसे आये ? क्या काम करते हैं कि किस, कामके लिये विशेषता रखते हैं । अलिफमें क्या इल्लतल है, बावमें क्या इल्लतल है तथा ये में क्या है ? ।
द्वितीय प्रश्न—दूसरा यह पूछना कि, जितने अक्षर हैं सब ज़ोर जबर और पेशके संयोगसे काम देते हैं । बिना इनके सब अक्षर बेकार हैं ? सो यह क्या हैं ज़ोर किस लिये ज़ोर है । जबर किस लिये जबर हैं । पेश किस वास्ते पेश है । पेश मुफ़रिद है कि, मुरक्कब । इस पेशमें दो रूप मालूम होते हैं, एक बैजा (अण्डा) और दूसरी मद्द है, मद्द क्या है ? दोनों किस लिये मिले हैं ? वे दोनों अलग हैं तब क्या हैं ? जब मिले हैं तब क्या हैं ? किस लिये मिले हैं ! किस लिये अलग हैं ? जब अलग २ हैं तब क्या गुण नाम रखते हैं ? इनके अतिरिक्त एक ज़ज्म भी है वह क्या है ? वह क्या गुण रखता है ? उसका मूल क्या है ? उसका नक़ल क्या है ? यह क्या है कहाँसे आये ? सब Hurufकी ये रुह हैं, इनके बिना सब मुरदा है ।
तृतीय प्रश्न—तीसरे यह कि, जब अरबी और फारसी लिखते हैं, तब कागजके सिर पर एक रूप बनाते हैं फिर लिखना आरम्भ करते हैं, इस रूपका क्या अर्थ है ? इसका कुछ अर्थ है कि, निरर्थक है ? कोई २ कहते हैं कि, खुदाका नाम है, सो तो मैं भान लेता हूँ पर इतनाही कहना अलम न होगा । जबतक शीशः और नुकताके भिन्न २ स्पष्ट अर्थ प्रगट न किये जायेंगे तब तक सब निरर्थक हैं ।
मेरे प्रश्नोंके समझने सोचनेसे अन्तःकरणमें प्रकाश और शुद्धता होगी । मैंने सब बातें खोल दी हैं पर गुरुमुख बिना समझना कठिन होगा जिनकी बुद्धि शुद्धि और धीर हैं वे समझेंगे वही सत्य पदके अधिकारी होंगे ।
अङ्ग्रेजी विद्वानोंसे प्रश्न ।
अंग्रेजी विद्वानोंकी तरफ फिरता हूँ । उनमेंसे धार्मिक विद्वानोंसे इतनाही
पूछना है कि, आदिमें कौनसा शब्द था । किस प्रकार संसारमें आया । यदि वह शब्द मसीह था तो मसीहके साथ गया, अगर नहीं गया तो कहाँ है ? किसके पास है ? इज्जजीलमें कुछ खबर है कि, नहीं ? । तसलीससे केवल बाप बेटा और पवित्र आत्माही आशय है कि, और कुछ ? इन तीनोंका जब एकता होती है तो उनका नाम क्या होता है ? वह क्या काम करते हैं ? सब गुण तो शब्दमें है पर मुक्तिकें लिये कौनसा गुण आवश्यक है ? क्या इतनाही आवश्यक है कि, हम मसीह पर विश्वास करें ? सलीब उठावें, सलीब उठाने और ईसा पर विश्वास लानेसे क्या गुण और आधिक्यता आ गई ? कुछ प्रगट चिह्न भी है ? क्या इज्जजीलपर सच्चा ईमान लानेसे सत्यही पहाड़ अपनी जगहसे टल जाता है ? क्या ऐसा कोई कहीं है ?
इस धर्मके हजारों विद्वान् हैं जिन्होंने सहस्रों पुस्तकें छान डाली हैं । अपनेको बुद्धिमान् और भजन करनेवालोंको तुच्छ समझते हैं । अंग्रेजी फारसी संस्कृत, अरबी, तुर्की, लेटिन फ्रांसीसी और इब्रानी आदिक भाषामें योग्यता रखते हैं । जो बात मैंने संस्कृत पण्डितोंसे पूछी है वही बात इनसे भी पूछना चाहता हूँ । अंग्रेजी भाषाकी वर्णमालामें भी दो प्रकारके अक्षर होते हैं प्रथम (VOWEL) ह्वाविल दूसरेका नाम (CONSONANT) कोन्सोनेन्ट, जो ह्वावेलकी सहायता बिना नहीं बोला जा सकता । ह्वाविल पांच हैं. (AEIOU) ये पांचों ह्वाविल क्या अर्थ रखते हैं ? इन पांचोंके बिना सब अक्षर और उच्चारण तुच्छ हैं । ये पांचों ह्वाविल क्या हैं ? प्रत्येक अक्षरका भिन्न २ क्या अर्थ है ? यदि इनका कुछ अर्थ है तो प्रगट करना उचित है क्योंकि इनका अर्थ समझनेसे मनुष्यके अन्तःकरणमें बड़ा प्रकाश होगा । मैंने इन अक्षरोंके अर्थ किसी किताब डिक्सनरीमें नहीं देखे । न बालकपनमें मुझे इतनी सुधि थी कि, अपने शिक्षकसे इसका अर्थ पूछता । मैं भी अपने दूसरे सहपाठियोंके समान वे अर्थकाही पढ़ता रहा । जब युवावस्था पहुँचा कुछ समझ हुई अपनी भूलके ऊपर दृष्टि पड़ी । अंग्रेजी भाषाके बड़े बड़े प्रसिद्ध विद्वान् इस समय वर्तमान हैं वे सब मेरी ही तरह भूलें तो नहीं हैं ? इन अक्षरों के अर्थ उन्होंने कहीं पढ़े हैं इन पांचों अक्षरोंकी कहीं विस्तृत व्याख्या लिखी हुई है ? ।
मनुष्यत्वका अधिकार—मैंने बहुत लोगोंसे पूछा वे अपनी अज्ञानता ही प्रगट करते रहे तब निराश हो रहा । ये ही पांचों अक्षर सबके शिर, सार अथवा रूह हैं । इनके बिना सब मृत हैं ये पांचों सगकी आत्मा ठहरे इनके बिना सब निर्जीव हैं, तो इनके भेदको जानना ही बुद्धिमानो है । इनके आशय को
समझे बिना पुस्तकोंको पढ़ते जाना बुद्धिमानो नहीं है। यथार्थ भेदको न जाना तो सहस्रों पुस्तकोंके पढ़नेसे क्या लाभ हुआ। यदि कोई कहेंकि, इन अक्षरों के कुछ अर्थ और आशय नहीं हैं, यह बात स्वीकार न करूँगा क्योंकि, ये पांचों निरर्थक होंगे तो सम्पूर्ण विद्या विज्ञान हिकमत निरर्थक हो जायगी। जिस किसीने इन पांचों ह्वाविलके अर्थ पढ़ लिये उनके यथार्थ भेदको जान लिया, उसने भविष्यमें विद्वान् होनेकी नेव डाली जिन लोगोंने इन पांचोंके आशयको समझेबिना बहुतसी पुस्तकें पढ़ ली, वे सब तुच्छ और निरर्थक हुआ। इन्हीं पांचों अक्षरके अर्थको समझ लेना ही विद्या की पूर्णता है कुछ पढ़े अथवा न पढ़े। सांसारिक व्यवहारके लिये भले ही और कुछ पढ़े, परमार्थके हेतु तो केवल इन्हीं पांच अक्षरोंके अर्थ जानना उचित है। यदि इन पांचों में से कोई एक अक्षर का अर्थ भी सीख समझ ले तो उसके अन्तःकरणकी शुद्धता होगी। पांचों अक्षर में पहला अक्षर—ए (A) कहलाता है। यदि कोई इस एक अक्षरका अर्थ समझ ले तो मनुष्यत्व प्राप्त करनेका अधिकारी हो जायगा।
उपदेश—लोगोंने इसी लिये सहस्रों पुस्तकें और अनेक भाषाओंमें दक्षता प्राप्त की है? कि, संसारमें उच्चपद और धन माल? प्राप्त करें बड़े ओहदे और दर्जोंपर स्थिर हों। यदि ऐसा नहीं तो जिसको ईश्वरी ज्ञान प्राप्त करने और मनुष्य पद पर स्थित होने का अनुराग होगा वह अवश्य विवेकी, ज्ञानवानों और सच्चे सन्त साधुओंसे प्रेम करेगा उनके सत्सङ्गसे आत्मिक सुख प्राप्त करेगा। ईश्वरी ज्ञान प्राप्त किया हुआ पूरा महात्मा मिल जावे तो इसी एक अक्षर—A— में समस्त विद्या सिखला देगा। फिर किसी किताबके पढ़ने की इच्छा न रह जायगी।
अंग्रेजी वर्णमाला।
मैं थोड़ासा इस—A— का आशय लिखता हूँ—जब आदिमें कुछ न था। तो वह अनाम निराकार, अचञ्चल, बुद्धिसे परे, वाणीसे परे, अद्वैत था। उसने जब द्वैतकी ओर दृष्टि फेरी तो एक रूप प्रगट हुआ जिसका आकार—O— (अण्डाकार) था, इसको अंग्रेजी ज्ञानमें—ओ बोलते हैं, इसीको साङ्कर भी कहते हैं, जिसका अर्थ है, खाली, सुन्न अथवा कुछ नहीं।
इस अंग्रेजी ह्रूप; ओ—का अर्थ कोई नहीं पढ़ता पढ़ता पर इस ओ—का उच्चारण यथार्थमें ( Woe ) ओ होता है और ( Woe ) का अर्थ चिन्ता, शोक और विपत्ति आदिक हैं।
फिर वही—ओ—जब दूसरे ढङ्गसे लिखा जाता है तब उसका रूप ( Owe ) के समान होता है जिसका अर्थ है—ऋणी (कर्जदार)।
अब जानना चाहिये कि, यह (०) दो शब्दोंमें दो स्वरूप धारण करता है, दोनोंका अर्थ भी दो प्रकारका होता है । एक दुःख और आपत्ति आदिक और दूसरा अर्थ-ऋणी । यह ऋणी जबतक अपने ऋणदायकका ऋण न चुका दे तबतक उसका छुटकारा नहीं हो सकता । आपत्ति और दुःखसे उसकी मुक्ति न होगी । जब यह (०) प्रगट हुआ तब उसमें नाना प्रकारकी वासना भरी हुई थी, यह वासनासे भरा हुआ प्रगट हुआ उसकी छाया पड़ी एक रूपके दो दृष्टि आने लगे । एक असल, दूसरी नकल है जब दो रूप प्रगट हुए तो उसका स्वरूप (००) हुआ । एक साइफर से दो हुये अथवा दो-ओ कहो, जब दोनों साइफर एक रूपके हुये तो उनसे कुछ काम न हुआ तब प्रकृतिने उनके स्वरूपमें विभिन्नता करदी । तब दो रूप बन गये अर्थात् दोनोंमें केवल इतना भेद हुआ कि, एकका आधा शिर टूट गया, तब उनका रूप ऐसा (a) हुआ, यानी जो दो-ओ (००) था सो एक ए (a) हो गया, यह अंग्रेजी वर्णमालाका प्रथम अक्षर हुआ । यथार्थमें इन दो-ओ (००) को प्रकृतिने-ए- (A) बना दिया । यथार्थमें दोनों साइफर हैं : एक असल, दूसरा नकल, एक स्त्री, दूसरा पुरुष । जब एकसे दो हुये तो इनमें दूसरोंको उत्पत्ति करनेकी सामर्थ्य हुई । जब दोनों का रूप बदल गया तो वे दोनों परस्पर मिलकर क्रशमः (EIOU) को उत्पन्न किया (A) के साथ मिलनेसे पांच अंग्रेजी भाषाके ब्हाविल कहलाते हैं । इन्हींसे आगेकी उत्पत्ति हुई, फिर तो क्रमशः (BCDFGHJKL MNPQRSTV-WXYZ) यह अंग्रेजी भाषाके इक्कीस कोन्सोनेन्ट (CONSONANT) हुये । इन अक्षरोंको युक्तिपूर्वक संयुक्त करनेसे शब्द बना । उससे वाक्य, वाक्यसे श्लोक, मन्त्र, पदार्थ पुस्तकें इत्यादि सब बनाई गई यथार्थ, और कृत्रिम, अमली और नज़री सब विद्याएं प्रगट हुई । समस्त संसार, वाणी और पुस्तकोंसे भर गया । सब केवल ओ (O) का प्राकट्य है सब ओ (O) हैं । अगणित पुस्तकों और वाणीसे संसार भर गया । नकल में असल छिप रहा है । यथार्थ और कृत्रिम एकरूप होकर संसारमें पूर्ण हो रहे हैं । पहचानने में नहीं आते कि, कौन यथार्थ कौन कृत्रिम है ? यथार्थ और कृत्रिम दोनों क्या हैं ? क्योंकर है ? किस प्रकार इनका स्पष्टीकरण हो ? सब एक दूसरेके पीछे चले जाते हैं । सब मनुष्य बन्धनमें पड़े हैं यथार्थ मूलको न कोई जानता है न कोई जाननेका प्रयत्नही करता है । इन्हीं पांचोंसे सारा संसार चैतन्य होता है, कोई नहीं जानता कि, ये पांचों कौन हैं । इसी प्रकार सृष्टि और उसका कर्ता, जगत् और ईश्वर, स्वामी सेवक सब प्रगट हो बन्धनमें पड़े । इन सब जगत्
कर्ताओं में सब का राजा ओ (०) है। समस्त साहित्य और सब कला कौशल और विद्याकी जड़ यही है। यहाँतक तो बुद्धि और विचारकी पहुँच है इससे आगेकी किसीको सुधि नहीं कि क्या है ?
जब यह गुप्तसे प्रगट हुआ तो दुःख और शोकसे पूर्ण था। उसी दुःख शोकसे अनन्त दुःख उत्पन्न करके संसार को बन्धनमें डाल दिया समस्त संसार में आपही आप बना आपहीमें समस्त संसार है। यथार्थमें यह ओ (०) है सो ( WOE ) है, इस पर शोक है यह दुःख और आपत्तिका घर है। यह ओ (०) तो स्वयं बन्धनमें है जबतक अपने छुड़ानेवाले को न पहचाने तबतक कदापि न छूटेंगे। यह ओ (०-Ow-c) ऋणी है जबतक अपने ऋणको न चुकावे तबतक छुटकारा न होगा। जब यह अपना ऋण ऋणदाताको चुकावे तो भाग्यवान् हो। यह जाने कि, मेरे ऊपर क्या ऋण है ? किसको देना है ? इसको पहचाने तो मालम करे कि, तन, मन धन ये तीनों आपत्तियां इसको लग रही हैं। इन तीनों आपत्तियोंमेंसे यह फँस गया है। ये तीनों आपत्तियां ही इसके नष्ट और भ्रष्ट होनेके कारण हैं। इन्हीं तीनों में बँधा हुआ इसका आवागमन हुआ करता है। जबतक इनसे पृथक् न हो तबतक मुक्ति की आशा नहीं। उनमें यह जीव ऐसा फँसा है कि. नाना दुःख कष्ट सहनेपर भी उनको छोड़ने नहीं चाहता।
ऐ ओ ! (०) तेरा कहना लिखना सब साइफर, झूठ और निर्मूल है। जब तक इन तीनों (तन, मन, धन, को सद्गुरुके समर्पण न करदे। तब तक तेरा कुछ न होगा क्योंकि, तू वासनासे पूर्ण है। तू इनके मूलको विचार कर कि ये क्या है ? ये तीनों अत्यन्त अशुद्ध है तू शुद्ध है। तू वह है जो मनवाणी और शब्दके परे है। इनसे जो तूने प्रेम किया है इसी कारण अशुद्ध होगया है तुम्हें इन्हीं तीनोंने कँद रखा है। इन तीनोंकी व्याख्या तू सुन।
पहले मनको पहचान कि, यह कौन है। ? यही मन कालपुरुष निरञ्जन है, यह स्वयं बड़ा विषयी है। सब विषय वासनासे पूर्ण है। विषय वासना और काम, भोग इसीसे उत्पन्न हुये हैं इसी मनने मुझे पशुधर्मकी तृष्णा की ओर खींचकर बन्दी बनाया है। जब तक तू इस मनको मारके मृतक न करे गुरुकी आज्ञा-कारितामें पूर्ण उतरे तब तक यह मन मुझ पर प्रबल रहेगा, तू उसके शासन के नीचे दबा रहेगा। जब यह मृतक हो जावेगा। तब तेरा बल उसके ऊपर चलेगा उसको विजय कर सब सुखको प्राप्त करेगा।
दूसरा तन-इस शरीर पर ध्यानकर कि, यह कैसे अशुद्ध मन्त्रकी बँदसे बना है। इस शरीरको मनने बनाया है। जैसा मन है वैसीही तृष्णा और वासना-ओंसे भरा हुआ है, ये दोनोंही महान अपवित्र और नीच है।
तीसरा धन—यह सब विपत्ति और वासनाओंका घर है। अभिमान और अहङ्कारका पिता है चिन्ता व भोग विलासका आधार है।
इस प्रकार ये तीनों (तन, मन, धन) दुःख और अप्रतिष्ठाके कारण हैं। जबतक इन तीनोंका तू सद्गुरुके अर्पण न करे, तब तक मुक्तिका अधिकारी न होगा। इन्हींमें सारा संसार फँसकर मरता है। तू सद्गुरुका ऋणी है। ये जब तू तीनोंको सद्गुरु के अर्पण करदे तो तेरे ऊपर उसकी दया होगी तेरा बन्धन छूटेगा। सब चर अचरमें अपने सद्गुरुको देख। सबको स्वामी तथा अपनेको सेवक जान। सब को सद्गुरुकी मूर्ति जान कर सबकी सेवा कर। जिसप्रकार होसके उनको सुख पहुँचा, किसीको दुःख न दे। किसीपर अत्याचार मत कर, किसीको हानि मत पहुँचा क्योंकि, सब मूर्ति साहबको हैं। पण्डित लोग सहस्रों पुस्तकोंको पढ़ गये, पर अभी तक वर्णमाला भी नहीं पढ़े। वे लोग अपनेको बहुत बड़ा बुद्धिमान और सच्चा समझते हैं पर अभीतक वर्णमालाके ज्ञानमें कच्चे हैं।
साधुओंके हंसनेवाले।
वे लोग सच्चे सन्त साधु और भक्तोंकी हँसी करते हैं उनका ठट्ठा उड़ाते हैं कि, हम बड़े बुद्धिमान् हैं यह अल्पविद्यावाले अथवा वे पढ़े हैं वह उनका हँसना कैसा है? दर्वेशोंपर ठट्ठा उड़ाना कैसा है? जैसा बगला हँसको हँसे तथा तुच्छ समझे, बगलेका गुण बगलोंमें है हँसोंकी पहचान हँसोंको होती है।
विद्याभिमानी पण्डित लोग अपनी समस्त आयु धनके प्राप्त करने, प्रतिष्ठा पाने, विषय भोग को भोगनेमें बिताकर मरे जो सच्चे सन्त साधु राज्य छोड़ छोड़कर निवृत्ति धारण करके संसारसे अलग हुये, मनको दमनकर अपने वश कर लिया, सेवकसे स्वामी बन गये, उदारता, शौर्य, न्याय और शील इन चारों गुणोंको पूरा पाला। यदि विद्याके अभिमानी उनका ठट्ठा करें तो उनको इसकी क्या परवाह है? हँसका भक्ष्य तो मोती ही होगा, बगला मँढक, घोंघी और मछलियों को ही खाया करेगा। हँस और बगले बराबर नहीं हो सकते हैं, उन दोनोंकी चाल अवश्य भिन्न रहेगी। बगला कितनीही युक्ति क्यों न करे? पर हँसकी चाल ग्रहण न कर सकेगा।
झूठ सांचकी एकता—दो सौ वर्षके लगभग हुये होंगे कि, जबसे छपा हुवा सहस्रों प्रकारकी पुस्तकें छपने लगीं पुस्तकावलोकनकी उन्नति हुई। पण्डितों सन्तोंकी निन्दा करना आरंभ कर दिया। ठट्ठा उड़ाने लगे। लोगोंने साधु सेवा छोड़ दी। तब साधुओंनेभी अपने भजनको छोड़कर अपने पेटका धन्धा करना