भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 1041, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1041

और बुद्धिकी बातोंमें लिख दिया है, जिसके पढ़ने सुननेसे मनुष्य और पशुकी समता जान पड़ती है । मनुष्यको खुदाने साग, पात, फल, फूल, आदिके भक्षण की आज्ञा दी, पर नूह और मूसाको धोखा देकर पशुओंकी हत्या कराई मनुष्योंको पापमें फँसाया ।

७ व्यभिचार मत करो — गृहस्तको पराई स्त्री एवं साधुको 'आठों प्रकारके सैथुनका निषेध है ।

८ चोरी मंत करो — जो चोरी करता है उसे हाथ आने पर दंड दिया जाता है जो गुप्तरीतिसे मानसिक चोरी करता है, बुरे संकल्प उठाता है, मिथ्या मनो-राज किया करता है. वह ईश्वरका चोर है अन्तर और बाहर सब प्रकारके बुरे संकल्पों और कम्मोंको छोड़नेसे ही मनुष्यता प्राप्त हो सकती है । जिसका कि, अन्तर और बाहर एकसा हो वही मनुष्य है ।

९ अपने पड़ोसीको प्यार करो — प्रगट तो इसका अर्थ यही है कि, अपने घरके निकट रहनेवालोंको प्यार करो, पर यहां पर समझने की बात है यदि अपना पड़ोसी बदमाश, चोर और डाकू हो. अथवा किसी प्रकारका और भी कोई अधम कर्म करता हो तो हमारा प्यार उसके साथ किस प्रकार हो सकता है ? यदि हम उसको मित्र बनायेंगे तो हम भी उसके साथ पापी ठहरेंगे. क्योंकि, चोर और चोरका सहायक न्यायमें बराबर है । यहां अपने पड़ोसीका यह आशय है कि अपना अर्थात् अपनी आत्मा इन्द्रियोंसे परे मन है, मनसे परे बुद्धि, बुद्धिसे परे आत्मा, अतः आत्माके निकट बुद्धि है इससे बुद्धि अपनी निकटवर्ती पड़ोसी है इस कारण बुद्धिको प्यार करना, उसको उचित कार्यमें लगाना, धर्म, द्वेष, पक्षपात और अन्याय आदि (बुद्धिके शत्रुओं) से बचाना ऐसा प्यार मुक्तका चिह्न है, जो बुद्धिको प्यार करेगा वह सब काम पूरा कर सकेगा । बुद्धिको बिना प्यार करे कोई भी काम ठीक नहीं हो सकता ।

१० झूठी गवाही मत दो — प्रगट तो झूठी गवाही वही समझी जाती है जो जगत्में प्रसिद्ध है । पर उसे भी झूठी गवाही कहते हैं जो कि, बिना जाने सत्य अद्वैत परमात्माके विषयमें गप्पे मारकर लोगोंको जालमें फँसाते हैं ।

इन दश आज्ञाओंके आशयको जो कोई भली प्रकार विचारेगा, उसके अनुसार चलनेका प्रयत्न करेगा वह अज्ञानसागरसे पार हो जायगा ।

जबूर और नबियोंकी किताबोंका भी यही संक्षेप है । इसी मूसाके धर्म की ही उनके पीछेके सब नबी (हजरत ईसा तक) आज्ञा मानते आये हैं ।