कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1039, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर भक्तितमें, परोपकारमें, सत्यमार्गके ग्रहण करनेमें कट जाते, मर जाते थे, तो भी न हटते थे । हां आजकल इतनी बात तो अवश्य है कि, सांसारिक बुरे काम और आसुरी व्यवहारमें बड़ी शूरता प्रगट करते हैं । वह न्याय भी अब नहीं है, क्योंकि, सबसे पहले न्याय यही है कि, परमात्माके ऋणको अदा करें । माता, पिता अपने पराये सबके साथ अपना कर्तव्य पूरा करें । शील (सदाचरण) में भी दोष आगया । लोग हजारों रुपया कमाते हैं, अपना पेट भरते हैं पर दूसरा दुखिया देखता हो तो उसकी सहायता नहीं करते । ईश्वरके नामसे कुछ देनेमें महा कठिनता बीतती है । अतः उदारताके बदले लोभ, लालच और कृपणता देख पड़ती है । शौर्यताके बदले डरपोकपना निज स्वार्थपना और बेइमानी प्रगट हो रही है । न्यायके बदले अन्याय और हठधरम्मी प्रचलित हो रही है । शीलके बदले कठोरता, परनिन्दा, चुगली, चपारी आदि होगये इस प्रकारसे ईश्वरका नाम छोड़तेही लोगों के अन्तःकरणमें आसुरी सम्पत्तिका वास हो गया । जो नामके अभ्यासी पुरुषोंके साथ ये चारों गुण अवश्य होंगे ।
४ सबतका दिन पाक रखो — प्रगट तो यही अर्थ है कि, छः दिन मनुष्य काम करे सातवें दिन कोई काम न करके केवल भजन करे । पर यथार्थमें वह सबतका दिन है । जिस दिन मनुष्यको संसारसे घृणा और वैराग्य आ जावे । सांसारिक । व्यवहार छोड़कर प्रेममें ऐसा भग्न होवे कि, अपने शरीरकी भी सुधि न रहे, निश्चलतासे भजन करे, भजनमें तनिक भी दोषता हो जाने पर सबतका दिन अशुद्ध हो जायगा ।
५ मातापिताकी प्रतिष्ठा करो — प्रगट तो लोग जो अर्थ समझते हैं वही है, पर उसका यथार्थ अर्थ यह समझना चाहिये कि, हमें वह काम करना चाहिये, जिससे माता पिताकी प्रतिष्ठा और सुकृती बढे । ऐसा कर्म केवल एक सत्य परमात्माकी भक्ति है । जिसका पुत्र ज्ञानी भक्त होगा उसके माता पिता प्रतिष्ठाको प्राप्त करेंगे; जैसे धर्मदासजीके पूर्वज, श्वपच सुदर्शन आदिके माता पिता । अपनी संतानकी भजनसे परंधामको पहुच गये । जिस माताने सन्त उत्पन्न न किया उसने कुछ भी नहीं किया । क्या सब मनुष्य सन्तान पुत्र उत्पन्न नहीं करते ? पर जिसने सन्त पुत्र उत्पन्न किया उसनेही पुत्र उत्पन्न किया बाकी सब कुपुत्र हैं । माता पिताको यथार्थ सुख और प्रतिष्ठा देनेवाले केवल सन्तही हैं । इस कारण सबको उचित है कि, अपने माता पिताको प्रतिष्ठा दें । अब यहांपर मैं थोड़ासा इसका विवरण लिखता हूं । जो कबीर साहबने मातृगर्भके विषयमें कहा है । जब बालक मातृगर्भमें रहता है, तब उस दुःख और कष्टमेंसे व्याकुल होकर बहुत विनय