कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
जीवके पक्के तत्व, कच्चे होना मायासे संयोग
तपस्वीकी कथा ।
इसी पुस्तकमें लिखा है कि, एक पुरुष उलटा लटक रहा था, उससे उसका आशय यह था कि, तीन लोकका राज्य मिले, पर उसकी स्त्री इस हेतु तपस्या कर रही थी कि, मेरा पति मेरे घरसे बाहर न जावे। दोनोंकी कामना पूर्ण हुई, उस पुरुषने तो सातों द्वीपका राज्य पाया उसकी स्त्रीके जानते उसका पति उसके घरसे बाहर न गया। घरके भीतरही उसे सात द्वीपका राज्य मिला।
तपस्वी गाधको माया दर्शन ।
एक समय कर्मकाण्डी विद्वान् सरयू नदीमें खड़ा होकर तपस्या कर रहा था, अत्यन्त कष्टसे तपस्याके सिद्ध होनेपर विष्णु भगवान् प्रसन्न हुये दर्शन देकर बोले कि, बर माँगो। तपस्वीने कहा कि, आपकी मायाका कौतुक देखना चाहता हूँ। भगवानने कहा कि, ऐसाही होगा। इतना कहकर भगवान तो अन्तर्धान हो गये। तपस्वीने पानीमें स्नान करनेके लिये डुबकी लगाई तो क्या देखता है कि, वह सपरिवार है अपने घरपर बीमार होकर भर गया है, उसके घरके लोग रोते हुए शोक करते हैं। रीतिके अनुसार उसकी अन्तिम क्रिया हुई, श्राद्ध आदिक भली प्रकारसे किये गये। अब क्या देखता है कि, एक भङ्गीके घरमें जन्म लिया जहाँ इसका गज नाम रखा गया। सोलह वर्षकी अवस्था होने पर एक सुन्दरीके साथ विवाह हुआ, आनन्दपूर्वक उसके साथ जीवन व्यतीत करने लगा। इसके कुछ दिन बीत जानेपर तपस्या करनेकी इच्छा हुई, जङ्गलमें रहकर तपस्या करने लगा। कुछ दिनके बाद स्त्री आदिक सब मर गये, उसके शोकमें देश त्यागकर दूसरे देशको चला गया, जिस देशमें वह पहुँचा वहाँ का राजा सन्तानहीन मर गया था। वहाँके लोगोंने रीत्यानुसार एक हाथीके सृङ्गमें मोतियोंका माला दे दी ऐसा निश्चय कर लिया कि, यह हाथी जिसको माला पहनावेगा उसीको राजा बनाऊँगा। उसी समय जब कि, गज उस देशमें पहुँचा कारंवाई हो रही थी, उस हाथीने इस भङ्गी (गज) के गलेमें माला डाल दी। अब गजकी दयासे उस देशका राजा बन गया। अब वहाँ उसका नाम “कौल” रखा गया। बहुत दिनोंतक आनन्द पूर्वक राज्य करनेके बाद एक दिन राजा कौल नग्न शरीर फिर रहा था कि, उसीके वंशका कोई पुरुष भङ्गी वहाँ आ निकला। उसने राजा कौलको पहचान कर कहा, भाई गज ! इतने दिनों तक कहाँ रहे, किस प्रकार अपना जीवन व्यतीत किया, आजका दिन कँसा अच्छा है कि, बहुत दिनोंके विरेछ हुये मित्रसे भेंट होगई। वे दोनों खड़े वार्तालाप कर रहे थे, बहुतसे लोगोंने उनको
पतन, उन्नति और अवनतिके कारण तत्वमसिका अर्थ खण्डन
देखा यह बात प्रसिद्ध होगई कि, राजा जातका भङ्गी है । इस बातके प्रसिद्ध होनेपर राज्यके जितने अहलकार थे सब बहुत लज्जित हुये । विचारने लगे कि हाय ! हमने बड़ा अनर्थ किया कि, भङ्गीके साथ भोजन आदिक संसर्ग किया । प्रायश्चित्तके लिये ब्राह्मणोंके पास गये, ब्राह्मणोंने कहा कि, अपना सब धन सम्पत्ति ब्राह्मणोंको दान कर दो अपने कुटुम्ब सहित अग्निमें जल जाओ इस पापसे छूटोगे, दूसरा कोई भी मार्ग नहीं है । अतः वे सब अपना धन सम्पत्ति ब्राह्मणोंको देकर अग्निमें जल मरे ।
कौल राजाने जब सुना कि, मेरेही कारण सहस्त्रों मनुष्य सपरिवार अग्निमें जलकर मर गये, अब मेरा जीवन व्यर्थ है, मैं भी जलकर मर जाऊँगा यह विचार कर लकड़ियों जमा करके चिता बनाई उसपर बैठके अग्नि लगा दी । थोड़ी देरमें अग्निकी ताप उसे लगी चेत आया अपनेको देखा कि, मैं वही गाध नाम ब्राह्मण हूँ, जो सरयू नदीमें स्नान कर रहा था । उसके कपड़े जैसेके तैसे रखे हुये हैं, स्नान करनेके लिये चार घड़ीसे अधिक समय नहीं बीता पर उसको भङ्गीके घरमें रहते और उसको राज्य करते हुये सौ वर्ष (१००) हो गये थे । नदीमें डुबकी मारतेही उसकी यह दशा हो गई थी ।
यह कौतुक देखने पर भी सन्तोष नहीं हुआ, फिर तपस्या करना आरम्भ किया । दूसरी बार तपस्या आरम्भ करने पर एक ब्राह्मण उसके घर आया । वह नवागत बहुत कृश और निर्बल हो रहा था । गाधने उसकी यह दशा देखकर पूछा, तुम ऐसे क्यों हो रहे हो ? अभ्यागतने कहा कि, मैं कोशर देशका रहनेवाला हूँ, कालके प्रभावसे वहाँ एक चाण्डाल राजा हो गया था, जिसके साथ वहाँके सब लोगोंने भोजनादिक किया, जिसके कारण वे सब अग्निमें जलकर मर गये । अग्निमें जल जानेके भयसे मैं वहाँसे भाग आया । क्योंकि, मेरा भी उन लोगोंके साथ भोजन आदिकका संसर्ग हुआ था । इस भयसे कि, कोई मुझे भी जल जानेको न कहे मैंने देश छोड़ दिया । अब अज्ञात देशोंमें फिरता हूँ जिससे मुझे कोई न पहचान ले । तभीसे बराबर चान्द्रायण व्रत करता हूँ, जिसके कारण शरीर कृश और निर्बल हो गया है ।
यह कहानीको सुनकर गाध ब्राह्मणने अपने मनमें विचारा कि, यह तो मैंने स्वप्नके समान देखा था, यह प्रत्यक्ष कैसे वर्णन करता है ? इस ब्राह्मणकी जबानी तो मेरा स्वप्नके समयका देखा हुआ सब सत्य जान पड़ता है । कुछ विचार कर उस अभ्यागत ब्राह्मणसे पूरा पता ठिकाना पूछ लिया । वह ब्राह्मण तो बिदा हो गया और गाध उस विषयकी सत्यता जाननेके लिये चला ।
जीवनमुक्त तथा विदेह मुक्त
प्रथम लौतदेशको गया वहाँ अपने भङ्गी परिवारोंको देखा, उनको भली प्रकार पहचाना, मकानोंको ठीक २ वैसेही देखा। वहाँसे केशर देशको चला, केशर देशमें पहुँचकर राज्यका हाल जाना, जैसे पहले देखा था वैसेही पाया। लोगोंसे कहा यहाँके लोग तो बड़े भक्त और अभ्यागतसेवी जान पड़ते हैं। लोग कहने लगे कि, यहाँ तो बड़ी भक्ति और सेवा हुआ करती थी पर कुछ दिन हुए यहाँ एक भङ्गी राजा हो गया था, जिसके साथ लोगोंने भोजनादिक संसर्ग किया बहुतसे लोग उसी पापमें जल मरे। इसी कारण लोगोंके मनमें बड़ा सन्देह हुआ इसीसे अभ्यागतोंकी सेवा बन्द हो गई।
यह सब हाल देख सुनकर गाधको विश्वास हुआ कि, माया कुछ न होनेपर भी सब कुछ है। फिर तपस्यामें संलग्न हुआ। विष्णु भगवान् फिर प्रगट हुये कहा कि, सब कुछ पञ्चतत्त्वसे बना है पञ्चतत्त्व माया है, जो मायाको चाहेगा उसको मायाही मिलेगी। जो ज्ञान चाहता है अथवा जिसको ज्ञान हो जाता है, वह मायाको तुच्छ जानता है, उसकी अभिलाषा नहीं करता। मायाको चाहनेवालोंको मायाही मिलती है जैसे खेतमें धान बोनेवालोंको खलिहानमें गेहूँ नहीं मिलता। बबूरकी डालीसे कोई सेब नाशपाती अथवा अंगूरदि नहीं तोड़ सकता। तू मायाका अभिलाषी था, इसलिये मायाही मिली। भङ्गीके घरमें तुझको सुन्दर स्त्री मिली, राजा होकर सहस्रोंकी हत्याका अपराधी हुआ, यदि मोक्ष चाहता है तो मायाकी उपासना छोड़ दे।
फकीर और अघोरी।
पञ्जाब देशान्तगत पटियाला राज्यके बिटण्डा नामक नगरमें मेरे मित्रोंमें से हुजूरशाह नामक एक विरक्त मित्र (१८७५ ई. में) रहते थे। हुजूरशाह बड़े महात्मा थे, वे कभी २ मुझसे भी मिलनेके लिये दूधनामक गाँवमें आया करते थे, जहाँ कि, मैं रहता था। एक दिन संयोगन मुझसे कहने लगे कि, उनके पास (शहर विटण्डामें) धूलीशाह नामक एक फकीर आये। उन्होंने उनके खूब आवभक्ति की, रातके समय धूलीशाह उनके पास रहे। सबेरे वहाँसे जाने लगे तो हुजूरशाहजीने कहा कि, अब फिर कब दर्शन होगा? धूलीशाहने कहा कि, मेरा डेरा सङ्कुरा राज्यके अमुक ग्राममें है इतना कहकर वहाँसे चले गये। कई एक दिनोंके बाद धूलीशाहके बताये हुये पते ठिकानेपर हुजूरशाह उसी ग्राममें पहुँचे। वहाँ लोगोंसे उन्होंने पूछा कि, धूलीशाह कहाँ रहते हैं, उनकी कुटिया कहाँ है? वहाँके लोगोंने कहा कि, अब धूलीशाह यहाँ कहाँ, उनको मरे हुये पचास वर्षसे भी अधिक हो गया, अब तो यहाँ उनकी समाधि बनी
अम्र ब्रह्म, दृष्टान्त
हुई है । हुजूरशाहजीने धूलीशाहके कब्रको जाकर देखा सलाम करके चले आये । इसी प्रकार सहलों साधू फकीर प्रगटमें तो मर गये हैं पर दूसरी जगह फिर प्रगट होकर फिरा करते हैं । यह सारा संसार बाजीगरका कौतुक है । उदाहरण लिखता हूँ ।
एक दिन ये ही हुजूरशाह साहब कहने लगे कि, गरमीका समय था । कड़ाकेकी धूप पड़ रही थी, दोपहर होने आया था, उस समय एक अघोरी मेरे पास आया । अभ्यागतोंको सम्मान देना सबको उचित है पर उस समय पास खानेका पदार्थ कुछ नहीं था । मेरे हृदयकी बातको अघोरी समझ गया और कहींसे कुछ गुड़ लाया, वह गीला होनेके कारण उसमें बहुतसी मक्खियाँ चिपटकर मर गईं थीं, जिसको देखकर मुझे बहुत घृणा हुई पर मक्खियोंके साथही उसने गुड़ भी घोल कर पी लिया । मक्खियें साथ पी लेनेके बाद वह हुक्का पीने लगा । तम्बाकू पीते पीते धूँवाँ निकालता तो दो चार मक्खियाँ मुखसे निकल कर हवामें उड़ने लग जातीं, इसी प्रकार सब मक्खियोंको उसने धूँवाँकी राहसे बाहर निकाल दिया ।
इसी प्रकार काल निरञ्जन समस्त संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश किया करता है । अघोरी लोग निरञ्जनके मुख्य सेवकोंमें हैं, जब इनका साधन पूर्णताको पहुँचता है तब ये काल निरञ्जनसे मिलकर उसीके रूप हो जाते हैं ।
राजा लवण ।
उत्तरीय भारतके प्रसिद्ध महाराजा हरिश्चन्द्रके वंशमें लवण नामक एक राजा हुआ था । वह सर्वाङ्ग सुन्दर, विद्या, कला कोशलमें पूर्ण, राजकीय कार्योंमें निपुण, सदाचारी, न्यायी, शत्रुओंपर दया भी करने वाला, सेवकोंपर पुत्रके समान दृष्टि रखनेवाला, समानके राजाओंसे द्वेष रहित प्रीति करनेवाला और छोटे तथा पड़ोसके राजाओंकी रक्षा करनेवाला था, सब देशके वणिज लोग स्वतन्त्रता पूर्वक उसके राज्यमें वाणिज्य किया करते थे ।
एक दिन राजा सिंहासनपर बैठा दरबार कर रहा था कि, एक बाजीगर आया, यथायोग्य नमस्कार करके कहने लगा कि, मैं कामरूपदेशसे आया हूँ, बंगालेकी जादूगरी सीखा हूँ, विचित्र खेल दिखला सकता हूँ, यदि आज्ञा है तो कुछ कौतुक दिखलाऊँ । राजाकी आज्ञा पाकर तमाशा दिखलाने लगा । हाथमें एक मुछल लिया, उसको इधर उधर हिलाकर आकाशकी ओर फेंक दिया । वो आकाशमेंही लोप हो गया । बहुत देर न हुई थी कि, सिन्धदेशका एक दूत एक घोड़ा लिये हुये आया कहने लगा कि, यह घोड़ा समुद्रसे निकला
है, मेरे राजाने यह आपके लिये भेंट भेजी है। राजाने दूतको यथायोग्य प्रतिष्ठा दी। राजाने उसे आनन्द पूर्वक स्वीकार कर ली। बाजीगरने कहा कि, महाराज ! इस घोड़ेपर सवार हूँजिये, इसका तमाशा देखिये। राजाने उस घोड़ेकी ओर दृष्टि की। दृष्टि करतेही राजाकी टकटकी बँध गई ऐसा चुप बैठ गया मानों सक्तासी आ गई है। राजाकी यह दशा देखकर सब दरबारी लोग आश्चर्यमें थे, राजाके शरीरको निर्जीव अनुमान करने लगे थे। इस अवस्थामें दो घड़ी रहनेके बाद चैतन्य हुआ, सब लोगोंकी जानमें जान आई। राजाने कहा कि, जिस समय बाजीगरने अपना मूर्छल हिलाया था घोड़ा आजानेपर जैसेही बाजीगरने उसपर चढ़नेको कहा वैसेही मैंने अपनेको उस घोड़ेपर सवार हुए घोर वनमें शिकार खेलते हुये पाया था। वहांसे चलते चलते एक ऐसे वनमें पहुँचा जहां किसी भी जीवधारीका पता नहीं था। आगे चलकर एक ऐसे भँदानमें पहुँचा जहां कि, वृक्ष तो क्या ? घास भी नहीं देख पड़ती थी, दिनभर उसीमें फिरता रहा, रात हुई तो उससे बाहर हुआ। बाहर होना क्या था ? एक दूसरे जङ्गलमें पहुँचा। उस जङ्गलमें नानाप्रकारके जीवधारी इधरसे उधर फिर रहे थे, जगह जगह मीठे पानीके तालाब भरे हुये थे, नानाप्रकारके सुन्दर और फलदार वृक्ष स्थान स्थान पर खड़े थे। मैंने वृक्षकी डाली पकड़ ली वृक्षपर चढ़ गया। घोड़ा भी उसी जङ्गलमें चरता रहा। वह रात मुझे कल्प समान बीती। क्योंकि, दिनभरका थका हुआ भूखा, प्यासा, ऐसे अपरिचित वनमें पड़ा हुआ था। सबेरा होनेपर मार्गको ढूँढ़नेके लिये इधर उधर भटकते भटकते एक दूसरे जङ्गलमें पहुँचा, उसमें बड़े वृक्ष तथा जलका अभाव था, पर कुछ दूर आगे चलनेपर एक लड़की, हशियाँ काली, जैसी भँसकीसी मोटी और शूकरकीसी मैली, अपने हाथमें भोजन लिये हुये जल्दी जल्दी कहींको जाती देख पड़ी। मैं कई दिनका भूखा था, धैर्य न रख सका, उसीसे कहा कि, पर उपकार करना सर्वोत्तम गुण है, किसी भूखेको तृप्त करादेनाही पुण्य है, मैं कई दिनोंका भूखा हूँ, तू अपने भोजनमेंसे थोड़ा मुँ भी देदे। बहुत प्रकारसे बिनती करनेपर कठोर हृदयाने मेरी कुछ भी न सुनी, वरन् भयानक होकर कहने लगी कि, मैं भड़्गिनकी लड़की हूँ, इस वनमें मेरा पिता खेतका काम कर रहा है, उसीके लिये भोजन लिये जाती हूँ, इसमेंसे मैं तुझको नहीं दे सकती। हाँ ! उस दशामें कि, तू मुझसे विवाह करना स्वीकार कर ले तो आधा तुझको दे दूँ, क्योंकि, पति पितासे भी अधिक प्यारा होता है। राजाने कहा कि, आवश्यकतामें प्रतिष्ठा और पवित्रताका ध्यान नहीं रहता, आवश्यकता मनुष्यको किस घाटका पानी नहीं पिलाती
ज्ञानके साधन
है ? मैंने भी आवश्यकताके बश होकर उस भङ्गन की लड़कीसे विवाह करना स्वीकार कर, उससे भोजन लेकर खाया । उसके पास स्वयं मृत पशुका मांस और जो की रोटी थी । वह मुखमें स्वर्गीय भोजनके समान स्वादिष्ट जान पड़ा । पीछे लड़की मुझे पिताके पास ले गई उससे कहा कि, मैंने इस पुरुषको पति स्वीकार किया है तुम भी इसे अपना दामाद बनाओ । उसके बुड़दे बापने कहा कि, जिसको तूने स्वीकार किया वह मुझेभी स्वीकार है । सन्ध्या होनेपर मैं उसके साथ उसके घर गया । वहां देखा तो चारों ओर शूकर फिर रहे हैं, घरमें स्थान २ पर मांस, हड्डियां लटकती औ पड़ी हैं । उस बुड़देने अपनी स्त्रीसे कहा कि, मेरी बेटीने इस पुरुषको पति बनाया है, मेरी सासने भी स्वीकार किया । उन लोगोंके स्वीकार करतेही गांवभरके मेहतर लोग जमा हुये उत्सव करनेका विचार किया । सात दिनतक बराबर मछ, मांसका खाना पीना तथा नाच रङ्ग होता रहा ; मेरा विवाह हो गया । एक सप्ताह भी पूरा न बीता होगा कि, भङ्गन गर्भवती हुई । दो महीनेमें गर्भ रह गया, अब क्या कहना था ? साल २ बच्चे पैदा होने लगे, कई वर्षोंमें बच्चोंसे घर भर गया । एक साल अकाल पड़ा, गांवके सब लोग तितिर बितिर हो गये, मैं भी अपनी स्त्री और बच्चोंको साथ लिये हुये बाहर निकला । चलते २ थकावट भूखसे एक वृक्षके नीचे बैठ गया । खानेको कुछ भी पासमें न था, भूखके मारे सबके प्राण घबड़ा गये । यह विचार हुआ कि सब आत्महत्या करदे, मैंने जब अपनेको आगमें दिया आगकी गर्मीने मुझने तपाया तो मेरी आँख खुल गई, होशमें आया अपनेको यहाँका यहाँही बैठ पाता हूँ । यह सब विपत्ति इस बाजीगरके कारणही भोगी है । इतनी बात सुनतेही बाजीगर अन्तर्धान हो गया । लोगोंने राजासे कहा यह कोई बाजीगर नहीं था, वरन् देवता था, जो आपको उपदेश करनेके लिये आया था कि, संसार ऐसेही भ्रम हैं । यदि कोई बाजीगर होता तो इनाम लिये बिना न जाता । कुछ दिनोंके बाद राजा आखेटके लिये बनकी दक्षिण दिशामें गया चलते २ एक पहाड़की तराईमें पहुँचने पर देखा कि, वहां भङ्गियोंकी बड़ी भीड़ है, उसमें अपने ससुरको भी देखा । उससे अपनी स्त्रीका हाल पूछा राजाका भङ्गी साला मिला । वह, पहचानकर अपने घर ले गया । वहाँ पहुँचनेपर राजाने देखा कि, बहुतसी स्त्रियां बैठी रो रही हैं राजाने पूछा तुम क्यों रोती हो ? उसकी सासने कहा, मेरा दामाद मेरी पुत्रीको लेकर अकालके दिनोंमें न मालूम कहाँ चला गया, इसीसे मैं रोती हूँ । यह बात सुनतेही राजाको भी रोना आया, फिर अपने मंत्रीकी ओर देखकर अपनी सासको कुछ इनाम दिलवाया, वहांसे दूसरी ओर चल दिया ।
माया क्या नहीं करती है, सत्यको असत्य और असत्यको सत्य बनाना असम्भवको सम्भव और सम्भवको असम्भव बना देना ही इसका काम है। मायाके कार्यमें बुद्धि कुछ भी निश्चय नहीं कर सकती मायाकी गतिको जान लेना कठिनही नहीं वरन् असम्भव है।
साखी - जाकी गति ब्रह्मै नहिं पायो, शिव सनकादिक हारे।
ताकी गति नर कैसेके पड़हो, कहैं कवीर विचारे ॥
मुहम्मद साहबके मआराज।
मुहम्मद साहब मआराजको गये एक क्षणमेही सारे आकाशका भ्रमण करके पीछे आगये। पीछे आने पर लोगोंसे अपना सबहाल कहा, किसी २ ने तो मान लिया पर बहुतोंने न माना। सुलतान रुमने तो इस बातके ऊपर तनिक भी विश्वासही नहीं किया। मुहम्मदसाहबकी बातको बिलकुल झूठ समझा बहुत दिनोंतक ऐसाही अविश्वासी बना रहा। एक दिन एक फकीर बादशाहके सामने आकर कहने लगा कि, ईश्वरमें सब शक्ति है वह जो चाहे दिखलावे, जो चाहे सो करदे। आप मुहम्मद साहबके मआराज पर क्यों नहीं विश्वास लाते? मुहम्मद साहबका मआराज बहुतही ठीक है। उस फकीरने बहुत प्रकार बादशाहको समझाया पर बादशाहने एक भी न मानी, उस फकीरने बादशाहसे कहा कि, पानीका एक बड़ा बरतन मँगवाओ। बरतन मँगवाया गया फकीरके कहनेसे उसमें पानी भरकर मैदानमें रखवा दिया गया। उसने बादशाहसे कहा कि इसमें अपना माथा डुबाकर निकाल लो। दरबारी लोग चारों तरफसे घेरकर खड़े थे, बादशाहने जलमें शिर डालके तुरतही निकाल लिया। शिर निकालतेही उस फकीरके ऊपर क्रोध करके बहुत झुंझलाया कहा कि, इस फकीरने मेरे ऊपर बहुत कष्ट डाला था। फकीरने कहा आपके सब आदमी यहाँ खड़े हैं, मैंने आपको कुछ भी नहीं किया, मैं अलग खड़ा था इन लोगोंसे पूछ देखिये। लोगोंने भी कहा, हां हुजूर! यह फकीर तो अलगही खड़ा है, इसने कुछ भी नहीं किया। अपने आदमियोंकी यह बात सुनकर बादशाहको बड़ा आश्चर्य हुआ कहने लगा कि, मैंने जबपानीमें शिर डुबोया उस समय देखा कि मैं स्त्री होगया हूँ एक मैदानमें इधर उधर फिर रहा हूँ, कोई आगे है न कोई पीछे। वहाँसे थोड़ेही दूर पर खेतिहर लोग खेतीका काम कर रहे थे, उसी (स्त्रीके) रूपमें मैं उन लोगोंके पास गया। उन लोगोंने मुझे अकेला लावारिस जानकर अपने गाँवमें चलनेको कहा, वहाँ पहुँच कर एक युवकके साथ मेरा विवाह कर दिया, मैं उसके साथ रहने लगा। उसी अवस्थामें बहुतसे लड़के और लड़कियाँ
कबीर साहिब कृत षड्देह वर्णन
उत्पन्न हुई, यहांतक कि, मैं बहुत बूढ़ हो गया उसी बुड़्डी स्त्रीके स्वरूपमें एक दिन तालावमें स्नान करने गया । जलमें शिर डुबाके बाहर निकलतेही अपनेको यहां खड़ा पाया जाना कि मैं शाहनशाह रूम हूँ आप लोगोंको भी जैसेका तैसा खड़ा पाया । आश्चर्य है कि, इतनीही देरमें क्या क्या हो गया—स्त्री होकर बहुतसे बच्चे जने बूढ़ हो नदीमें स्नान करने गया डुबकी मारतेही पूर्वावस्थामें आगया । यह क्या कौतुक है ? जो एक क्षणमात्रमें ऐसा देखा । उस फकीरने कहा कि खुदाकी कुदरत है, वह जो चाहे सो कर सकता है । उस बादशाहको मुहम्मदके आराज पर विश्वास हुआ उसने समझ लिया कि, संसार ऐसाही है ।
गजल — यह हरदो जहाँदर जहाँ शुवदः बाजी ।
नादानसे दर परदः तिहाँ शुब्दः बाजी ॥
है ख़ाब वह दर नज़र अह्व बरासत ।
यह सारी जमीं और जमाँ शुब्दः बाजी ।
है किस्सा जो सब दो जखो फिरदवस ।
यक सच नहीं यहाँ और वहाँ शुब्दः बाजी ॥
इस किस्साके दफ़्तरमें न गुनजायश आजिज ।
कबतक लिखेगा यह ब्यान शुब्दः बाजी ॥
संसारसे भय और घृणा ।
जो लोग ज्ञानी हैं वे संसारको बहुत तुच्छ समझते हैं क्योंकि, यह यथार्थमें कुछ भी नहीं है जलके बुदबुदके समान है । इसलिये जो मोक्षमार्गके खोजी हैं वे लोग इससे घृणा रखते हैं, समस्त विषय और वासनाको त्यागकर अलग हो जाते हैं, उसकी तरफ दृष्टि भी नहीं करते । यह संसार मृतक है मृतकसे जो लिपटता है वह कुत्ता है, इस कारण संसारसे प्रेम करनेवाले मनुष्यत्वसे हीन कुत्तेके समान हैं । मनुष्य कभी मृतकसे प्रीति नहीं करता, सारी विषयवासना आशक्तिको अन्तःकरणसे उठा दिया उसीका नाम वैरागी, सन्यासी और उदासी है । वही तपस्वी साधु है । इसकी आशक्तिको अन्तःकरणसे निकाले बिना कोई भी साधु वैरागी आदि नामोंका अधिकारी नहीं हो सकता । तन, मन, धन, जिसमें सारे संसारकी आशक्ति है वे ही बन्धनके कारण हैं । पहले शरीरकोही विचारना चाहिये, जिसके कारण धनसे प्रीति करते हैं । यह देह झूठी है असत्यसे प्रेम करनेवाला सत्यको छोड़ता है । जिसने सत्यको छोड़ा वह भटककर अन्धकारमें पड़ेगा । जब असत्य (देह) से आशक्ति हुई तो उसके पोषण पालनके लिये नाना प्रकारकी युक्तियाँ करने लगा, झूठ बोलकर बेइमानी करके दूसरोंको
स्थूल शरीर या कञ्चे तत्त्वकी देह लिंग देह या सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर
दुख देकर, चोरी और धूर्तता आदि नाना प्रकारके निषिद्ध पाप कर्मोंसे धनको कमावेगा, या परतन्त्र होकर नाना प्रकारकी झिड़कियोंको सहता हुआ दासपनसे कुछ प्राप्त करेगा । जो शरीरके ही पोषण पालनमें लगा रहेगा वह सत्यको नहीं प्राप्त कर सकता क्योंकि, सारे विकारोंका मूल आशक्ति है । शरीरकी आशक्ति छोड़े बिना अपने स्वरूपकी सुधि नहीं होती । शरीरकी आशक्तिमें पड़ा हुआ सारा संसार कोल्हूके बेलके समान दिनरात चढकर खा रहा है, इसको कभी भी सुख नहीं होता । इस पर कबीर साहिबने एक शब्द कहा है—
शब्द — खसम विन तेलीके बेल भये ।
बैठत नाहीं साधुकी संगति नांधे जनम गये ॥
बहि बाँह मरे पचे निज स्वार्थ यमको दण्ड सहे ।
सुत दारा धन राज काज हित माथे भार गहे ॥
खसमहिं छोड़ि विषय रंग राचे पापके बीज बोये ।
झूठ मुक्ति नर आश जिवनकी प्रीतिको झूठ खोये ॥
लख चौरासी जिया जन्तुमें सायर जात बहे ।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो उन स्वानकी पूछ गहे ॥
जीव विषयवासनामें पड़ा हुआ चौरासी लाख योनियोंमें मारा मारा फिरता है, उसको ज्ञान विवेकका अवकाशही नहीं मिलता, सदा भय और आशामें फँसा हुआ सन्देह सागरमें गोते खाया करता है ।
साखी—कबहुँ चित्त संसारमें, कबहुँ लोकको भीति ।
क्षणहूँ सुख पावे नहीं, कहा हार कहैं जीति ॥
यह अपने मनमें तनिक भी नहीं सोचता समझता कि, मातृगर्भमें पोषण करनेवाला कौन था ? किसने वहाँ भोजन पहुँचाया ? किसने रक्षा की ? किसने सुखपूर्वक बाहर निकाला ? जन्म लेनेके प्रथमही माताके स्तनोंमें दूध भर दिया । जब तक मातृगर्भमें उलटा लटकता था तबतक किसने किस युक्तसे पेटमें खानेको पहुँचाया ? गर्भसे बाहर निकालने पर किसने दो सेवक प्राणापन्न सेवा करनेवाले उपस्थित कर दिये । वे प्राण जाय तो जाय पर बालककी रक्षामें किसी प्रकारसे उत्साह नहीं हारते थे जब तक युवावस्थाको न पहुँचे तब तक अपना जान माल सब उसके ऊपर निछावर करते रहे जिस विश्वम्भर सर्व रक्षक माताके गर्भमें पोषण और रक्षा की, सुखपूर्वक जन्म दिया वो सर्वदा रक्षा किया करता है । ऐसे दयालु सर्व रक्षक सर्व शक्तिवान पिताको भूल कर असत्य संसारसे प्रेम करना मनुष्यत्व नहीं है इस संसारमें कोई किसीका नहीं होता, सब अपने २ स्वार्थके चाहनेवाले हैं ।
महाकारण, ज्ञान देह
माता पिता पुत्रकी रक्षा सेवा स्वार्थ जानकर करते हैं, पुरुष स्त्रीको अपने सुखके लिये चाहता है, स्त्री पुरुषको स्वार्थवश हो प्यार करती है, सांसारिक प्रेम कोई न कोई स्वार्थसेही हुआ करता है । निःस्वार्थ हर समय रक्षा करता है वही सत्य परमात्मा अपना है, नहीं तो कोई किसीका नहीं है । माता पिताके अन्तःकरणमें बालककी सेवा करनेका अङ्कुर डालनेवाला भी वही है । यदि उसकी कृपा न हो तो माता पिता अथवा कोई भी प्रेम न करे । सारे जीवधारी अपने बच्चोंको प्रेम और प्रीतिके साथ पालते हैं । किसी प्रकारकी आशा नहीं रखते । ऐसा प्रत्यक्ष देखनेमें आता है कि, जबतक बच्चा स्वयं अपना व्यवहार चलाने योग्य नहीं होता तबतक (मनुष्यके अतिरिक्त सब जीवधारी उसका पोषण और पालन करते हैं, पीछे कोई सम्बन्ध नहीं रहता, पर मनुष्य अपने बच्चोंकी सेवा और पोषण पालन करके उससे बदलेकी इच्छा रखते हैं । जिसने उनके (माता पिता) अन्तःकरणमें बालकका प्रेम और प्रीति वही बदला भी दिला सकता है, परमात्माको धन्य है जो सर्व कुछ करनेपर भी किसीसे कुछ नहीं चाहता । पशु अपने बच्चोंसे इतनी प्रीति करते हैं कि, मनुष्य उनकी समता नहीं कर सकते, जैसा कि, इसी पुस्तकके देखनेसे प्रगट होगा कि, पशु अपने बच्चोंसे कितनी मुहब्बत करते हैं पर वे कुछ भी बदला नहीं चाहते । उससे उल्टा मनुष्य नाना प्रकारकी आशाओंसे घिरा हुआ अपनी सन्तानसे बहुत कुछ चाहता है । प्रत्येक जीवधारी कामके वशमें होकर स्त्रीसे सम्भोग करता है, जिससे सन्तानकी उत्पत्ति होती है । जिस प्रकार अपना सुख विचार कर सम्भोग करता है उसी प्रकार प्रेमके वश होकर उसकी रक्षा और पोषण पालन करता है, यह ईश्वरी नियम है । माता इस कारण भोजन नहीं करती कि, वह बच्चेको पहुँचे, वरन् वह भूखको मिटानेके लिये भोजन करती है पर विश्वम्भर स्वयं बच्चेको गर्भमें भी भोजन पहुँचाता है, जिसको विश्वम्भर पर विश्वास है वह संसारकी आशाओंसे मुक्त होता है । जो सर्व रक्षक परमात्माको सत्य जानता है, वह सांसारिक प्रेम और प्रीतिसे निर्मूल होजाता है । सांसारिक स्नेहको मूर्खता । अज्ञानता समझकर त्याग देता है ।
गजल
मुहब्बत देह और दिलबर नहीं होता नहीं होता ।
कि, दो मिहमानका एक घर नहीं होता नहीं होता ॥
चढ़े मन्सूर और ईसा हजारों दारके ऊपर ।
कि रौशन रोजमें शब्रे पर नहीं होता नहीं होता ॥
षष्ठ विज्ञान देह
नहीं मैं तुही तू है जब हूँ मैं तब तू नहीं हरगिज ।
भजन विन वह सुजन दरबर नहीं होता नहीं होता ॥
सनमके खालो ख़तको देख जिसने हज उठाया है ।
कि, इस दिल पर हजे दीगर नहीं होता नहीं होता ॥
नहीं रूईदगी बाकी रहे कोई तुख्म बिरियामें ।
कभी बरपा कोई अशजर नहीं होता नहीं होता ॥
जमुरंद नीलमो मिर्जा और लाले बढुखाशॉनी ।
गोहर गंजों मेहर दरबर नहीं होता नहीं होता ॥
जो होवे खाने खंजीर और फिर तैर तारीकी ।
कि, वह मंजिल परी पैकर नहीं होता नहीं होता ॥
यह जान बाजी न हो हरगिज वज्रज कोई मर्द गाजीके ।
कि, बुजहिल फौजका सरवर नहीं होता नहीं होता ॥
न करत खीर तन मन धन तसद्दुक करनेमें आजिज ।
कि, आशिक धडके ऊपर सर नहीं होता नहीं होता ॥
मनकी इच्छाओंको पूरा करनेसे यह मोटा और प्रबल हो जाता है ।
जब यह प्रबल हो गया तो फिर वशमें लाना बहुत कठिन हो जाता है । इसी
कारण साधु लोग मनकी इच्छाओंको पूरी नहीं होने देते, वरन् इसके उलट
करके मृतक तुल्य बान लेते हैं । जब यह इच्छा पूर्वक पदार्थोंको नहीं पाता तो
शनैः शनैः आपही मुर्वके समान हो जाता है । जो बुद्धिमान् हैं वह शरीरसे
आसक्ति करके इसीमें नहीं लगे रहते वरन् जैसे होता है संसारकी मुख्य वास-
नाओंको ठिकाने लगाते हैं अर्थात् संसार मुख्यवृत्तिका निरोध करके सत्पुरुषमें
जोड़ते हैं । इसी विषय वासनाकी इच्छाने सारे संसारको खा लिया है ।
शब्द — नर तेरी कबकी बैरिन जवानी ।
विषया लीन भयो मतवारो निर्गुन भक्ति न जानी ।
बीस बरसकी घरमें सुन्दरी रहे अलमस्त दिबानी ॥
निसिवासर वाहीसे लुबधे ज्यों माँखी मिष्ठानी ॥
उड़ते बार उड़ा नहिं जाई नारी नरककी खानी ॥
कहें कबीर सुनो भाई साधो यही विधि बहुत दिवानी ॥
शब्द — सन्तो बाधिनका खायो लोई ।
तीन लोकमें पड़ गई बाधिन खात न जाने कोई ॥
काजल नैन दशन चमकावे कसकस बाँधे गाढ़ी ।
हिन्दुओंकी तरह मुसलमान भी अम्रमें
लुकि २ अन्तरगत पैठी खाय करेजा काढी ॥
कान गहू काजी नाक गहू मुल्ला औलिया भेष है प्यारी ।
राज कुमार रङ्गपति सुन्दर मोहि लिये नरनारी ॥
जेहि स्वाद षट्दर्शन मोहे पण्डित कियो खिहोड़ी ।
सुखदेव स्वामी कन फट्टा गुरु उनहूँकी नाड़ि मरोडी ॥
शिव सनकादिक औ ब्रह्मादिक बाधिन मुख सब आये ।
गिरि गोवर्द्धन नखपर लीन्ह्यो तेहि बाधिन धर खायै ॥
उत्तपति परलय दोउबिच बाधिन सतगुरु भली विचारे ।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो हरिजन बाधिन मारे ॥
बाधिनने सबको खा लिया, जिसको सतगुरुका पता मिला कायाके मार्ग-
मेंही उनको प्रकाश मिला है ।
नजम — जो तन मनो धनके हंकारसे । न टूटा न जूटा निरंकारसे ॥
सो तनोमन धनसे गिरफ्तार है । न कोई राह्रास्त रफ्तार है ॥
सो यह तन सरासर त अफुन भर । फिक गौरसे उसको देखो जरा ॥
कोधानो सोई सातसो पूर हैं । यह नापाक है गन्दगी धूर है ॥
मिलेगी सो जा खाक्रमें अन्तको । तजो नेह देही भजो कंतको ॥
गलत इसको जाने है जाहिद वही । सो पावे खुदापाक वाहिद वही ॥
बलैयात आफादका घर यही । महल आमदो रफदका दर यही ॥
निगह कीजसे कृष्ण और रामको । करो गौर आगाज न अनजाम को ॥
यह दुनियाँका दुख भोगकर चले । कैरो जादव और पांडो अमर कले ॥
धरे तन कहाँ कोन जगमें सुखी । गूही और तपी सिद्ध योगी दुखी ॥
जमीन आसमानके जो बाशिदगान । गिरफ्तार गम है सब बे गुमान ॥
धरे तन लगी सङ्ग तेरी बला । कनक कामिनी रङ्गमें जारुला ॥
परख दोनों तलवारकी धार है । मिले इनसे उनका गला पार है ॥
यह जड़ देह तो आत्माराम है । तू चैतन गुनों सारेका धाम है ॥
किया जड़की संगततू चैतन्य हो । निराकार निराधार तू धन्य है ॥
त्रिगुण पाँच पञ्चीसके कोटमें । पुराने डुराने इसी ओटमें ॥
सो तदबीर कर कर्म फन्दा कटे । कि जड़ संग देहीका गन्दा कटे ॥
तू मनके मते जो करे कामको । पड़े नर्कमें ना लखे रामको ॥
यही मन निरञ्जन निराकार है । यही खींच नफ़सानीमें डार है ॥
यही लोक तीनोंका भूपाल है । यही जगत कारन महाकाल है ॥
सब अम्रमात्र, हंस देह
छले ज्ञानी ध्यानी हटा ध्यानको । छले सिद्ध मारे विषेवानको ॥
जो धनका तुझे ध्यान दिलमें बड़ा । गिरफ्तार लज्जातमें जा पड़ा ॥
यही धन सभी पाको साज है । धरे सो धरे देख जमराज है ॥
इन्ही तानको फाँस तू जानले । हमलमें दर आना नरक मानले ॥
दिया गुरुको तीनों तू अपनी बला । तेरो पापका भार सर सेटला ॥
जहर देके तूने अमी लेलिया । बताओ भलाजी न बदला किया ॥
कहो कौन है जगमें ऐसा कोई । सुधा देके लेवे जहरको जोई ॥
सिवा एक गुरु देवके कौन है । अगम ज्ञान दाता दया भौन है ॥
दिया जिसने सत् नामका जाप है । गई भ्रम पहचाने तब आप है ॥
सभी रिद्धि और सिद्धि इसके गुलाम । जो मुश्दिद मिहरबानीसे लेवेनाम ॥
कहो गुरुसे कहाले मिलेंगे वहीँ । बदल नामकी पास मेरे नहीं ॥
न गुरु देवसा जगतमें मीत है । पचेगा जिन्हे गुरु चरण प्रीति है ॥
मेरी आजिजी खाक सारी तमाम । हमः उग्रकर शुक्र उसका मदाम ॥
मेरी इन कसारीको कीजे कबूल । मिहरबान मुश्दिद मुकद्दस रमूल ॥
मैं आजिज फिरोतन न तनमें है जोर । तू क्रादिर खुदाको बन्द है बन्दी छोर ।
संसारियोंको उपदेश ।
उसकी बुद्धि और विवेकको धन्य है जिसने अपनेको अज्ञानतामें फँसा हुआ देखकर, शीघ्रही सत्सङ्ग खोज अपने आचारको ठीक कर सदाचारी बन गया । उस पर शोक है जो देख जानके भ्रममें फँसा उसीके पक्षपातमें पड़कर सत्य असत्यका विचार न करके झूठको सच्चा कर दिखलाता है उसको सिद्ध करनेके लिये नानाप्रकारके प्रमाणों और युक्तियोंको काममें लाता है । आप सत्य-पथ भूला है, दूसरोंको भी कुमार्गमें डालता है । उसका जीवन तुच्छ है जिसने सत्य भेदको न पाया, जिसने विवेक ज्ञानको प्राप्त न किया । जिसको ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ, वह वेदपाठी हुआ तो क्या ? कुरान और हदीस पढ़ा तो क्या ? पूजा निमाज और व्रत रोजा रखा तो क्या ? सत्यको न पा पक्षपातमें पड़ा मूर्ख कहता है । मेराही धर्म सबसे बड़ा है, इसके बराबर दूसरा कोई नहीं, यह हमारे गुरुने बतलाया, हमारे पुरुषाओंने इसका आचरण किया, मैं इसको न छोड़ूँगा । इसी पक्षपातमें पड़ा हुआ मूर्ख कहता है, मैं जो कहता हूँ, जिस धर्मको मानता हूँ, जो कुछ मेरे गुरुने बतलाया है वही मोक्षमार्ग है, इसके बिनासब बन्धनमें हूँ, अपने आचार्य गुरुके वचनमें किसी प्रकारका सन्देह करना अथवा विचार करना पाप है । ऐसे मूर्ख पक्षपातीको कभी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता, ऐसा
पाँचों भूमिकाओंके नाम
अज्ञानी डरकर भटकता फिरता है पर कहीं भी सुख नहीं पाता, स्वप्नमें भी प्रतिष्ठाका दर्शन नहीं होता, ऐसा पक्षपाती किसी प्रकार भी किसीको सन्तोष नहीं दिला सकता । पक्षपाती धर्म द्वेषमें पड़ा हुआ एकही हृदमें कोल्हूके बेलकी तरह फिरा करता है, वह कभी उस असीम अनन्त परमात्माका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता, जहाँ वेदवाणी भी नहीं पहुँच सकती, जिसके भेदको बड़े २ ज्ञानी ऋषि मुनि नहीं पा सकते, ऐसा पक्षपाती सूर्य उसको कैसे पा सकता है ? ऐसा पक्षपाती पुरुष अपनी बुद्धि और विवेकको कभी काममें नहीं लाता, इस कारण उसे सद्गुण और उत्तम पदकी प्राप्ति नहीं होती, वह अभागही रहता है ।
गजल—यह अबस मर्द जिन्दगानी है । अस्ल इसरार गर न जानी है ॥
कुछ तफक्कुर नहीं न दिलमें तमीज । यह सब अज्ञानकी निशानी है ॥
कहीं रोजा निमाज और पूजा । कहीं कोरे आँ वेद ख्वानी है ॥
मैं बड़ा और मेरा धर्म है बड़ा । और न इसके कोइ सानी है ॥
कभी अगला धर्म न हम छोड़ें । यह हमारी रविश पुरानी है ॥
हम हैं हरदो जहाँमें तजावर । मेरे मुशिदकी मिहरवानी है ॥
ऐसे इनसानको न हो इल्म कभी । झूठको सच जिसने जानी है ॥
कोह जंगल अबस फिरे मारा । दशत सेहराकी खाक छानी है ॥
आदमी जाद के याके द्वाब । शाखेदम अब तलक न आनी है ॥
पढ़के माकूल मन मगन जो होवे । दिल लगन किससा और कहानी है ॥
सिर उसका न हो कभी मालूम । वहाँ पहुँचे न वेद बानी है ॥
गर करे फिक्र कौल आजिज पर । बदो दारैन हुकम रानी है ॥
बुद्धिमान् मनुष्य वही है जो दोषोंको देखकर पक्षपात न करे । शीघ्रही अज्ञानताके मार्गको छोड़ दे ।
दृष्टान्त—एक आदमी व्यापारके लिये परदेश गया । वहाँ से कुछ उपा-
जंन करके जब लौटा तो उसने मार्गमें एक लोहेकी खान देखी । सभोंने लोहा
उठा लिया, कुछ और आगे चलनेपर ताँबेकी खान मिली, लोहाको फँककर
ताँबा उठा लिया पर उनमेंसे एकने न लोहा फँका न ताँबा लिया । यद्यपि उसके
साथियोंने बहुत समझाया पर उसने किसीका कहना नहीं माना । कुछ और
आगे चलनेपर एक चाँदीकी खान मिली, वहाँसे सभोंने ताँबा फँककर चाँदी
उठाली पर लोहेवालेने लोहाही रखा, चाँदी न ली । वहाँ भी उसके साथियोंने
बहुत समझाया पर उसने किसीका कहना न माना । कुछ और आगे चलनेपर
सोनेकी खान मिली सभोंने चाँदी फँक दी सोना ले लिया, पर उस लोहेवालेने
अपना हठ न छोड़ा, उसी लोहेको लिये रहा । कुछ और आगे चलनेपर एक रत्नोंकी खान मिली, सबोंने सोना फँककर रत्न बाँध लिया, पर उस दुराग्रही लोहेवालेने वहाँ भी रत्नोंका अनादर करके लोहाहीके बोझकोही अच्छा समझा । सब अपने अपने घर पहुँचे, जो लोग रत्न लाये थे वे एक एक रत्नको बेचकर अपना व्यवहार चलाने लगे । आनन्द पूर्वक दिन व्यतीत करने लगे, धनी होगये देश देशमें सबका वाणिज्य फैल गया, दिन दिन उत्पत्ति होने लगी । पर वह अभागा लोहेवाला प्रथम तो कुछ दिनों लोहा बेचकर सूखी रुखी खाकर दिन बिताता रहा । फिर दरिद्र हो भूखों मरने लगा । तब दूसरे साथियोंके पास मँगने गया । उन लोगोंने उत्तर दिया कि, हे मूर्ख ! हम लोगोंने तुझे कितना समझाया तूने एकका भी कहना न माना, लोहेको फँककर जवाहिरात तक नहीं ली अब हम क्या करें ? यह तेरे कम्मोंका ही फल है, जो जैसा बोता है वैसाही फल मिलता है ।
साखी – करै बुराई सुख चहै, कैसे पावे कोय ।
रोपे पेड़ वबूलका, आम कहाँ ते होय ॥
जो कोई सज्जनोंकी रीति द्वारा शुभकम्मोंमें अपना मन लगाता है उसका सब कष्ट दूर होता है । वही सद्गुरुका कृपापात्र बनता है । सज्जनोंकी रीति अनुसार शुभकम्मोंमें लगा रहनाही सुखका मार्ग है जो असज्जनोंवत् अशुभ कम्मोंमें प्रवृत्त होगा वह कभी भी सुख न पा सकेगा । जो सद्गुरुकी शरण हो शुभ कम्मोंमें लगेगा वह दोनों लोकोंमें भाग्यवान होगा । इस कारण शुभ कम्मोंही सज्जनोंकी रीतिके अनुसार करना उचित है, यही मनुष्यका कर्तव्य है । शुभ-कम्मोंसे सद्गुरु मिलते हैं, शुभ कम्मोंसेही पापोंसेभी छूट जाता है, शुभकम्मोंसेही जठराग्निकी अग्निसे बचता है, शुभकम्मोंमें प्रवृत्तिही अज्ञानताको दूर कर ज्ञानका प्रकाश प्रगट करती है, शुभकम्मोंही करना उचित है ।
कम्मोंही द्वारा सब जगतकी उत्पत्ति हुई है, कम्महीके आधारसे ग्रह, नदी, पहाड़, समुद्र आदि खड़े हैं, कम्मोंहीसे सूर्य, चन्द्र, भ्रमण करते हैं, कम्मोंही द्वारा ईश्वर और जगत प्रगट हुए हैं, कम्मोंहीसे तीन लोक चौदह भुवन बने हैं, कम्मोंहीसे इन्द्रको छोड़ निद्रन्द पदमें स्थित होता है ।
सदाचरणही माता पिता है, बहन भाई है, यही पुत्र मित्र और सहायक है । सदाचरणसेही लोक परलोकका सुख प्राप्त होता है, सदाचारही उच्चसे उच्चपदको प्राप्त कराता है, सदाचारही संसारमें माननीय और प्रतिष्ठित बनाता है, यही है, जिससे मनुष्य ऋषि, मुनि, सन्त, साधु, पीर, पैगम्बर
औलिया आदि पदको प्राप्त होता है, सदाचारसेही यज्ञ, योग, जप, तप, ज्ञान आदिको प्राप्ति होती है, सदाचारसेही गुरु मिलता है, जिससे मोक्ष प्राप्त होती है । सदाचारही कर्तव्य है, जिसमें सदाचार नहीं है वह मनुष्यही नहीं पशु है ।
मुसद्दस
अमल कर ऐ अमल वारा अमल तुझको छुड़ावेगा ।
अमलही फर्ज है तुझपर अमल सद्गुरु मिलावेगा ॥
अमलही दाग सब तेरे गुह्नकी धों बहावेगा ।
अमलगर होश कर कोई हमल मसकन् छुड़ावेगा ॥
जगतमें भरमका फेरा अमल तेरा हटावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ १ ॥
अमसे यह जमीं और दीद मंजर सब समावी है ।
कवाकिब और सवाबित मेहरो महकी रोशनाई है ॥
जहाँ यह और जहाँदारो जो कुछ खुद अकल आई है ।
तबक चौदह बनाई है अमलकी सब कमाई है ॥
मकॉ सब पार जावे लामकॉ घरमें बसावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ २ ॥
यही मादर पिदर तेरा मिहरवों बहिन और भाई ।
यही फर्जन्द दिलबन्द यही दादा यही दाई ॥
यही ोर्छ अकरवाखुद बतिलफी जोफो बरनाई ।
तेरे आमाल हसनः सब मिलावे मुल्क मोलाई ॥
अमलके वास्ते इनसॉ अमल कर चैन पावेगा ।
अमल करले अमल करले अलमही काम आवेगा ॥ ३ ॥
अमलसे पीर पैगम्बर अमलसे वेद और बानी ।
अमलसे इब्तादा महशर अमलसे रहम रहमानी ॥
अमलसे योग और जुगती अमलसे ब्रह्म ब्रह्मज्ञानी ।
अमलसे सूर गूनागूं वर नक्स हयूलानी ॥
अमल कर नेक सद्गुरु टेक सोई रह बतावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ ४ ॥
अमल मखलूक और खालिक अमल का सब पसारा है ।
अमल के वास्ते आदम वशकले खुद सँवारा है ॥
हुआ आदम अल्लाह सूरत अमलका हुक्म धारा है ।
पाँच देहके नाम, पाँचों वाणियोंके नाम धर्मकी खोज
अमलसे आदमी है वरनः चौपाया विचारा है ॥
अमल कर नेक गर आज्जिज अमल नस्क मिटावेगा ।
अमल करले अमल करले अमलही काम आवेगा ॥ ५ ॥
ईश्वर विषयक सिद्धान्त
पुरुष सूक्तका सिद्धान्त
एक पुरुष है जिसके बहुतसे शिर, नाक, आँखें, कान, मुंह, जिह्वा, पद और अङ्ग हैं, गुप्त प्रकट असंख्य ही इन्द्रियाँ हैं, सारे संसारमें वही व्यापक है। सब जीवधारी उसीकी आँखोंसे देखते हैं, उसीके कानोंसे सुनते हैं, वही सबके अन्तःकरणमें है, वह तीनों कालमें समान है, सबका स्वामी है, अद्वैत और अनुपम है, अनाम है, अक्रिय है, उसका कोई स्थान नहीं सब स्थानोंमें वही है, यह संसार उसके प्रकाशका लघुसे लघु किरण है, ऋग, यजु और साम ये तीनों वेद रज, सत, तम ये तीनों गुण उसीके प्रागटच का परमाणु है, उसीसे उत्पत्ति स्थिति और लय है। प्रणवके तीनों अक्षर उसीसे प्रगट होते हैं वह पुरुष जब स्वांस नीचेको छोड़ता है तो सारा संसार जीवित हो जाता है ऊपर को खींचता है तो प्रलय हो जाता है, ये सब क्रियाएँ होती रहती हैं पर वह पुरुष आप निलैप रहता है।
जब वह सृष्टि उत्पन्न करनेकी इच्छा करता है तो प्रथम हिरण्यगर्भको प्रगट करता है इससे सब जड़ चैतन्य और विराट पुरुष प्रगट होते हैं।
हिरण्यगर्भ अर्थात्-प्रजापति उससे मनु-अर्थात् आद'म और मनरूप-अथवा हौवा होते हैं जिससे सृष्टि होती है।
यज्ञ और जगतका एकही अर्थ है। पुरुष यज्ञ स्वरूप है, सब वस्तुयज्ञसे हुआ करते हैं उसीमें हवन होनेसे लय हो जाते हैं। वेदके ज्ञाता लोग इसी कारण अङ्गोंके समान है। ज्ञानी, पण्डित, वेद और शास्त्रके ज्ञाता, शास्त्रज्ञ, शास्त्रानुसार कर्म करनेवाले, सदाचरणमें बरतनेवाले, पापोंसे घृणा करनेवाले, दैवी सम्पत्तिसहित अपनी आयुको जगत्के उपकारमें बितानेवाले, ऋषि और मुनियोंके समान शरीरयात्रा करते हुये सर्वदा पुरोपकारमें रहनेवाले, विराट पुरुषके शिर हैं। राजा, तन्त्री, ज्योतिषी, वैद्य आदि जिनसे जगत्की रक्षा होती है जिसके द्वारा सब अपनी मर्यादापर चलते हैं, वाँह हैं। वाणिज्य करनेवाले,
१ समष्टि सूक्ष्म अभिमानी देवताको हिरण्यगर्भ कहा करते हैं। २ समष्टि स्थूलके अभिमानी देवताको विराट कहते हैं। ३ मानवी सृष्टिके प्रवर्तकोंको पाश्चात्य साहित्यकवाबा आदम और भी हौवा कहते हैं।
खेती करनेवाले, कारीगरी प्रगट करने नानाप्रकारकी वस्तुओंद्वारा लाभ पहुँचानेवाले, पेटके समान हैं । सब प्रकारकी सेवा करनेवाले सेवक, जिनको कि न विद्या है न बुद्धि है वे बैलोंके समान कमाते हैं दूसरोंके आश्रय जीवन व्यतीत करते हैं, कुर्तोंके समान द्वार द्वार फिरते हैं वे उसके विराट रूपके पग हैं । पशू मांस, अस्थि और चर्मके समान हैं । वनस्पती उसके नख केश हैं, चन्द्रमा मन है, सूर्य आंख है, वायु प्राण हैं, अग्नि वाक्य है, पृथिवीनाभि है, वैकुण्ठशिर है, पाताल पगका तलवा है, दश दिशा कान हैं । इस प्रकार समष्टि स्थूलका नाम विराट है, समष्टि स्थूलही पुरुषका रूप है । इस यज्ञकी सामग्री यह है कि वसन्त ऋतु घोंके समान है, ग्रीष्म लकड़ी है, शरद ऋतु शाकल्य है, सात समुद्र सात काष्ठ हैं, जिससे हवन कुण्डका घेरा बनाते हैं, वेदमन्त्र उसके समान है जिससे अग्निमें शाकल्य छोड़ते हैं ।
प्राचीन कालमें देवता लोग इस यज्ञ को करके परम आनन्दको प्राप्त कर शोकसे छूट जाते थे । हिरण्यगर्भ समष्टि सूक्ष्मका नाम है, उसीसे तत्व प्रगट हुये, उसीमें लय हो जाते हैं, वैसे सूर्यकी किरण सूर्यमें समा जाती हैं, उसी प्रकार सब उसी पूर्ण अनन्त प्रकाशमें लय होजाते हैं । इस भेदको जो समझे वह अज्ञान सागरसे पार हो जावे और सत्यज्ञान पावे । प्रजापति स्थूल समष्टिसे आशय है; हिरण्यगर्भ समष्टि सूक्ष्म है जो इनको परमात्मा समझते हैं वे भूलमें हैं । सभस्त संसार प्रजापतिमें । प्रजापति हिरण्यगर्भमें और हिरण्यगर्भ उस पुरुषमें हैं । इसभेदको ब्रह्मज्ञानी समझते हैं जो समझते हैं वे भली प्रकार जानते हैं कि, हिरण्यगर्भ मैं ही हूँ सभस्त संसार जिससे प्रगट हुआ है वो मैं ही हूँ ।
जो कुछ कहा सुना और लिखा गया है उस अनन्त प्रकाशका वह एक किरण है, उसीको वारम्बार नमस्कार है । जो उस भेदको समझे वैसाही निश्चय करे उसको लोक परलोकका सब आनन्द प्राप्त होता है सब देवते उसकी आज्ञा मानते हैं ।
सारे संसारमें सूर्य श्रेष्ठ है । सबको उचित है कि, अपनेमें और अपनेको सबमें समझे, जैसा विराट पुरुषका वर्णन लिखा गया है वैसाही अपनेमें ध्यान करे ।
जैन धर्मका सिद्धान्त — निरञ्जन परमात्मा वैकुण्ठमें रहता है, वह न कुछ करता है न कराता है, उसको न किसीसे मित्रता है न शत्रुता, सर्व जीव अपने २ कर्म्मोंका फल पाते हैं, परमात्मा निलैप और अकर्त्ता है ।
योगी और संन्यासियोंका सिद्धान्त — निरञ्जन परमात्मा सहस्रदल कमलमें रहता है, प्रणवकी उपासनासे उसका दर्शन होता है ।
१ कंवलयसूत्रमें प्रतिपादित है ये आज केवलनाथ और केवली करके भले ही कुछ मानते हों पर निरंजनका तो जिक्र भी नहीं हैं ।
अज्ञानकी सात भूमिका
कबीर पन्थियोंका सिद्धान्त ।
शब्द – साधू सद्गुरु अलख लखाया । जाते आप आप दरसाया ॥
बीज मध्य ज्यों तरवर दरशे, वृक्ष मध्य ज्यों छाया ।
आतममें परमात्म दरशे, परमात्ममें माया ॥
ज्यों नाभीमें शून्य देखिये, शून्यमें अण्डाकारा ।
निःअक्षरसे अक्षर ऐसा, क्षर अक्षर विस्तारा ॥
ज्यों रवि मध्य किरण देखिये, किरण ज्योति परकाशा ।
पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, जीव ब्रह्मसे स्वाँसा ॥
स्वाँसा मध्ये शब्द देखिये, शब्द अर्थके माहीं ।
पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, न्यास है वह साँई ॥
आपे बीज वृक्ष अंकुर, आपे पुष्प फल छाया ।
सूर्य किरण परकाश आपही, आप ब्रह्म जिव माया ॥
आतममें परमात्म दरशे, परमात्ममें झाँई ।
झाँईमें एक झाँई दरशे, लखे कबीरा साँई ॥
साखी – हम वासी वहि देशके, जहां पारब्रह्मको खेल ।
दीवा बले अगम्यका, बिनु बाती बिनु तेल ॥
राम जपत हैं नामको, नाम जपत हैं थीर ।
ताहूते कछु अपर है, ताको जपे कबीर ॥
हजरत मूसाका सिद्धान्त ।
मूसाका खुदा आसमानी रङ्गका है, वह नबियोंको मनुष्यके रूपमें दिखाई देता है, ध्रुवाँ बादल तथा आगकी लहरोंमें प्रगट होकर भले और बुरेका ज्ञान देता है ।
हजरत ईसाका सिद्धान्त ।
आदिमें एक शब्द था दूसरा कुछ न था, वही तीन भागोंमें विभक्त होकर पिता, पुत्र और पवित्रात्माके रूपमें हुआ, इसीको तसलीस खुदा कहते हैं ।
मुहम्मद शाहका सिद्धान्त ।
तौहीदकी चार श्रेणियाँ हैं । तौहीदका एक सार है, उसका भी एक सार है, उसका एक छिलका है उसका भी एक छिलका है । उसीकी उपमा अखरोटसे
अशुचि जाग्रत् भूमिका, जाग्रत भूमिका महा जाग्रत भूमिका जाग्रत स्वप्न भूमिका
देते हैं; जैसे अखरोटके दो छिलके होते हैं एक (सार) गिरी होती है उसका तेल दूसरा सार है ।
प्रथम वह श्रेणी है कि, आदमी मुखसे — (लाइला इलिइल्लाह) लाइला इलिइल्लाह कहे और हृदयमें विश्वास न रखे, यह संसारी लोगोंका सिद्धान्त है ।
दूसरी श्रेणी यह है कि, उस कलमेके अर्थको जैसे दूसरे लोग मनाते हैं वैसेही मानें उसीको प्रमाणित करनेके लिये नाना प्रकारकी युक्ति और प्रमाण दे यह सिद्धान्त वाचक ज्ञानियोंका है ।
तीसरी यह श्रेणी है कि, मनुष्य विचार करके निश्चय करे कि, सबका मूल एकही है; सब कम्मोंका एकही कर्त्ता है, दूसरा कोई कुछ करही नहीं सकता । यह विश्वास कहे दोनों विश्वासोंके समान नहीं है । इसीसे अज्ञानताकी गॉठ छूट जाती है, यह सब गॉठोंको खोलकर बन्धनोंको छुड़ा देता है ।
कोई पुरुष किसी मकानके द्वारपर जाकर किसीसे सुनले पर यह निश्चय करे कि, अमुक पुरुष घरमें है, यह साधारण लोगोंका विश्वास है कि, उन्होंने अपने माता पितासे अथवा उपदेशकोंसे सुन रखा है । दूसरा पुरुष घोड़ा और नौकरोंको देखकर विश्वास करे कि, अमुक सरदार घरमें है, यह विद्वानोंका सिद्धान्त है कि, उन्होंने युक्ति और अनुमानसे जाना तीसरेने सरदारको घरमें देख लिया । यह ब्रह्मज्ञानियोंका सिद्धान्त है, वे लोग प्रत्यक्ष देखते हैं । इन तीनोंमें बड़ा भेद है सबसे बड़ा पद ज्ञानियोंका है । पर इस श्रेणीपर भी पहुँचकर द्वैत होता है क्योंकि, इस अवस्थामें भी दो भासते हैं जानता कि, ईश्वरसे सृष्टि है, यहां तक एक अनन्त काही बखेड़ा है । जबतक ज्ञानी द्वैतको न नष्ट कर दे, तब तक भेद रहता है कि, उसको तौहीद (अद्वैत) नहीं कह सकते ।
चतुर्थ श्रेणी यह है कि, आदमी एकके अतिरिक्त दूसरा न देखे । जो कुछ देखे एकही देखे एकही कहे, द्वैतका लेश भी न रहे । ऐसे पुरुषको सूफी कहते हैं, सूफी (फनाफी अल्लाह) (ईश्वरमें लय) कहलाता है ।
प्रथम तौहीदको मनाफिक कहते हैं (सुनी सुनी बातोंको निश्चय करना) उसी प्रकार साधारणोंकी तौहीद, अनुमानिक है । चतुर्थ श्रेणीकी तौहीद का समझना कठिन । इस श्रेणीमें केवल ईश्वरही ईश्वर होता है, वरन् मनुष्य आपको भी भूल जाता है । तबकुल (विश्वास) को चौथी श्रेणीकी तौहीद नहीं चाहिये वरन् तीसरे श्रेणीकी तौहीद आवश्यक है, चतुर्थ श्रेणीकी तौहीदकी व्याख्या कोई करही नहीं सकता । इस दरजेमें पहुँचा हुआ, सब कुछ एकही देखता है, आपही प्रेमी और आपही प्रीतम होता है, स्वभावमें स्थित हो जाता है । वह कुछ कर्तव्य