कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1161, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेते हैं; जैसे अखरोटके दो छिलके होते हैं एक (सार) गिरी होती है उसका तेल दूसरा सार है ।
प्रथम वह श्रेणी है कि, आदमी मुखसे — (लाइला इलिइल्लाह) लाइला इलिइल्लाह कहे और हृदयमें विश्वास न रखे, यह संसारी लोगोंका सिद्धान्त है ।
दूसरी श्रेणी यह है कि, उस कलमेके अर्थको जैसे दूसरे लोग मनाते हैं वैसेही मानें उसीको प्रमाणित करनेके लिये नाना प्रकारकी युक्ति और प्रमाण दे यह सिद्धान्त वाचक ज्ञानियोंका है ।
तीसरी यह श्रेणी है कि, मनुष्य विचार करके निश्चय करे कि, सबका मूल एकही है; सब कम्मोंका एकही कर्त्ता है, दूसरा कोई कुछ करही नहीं सकता । यह विश्वास कहे दोनों विश्वासोंके समान नहीं है । इसीसे अज्ञानताकी गॉठ छूट जाती है, यह सब गॉठोंको खोलकर बन्धनोंको छुड़ा देता है ।
कोई पुरुष किसी मकानके द्वारपर जाकर किसीसे सुनले पर यह निश्चय करे कि, अमुक पुरुष घरमें है, यह साधारण लोगोंका विश्वास है कि, उन्होंने अपने माता पितासे अथवा उपदेशकोंसे सुन रखा है । दूसरा पुरुष घोड़ा और नौकरोंको देखकर विश्वास करे कि, अमुक सरदार घरमें है, यह विद्वानोंका सिद्धान्त है कि, उन्होंने युक्ति और अनुमानसे जाना तीसरेने सरदारको घरमें देख लिया । यह ब्रह्मज्ञानियोंका सिद्धान्त है, वे लोग प्रत्यक्ष देखते हैं । इन तीनोंमें बड़ा भेद है सबसे बड़ा पद ज्ञानियोंका है । पर इस श्रेणीपर भी पहुँचकर द्वैत होता है क्योंकि, इस अवस्थामें भी दो भासते हैं जानता कि, ईश्वरसे सृष्टि है, यहां तक एक अनन्त काही बखेड़ा है । जबतक ज्ञानी द्वैतको न नष्ट कर दे, तब तक भेद रहता है कि, उसको तौहीद (अद्वैत) नहीं कह सकते ।
चतुर्थ श्रेणी यह है कि, आदमी एकके अतिरिक्त दूसरा न देखे । जो कुछ देखे एकही देखे एकही कहे, द्वैतका लेश भी न रहे । ऐसे पुरुषको सूफी कहते हैं, सूफी (फनाफी अल्लाह) (ईश्वरमें लय) कहलाता है ।
प्रथम तौहीदको मनाफिक कहते हैं (सुनी सुनी बातोंको निश्चय करना) उसी प्रकार साधारणोंकी तौहीद, अनुमानिक है । चतुर्थ श्रेणीकी तौहीद का समझना कठिन । इस श्रेणीमें केवल ईश्वरही ईश्वर होता है, वरन् मनुष्य आपको भी भूल जाता है । तबकुल (विश्वास) को चौथी श्रेणीकी तौहीद नहीं चाहिये वरन् तीसरे श्रेणीकी तौहीद आवश्यक है, चतुर्थ श्रेणीकी तौहीदकी व्याख्या कोई करही नहीं सकता । इस दरजेमें पहुँचा हुआ, सब कुछ एकही देखता है, आपही प्रेमी और आपही प्रीतम होता है, स्वभावमें स्थित हो जाता है । वह कुछ कर्तव्य