कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1160, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर पन्थियोंका सिद्धान्त ।
शब्द – साधू सद्गुरु अलख लखाया । जाते आप आप दरसाया ॥
बीज मध्य ज्यों तरवर दरशे, वृक्ष मध्य ज्यों छाया ।
आतममें परमात्म दरशे, परमात्ममें माया ॥
ज्यों नाभीमें शून्य देखिये, शून्यमें अण्डाकारा ।
निःअक्षरसे अक्षर ऐसा, क्षर अक्षर विस्तारा ॥
ज्यों रवि मध्य किरण देखिये, किरण ज्योति परकाशा ।
पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, जीव ब्रह्मसे स्वाँसा ॥
स्वाँसा मध्ये शब्द देखिये, शब्द अर्थके माहीं ।
पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, न्यास है वह साँई ॥
आपे बीज वृक्ष अंकुर, आपे पुष्प फल छाया ।
सूर्य किरण परकाश आपही, आप ब्रह्म जिव माया ॥
आतममें परमात्म दरशे, परमात्ममें झाँई ।
झाँईमें एक झाँई दरशे, लखे कबीरा साँई ॥
साखी – हम वासी वहि देशके, जहां पारब्रह्मको खेल ।
दीवा बले अगम्यका, बिनु बाती बिनु तेल ॥
राम जपत हैं नामको, नाम जपत हैं थीर ।
ताहूते कछु अपर है, ताको जपे कबीर ॥
हजरत मूसाका सिद्धान्त ।
मूसाका खुदा आसमानी रङ्गका है, वह नबियोंको मनुष्यके रूपमें दिखाई देता है, ध्रुवाँ बादल तथा आगकी लहरोंमें प्रगट होकर भले और बुरेका ज्ञान देता है ।
हजरत ईसाका सिद्धान्त ।
आदिमें एक शब्द था दूसरा कुछ न था, वही तीन भागोंमें विभक्त होकर पिता, पुत्र और पवित्रात्माके रूपमें हुआ, इसीको तसलीस खुदा कहते हैं ।
मुहम्मद शाहका सिद्धान्त ।
तौहीदकी चार श्रेणियाँ हैं । तौहीदका एक सार है, उसका भी एक सार है, उसका एक छिलका है उसका भी एक छिलका है । उसीकी उपमा अखरोटसे