कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहै ? मैंने भी आवश्यकताके बश होकर उस भङ्गन की लड़कीसे विवाह करना स्वीकार कर, उससे भोजन लेकर खाया । उसके पास स्वयं मृत पशुका मांस और जो की रोटी थी । वह मुखमें स्वर्गीय भोजनके समान स्वादिष्ट जान पड़ा । पीछे लड़की मुझे पिताके पास ले गई उससे कहा कि, मैंने इस पुरुषको पति स्वीकार किया है तुम भी इसे अपना दामाद बनाओ । उसके बुड़दे बापने कहा कि, जिसको तूने स्वीकार किया वह मुझेभी स्वीकार है । सन्ध्या होनेपर मैं उसके साथ उसके घर गया । वहां देखा तो चारों ओर शूकर फिर रहे हैं, घरमें स्थान २ पर मांस, हड्डियां लटकती औ पड़ी हैं । उस बुड़देने अपनी स्त्रीसे कहा कि, मेरी बेटीने इस पुरुषको पति बनाया है, मेरी सासने भी स्वीकार किया । उन लोगोंके स्वीकार करतेही गांवभरके मेहतर लोग जमा हुये उत्सव करनेका विचार किया । सात दिनतक बराबर मछ, मांसका खाना पीना तथा नाच रङ्ग होता रहा ; मेरा विवाह हो गया । एक सप्ताह भी पूरा न बीता होगा कि, भङ्गन गर्भवती हुई । दो महीनेमें गर्भ रह गया, अब क्या कहना था ? साल २ बच्चे पैदा होने लगे, कई वर्षोंमें बच्चोंसे घर भर गया । एक साल अकाल पड़ा, गांवके सब लोग तितिर बितिर हो गये, मैं भी अपनी स्त्री और बच्चोंको साथ लिये हुये बाहर निकला । चलते २ थकावट भूखसे एक वृक्षके नीचे बैठ गया । खानेको कुछ भी पासमें न था, भूखके मारे सबके प्राण घबड़ा गये । यह विचार हुआ कि सब आत्महत्या करदे, मैंने जब अपनेको आगमें दिया आगकी गर्मीने मुझने तपाया तो मेरी आँख खुल गई, होशमें आया अपनेको यहाँका यहाँही बैठ पाता हूँ । यह सब विपत्ति इस बाजीगरके कारणही भोगी है । इतनी बात सुनतेही बाजीगर अन्तर्धान हो गया । लोगोंने राजासे कहा यह कोई बाजीगर नहीं था, वरन् देवता था, जो आपको उपदेश करनेके लिये आया था कि, संसार ऐसेही भ्रम हैं । यदि कोई बाजीगर होता तो इनाम लिये बिना न जाता । कुछ दिनोंके बाद राजा आखेटके लिये बनकी दक्षिण दिशामें गया चलते २ एक पहाड़की तराईमें पहुँचने पर देखा कि, वहां भङ्गियोंकी बड़ी भीड़ है, उसमें अपने ससुरको भी देखा । उससे अपनी स्त्रीका हाल पूछा राजाका भङ्गी साला मिला । वह, पहचानकर अपने घर ले गया । वहाँ पहुँचनेपर राजाने देखा कि, बहुतसी स्त्रियां बैठी रो रही हैं राजाने पूछा तुम क्यों रोती हो ? उसकी सासने कहा, मेरा दामाद मेरी पुत्रीको लेकर अकालके दिनोंमें न मालूम कहाँ चला गया, इसीसे मैं रोती हूँ । यह बात सुनतेही राजाको भी रोना आया, फिर अपने मंत्रीकी ओर देखकर अपनी सासको कुछ इनाम दिलवाया, वहांसे दूसरी ओर चल दिया ।