कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1152, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनहीं मैं तुही तू है जब हूँ मैं तब तू नहीं हरगिज ।
भजन विन वह सुजन दरबर नहीं होता नहीं होता ॥
सनमके खालो ख़तको देख जिसने हज उठाया है ।
कि, इस दिल पर हजे दीगर नहीं होता नहीं होता ॥
नहीं रूईदगी बाकी रहे कोई तुख्म बिरियामें ।
कभी बरपा कोई अशजर नहीं होता नहीं होता ॥
जमुरंद नीलमो मिर्जा और लाले बढुखाशॉनी ।
गोहर गंजों मेहर दरबर नहीं होता नहीं होता ॥
जो होवे खाने खंजीर और फिर तैर तारीकी ।
कि, वह मंजिल परी पैकर नहीं होता नहीं होता ॥
यह जान बाजी न हो हरगिज वज्रज कोई मर्द गाजीके ।
कि, बुजहिल फौजका सरवर नहीं होता नहीं होता ॥
न करत खीर तन मन धन तसद्दुक करनेमें आजिज ।
कि, आशिक धडके ऊपर सर नहीं होता नहीं होता ॥
मनकी इच्छाओंको पूरा करनेसे यह मोटा और प्रबल हो जाता है ।
जब यह प्रबल हो गया तो फिर वशमें लाना बहुत कठिन हो जाता है । इसी
कारण साधु लोग मनकी इच्छाओंको पूरी नहीं होने देते, वरन् इसके उलट
करके मृतक तुल्य बान लेते हैं । जब यह इच्छा पूर्वक पदार्थोंको नहीं पाता तो
शनैः शनैः आपही मुर्वके समान हो जाता है । जो बुद्धिमान् हैं वह शरीरसे
आसक्ति करके इसीमें नहीं लगे रहते वरन् जैसे होता है संसारकी मुख्य वास-
नाओंको ठिकाने लगाते हैं अर्थात् संसार मुख्यवृत्तिका निरोध करके सत्पुरुषमें
जोड़ते हैं । इसी विषय वासनाकी इच्छाने सारे संसारको खा लिया है ।
शब्द — नर तेरी कबकी बैरिन जवानी ।
विषया लीन भयो मतवारो निर्गुन भक्ति न जानी ।
बीस बरसकी घरमें सुन्दरी रहे अलमस्त दिबानी ॥
निसिवासर वाहीसे लुबधे ज्यों माँखी मिष्ठानी ॥
उड़ते बार उड़ा नहिं जाई नारी नरककी खानी ॥
कहें कबीर सुनो भाई साधो यही विधि बहुत दिवानी ॥
शब्द — सन्तो बाधिनका खायो लोई ।
तीन लोकमें पड़ गई बाधिन खात न जाने कोई ॥
काजल नैन दशन चमकावे कसकस बाँधे गाढ़ी ।