कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कोढ़की बीमारी, दृष्टान्त
भूलके लजाने ठनठनानाही है—कबीर साहबकी साखी ।
चारि अठारह नौ पढ़ि, छौपढ़ि खोये मूल ।
कबीर मूल जाने बिना, ज्यों पंछी चण्डूल ।
चारों वेद अठारह पुराण नौ व्याकरण छः शास्त्र आदि तूने पढ़े पर अपने मूलके न जाननेसे इसे खो दिया । अब तू चण्डूल पक्षीके समान टेंटें चच करता फिरता है । इतना पढ़कर भी अपने मूलको न जाना तो तेरा सब कहना सुनना झोंझके समान झन् झनाने एवं पीतलके समान ठन् ठनानेका है ।
गजल— झोंझके तौर झंझनाते हैं । मिसल पीतलके ठन् ठनाते हैं ।
नुक्तःबारीकसे खबर न रही । जैसे चण्डूल चह चहाते हैं ॥
बात इनकी है बा नमक और नाज्र । जालमें मुर्ग फँसाते हैं ।
बेखबर दाममें फँसे मुर्गी । मुफ्त जान अपनी सब गँवाते हैं ॥
ऐसे आलिमसे दे पनाह अल्लाः । आजिज आलममें ख्वारीलाते हैं ।
हजरत ईशाको साधुका आशीर्वाद — जो रीति भारतवर्षमें कहीं कहीं किञ्चित मात्र रह गई है । पूर्वकालमें योरपमें भी यही रीति प्रचलित थी कि, सांसारिक लोग (गृहस्थ) साधुओंकी सेवा करते थे, साधु वैराग्य विवेक संयुक्त भजन किया करते थे । उस समय संसारियोंको साधुओंपर किसी प्रकारका तर्क नहीं था । साधुओंकी सेवा बे अटक करते थे साधुलोग भली प्रकारसे विचारमें लगे रहते थे । जिससे उनका अन्तःकरण प्रकाशित होता था तब सत्य ज्ञान मिलता था । जिससे संसारियोंको उपदेश करके उनका कल्याण करते थे संसारकी मर्यादाको स्थित रखनेके लिये उत्तम २ नियम बनाते थे उस समय तप दान दोनों उचित था, दान और भजनसे दोनोंके अन्तःकरण शुद्ध होते थे, अतः जिस समय हजरत ईसा उत्पन्न हुए उस समय एक फकीरने उन्हें गोदमें लेकर कहा कि, यह लड़का बड़ा प्रतिष्ठित होगा ।
मुहम्मद साहिबको राहिबका आशिर्वाद—ऐसेही बालकपनमें मुहम्मद साहब चचाके साथ बसरा शहर गये । वहाँ राहिब नाम एक ईसाई साधू मिला, वो बड़ी प्रतिष्ठासे मुहम्मद साबसे मिला । उस समय मुहम्मद साहब लगभग बारह वर्षके थे । साधुने मुहम्मद साहबके मुखकी ओर देख करके कहा कि, यह अन्तिम पैगम्बर होगा, उसीने उनके पीठके ऊपर पैगम्बरी मोहर बतलाई सब भविष्य कहा, जिसके अनुसारही सब कुछ हुआ । मुहम्मदी साहिबका हाल
विशेष वक्तव्य
देखे तवारीखमें इस समय भी सहस्रों प्रकाशित हृदय, अन्तर्यामी, सन्त महात्मा हैं, पर समयके प्रभावको देखकर अपनेको गुप्त रखते हैं, वे प्रगट करना नहीं चाहते।
योरोपमें साधुओंका दान—दुनियादार और विरक्त दोनों अपने अपने धरम पर स्थित थे। जबसे छापाखाना शुरू हुआ तबसे पुस्तकें बहुत सस्ती हो गईं स्थान स्थानपर पाठशालें हो गईं, लोग पढ़ पढ़कर विद्याभिमानी होने लगे। साधुओंकी निन्दा करना आरम्भ कर दिया, प्राकृतिक जन सन्तोंकी सेवा छोड़ बैठे साधू लोगोंने भजन छोड़कर उद्यम करना आरम्भ कर दिया। योरोपमें हरमिट, फरायर। मङ्गल और कोल नामके साधू लोग रहते थे। गृहस्थोंकी यह रीति थी कि, उनसे कोई अपराध हो जाता था तो उसके प्रायश्चित्तके लिये कुछ रुपया लेकर साधुओंके पास जाते थे। कहते थे कि, हमसे यह अपराध हुआ है, आप यह द्रव्य लीजिये परमात्मासे मेरे अपराधको क्षमा कराइये। वे लोग द्रव्य आदि ले लेते थे एक एक स्वीकृति पत्र दे देते थे। जिसे अंग्रेजीमें पारडन बिल (PARDON BILL) कहते हैं, यह क्षमा करानेके पत्रका नाम है इस पार्डन बिलको अपने पास रखो तुम्हारे अपराधकी क्षमाके लिये मैं ईश्वरसे आशीर्वाद करूँगा। इस प्रकार वे पादड़ी उन रुपयोंको अपने काममें लगाते थे एवं अपराधियोंके लिये ईश्वरसे प्रार्थना करते थे। भारतवर्षमें इस प्रकारके दान और प्रायश्चित्तकी रीती अब भी प्रचलित है। यहाँके धर्मात्मा लोग दान पुण्यसे पाप कटना समझते हैं।
पादरीयोंकी हंसी—विद्वानोंने साधुओं और पादड़ियोंका ठट्ठा करना आरम्भ किया। तबसे यह सब रीतियाँ उठ गईं, अपने समयमें जान मिल्टन साहब अंग्रेजी भाषाके एक बड़े भारी कवि हुये हैं, अपनी किताब (PARADISE LOST) की तीसरी जिल्दमें पादड़ियोंका इस प्रकार ठट्ठा करते हैं, मैं भी उसे पद्यमें बनाकर लिखता हूँ।
जान मिल्टन साहबका बचन।
नञ्जम - हर्मिट व फरायर कौल। और मंक भी इस डौल ॥
करते जो मकरोफरेग। मिक्काज धर दर जेब ॥
जामः सफेदो स्याह। सरपर अजीब कुलाह ॥
गिल गिता पाक मकान। ईसू जहां कुर्बान ॥
चल इश्क से अनसूब। ईसा जहां मसलूब ॥
दिलमें भी है हौस। हम जावेंगे फिर दौस ॥
सर्व धर्म
नौरोज हमको ईद । पितरसके हाथ कलीद ॥
दर खोल जन्नत आय । दाखिल हुये मर्द खुदाय ॥
चलते हो दिलमें शाद । उठती मुखालिफ़ बाद ॥
उनको उड़ावे दूर । उस अंधकारमें चूर ॥
हो अकल उनकी गुल । उड़ जाय पारडन बिल ॥
और कौल करता टोप । इस अंधकारमें तोप ॥
बाला विहिश्ती काख । पहले वसीअ व फर्खाख ॥
वहां जान अब कोई भूल । दिल वहां रहे मलूल ॥
वह अहमकों के बिहिश्त । बाकी न अब कोई खिश्त ॥
साधु फकीरोंकी हंसी — इस प्रकार जान मिल्टनके समान प्रायः विद्वान् ठट्ठा मस्खरी उड़ाने लगे अब भी करते हैं । जिसने दस पुस्तक पढ़ली वह कहता है कि, मैं ही बुद्धिमान विद्वान् हूँ, दूसरा मेरे बराबर कौन है । इस कारण साधु फकीर भजन छोड़कर व्यवहारमें लग गये । सब भक्ति भाव नष्ट होगई, पार्टनबिल काफूर हो गया ।
गजल—कुतुहऔ किससे खाँ मचाये गुल । भागा योरोप को छोड़ पार्टनबिल ॥
फिर न योरपमें तू कभी जाना । बागदे अपनी मोड़ पार्टनबिल ॥
अब जो जावे जरूर खावे मार । कुछ न तेरी है लोड़ पार्टनबिल ॥
हरगिज वह सरजमें न देख कभी । उल्मा करते जो हाड़ पार्टनबिल ॥
अब तू सर खुद हो मस्त बहरिश्ता । अहल दुनियासे तोड़ पार्टनबिल ॥
दुनियावी रख न अपना रख करना । खेत अपना तू गोड़ पार्टनबिल ॥
आजिज औरों के गौहरों को फेंका । कूट अपना ही रोड़ पार्टनबिल ॥
गजल—नू जरा सोच आदमी बच्चे । जिससे तू फिर न घर बघर नच्चे ॥
पहली रस्मों को तूने दूर किया । अब कौन रस्म तेरे हैं सच्चे ॥
पढ़ लिया सब जबाँ लाहासिल । अब तलक तुम हो वैसेही कच्चे ॥
पहले जो था है अब नहीं कुछ और । वही तो है भी वही जच्चे ॥
किस लिये हकने की तुझे पैदा । क्या था करना वह काम किस पच्चे ॥
किस लिये खलक में तू अशरफ है । कौनसे कारको तुझे रच्चे ॥
तू अब अपने को जानता दाना । शोहरा तेरा जहानमें मच्चे ॥
नहीं मालूम बारगह वारी । फिर बैठालें तुझे वजा उच्चे ॥
वे समझ सारे ख्वाँदे ना ख्वादे । देख आजिज सब एकसे खच्चे ॥
सच्चे साधुओंके लुप्त होनेका कारण—हिन्दुओंके राज्यके समय साधु
धर्मका प्रयोजन, धर्मका स्वरूप नियमोंकी आवश्यकता और सत्ता नियमोंके भेद ईश्वरीय नियम, परीक्षा, धारण
सन्तोंकी बहुत सेवा शुश्रूषा होती थी, पर वर्त्तमानमें राजा प्रजा कोई भी साधु सन्तोंकी ओर दृष्टि नहीं करता, इस कारण भक्ति और साधु दोनोंही लुप्त हो गये।
संग्रह—साधुओंके विषयमें जो भी कुछ कहा गया है उसीका संग्रह इन नीचेके पद्योंमें दिखाये देते हैं—
गजल—कसरतने कुतुब ख्वानी इबादतको हटाई।
योरपसे चली बाद अब इस हिन्दमें आई ॥
गुम्म ज्ञान किया है न रहा इल्म इलाही।
दिल दिया हलाहल रहा सब दलमें समाई ॥
मैं आकिल व मैं दाना बहर सिम्त सदा है।
मैं आलिमों आजिल हमादाँ हेच गदाई ॥
फिरते हैं बहर नामें कुतुब किस्से ख्वाना।
मुशर्रव मूअ सच जो किसीके दिलमें रहाई ॥
मजहब न कोई साधु गुरु कौन हे आजिज।
दिल भूत सभीको रहे जुल्मात दिखई ॥
मुखम्मस तरजीअ बन्द।
अमबाजका बहरमें तला तम्। भक्तिका नहीं कहीं महातम्।
शैतान् नफस मतिअ नजातम्। क्यों कर हो किसीको लाभ आतम् ॥
भक्तिके लिये है नोहे मातम्।
तालिम मरअक्स प्रेम व भक्ति। सिखलाते हैं लोग जीव जगती ॥
दुनियावी को बात खूब लगती। क्यों कर कोई पावे राहमुक्त ॥ भक्ति० ॥
कसरत जो हुई है कुतुब ख्वानी। हर सिम्त हजार बैठे ज्ञानी ॥
बतलाते हयाते जाबदानी। दिखलाते नजात की निशानी ॥ भक्ति० ॥
कोई करता है दावा खुदाई। कोई कहता है दायेमूल जुदाई ॥
कोई कहता है कुछ न दर गदाई। पुर है बगुनः बअदाई ॥ भक्ति० ॥
सारे मुद्दमा बुजरुग भूले। गहवारये मौतमें सो झूले ॥
बे वजह यकीन करके भूले। कर चक्कर वर्ग ज्यो बगोले ॥ भक्ति० ॥
कोई मुद्ई वजझ जौशन। कहता मेरा दिमाश रौशन ॥
है हाथ मरे तफझ औ तौसन। मैं आकिल और जमाना कोदन् ॥ भक्ति० ॥
पुरसिस नहीं साधु और गुरुकी न फिके। हिसाब रूबरूकी ॥
अन्देशा न खुद खराब खोकी। परवाह नहीं साथके अदो की ॥ भक्ति० ॥
मतमतान्तरके प्रचारक ज़ाता
धोका दिये सबको कुतुब किरमाँ । इन्सान हरीस हैं बहिरमाँ ॥
दिलमें न किसीके इश्क अरमाँ । नाहकमें फँसे न हकका फरमाँ ॥ भक्ति० ॥
मुनतिको दलीलका जो घर है । मामूर इस अहद बशर है ॥
हर सिम्त बहुतसा करौंफर है । इन्सानको मौतकी न डर है ॥ भक्ति० ॥
होवे जो मलिक मौतका फेरा । भूलेंगे सब ही फकीर फन् तेरा ॥
जब आनेके अजरईल घेरा । दोजखमें करेगा जाके डेरा ॥ भक्ति० ॥
मुन्किरो नकीर जिस्मथाना । आजा जो कहेंगे शाहिदाना ॥
लिखते जो हिसाब हर जमाना । बाकी न रहे कोई बहाना ॥ भक्ति० ॥
कोई न चलेगी होशियारी । चलनेकी हुई अब तैयारी ॥
अब छोड़ दे ख्वाबकी खुमारी । रह कोई रहे न रस्तगारी ॥ भक्ति० ॥
खुद गुम्राह और को सिखाते । अन्धे अन्धे को राह बताते ॥
पीते हैं शराब गोश्त खाते । दोजख खोरिश आब जब चखाते ॥ भक्ति० ॥
लब फूल वह दुनियाँ को तोड़े । हाहाकर प्याला को न मोड़े ॥
एक शिद्धत पर फिर और जोड़े । क्रितयन कुल रहम को सो छोड़े ॥ भ० ॥
ले हाथ में आगकी कतरनी । कतरें लब व सर अजाब धरनी ॥
दस गुण दुख औरसे जो भरनी । छूटे न गुरुके शरनी ॥ भ० ॥
जब तक न साधु गुरु मेहर है । तब तक हर सिम्तमें कहर है ॥
सब ग्राफिल सौपकी लहर है । रोजो शबो शाम और सेहर है ॥ भ० ॥
भक्ती और मुक्तिका निशाना । बतलाये कबीर हर जमाना ॥
बिठलाया जमीपै अपना थाना । दी वख्श बखेश व यगाना ॥ भ० ॥
जो सद्गुरुका निशान पावे । कर उसका अमल हमल न आवे ॥
फर्माबरी उसकी दिल लगावे । हो हंस मुकाम उसका पावे ॥ भ० ॥
ऐ सद्गुरु सत्से मिलादे । मुर्दा हुई भक्तीको जिलादे ॥
बुतलान जमीसे हिलादे । पजामुर्दा अपना गुल खिलादे ॥ भ० ॥
आजिजके तरफ जो मेल करते । यह बात बहिल जो कान धरते ॥
सद्गुरु की शरण तो आन परते । दरिया अगम अपरा तरते ॥
**विश्वामित्र—**विद्याभिमानियोंकी क्या सामर्थ्य है जो कि, सन्तोंकी तुल्यता कर सकें । भक्तिके प्रकाशसे भक्त भगवन्त बन जाता है, सन्तको वह पद मिलता है जो विद्याभिमानियोंको (स्वप्नमें भी) ध्यानमें नहीं आता । इसपर मैं एक उदाहरण लिखता हूँ । जो देवीभागवतके सातवें स्कन्धके बार-हवें अध्यायमें लिखा है :-
धर्मकी जड़, गुरुभक्ति
एक समय अयोध्याजीके महाराजा हरिश्चन्द्रके पिता राजा त्रिशंकु वशिष्ठजीके शापसे राक्षस होगये, पीछे उनपर विश्वामित्रकी कृपा हुई, उनकी राक्षस अवस्था छूट गई मनुष्यत्व प्राप्त हुआ। विश्वामित्रजीने शरीर सहित स्वर्गको भेज दिया। राजाके स्वर्गमें पहुँचतेही स्वर्गवासियोंने राक्षस जान धक्का देकर गिरा दिया। महाराजा त्रिशंकु पृथिवीकी ओर गिरने लगे। विश्वामित्रजीने उनको नीचे गिरता जान कर अपने योगबलसे बीचमेंही खड़ा कर दिया। अपने तपोबलसे कहा कि, यहाँ ही स्थित रह नीचे न आना, विश्वामित्रकी आज्ञासे अधरमेंही रह गये। इधर विश्वामित्रजीने अपने तपके बलसे एक दूसरी इन्द्रपुरी बनाना आरम्भ किया, नवीन इन्द्रपुरीकी शोभा इन्द्रपुरीसे कहीं बढ़कर थी। इन्द्रने दूसरी इन्द्रपुरी बनते देखी तो बहुत लज्जित और भयभीत होकर महान् तपस्वी विश्वामित्रजीके निकट आ दण्डवत नमस्कार कर गिड़गिड़ाके कहने लगा कि, महाराज ! ऐसा काम मत करो, एक इन्द्रपुरी तो वर्तमान है दूसरेकी क्या आवश्यकता है। इसमें बड़ा बखेड़ा होगा, एकही ब्रह्माण्डमें दो इन्द्रोंका रहना कठिन और दुखदाई है। विश्वामित्रने कहा, यदि तू राजा त्रिशंकुको लेजाकर अपनी इन्द्रपुरीमें रखे तो मैं इन्द्रपुरी बनाना बन्द करूँ, नहीं तो अवश्य बनाऊँगा। राजा इन्द्रने विवश होकर महाराजा त्रिशंकुको ले जाकर स्वर्गमें स्थान दिया विश्वामित्रने दूसरी पुरीकी रचना बन्द कर दी।
यह विश्वामित्र सृष्टिकर्त्ताके पद पर स्थित हो चुके थे, सृष्टि उत्पन्न करनेकी शक्ति प्राप्त कर चुके थे, जीव जब कर्मोंको भोगते हुये मनुष्य शरीरको पाते हैं तो फिर तपस्या करके उस पदको प्राप्त कर लेते हैं, आजतक उनका आवागमन नहीं छुटा। न उनकी मुक्तिकी आशा होती है। क्योंकि, उनमें क्रोध कामना बहुत है। तपस्या तो बहुत करते हैं पर वासना दूर नहीं होती जब विश्वामित्र राजा प्रियव्रतके हेतु स्वर्ग रचने लगे तो राजा इन्द्रको यह भय हुआ था कि, अब मेरा शत्रु उत्पन्न होगा क्योंकि, जब नई इन्द्रपुरी बनती है तो नया इन्द्र भी अवश्य होगा। देवते भी होंगे इन्द्रका सभी ठाठ बाट होगा, मुझमें और नये इन्द्रमें शत्रुता बढ़ेगी। यह विचार कर इन्द्रने विश्वामित्रसे बिन्ती करके नई इन्द्रपुरीकी रचना बन्द कराई। विश्वामित्र दूसरे ऋषीश्वरोंके समान भिन्न ब्रह्माण्ड बनाकर उसमें इन्द्रपुरी बना सृष्टि उत्पन्न करते तो विष्णु अथवा अन्य दूसरे देवताओंको किसी प्रकार कुछ कहनेका अवसर न मिलता।
सम्बर—जो कोई ब्रह्माण्डमें रचना करना चाहता है, अवश्य उससे देवता लोग शत्रुता करते हैं। अतः योगवाशिष्ठमें लिखा है कि, दैत्योंके राजा
श्रद्धा, विश्वास, गुरुदर्शन, गुरुमुखका कृत्य
पातालवासी साम्बरने नवीन सृष्टि उत्पन्न करना आरम्भ किया वो अपनी सृष्टिके जीवधारियोंकी देहको मणि माणिकसे युक्त महासुन्दर शोभायमान बनाता था। देवता लोग उसको नष्ट कर जाते थे, इस कारण देवताओं और दैत्योंमें घोर युद्ध हुआ करता था। साम्बरने अन्तमें तीन पुरुष ऐसे उत्पन्न किये जिनमें वासनाका लेश भी न था। तीनों वासना रहित पुरुषोंने देवताओंको जीतकर भगा दिया, जिससे उनको ऐसा भय उत्पन्न हुआ कि, पहाड़की घाटियों गुफायें आदि गुप्त स्थानोंमें छिपने लगे। अन्तमें विचार कर उन तीनों साम्बर रचित निष्काम पुरुषोंमें वासना उत्पन्न कराई। इससे वे भय खाकर देहकी बचावट करने लगे। भय और चिन्ता हुई तो देवताओंने उनके ऊपर बड़ी प्रबलताके साथ आक्रमण किया वे लड़ाई छोड़कर पाताल भाग गये, जहाँ यमराजाका स्थान था वहाँ जाकर छिपे। पीछे दैत्यराजा साम्बरने ऐसे तीन पुरुष उत्पन्न किये जिनको कि, कभी वासना होवेही नहीं। तीनों आत्मज्ञानी थे उन्होंने देवताओंको मार भगाया। पीछे स्वयं विष्णु भगवान्ने जाकर उनसे महान् युद्ध करके उनका बध किया। यह देख दैत्यराज साम्बर स्वयं विष्णु भगवान्से युद्ध करनेके लिये रणभूमिमें उपस्थित हुआ, अन्तमें असुरारि विष्णु भगवान्ने उसे भी मार गिराया। इस प्रकार स्वयं भगवान् विष्णु इस ब्रह्माण्डके अधिपति हैं, इसमें दूसरा हस्ताक्षेप नहीं कर सकता। सहस्रों ऋषि मुनि ईश्वरपदको प्राप्त हो नया ब्रह्माण्ड रच ईश्वरी करते हैं, पर वे भी इसमें कुछ हस्ताक्षेप नहीं करते।
पठित मूर्ख—विश्वामित्र मध्य श्रेणीके ऋषि थे, हजारों उनसे बढ़कर उच्चपदपर स्थित हैं जिनके ऐश्वर्य और प्रतिष्ठाका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। विद्याभिमानियोंको उनकी श्रेष्ठता और प्रभावकी क्या सुधि है, ऐसे २ ऋषि मुनि हैं जिनकी अपेक्षा ब्रह्मा, विष्णु आदि तुच्छ हैं। उन ऋषियोंको विद्याके अहङ्कारी पठित मूर्ख क्या जान सकते हैं।
विद्याभिमानी कूवेंके मंडकीके समान हैं, कूवेंकी मंडकीको अपने कूवेंकी सुधि होती है, उसे असीम सागरकी क्या सुधि है? कबीर साहबने ऋषियोंकी बड़ाईमें कहा है कि, सच्चे सन्त और साहब, एक हो जाते हैं। जिन्होंने सत्यपदको प्राप्त किया है, जो गुरुपदकी सुधि रखते हैं, निर्माण होकर रहने पर भी साहबके तुल्य हैं, जो ऐसी महिमा युक्त सन्तोंकी ठट्टा और निन्दा करते हैं, वे भक्ति मुक्तिके सत्यमार्गको नहीं प्राप्त होते, विषयवासनाके वश संसार सागरमेंही पड़े हुये बारम्बार आवागमन किया करते हैं।
मनमुख, दोनोंके कृत्य मनमुखके मुक्त न होनेका कारण, गुरु पूजाका माहात्म्य, मजहबियोंकी ओर दृष्टि
कबीर साहबकी साखी ।
कोठी तो है काठकी, ढिग ढिग दीन्हीं आग ।
पढ़ पण्डित झोली भये, साकट उधरे भाग ॥
हजरत ईसाकी वाणी ।
मतौफी इज्जोल ८ बाब, २० आयत—ऐ बाप ! तूने विद्याभिमानियोंसे ओट रखा अपने बच्चोंपर परदा खोल दिया ।
एक फकीहा (कर्मकाण्डी विद्वान्) ने हजरतसे कहा कि, आप जहाँ जावें मैं भी आपके साथ जाऊँगा । इस बातपर हजरतने जवाब दिया कि, लोमड़ियोंके वास्ते माँद और पक्षियोंके लिये घोंसले हैं, पर मनुष्योंके लिये शिर धरनेकी जगह नहीं, इतना कहकर उसको शिष्य नहीं बनाया ।
लोमड़ियोंसे आशय विद्याभिमानियोंसे है । क्योंकि, वह फकीहों विद्याभिमानी था, अतः विद्याभिमानियोंको लोमड़ी कहा क्योंकि, विद्याभिमानी लोमणियोंके समान चतुर और चालाक होते हैं, वे पृथिवीमें रहते हैं, पक्षीके घोंसले वृक्षपर होते हैं, विद्याभिमानी जनोंका आवागमन नहीं छूटता । वे मातृगर्भरूपी माँदोंसे कभी छुट्टी नहीं पाते । जब ऐसेही विद्याभिमानी लोग संसारके उपदेशक बने तो किस प्रकार जीवोंका कल्याण हो सकता है ।
तपस्वी और भजनीक भक्त ज्ञानी लोग जो अपने भजनके बलसे स्वर्गमें जाते हैं, यह पक्षियोंके कहनेका आशय है समय पाकर वे भी पतित हो जाते हैं ।
मनुष्योंके कहनेका आशय उन लोगोंसे है, जो कि, विषय वासनासे मुक्त होकर तीन लोकसे बाहर होगये उनको तीन लोकमें शिर धरनेकी जगह नहीं है क्योंकि, यह तीन लोक वासनिकोंके लिये है । ये तीन लोक सच्चे मनुष्योंके लिये नहीं है । ज्ञान तिलकमें लिखा हुआ है ।
स्वामी रामानन्द वचन ।
पढ़ पढ़ राते गुण गुण माते हृदया शुद्ध न होई ।
नानक वचन
पढ़ पढ़ गढ़ी लादिया, लिर लिख भरीं साख ।
नानक लेखे एक गुरु, हौं मैं श्रवकड़ झाख ॥
प्रह्लाद वचन ।
पढ़ूँ न विद्या सो लिख पाटी । विषेक राम भगतकी टाटी ॥
क्या पौड़े तूँ लिखे जँजाला । लिख कीरतन राम नाम गुपाला ॥
इज्जोलमें करीनतूनको पोलूस रसुलका पत्र कि—जो कोई पण्डित
स्वसंवेदका सार, बिन्दी
विद्वान् और बुद्धिमान् बनना चाहता है उसको चाहिये कि, मूर्ख बन जावे । जो सांसारिक बुद्धिमत्ता और विद्वत्ता है वह परमात्माके निकट मूर्खता और निर्बुद्धिता है, परमात्मा अभिमानी पण्डितोंको विद्याकेही जालमें डरझा रखता है ।
जबूरमें अयूबके विषयमें—परमात्मा बुद्धिमानोंकी बुद्धिमत्ता असत्य कर देगा, वे स्वयं अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर सकेंगे । विद्याभिमानियोंको विद्याके जालमें फँसाए रखता है, जो टेढ़े तिरछे लोग हैं उनकी बुद्धिमानोंको शिरके बल उलटा देता है, वे लोग दिनके प्रकाशमें भी अंधेरेके समान अन्धे हो दूढ़ते फिरते हैं ।
फिक्रियाका सिद्धान्त—मुहम्मद साहबके बहततर पंथोंमेंसे फिक्रिया नामक पन्थका वचन है कि पुस्तकावलोकन आदि विद्याकी विशेष वृद्धि होते ही भक्ति और भजन नष्ट हो जाता है ।
शिष्टका वचन—किसीने कहा भी है कि,—
श्लोक—जातिविद्या महत्त्वं च रूपं यौवनमेव च ।
यत्र नैव प्रजायन्ते पञ्चैत भक्तकण्टकाः ॥
जाति, विद्या, रूप, मान, युवावस्था ये पांचों भक्तिके परम शत्रु हैं, जबतक इनसे निवृत्त न होगा तबतक भक्ति न कर सकेगा । इसी प्रकार पृथिवीके सारे विरक्त महात्मा कहते चले आते हैं । यदि मनुष्य भक्तिका कुछ भी अनुराग रखता हो तो विद्वान् होता हुआ भी विद्याका अभिमान छोड़ दे ।
विद्याभिमानियोंका आधार—दो बातों पर है एक पुस्तक अर्थात् दृष्टि ज्ञान और दूसरा उनका ज्ञान । दोनोंही असत्य हैं । क्योंकि, दोनों परिवर्तनशील हैं । दोनोंका कुछ भी विश्वास नहीं । बालकपनसे मृत्यु तक इनमें परिवर्तन हुआ करता है, इनपर भरोसा करना गुरुको न दूढ़ना महामूर्खता है । मनुष्य धर्मद्वेष और पक्षपात छोड़कर देखे विचारकर उचित व्यवहार करे तो निस्सन्देह इष्टको प्राप्त कर सकता है । पहले गुरुकी पहचान अवश्य है, जबतक गुरुको न पहचानेगा तबतक कोई कार्य पूरा नहीं हो सकता । बुद्धिमानों वही है जो सद्गुरुको पहचानकर उसके चरणका रज हो जावे अपने विचारको गुरुकी आज्ञानुसार काममें लावे ।
यह एक सीढ़ी है जो पृथिवीसे ऊपर आकाशमें लगाई है उसके चार दण्डे हैं, शरीयत (कर्म काण्ड) तरीकत (योग और उपासना) हकीकत (ज्ञान) और मारफत (विज्ञान) आदिक ।
जितने विद्याभिमानी संसारमें हैं सब शरीयत (कर्मकाण्ड) के दण्ड
पर खड़े हैं, आगे पग नहीं बढ़ा सकते। जिसके दण्डे पर सब सांसारिक तथा विद्याभिमानी खड़े हैं, वह क्या है? वह तो केवल अज्ञानी अन्धोंके लिये है।
कबीर साहबने कहा है—‘अन्धेको दरपण वेद पुराण’।
वेद, पुराण, किताब कुरान आदि ऐसे हैं; जैसे अन्धोंके सामने दरपण। ऐसाही इञ्जीलमें, पोलूस रसूलका पहला तमताऊसको खत देखो ८ और ९ आयत—हम जानते हैं कि, शरीयत (कर्मकाण्ड) अच्छा है, यदि उसकी रीति पर भली प्रकार वर्तवि किया जावे।
यह शरीयत (कर्मकाण्ड) सत्यवादियोंके लिये नहीं है वरन् शास्त्र विमुख, दुराचारी, अधर्मी पापी, माता पिताको बद्ध करनेवालों, अन्यथाचारियों, विषयी, मनुष्य विक्री करनेवालों झूठे, झूठी शपथ खानेवालों आदि काफ़िरोंके लिये है। इनके अतिरिक्त और भी जो सत्यपथसे विरुद्ध हों उनके लिये है। क्यों कि, दण्डव्यवस्था इसीमें है।
सभी विद्याभिमानी सन्तोंकी कृपा बिना शरीयत—कर्मकाण्ड—में बँधकर मनमुख हो गये। सन्त राजा हैं। पठित अपठित मनुष्य उनकी प्रजा हैं। राजाको कर देना तथा उसकी आज्ञाकारिता करना उचित है, जो न करेगा वह अवश्य कैंद होगा। संसारके सन्त गुरु शिक्षक हैं। जो रीतिसे गुरुकी सेवा न करेगा वह पदसे भ्रष्ट हो जावेगा। गुरु और ईश्वरका धन्यवाद करना आवश्यक है। जिसका गुरु नहीं है उसका ईश्वर भी नहीं है। गुरु और सन्तसे ईश्वर की प्राप्ति होती है। जिसका गुरु न हो वह एक अथवा दो ईश्वरोंकी भक्तिका दावा करे तो झूठा है, उसको द्वैत अथवा अद्वैत किसी प्रकारसे ईश्वरकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इस प्रकार विद्याभिमानी अपने ऊपर आपत्ति उठाते हैं। इसके ऊपर एक दृष्टान्त है कि—
बुल्लेशाह और शरई—साई बुल्लेशाह साहब, विरक्त महात्मा, लाहोरके निकट कुसूर नामक कसबामें रहते थे। उनकी भजन भक्ति माहात्म्य समस्त पंजाबमें प्रसिद्ध है। उनके समयमें कुसूरमें एक बड़ा आलिम शरई रहता था। वह सर्वदा बुल्लेशाह साहबकी निन्दा किया करता था उनसे शत्रुता रखता था। उसने समस्त कुसूरके पठानोंको बहकाया कि, यह बुल्लेशाह बड़ा बेशरा है। उसकी बातोंको सुनकर सब पठान लोग शाह साहबके विरोधी हो गये। शाह साहब तो विरक्त थे, उनको मुसलमानी रोजा निमाजसे अथवा कर्मकाण्डसे क्या सरोकार था यह सब तो प्राकृतिक मनुष्योंके लिये हैं, विरक्त उसको क्यों मानने लगे? इस भेदसे प्राकृतिक जन अज्ञात हैं। वह मौलवी
तीरीतकी आज्ञाएं, एक खुदा (ईश्वर) की पूजा करे, समीक्षा
बुल्लेशाह साहबको मर्दद और शौतान कहा करता था । हजरत शाह साहब उसकी बातोंको सुनकर धैर्यसे सन्तोष करके चुप रहते थे । एक दिन मौलवी कहने लगा कि, ऐ बुल्लेशाह ! तू जब मरेंगा तब मैं तेरा मुंह काला करवा, टोंगोंमें रस्सी बँधवा, समस्त शहरमें घसीटवाऊँगा । मौलवी उसका बड़ा काजी था, मुसलमानी राज्यमें फतवा दिया करता था बहुत बल रखता था । उसकी बातें सुनकर बुल्लेशाह साहबने कहा कि, ऐ काजी ! जब मैं मरूँगा तब तू यहाँ न होगा, मेरे मरनेके पीछे तू मरेंगा बहुत दुःख दर्दसे पड़ेगा, वहाँ तेरा प्राण न छूटेगा तब तू कुसूरमें आवेगा तो मेरे पगके नीचे गाड़ा जावेगा तभी तेरेको शान्ति होगी । अन्तमें मौलवी काबुल गया । बुल्लेशाहका देहान्त हो गया । कुसूरमें उनकी अन्तिम क्रिया हुई । वह काजी काबुलमें बीमार पडा, उसके शरीरमें बहुत जलन उत्पन्न हुई, बहुत दुःखी हुआ पर प्राण नहीं निकला, उसने कहा कि, मुझको शीघ्रही कुसूरमें बुल्लेशाहके चरणोंमें ले चलो । मौलवी बुल्लेशाहकी कब्र निकट पहुँचा तो उसका प्राणान्त हो गया बुल्लेशाहके पगकी ओर उसकी कब्र बनी है । उसकी सभी शरयतें और विद्याभिमान भूल गया, कोई काम न आया । सच्चे सन्तोंके विद्वेषियोंको कभी सुख नहीं मिल सकता ।
मृतकाचार्योंके शिष्य—विद्याभिमानियोंके कोई गुरु नहीं । केवल वे पुस्तकोंहीको गुरु माने बैठे हैं । किसी एक धर्मके आचार्यका नाम लेकर उसकी ओटमें नानाप्रकारके शुभ अशुभ व्यवहार करते रहते हैं, यद्यपि आचार्यकी सूरत भी नहीं देखी कि, वह कैसा है ? केवल किसीका नाम सुनकर उसके चेला बन जाते हैं कहते हैं । कि, हम अमुक आचार्यके अनुयायी हैं, ऐसाही है—जैसा कोई कहे कि, आकाशमें बाग लगा है मैंने उससे खूब फल तोड़कर खूब खाए जिससे पेट भर गया । ऐसे झूठ सत्य मार्गपर कभी नहीं आ सकते । जिसको मरे हुये बहुत काल बीत गया, उस आचार्यका नाम लेकर चेला बन जाना तो ऐसाही है—जैसा कोई स्त्री कहे कि, अमुक पुरुष जिसको मरे हुये अब बहुत दिन बीत गये हैं मैंने अपना पति आज बना लिया । इस प्रकारके पति बनानेसे सन्तानकी उत्पत्ति न होगी, यह सब मूर्खताका विचार है बिना गुरु चेलाके मिले कदापि ज्ञान नहीं होता । स्त्री पुरुषके संयोग बिना सन्तान उत्पन्न भी नहीं हो सकती ।
इस मण्डलीके लोगोंको आँख, कान और बुद्धि भी है पर प्रकाश और
निराकार निरव्यवका पता नहीं
शुद्धताके बिना अहंकृत बुद्धि, अज्ञान पथमें डाल देती है। जिसे वे ज्ञानके पथसे निराश रह जाते।
उपदेशके अयोग्य—ये विद्याभिमानी लोग सच्चे नहीं कहे जा सकते, बरन्पेटके लिये उद्यम करते हैं। सैकड़ों विद्याभिमानियोंपर एक अपढ़ सन्तका विचार जय पावेगा, इसमें कुछ सन्देह नहीं कि, जो तत्त्ववेत्ता विद्वान् नहीं अपने कहनेके अनुसार चलनेवाला नहीं उसके वचनपर विश्वास करना अपनेको कुमार्गमें डालना है। सन्त लोग विद्याभिमानियोंको उपदेश भी नहीं देते। क्योंकि उनका अन्तःकरण सांसारिक ज्ञानसे भरा रहता है। पुराने अह्वनामके २८ के बाबसालिब नबीके वृत्तान्तामें लिखा है कि, वह एक औरतसे जिसका कि मित्र एक राक्षस था कुछ समाचार पूछने गया इसी कारण उसका ज्ञान लुप्त हो गया।
इसी प्रकार सब मनुष्योंकी दशा है। जिस अन्तःकरणमें अभिमानने स्थान किया, वह अन्धकारमय पत्थरके समान कठोर हो गया, वह कभी सुधारने योग्य नहीं होता। बड़े २ विद्वान् लुकमान, अफसातून अस्तू सुकरात आदिकोंको सच्चे सन्तोंके उपदेशके बिना बहुत दुख भोगना पड़ा, हिकमत तथा रसालत राज्य आदिक सबका अन्तिम परिणाम शोक एवं निराशाही है।
गजल - जितने उल्माजमीं ऊपर न जाने क्या खुदाई।
शरीतकी सलाई उनकी आँखोंमें चलाई है ॥
यह हरदो ऐन अन्धे हैं सो यम जालिमके बन्दे है ॥
फकीरोंके कदमकी खाक आँखोंमें न पाई है ॥
हजो करके फकीरोंके हैं आशिक राहगीरोंके।
ठगोंकी दोस्ती करके गला अपना कटाई है ॥
दरूनी और बेरूनी आँख रौशन मिसल सद सूरज।
जो दर्वेशन खाक पायेका सुरमा बनाई है ॥
जो इस दुनियाके दाना सब हैं ओकबा महज नादानसो।
खबरदारान इश्क आलम खबर ऐसी सुनाई है।
पकड़ जब लेवे मलकुलमौत भूलें सारी दानाई है।
जो गन्धक आगके घर बीचमें डेरा बनाई है ॥
न जबतक वारते फुकरापर तनमन और धन आजिज।
करें तदबीर सो सदहा सो कहाँ राहे रहाई हैं ॥
बुत परिस्तीको खुदा परिस्ती
परमात्मा के तुल्य—साधुओंकी सद्भक्ति साधुओंके दर्शन एवं साधुओंका भोजन वस्त्र देना साधुओंकी अवश्यकता पूरी करना आदि नाना प्रकारोंसे साधुओंकी सेवा करनेका अनन्त फल है, वह वर्णन नहीं किया जा सकता। सच्चे साधुओंकी सेवा करना सर्वोपरि है वह परमात्माकी सेवाके समान है।
साधुओंके दर्शनका फल।
साधुओंके दर्शनका फल इतना है कि, मुझसे वर्णन नहीं किया जा सकता। कबीर साहबने स्थान स्थान पर इस विषय पर बहुत कुछ कहा है। सन्तोंके दर्शनसे पशुसे मनुष्य और मनुष्यसे फिर जीवन मुक्त हो जाता है; जैसा कि, मैं पहले लिख आया हूँ कि, कबीर साहबके दर्शनसे कुत्तीका बच्चा मनुष्य हो गया। मनुष्यसे जीवन मुक्त होगया तो सन्तके नाम और दर्शनका फल नहीं कहा जा सकता। जैन धर्मके ग्रन्थोंमें एक दृष्टान्त लिखा है कि—
एक सिंहने एक सन्तको बनमें जाते हुये देखा। दर्शन करतेही मनमें यह विचार हुआ कि, मैं बड़ा पापी हूँ : एक तो जीवोंको खाता हूँ, दूसरे जीवित पशु सब मुझसे ऐसे भयभीत रहते हैं कि, मृतक तुल्य हो रहे हैं, अब ऐसा पाप न करूँगा। ऐसा सोच समझ कर व्याघ्र शान्त हो एक स्थान पर बैठ गया, तेरह दिन तक बराबर भूखा रहनेसे उसके प्राण निकल गये, इस पुण्यके प्रतापसे वह मरकर समस्त भारतवर्ष तथा अनेक देशोंका राजा हुआ। उसका नाम चक्रवर्ती भरत हुआ। बहुत समय तक राज्य करनेके बाद त्यागी होकर मुक्तिका अधिकारी हुआ। सहस्रों ऐसे दृष्टान्त हैं, कहाँ तक लिखूँ ? पर इसके साथ ऐसा तर्क न करना चाहिये कि, सन्तके दर्शन सभी मनुष्य करते हैं ऐसेही क्यों नहीं हो जाते ? वरन् ऐसा समझना चाहिये कि, जिनका अन्तःकरण कठोर है उनके पूर्वजन्मके पाप बहुत हैं उनका अन्तःकरण पत्थरके समान हो गया है, जिस पर तीररूपी उपदेश अथवा दर्शनका प्रभाव कुछ असर नहीं करता ऐसे अशुद्ध अन्तःकरणवालोंको साधुओंके दर्शन करने और वचन सुननेसे कुछ भी लाभ नहीं होता, कबीर साहब सन्ध्या स्मरणमें कहते हैं कि—
साखी — साधु साधु मुखसे कहे, पाप भसम होइ जाय ।
आप कबीर गुरु कहत हैं, साधू सदा सहाय ॥
साधुके नाम और दर्शनका फल है, जिन साधुओंकी यह महिमा है उनसे बढ़कर दूसरा कौनसा तीर्थ व्रत और दान, पुण्य है ? साधुओंके प्रसादका भी बड़ा माहात्म्य है। साधुओंके चरणामृतकी महिमा बहुत लिखी है, जिससे कि, मनुष्यका अन्तःकरण शुद्ध होता है।
तीनों पुच्छ हैं
साधुओंके भोजन देनेका पुण्य ।
जितने षट्दर्शनके सन्त हैं तथा दूसरे धर्मोंके साधु हैं उनको भोजन करानेसे महान् पुण्य होता है । कबीर साहब कहते हैं कि—
कहैं कबीर धर्मदाससे, भूला क्या डोला हो ।
कोटि यज्ञ फल होता है, एक साधु जेवायें हा ॥
कबीर साहब कहते हैं कि, एक साधुके भोजन देनेसे करोड़ों यज्ञोंका फल होता है । मैं प्रथमही लिख आया हूँ कि, पाण्डवोंकी यज्ञमें श्वपच सुदर्शनने जब भोजन किया तब यज्ञ पूरी हुई । दान पुण्य और यज्ञ आदिक किसी काम न आई । इस कारण सब साधुओंके भोजन देनेकी अपेक्षा हंस कबीरको भोजन देनेका सबसे अधिक पुण्य है ।
तिमिर लिंगको रोटीका फल—एक समय जिन्दा भेषमें कबीर साहब समर क़ंदमें रोटी २ पुकार रहे थे । किसीने रोटी नहीं दी पर तिमिरलिंग नामक एक लंगडने बड़े प्रेमके साथ रोटी खिलाई, पानी पिता सेवा की । साहबने उसको बड़ा भारी राज्य दिया, उसकी दरिद्रता दूर हो गई । वह कङ्काल बड़ा प्रभावशाली बादशाह बन गया । इसपर गरीबदासजीकी शास्त्री है ।
गरीब — देहली अकबरा बादमें, फिर लाहौरको जात ।
रोटी रोटी करत हैं, कोई न पूछे बात ॥
गरीब — तिमिरलिंग तालिब मिले, रोटीकी दी चाय ।
जिन्देकी उरमें धसी, तिमिरलिंग सुन माय ॥
गरीब — रोटी पोई प्रीतिसे, जलका तोटा हाथ ।
जिन्देकी पूज करे, मातु पुत्र दोउ साथ ॥
गरीब — तिमिरलिंग उभी रहे, मनमें कछू न चाय ।
मौज मेहर मौला करी, दीन्हा तख्त बैठाय ॥
गरीब — हिन्द जिन्द सभी दर्द, सेतुबन्ध लग सीर ।
बड़ गजनी ताबा करी, जिन्दा इस्म कबीर ॥
पारख अङ्गकी साखी ११६४ से ११७३ तक देखो ।
शास्त्र—साधु फकीरोंकी सेवा करनी चाहिये, सन्त सेवा सहस्रों आपत्ति दुःखोंको नाश करती है । पक्षपात रहित हो सब प्रकारके सन्तोंको भोजन दे
१ वास्तवमें सच्चा साधु हो कोई भी हो परमात्माकाही रूप है ।
बुत परिस्ती मत करो खुदाका नाम बेफ़ायदा मत लो
कदापि न चूके, इसी कारण शास्त्रोंमें आज्ञा है कि, गृहस्थ भोजन तैयार होनेपर पहले साधु अभ्यागतोंको खिलाले, पीछे आप भोजन करे । कबीर साहबने कहा है कि, जिस घरमें साधु भोजन नहीं करते वह मरघट और मसान है, उसके रहनेवाले भूत प्रेत हैं । जिस घरसे साधु अभ्यागत भोजन किये बिना फिर जाते हैं उस घरमें भूत प्रेत रहते हैं; भोजन करते हैं । इस कारण प्रत्येक गृहस्थको उचित है कि, घरमें भोजन तैयार हो जावे उस समय अपने
गीता अध्याय ३ श्लोक १३ ॥
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥
पदच्छेद—यज्ञ'शिष्टाशिनः सन्तः' मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः' । भुञ्जते' ते' ।
तु' अघं' पापाः' ये' पचन्ति' आत्मकारणात्' ॥ १३ ॥
पदार्थ—जो पुरुष यज्ञके शेष अन्नको भोजन करता है वह शिष्टपुरुष सब पापोंसे छूट जाता है पापात्मा पुरुष केवल अपने वास्तेही अन्न पकाते हैं वे पाप-काही भोजन करते हैं ।
जो अधिकारी जन ऋषियज्ञ, देवयज्ञ पितृयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और भूतयज्ञों को करके बचे हुए अमृतरूप अन्नको भोजन करते हैं, वेही श्रेष्ठ कहे जाते हैं । श्रद्धापूर्वक सज्जनों संतों और —शास्त्रोंके कहे कर्मोंको करनेवाले पुरुषोंकोही श्रेष्ठ कहा गया है । श्रेष्ठजन प्रमाद करके किये हुये तथा और भी अनेक प्रकारोंसे हुए पापोंसे रहित होते हैं ।
पंच सूना रूप निमित्तसे उत्पन्न हुये पापोंको नष्ट करनेके लिये श्रेष्ठ जन अपने २ संप्रदायके अविरुद्ध पंच यज्ञका नित्य सेवन करते हैं ।
पंच यज्ञोंको न करनेवाले पुरुषोंको पापकी प्राप्तिका वर्णन करते हैं । पंच महायज्ञोंको न करनेवाले पापात्मा केवल अपने उदरके लियेही अन्नको पकाते हैं, देवता, अतिथि आदिके लिये रसोई नहीं बनाते वे पुरुष केवल पाप-काही भोजन करते हैं, अन्नका भोजन नहीं करते । यद्यपि पापात्माओंकी दृष्टिमें वह अन्नही है तो भी संत शास्त्र और देवताओंकी दृष्टि करके सो अन्न पापरूप ही है । एकतो उपरोक्त पाप अपना नित्य कर्तव्य छोड़नेसे दूसरा पाप लगता है । यथा— कण्डनी पेष्णी चुल्ली उदकुंभी च माजंनी ।
पंच सूना गृहस्थस्य ताभिः स्वर्गं न विदति ॥
अर्थ—गृहस्थ पुरुषों के गृहमें हिंसा होनेके पांच स्थान होते हैं । १—ऊखलके कूटनेसे जीवोंकी हिंसा होती है, २—पाषाणकी चक्कीमें अन्नको
द्वारपर खड़े होकर इधर उधर देखे । जो कहीं भूखा साधु अथवा पथिक तथा किसी प्रकारका मनुष्य भूखा मिल जावे, तो प्रथम उसको सत्कार पूर्वक भोजन करावे, पीछे आप भोजन करे । जब कोई भोजन करने वाला न मिले तो अकेला भोजन करनेपर पश्चात्ताप करे । परमात्मासे उस दिन अभ्यागत न मिलनेके कारण, अपराध क्षमा करनेकी प्रार्थना करे । किसी प्रकार छल कपट और बनावट न करके साधु अभ्यागतोंको नित्य भोजन कराया करे । साधु अभ्यागतोंको भोजन कराती बार किसी प्रकारकी स्तानि और घृणा न लावे, भोजन पीसनेसे जीवोंकी हिंसा होती है; ३—तीसरा अन्नके पकानेके वास्ते चुल्लेमें अग्निके जलानेसे जीवोंकी हिंसा होती है; ४—पात्रोंमें जलके भरनेसे, बर्तनोंके मोजनेसे, जीवोंकी हिंसा होती है; ५—मृत्तिका जल आदिकों से घरके लीपने (माजने) से जीवोंकी हिंसा होती है । यह पंच प्रकारकी जी कि हिंसासे पापको प्राप्त हुआ गृहस्थ सद्गतिको नहीं प्राप्त होता ।
“पंचसूनाकृतं पापं पंचयज्ञैर्व्यपोहति” ॥
अर्थ—पंच हिंसाओंसे उत्पन्न हुये पाप पांच यज्ञोंके करनेसे निवृत्त हो जाते हैं । वे पंच यज्ञ ये हैं—
ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा ।
नृत्यज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत् ॥
अर्थ—गृहस्थ रोज ऋषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ नरयज्ञ और पितृयज्ञ शक्तिके अनुसार करता रहे इनका परित्याग न करे ।
अपने २ धर्मग्रन्थोंके पठन पाठन, नित्य क्रिया पूजा पाठआदि करने तथा अपने गुरु और साधु विद्वानोंका भोजनादि करानेका नाम ऋषि यज्ञ है ॥ १ ॥
अन्य धर्मके विद्वान् सज्जन बुद्धिमान तथा स्वधर्मके साधु सज्जन तथा सहधर्मी गृहस्थको भोजन कराना अथवा, अपने इष्ट देवके हेतु नित्यकर्म करनेका नाम, देवयज्ञ है ॥ २ ॥
गौ, कुत्ता तथा अन्य सब प्रकारके जीवधारिओंकी भोजन आदिसँतृप्ति कराने, तथा स्थावर, शाक, पात, फल, फूल, वृक्ष, आदिके व्यर्थ छेदन न करनेको भूतयज्ञ कहते हैं । ३ ॥
गृह विषय प्राप्त हुये अतिथिको अन्नादिकोंसे संतोष करानेका नाम मनुष्य यज्ञ है ॥ ४ ॥
अपने पिता, प्रपिता पितामह, चचा, भाई आदि सब श्रेष्ठ पुरुषोंको भोजन आदिसँ नित्य प्रसन्न करने तथा अपने २ नियमानुसार श्राद्ध तर्पणादि करनेका नाम पितृयज्ञ है ॥
सत्यकबीर वचन सबतका दिन याद रखो
करनेवालेको तुच्छ न समझे । यदि मनमें किसी प्रकारकी घृणा अथवा ग्लानि आवेगी तो उसका यज्ञ भ्रष्ट होकर धर्म नष्ट हो जायेगा । मनमें कभी न समझे कि, मैं इस अभ्यागत अथवा साधुओंको भोजन कराता हूँ वरन् उसका कृतज्ञ हो कि, उसने कृपाकरके भोजन स्वीकार कर लिया । प्रत्येक धर्मोंके साधु और भूखोंको भोजन देना, सम्मान करना उचित है, उनको भोजन बस्त्रसे सन्तुष्ट करना महान् पुण्य है ।
जैन साहित्यका दृष्टान्त—जैनधर्मकी पुस्तकोंमें लिखा है कि, एक विधवा स्त्री थी, उसके केवल एकही पुत्र था । वह बहुत दरिद्र और दुखिया थी, परिश्रम करके अपना और बच्चेका पोषण करती थी उसका पुत्र सर्वदा उससे कहा करता कि ए माता ! “मुझे एक दिन खीर खिला ” वह दुखिया विधवा खीर कहाँसे खिलाती ? बहुत दिनोंतक पुत्रको सन्तोष देती रही पर अन्तमें
मित्तों अथवा अन्य संबंधियोंका भी सत्कार करे ।
पाराशर स्मृतिमें पूर्वोक्त यज्ञोंको न करनेवाले पुरुषोंको पापकी प्राप्ति कही है ।
श्लोक – वैश्वदेवविहीना ये आतिथ्येन विर्वजिताः ।
सर्वे ते नरकं यांति काकयोनिं व्रजंति ते ॥
काष्ठभारसहस्रेषु घृतकुंभशतैन च ।
अतिथिर्यस्य भग्नाशस्तस्य होमो निरर्थकः ॥
जो गृहस्थ वैश्वदेव न करते तथा अतिथिको भोजन नहीं देता वह मर करके अथवा जीवित रहनेपर ही अज्ञानता निर्दयता रूप मृत्युको प्राप्त हो करके नरकको प्राप्त होता है वा जीवित रहनेपर भी नाना दुःख कष्ट और लोकनिंदा आदि दुःखोंको प्राप्त होता है जो नरकसे भी अधिक दुखदाई हैं ।
जिन गृहस्थोंके गृहसे अतिथि पुरुष अन्नादिकोंकी प्राप्ति विना निराश होकर चलाजाता है । यदि सहस्रभार काष्ठों तथा घृतके सहस्र कुंडोंसेभी होम करे, पर किंचित मात्र फल नहीं पासकते कोई कितनाहूँ पुण्य क्यों करे, वेदपाठ, विद्याध्ययन, होम, यज्ञ करे पर यदि भूखा अतिथि द्वारसे फिर जावे तो सब निष्फल हो जाता है ॥
अतिथिका लक्षण पाराशर स्मृतिमें इस प्रकार किया हैं कि—
दूरादुपगतं श्रान्तं वैश्वदेव उपस्थितम् ।
अतिथिं तं विजावीयात्रातिथिः पूर्वमागतः ॥
माता पिताकी प्रतिष्ठा करो खून मत करो, व्यभिचार मत करो
एक दिन बहुत इच्छुक देखकर, कहींसे दूध, चावल, घी, खोंड़ आदिसामग्रियाँ इकट्ठा करके खीर पकायीं। घी खोंड़ डालकर पुत्रके आगे रख दिया। आप किसी कार्य्य वश इधर उधर चली गईं। इतनेहीमें दश दिनका भूखा एक साधु उस लड़केके निकट आकर भोजन माँगने लगा। लड़केने समस्त खीर उस साधुके थालीमें देदी, वह साधु भोजनसे सन्तुष्ट हो अपने आसनपर चला गया वह बालक केवल थाली चाटकर रह गया।
उसी पुण्यके प्रतापसे बालकने एक सेठके घर जन्म पाया। समय पाकर ऐसे अतुल धनका मालिक हुआ कि, उसके बराबर कोई धनी न था। जिस नगरमें वह रहता था वह राजधानी थी, क्योंकि, राजा भी वहाँही रहता था। एक समय एक सौदागर वहाँ आया। राजाके दरबारमें जाकर उसने बहुत तरहके जवाहिरात दिखलाये। उसके पास रत्न कमल था वो राजाको दिखलाया। राजाने उसका मूल्य पूछा, उसने लाख रुपया बतलाया। पश्चात् राजाने रानीके पास भेज दिया, रानीने उसको देखकर कहा कि, इसका मूल्य बहुत है। मैं न लूँगी फेर दिया। सौदागर वहाँसे चलकर उस सेठके घर गया। सेठ तो अपने आनन्द भवनमें था पर सौदागरने उसकी विधवा माताके निकट जाकर उपरोक्त रत्न कमल दिखलाया। माता उसको देखकर सौदागरसे बोली कि,
चौरो वो यदि चाण्डालः शत्रुर्वा पितृघातकः ।
न पृच्छेद्गोत्रचरणे स्वाध्यायं च व्रतानि च ।
हृदयं कल्पयेत्स्मिन्सर्वदेवमयो हि सः ॥
जो पुरुष दूर मार्गसे चलके आया हो, थका हो, वैश्वदेव करनेके समय प्राप्त होवे उसको अतिथि कहते हैं। जो अपने पुरोहितादिक पहले वहाँ हों तो वे अतिथि नहीं कहे जा सकते।
वैश्वदेव करनेके समय (भोजन तैयार होनेपर— ब्राह्मणादि सब गृहस्थोंके घरपर, जो कोई भूखा, चोर, चाण्डाल, शत्रु तथा पिताका हनन करनेवाला भी हो, आवे तो उसे अतिथि जानना वो सबका संगम है।
पुरुष अपने गृहमें प्राप्त हुये अतिथिका गोत्र न पूछे, शास्त्रकी वार्ता भी न करे वह पढ़ा है कि मूर्ख है ऐसी बात भी न पूछे। वेदकी शाखा आदि भी न पूछे वरन् ब्रह्मचर्यादि व्रतको भी न पूछे अतिथिको सर्व देवमय अथवा अपना इष्ट देवमय जानकर अन्नदिसे यथायोग्य सत्कार करे ॥
इस प्रकार जो गृहस्थ पूर्वोक्त पंचयज्ञोंको न करके केवल अपने उदर भरनेके लियेही अन्नको पकाता है वह पुरुष अन्नरूप पापको खाता है ॥
चोरी मत करो
तेरे पास केवल सोलह रत्न कमल हैं मेरी पतोहुओं बत्तीस हैं, यदि मैं सबको न दूंगी तो जिनको न मिलेगा वह मुझसे दुःखी होंगी । सौदागरने कहा, कि ऐ माता ! यह रत्नकमल जोड़े हैं, एकके दो दो बन जावेंगे । अन्तमें विधवा माताने सब ले लिये एकके दो दो करके अपनी बहुओंको पृथक् पृथक् दे दिये । उन्होंने जब पहने तो उसमें जो जवाहिरात जड़े हुये थे, वे शरीरमें चुभने लगे जिससे कष्ट होने लगा तब उनको उतारकर फेंक दिया । जब बूहारनेवाली आई उसको बूहारनेके समय रत्नकमल मिला । वह उसे पहनकर किसी कामके लिये राजाके महल गई । रानीने पूछा कि, यह रत्नकमल कहाँसे पाया ? उसने सेठके घरका सब हाल कहा । रानीने राजासे कहा । राजा सुनकर कहने लगा ऐसा धनवान् सेठ नगरमें रहता है, अब मैं उसकी भेंटको जरूर जाऊँगा । सेठके पास खबर भेजी कि, मैं आपसे मिला चाहता हूँ । मिलनेका समय नियत किया गया । सेठकी माताने राजाके भेंटके लिये सामग्री तैयार की उसका वर्णन बहुत विस्तारसे लिखा है, संक्षेपसे यह है कि, रत्न, मोती तथा सुवर्णके मुहरोंसे किश्तों और नानाप्रकारके नाना देशोंके बनाये हुवे सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्र और उत्तम उत्तम घोड़े, हाथी आदि राजाकी भेंटके लिये ठीक किये । राजाके भोजनके लिये नाना प्रकारके व्यञ्जन तैयार कराये । राजाके पधारनेपर सेठके नायब और गुमाशतोंने राजाकी बड़ी प्रतिष्ठा और आवभगत करके रत्न जड़ित सिंहासनपर बैठाया । फिर सेठसे भेंट हुई, सेठने भली प्रकार आवभगत करके भोजन कराया । संयोगन राजाके हाथकी अँगूठी गिर गई उसकी खोज होने लगी, पर न मिली । यह बात सेठकी माताके कान पहुँची । उसने अँगूठीयोंके दो तीन कूवें खुलवा दिये कहा, कि आपकी जैसी अँगूठी थी वैसीही इसमेंसे खोजके निकाल लो । राजाने अँगूठियोंसे भरे कुवाको देखकर एक अँगूठी निकालकर पहन ली आनन्दपूर्वक राज महल को गया । राजाके चले जानेके बाद सेठने मातासे पूछा कि, यह कौन पुरुष था, माताने कहा कि, बेटा यह देशका राजा है, जिसकी हमलोग सब प्रजा हैं । उस युवकने कहा कि, मुझसे भी जब दूसरा बढ़कर है तो मैं दूसरेके आधीन होकर न रहूँगा । उसके मनमें उसी समय संसारसे बड़ी घृणा उत्पन्न हुई । संसार त्याग देनेका विचार किया । रात हुई उसकी स्त्री अटारीपर उसके पास गई स्त्रीको देखतेही उसने कहा,—अब तू मेरे पास मत आ, तू मेरी माताके तुल्य है । दूसरे दिन दूसरी स्त्री गई उससे भी ऐसाही कहा । जब उसने इसी प्रकार कई दिनतक किया सब स्त्रियाँ डर गयीं । उसके निकट जाना बन्द कर दिया । यह समाचार सेठकी बहिनके पास पहुँचा
सूठी गवाही मत दो इच्छीलके मुख्य धर्म
वह सुनकर बहुत शोकित हुई। यह समाचार जिस समय उसके पास पहुँचा वह उस समय अपने पतिके पीछे खड़ी उसे स्नान करवा रही थी। चित्त क्षोभित होनेके कारण आँखसे आँसू टपक कर पतिके पीठपर पड़े जिससे उसके पतिने पीछे फिकर देखा। स्त्रीको रोते देखकर पूछा तू क्यों रोती है। स्त्रीने उत्तर दिया कि, मेरे भाईको वैराग्य उत्पन्न हुआ है वह स्त्रियोंको माता कहकर पुकारता है। यह बात सुनकर उसने कहा तेरा भाई मूर्ख और नीच है, वह बारम्बार अपनी स्त्रियोंको माता क्यों कहता है ? एकही बार सबको क्यों नहीं त्याग देता ? यह बात सुनकर उसकी स्त्रीने व्यङ्गसे कहा कि, आप उससे भी अच्छे हो ? यह बात सुनकर उसके मनमें बड़ी चोट लगी उसी समय वैराग्य उत्पन्न हुआ। हाथमें कमण्डलु ले लंगोटी बाँधकर चल दिया। उसकी अस्सी स्त्रियाँ थीं बड़ा भारी सेठ था, सब स्त्रियोंको एक बार ही माता कहकर सब धन दौलत छोड़ दिया। वहाँसे चला २ अपने सालके पास पहुँचा, उसे पुकारकर कहा कि, ऐ मूर्ख ! तूने क्या ढोंग पसारा है ? आ नीचे उत्तर अपनी सब स्त्रियोंको एक बारही माता कह कर त्यागदे मेरे साथ चल। अपने बहनोंईके शब्द सुनकर वह नीचे उतरा सबको त्यागकर उसके साथ चल दिया। दोनों विरक्त हो गये। घरके लोग नानाप्रकार रोते चिल्लाते रह गये। उन्होंने उनकी तरफ कुछ भी ध्यान न दिया सालसे बहनोंई अधिक धनवान् था। जैसा वह धनवान् था वैसाही पूरा संत हुआ, अपने परायोंकी ओर स्वप्नमें भी ध्यान न दिया ईश्वरमें अखण्ड ध्यान लगाकर उसीमें निमग्न हो गया।
इस कथामें जो कुछ हुआ केवल उस खीरकाही प्रताप था, जो उस लड़केने साधुको खिलाई थी। उसीके प्रतापसे पहले ऐसा सेठ हुआ, फिर साधु होकर समाधिष्ठ हुआ, जिससे मुक्तिका भागी बनकर मनुष्य देहको सफल कर लिया।
दूसरा दृष्टांत—एक संत चले जाते थे, उनको एक मनुष्यने नमस्कार करके कहा कि, महाराज ! आज आप मेरे घर भोजन करें। साधुने उसका निमन्त्रण मान लिया उसके घर भोजन करने गया। आदमीने साधुका हाथ धुलाकर थोड़ासा अलोना शाक भोजनके लिये दिया। वह बिचारा ऐसा दरिद्र था कि, शाकमें डालनेके लिये निमक भी नहीं पा सका था। साधु अलोना शाक आनन्दपूर्वक खाकर चला। साधुके घरसे बाहर निकलतेही उस श्रद्धालु भक्तके घरमें आकाशसे रत्नोंकी ऐसी वर्षा हुई कि, घर भर गया वह ऐसा धनी हो गया कि, नगरके राजाको उसपर ईर्षा आने लगी। राजाने अपने सेवकोंको आज्ञादी कि, साधुको खोज लाओ, हम भी उसको भोजन करावेंगे। राजाके सेवकोंने