कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1071, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंधोका दिये सबको कुतुब किरमाँ । इन्सान हरीस हैं बहिरमाँ ॥
दिलमें न किसीके इश्क अरमाँ । नाहकमें फँसे न हकका फरमाँ ॥ भक्ति० ॥
मुनतिको दलीलका जो घर है । मामूर इस अहद बशर है ॥
हर सिम्त बहुतसा करौंफर है । इन्सानको मौतकी न डर है ॥ भक्ति० ॥
होवे जो मलिक मौतका फेरा । भूलेंगे सब ही फकीर फन् तेरा ॥
जब आनेके अजरईल घेरा । दोजखमें करेगा जाके डेरा ॥ भक्ति० ॥
मुन्किरो नकीर जिस्मथाना । आजा जो कहेंगे शाहिदाना ॥
लिखते जो हिसाब हर जमाना । बाकी न रहे कोई बहाना ॥ भक्ति० ॥
कोई न चलेगी होशियारी । चलनेकी हुई अब तैयारी ॥
अब छोड़ दे ख्वाबकी खुमारी । रह कोई रहे न रस्तगारी ॥ भक्ति० ॥
खुद गुम्राह और को सिखाते । अन्धे अन्धे को राह बताते ॥
पीते हैं शराब गोश्त खाते । दोजख खोरिश आब जब चखाते ॥ भक्ति० ॥
लब फूल वह दुनियाँ को तोड़े । हाहाकर प्याला को न मोड़े ॥
एक शिद्धत पर फिर और जोड़े । क्रितयन कुल रहम को सो छोड़े ॥ भ० ॥
ले हाथ में आगकी कतरनी । कतरें लब व सर अजाब धरनी ॥
दस गुण दुख औरसे जो भरनी । छूटे न गुरुके शरनी ॥ भ० ॥
जब तक न साधु गुरु मेहर है । तब तक हर सिम्तमें कहर है ॥
सब ग्राफिल सौपकी लहर है । रोजो शबो शाम और सेहर है ॥ भ० ॥
भक्ती और मुक्तिका निशाना । बतलाये कबीर हर जमाना ॥
बिठलाया जमीपै अपना थाना । दी वख्श बखेश व यगाना ॥ भ० ॥
जो सद्गुरुका निशान पावे । कर उसका अमल हमल न आवे ॥
फर्माबरी उसकी दिल लगावे । हो हंस मुकाम उसका पावे ॥ भ० ॥
ऐ सद्गुरु सत्से मिलादे । मुर्दा हुई भक्तीको जिलादे ॥
बुतलान जमीसे हिलादे । पजामुर्दा अपना गुल खिलादे ॥ भ० ॥
आजिजके तरफ जो मेल करते । यह बात बहिल जो कान धरते ॥
सद्गुरु की शरण तो आन परते । दरिया अगम अपरा तरते ॥
**विश्वामित्र—**विद्याभिमानियोंकी क्या सामर्थ्य है जो कि, सन्तोंकी तुल्यता कर सकें । भक्तिके प्रकाशसे भक्त भगवन्त बन जाता है, सन्तको वह पद मिलता है जो विद्याभिमानियोंको (स्वप्नमें भी) ध्यानमें नहीं आता । इसपर मैं एक उदाहरण लिखता हूँ । जो देवीभागवतके सातवें स्कन्धके बार-हवें अध्यायमें लिखा है :-