कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1072, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंएक समय अयोध्याजीके महाराजा हरिश्चन्द्रके पिता राजा त्रिशंकु वशिष्ठजीके शापसे राक्षस होगये, पीछे उनपर विश्वामित्रकी कृपा हुई, उनकी राक्षस अवस्था छूट गई मनुष्यत्व प्राप्त हुआ। विश्वामित्रजीने शरीर सहित स्वर्गको भेज दिया। राजाके स्वर्गमें पहुँचतेही स्वर्गवासियोंने राक्षस जान धक्का देकर गिरा दिया। महाराजा त्रिशंकु पृथिवीकी ओर गिरने लगे। विश्वामित्रजीने उनको नीचे गिरता जान कर अपने योगबलसे बीचमेंही खड़ा कर दिया। अपने तपोबलसे कहा कि, यहाँ ही स्थित रह नीचे न आना, विश्वामित्रकी आज्ञासे अधरमेंही रह गये। इधर विश्वामित्रजीने अपने तपके बलसे एक दूसरी इन्द्रपुरी बनाना आरम्भ किया, नवीन इन्द्रपुरीकी शोभा इन्द्रपुरीसे कहीं बढ़कर थी। इन्द्रने दूसरी इन्द्रपुरी बनते देखी तो बहुत लज्जित और भयभीत होकर महान् तपस्वी विश्वामित्रजीके निकट आ दण्डवत नमस्कार कर गिड़गिड़ाके कहने लगा कि, महाराज ! ऐसा काम मत करो, एक इन्द्रपुरी तो वर्तमान है दूसरेकी क्या आवश्यकता है। इसमें बड़ा बखेड़ा होगा, एकही ब्रह्माण्डमें दो इन्द्रोंका रहना कठिन और दुखदाई है। विश्वामित्रने कहा, यदि तू राजा त्रिशंकुको लेजाकर अपनी इन्द्रपुरीमें रखे तो मैं इन्द्रपुरी बनाना बन्द करूँ, नहीं तो अवश्य बनाऊँगा। राजा इन्द्रने विवश होकर महाराजा त्रिशंकुको ले जाकर स्वर्गमें स्थान दिया विश्वामित्रने दूसरी पुरीकी रचना बन्द कर दी।
यह विश्वामित्र सृष्टिकर्त्ताके पद पर स्थित हो चुके थे, सृष्टि उत्पन्न करनेकी शक्ति प्राप्त कर चुके थे, जीव जब कर्मोंको भोगते हुये मनुष्य शरीरको पाते हैं तो फिर तपस्या करके उस पदको प्राप्त कर लेते हैं, आजतक उनका आवागमन नहीं छुटा। न उनकी मुक्तिकी आशा होती है। क्योंकि, उनमें क्रोध कामना बहुत है। तपस्या तो बहुत करते हैं पर वासना दूर नहीं होती जब विश्वामित्र राजा प्रियव्रतके हेतु स्वर्ग रचने लगे तो राजा इन्द्रको यह भय हुआ था कि, अब मेरा शत्रु उत्पन्न होगा क्योंकि, जब नई इन्द्रपुरी बनती है तो नया इन्द्र भी अवश्य होगा। देवते भी होंगे इन्द्रका सभी ठाठ बाट होगा, मुझमें और नये इन्द्रमें शत्रुता बढ़ेगी। यह विचार कर इन्द्रने विश्वामित्रसे बिन्ती करके नई इन्द्रपुरीकी रचना बन्द कराई। विश्वामित्र दूसरे ऋषीश्वरोंके समान भिन्न ब्रह्माण्ड बनाकर उसमें इन्द्रपुरी बना सृष्टि उत्पन्न करते तो विष्णु अथवा अन्य दूसरे देवताओंको किसी प्रकार कुछ कहनेका अवसर न मिलता।
सम्बर—जो कोई ब्रह्माण्डमें रचना करना चाहता है, अवश्य उससे देवता लोग शत्रुता करते हैं। अतः योगवाशिष्ठमें लिखा है कि, दैत्योंके राजा