भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1080

साधुओंके भोजन देनेका पुण्य ।

जितने षट्दर्शनके सन्त हैं तथा दूसरे धर्मोंके साधु हैं उनको भोजन करानेसे महान् पुण्य होता है । कबीर साहब कहते हैं कि—

कहैं कबीर धर्मदाससे, भूला क्या डोला हो ।

कोटि यज्ञ फल होता है, एक साधु जेवायें हा ॥

कबीर साहब कहते हैं कि, एक साधुके भोजन देनेसे करोड़ों यज्ञोंका फल होता है । मैं प्रथमही लिख आया हूँ कि, पाण्डवोंकी यज्ञमें श्वपच सुदर्शनने जब भोजन किया तब यज्ञ पूरी हुई । दान पुण्य और यज्ञ आदिक किसी काम न आई । इस कारण सब साधुओंके भोजन देनेकी अपेक्षा हंस कबीरको भोजन देनेका सबसे अधिक पुण्य है ।

तिमिर लिंगको रोटीका फल—एक समय जिन्दा भेषमें कबीर साहब समर क़ंदमें रोटी २ पुकार रहे थे । किसीने रोटी नहीं दी पर तिमिरलिंग नामक एक लंगडने बड़े प्रेमके साथ रोटी खिलाई, पानी पिता सेवा की । साहबने उसको बड़ा भारी राज्य दिया, उसकी दरिद्रता दूर हो गई । वह कङ्काल बड़ा प्रभावशाली बादशाह बन गया । इसपर गरीबदासजीकी शास्त्री है ।

गरीब — देहली अकबरा बादमें, फिर लाहौरको जात ।

रोटी रोटी करत हैं, कोई न पूछे बात ॥

गरीब — तिमिरलिंग तालिब मिले, रोटीकी दी चाय ।

जिन्देकी उरमें धसी, तिमिरलिंग सुन माय ॥

गरीब — रोटी पोई प्रीतिसे, जलका तोटा हाथ ।

जिन्देकी पूज करे, मातु पुत्र दोउ साथ ॥

गरीब — तिमिरलिंग उभी रहे, मनमें कछू न चाय ।

मौज मेहर मौला करी, दीन्हा तख्त बैठाय ॥

गरीब — हिन्द जिन्द सभी दर्द, सेतुबन्ध लग सीर ।

बड़ गजनी ताबा करी, जिन्दा इस्म कबीर ॥

पारख अङ्गकी साखी ११६४ से ११७३ तक देखो ।

शास्त्र—साधु फकीरोंकी सेवा करनी चाहिये, सन्त सेवा सहस्रों आपत्ति दुःखोंको नाश करती है । पक्षपात रहित हो सब प्रकारके सन्तोंको भोजन दे

१ वास्तवमें सच्चा साधु हो कोई भी हो परमात्माकाही रूप है ।