भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1081

कदापि न चूके, इसी कारण शास्त्रोंमें आज्ञा है कि, गृहस्थ भोजन तैयार होनेपर पहले साधु अभ्यागतोंको खिलाले, पीछे आप भोजन करे । कबीर साहबने कहा है कि, जिस घरमें साधु भोजन नहीं करते वह मरघट और मसान है, उसके रहनेवाले भूत प्रेत हैं । जिस घरसे साधु अभ्यागत भोजन किये बिना फिर जाते हैं उस घरमें भूत प्रेत रहते हैं; भोजन करते हैं । इस कारण प्रत्येक गृहस्थको उचित है कि, घरमें भोजन तैयार हो जावे उस समय अपने

गीता अध्याय ३ श्लोक १३ ॥

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥

पदच्छेद—यज्ञ'शिष्टाशिनः सन्तः' मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः' । भुञ्जते' ते' ।

तु' अघं' पापाः' ये' पचन्ति' आत्मकारणात्' ॥ १३ ॥

पदार्थ—जो पुरुष यज्ञके शेष अन्नको भोजन करता है वह शिष्टपुरुष सब पापोंसे छूट जाता है पापात्मा पुरुष केवल अपने वास्तेही अन्न पकाते हैं वे पाप-काही भोजन करते हैं ।

जो अधिकारी जन ऋषियज्ञ, देवयज्ञ पितृयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और भूतयज्ञों को करके बचे हुए अमृतरूप अन्नको भोजन करते हैं, वेही श्रेष्ठ कहे जाते हैं । श्रद्धापूर्वक सज्जनों संतों और —शास्त्रोंके कहे कर्मोंको करनेवाले पुरुषोंकोही श्रेष्ठ कहा गया है । श्रेष्ठजन प्रमाद करके किये हुये तथा और भी अनेक प्रकारोंसे हुए पापोंसे रहित होते हैं ।

पंच सूना रूप निमित्तसे उत्पन्न हुये पापोंको नष्ट करनेके लिये श्रेष्ठ जन अपने २ संप्रदायके अविरुद्ध पंच यज्ञका नित्य सेवन करते हैं ।

पंच यज्ञोंको न करनेवाले पुरुषोंको पापकी प्राप्तिका वर्णन करते हैं । पंच महायज्ञोंको न करनेवाले पापात्मा केवल अपने उदरके लियेही अन्नको पकाते हैं, देवता, अतिथि आदिके लिये रसोई नहीं बनाते वे पुरुष केवल पाप-काही भोजन करते हैं, अन्नका भोजन नहीं करते । यद्यपि पापात्माओंकी दृष्टिमें वह अन्नही है तो भी संत शास्त्र और देवताओंकी दृष्टि करके सो अन्न पापरूप ही है । एकतो उपरोक्त पाप अपना नित्य कर्तव्य छोड़नेसे दूसरा पाप लगता है । यथा— कण्डनी पेष्णी चुल्ली उदकुंभी च माजंनी ।

पंच सूना गृहस्थस्य ताभिः स्वर्गं न विदति ॥

अर्थ—गृहस्थ पुरुषों के गृहमें हिंसा होनेके पांच स्थान होते हैं । १—ऊखलके कूटनेसे जीवोंकी हिंसा होती है, २—पाषाणकी चक्कीमें अन्नको