कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1082, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वारपर खड़े होकर इधर उधर देखे । जो कहीं भूखा साधु अथवा पथिक तथा किसी प्रकारका मनुष्य भूखा मिल जावे, तो प्रथम उसको सत्कार पूर्वक भोजन करावे, पीछे आप भोजन करे । जब कोई भोजन करने वाला न मिले तो अकेला भोजन करनेपर पश्चात्ताप करे । परमात्मासे उस दिन अभ्यागत न मिलनेके कारण, अपराध क्षमा करनेकी प्रार्थना करे । किसी प्रकार छल कपट और बनावट न करके साधु अभ्यागतोंको नित्य भोजन कराया करे । साधु अभ्यागतोंको भोजन कराती बार किसी प्रकारकी स्तानि और घृणा न लावे, भोजन पीसनेसे जीवोंकी हिंसा होती है; ३—तीसरा अन्नके पकानेके वास्ते चुल्लेमें अग्निके जलानेसे जीवोंकी हिंसा होती है; ४—पात्रोंमें जलके भरनेसे, बर्तनोंके मोजनेसे, जीवोंकी हिंसा होती है; ५—मृत्तिका जल आदिकों से घरके लीपने (माजने) से जीवोंकी हिंसा होती है । यह पंच प्रकारकी जी कि हिंसासे पापको प्राप्त हुआ गृहस्थ सद्गतिको नहीं प्राप्त होता ।
“पंचसूनाकृतं पापं पंचयज्ञैर्व्यपोहति” ॥
अर्थ—पंच हिंसाओंसे उत्पन्न हुये पाप पांच यज्ञोंके करनेसे निवृत्त हो जाते हैं । वे पंच यज्ञ ये हैं—
ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा ।
नृत्यज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत् ॥
अर्थ—गृहस्थ रोज ऋषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ नरयज्ञ और पितृयज्ञ शक्तिके अनुसार करता रहे इनका परित्याग न करे ।
अपने २ धर्मग्रन्थोंके पठन पाठन, नित्य क्रिया पूजा पाठआदि करने तथा अपने गुरु और साधु विद्वानोंका भोजनादि करानेका नाम ऋषि यज्ञ है ॥ १ ॥
अन्य धर्मके विद्वान् सज्जन बुद्धिमान तथा स्वधर्मके साधु सज्जन तथा सहधर्मी गृहस्थको भोजन कराना अथवा, अपने इष्ट देवके हेतु नित्यकर्म करनेका नाम, देवयज्ञ है ॥ २ ॥
गौ, कुत्ता तथा अन्य सब प्रकारके जीवधारिओंकी भोजन आदिसँतृप्ति कराने, तथा स्थावर, शाक, पात, फल, फूल, वृक्ष, आदिके व्यर्थ छेदन न करनेको भूतयज्ञ कहते हैं । ३ ॥
गृह विषय प्राप्त हुये अतिथिको अन्नादिकोंसे संतोष करानेका नाम मनुष्य यज्ञ है ॥ ४ ॥
अपने पिता, प्रपिता पितामह, चचा, भाई आदि सब श्रेष्ठ पुरुषोंको भोजन आदिसँ नित्य प्रसन्न करने तथा अपने २ नियमानुसार श्राद्ध तर्पणादि करनेका नाम पितृयज्ञ है ॥