कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1069, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौरोज हमको ईद । पितरसके हाथ कलीद ॥
दर खोल जन्नत आय । दाखिल हुये मर्द खुदाय ॥
चलते हो दिलमें शाद । उठती मुखालिफ़ बाद ॥
उनको उड़ावे दूर । उस अंधकारमें चूर ॥
हो अकल उनकी गुल । उड़ जाय पारडन बिल ॥
और कौल करता टोप । इस अंधकारमें तोप ॥
बाला विहिश्ती काख । पहले वसीअ व फर्खाख ॥
वहां जान अब कोई भूल । दिल वहां रहे मलूल ॥
वह अहमकों के बिहिश्त । बाकी न अब कोई खिश्त ॥
साधु फकीरोंकी हंसी — इस प्रकार जान मिल्टनके समान प्रायः विद्वान् ठट्ठा मस्खरी उड़ाने लगे अब भी करते हैं । जिसने दस पुस्तक पढ़ली वह कहता है कि, मैं ही बुद्धिमान विद्वान् हूँ, दूसरा मेरे बराबर कौन है । इस कारण साधु फकीर भजन छोड़कर व्यवहारमें लग गये । सब भक्ति भाव नष्ट होगई, पार्टनबिल काफूर हो गया ।
गजल—कुतुहऔ किससे खाँ मचाये गुल । भागा योरोप को छोड़ पार्टनबिल ॥
फिर न योरपमें तू कभी जाना । बागदे अपनी मोड़ पार्टनबिल ॥
अब जो जावे जरूर खावे मार । कुछ न तेरी है लोड़ पार्टनबिल ॥
हरगिज वह सरजमें न देख कभी । उल्मा करते जो हाड़ पार्टनबिल ॥
अब तू सर खुद हो मस्त बहरिश्ता । अहल दुनियासे तोड़ पार्टनबिल ॥
दुनियावी रख न अपना रख करना । खेत अपना तू गोड़ पार्टनबिल ॥
आजिज औरों के गौहरों को फेंका । कूट अपना ही रोड़ पार्टनबिल ॥
गजल—नू जरा सोच आदमी बच्चे । जिससे तू फिर न घर बघर नच्चे ॥
पहली रस्मों को तूने दूर किया । अब कौन रस्म तेरे हैं सच्चे ॥
पढ़ लिया सब जबाँ लाहासिल । अब तलक तुम हो वैसेही कच्चे ॥
पहले जो था है अब नहीं कुछ और । वही तो है भी वही जच्चे ॥
किस लिये हकने की तुझे पैदा । क्या था करना वह काम किस पच्चे ॥
किस लिये खलक में तू अशरफ है । कौनसे कारको तुझे रच्चे ॥
तू अब अपने को जानता दाना । शोहरा तेरा जहानमें मच्चे ॥
नहीं मालूम बारगह वारी । फिर बैठालें तुझे वजा उच्चे ॥
वे समझ सारे ख्वाँदे ना ख्वादे । देख आजिज सब एकसे खच्चे ॥
सच्चे साधुओंके लुप्त होनेका कारण—हिन्दुओंके राज्यके समय साधु