भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1085, कुल 1367 में से

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तेरे पास केवल सोलह रत्न कमल हैं मेरी पतोहुओं बत्तीस हैं, यदि मैं सबको न दूंगी तो जिनको न मिलेगा वह मुझसे दुःखी होंगी । सौदागरने कहा, कि ऐ माता ! यह रत्नकमल जोड़े हैं, एकके दो दो बन जावेंगे । अन्तमें विधवा माताने सब ले लिये एकके दो दो करके अपनी बहुओंको पृथक् पृथक् दे दिये । उन्होंने जब पहने तो उसमें जो जवाहिरात जड़े हुये थे, वे शरीरमें चुभने लगे जिससे कष्ट होने लगा तब उनको उतारकर फेंक दिया । जब बूहारनेवाली आई उसको बूहारनेके समय रत्नकमल मिला । वह उसे पहनकर किसी कामके लिये राजाके महल गई । रानीने पूछा कि, यह रत्नकमल कहाँसे पाया ? उसने सेठके घरका सब हाल कहा । रानीने राजासे कहा । राजा सुनकर कहने लगा ऐसा धनवान् सेठ नगरमें रहता है, अब मैं उसकी भेंटको जरूर जाऊँगा । सेठके पास खबर भेजी कि, मैं आपसे मिला चाहता हूँ । मिलनेका समय नियत किया गया । सेठकी माताने राजाके भेंटके लिये सामग्री तैयार की उसका वर्णन बहुत विस्तारसे लिखा है, संक्षेपसे यह है कि, रत्न, मोती तथा सुवर्णके मुहरोंसे किश्तों और नानाप्रकारके नाना देशोंके बनाये हुवे सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्र और उत्तम उत्तम घोड़े, हाथी आदि राजाकी भेंटके लिये ठीक किये । राजाके भोजनके लिये नाना प्रकारके व्यञ्जन तैयार कराये । राजाके पधारनेपर सेठके नायब और गुमाशतोंने राजाकी बड़ी प्रतिष्ठा और आवभगत करके रत्न जड़ित सिंहासनपर बैठाया । फिर सेठसे भेंट हुई, सेठने भली प्रकार आवभगत करके भोजन कराया । संयोगन राजाके हाथकी अँगूठी गिर गई उसकी खोज होने लगी, पर न मिली । यह बात सेठकी माताके कान पहुँची । उसने अँगूठीयोंके दो तीन कूवें खुलवा दिये कहा, कि आपकी जैसी अँगूठी थी वैसीही इसमेंसे खोजके निकाल लो । राजाने अँगूठियोंसे भरे कुवाको देखकर एक अँगूठी निकालकर पहन ली आनन्दपूर्वक राज महल को गया । राजाके चले जानेके बाद सेठने मातासे पूछा कि, यह कौन पुरुष था, माताने कहा कि, बेटा यह देशका राजा है, जिसकी हमलोग सब प्रजा हैं । उस युवकने कहा कि, मुझसे भी जब दूसरा बढ़कर है तो मैं दूसरेके आधीन होकर न रहूँगा । उसके मनमें उसी समय संसारसे बड़ी घृणा उत्पन्न हुई । संसार त्याग देनेका विचार किया । रात हुई उसकी स्त्री अटारीपर उसके पास गई स्त्रीको देखतेही उसने कहा,—अब तू मेरे पास मत आ, तू मेरी माताके तुल्य है । दूसरे दिन दूसरी स्त्री गई उससे भी ऐसाही कहा । जब उसने इसी प्रकार कई दिनतक किया सब स्त्रियाँ डर गयीं । उसके निकट जाना बन्द कर दिया । यह समाचार सेठकी बहिनके पास पहुँचा

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