कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1075, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्वान् और बुद्धिमान् बनना चाहता है उसको चाहिये कि, मूर्ख बन जावे । जो सांसारिक बुद्धिमत्ता और विद्वत्ता है वह परमात्माके निकट मूर्खता और निर्बुद्धिता है, परमात्मा अभिमानी पण्डितोंको विद्याकेही जालमें डरझा रखता है ।
जबूरमें अयूबके विषयमें—परमात्मा बुद्धिमानोंकी बुद्धिमत्ता असत्य कर देगा, वे स्वयं अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर सकेंगे । विद्याभिमानियोंको विद्याके जालमें फँसाए रखता है, जो टेढ़े तिरछे लोग हैं उनकी बुद्धिमानोंको शिरके बल उलटा देता है, वे लोग दिनके प्रकाशमें भी अंधेरेके समान अन्धे हो दूढ़ते फिरते हैं ।
फिक्रियाका सिद्धान्त—मुहम्मद साहबके बहततर पंथोंमेंसे फिक्रिया नामक पन्थका वचन है कि पुस्तकावलोकन आदि विद्याकी विशेष वृद्धि होते ही भक्ति और भजन नष्ट हो जाता है ।
शिष्टका वचन—किसीने कहा भी है कि,—
श्लोक—जातिविद्या महत्त्वं च रूपं यौवनमेव च ।
यत्र नैव प्रजायन्ते पञ्चैत भक्तकण्टकाः ॥
जाति, विद्या, रूप, मान, युवावस्था ये पांचों भक्तिके परम शत्रु हैं, जबतक इनसे निवृत्त न होगा तबतक भक्ति न कर सकेगा । इसी प्रकार पृथिवीके सारे विरक्त महात्मा कहते चले आते हैं । यदि मनुष्य भक्तिका कुछ भी अनुराग रखता हो तो विद्वान् होता हुआ भी विद्याका अभिमान छोड़ दे ।
विद्याभिमानियोंका आधार—दो बातों पर है एक पुस्तक अर्थात् दृष्टि ज्ञान और दूसरा उनका ज्ञान । दोनोंही असत्य हैं । क्योंकि, दोनों परिवर्तनशील हैं । दोनोंका कुछ भी विश्वास नहीं । बालकपनसे मृत्यु तक इनमें परिवर्तन हुआ करता है, इनपर भरोसा करना गुरुको न दूढ़ना महामूर्खता है । मनुष्य धर्मद्वेष और पक्षपात छोड़कर देखे विचारकर उचित व्यवहार करे तो निस्सन्देह इष्टको प्राप्त कर सकता है । पहले गुरुकी पहचान अवश्य है, जबतक गुरुको न पहचानेगा तबतक कोई कार्य पूरा नहीं हो सकता । बुद्धिमानों वही है जो सद्गुरुको पहचानकर उसके चरणका रज हो जावे अपने विचारको गुरुकी आज्ञानुसार काममें लावे ।
यह एक सीढ़ी है जो पृथिवीसे ऊपर आकाशमें लगाई है उसके चार दण्डे हैं, शरीयत (कर्म काण्ड) तरीकत (योग और उपासना) हकीकत (ज्ञान) और मारफत (विज्ञान) आदिक ।
जितने विद्याभिमानी संसारमें हैं सब शरीयत (कर्मकाण्ड) के दण्ड