कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ऋषीश्वरोंके वचन
इसका आधिक्य विशेष है । ब्रह्मा और चीन इत्यादि देशोंमें भरे हैं । योगी तथा संन्यासियोंके समान समाधि लगाते हैं । और बंदनामें डूब जाते हैं ।
शङ्कराचार्यजीका वृत्तान्त ।
शंकराचार्यजी ब्राह्मणके घरमें उत्पन्न हुए । लड़कपनहीसे आपमें बड़प्पन तथा श्रेष्ठताके चिह्न प्रगट थे । पढ लिखकर आप अच्छे पण्डित हुए योग साधन भी किया और अपने योग तथा विद्याबलसे प्रत्येक स्थानपर जाकर विजयी हुए । समासधर्म चलाया, वेदधर्मका भली भाँति प्रचार कराया । जैन तथा बौद्ध दोनोंके अप धर्मोंके भलीप्रकार पददलित किया । वेदधर्म तथा संन्यासी ब्राह्मणोंकी मर्यादा बढ़ाई । राजा अमिरुके मृतशरीरमें अपने योगबलसे घुसकर योगसिद्धि दिखाते हुए कोकशास्त्र पढा, कोकशास्त्रके पण्डित होकर मण्डनमिश्रकी स्त्रीको परास्त किया । उसके साथ बहुत विवाद हुवा । तब मण्डन और उसकी स्त्री दोनों शंकराचार्यके सेवक बन गए । बदरीनाथकी मूर्तिको गङ्गाभेंसे बहिर्गत करके स्थापित कर दिया । मूर्तिपूजाको प्रचलित किया । वेदान्तशास्त्रको भी उज्ज्वल किया । जैसे दत्तजीने वेदान्त, सिखलाया और फिर शिवलिङ्गकी पूजाका प्रचार किया, वही कार्य शंकराचार्यजीने भी प्रचलित रक्खा कि, मूर्ति-पूजा भी होती और 'एकं ब्रह्म द्वितीयं नास्ति' भी कहते । जिसका मन चाहे वह 'एकं ब्रह्म द्वितीयं नास्ति' कहा करे । ये बात उसकी इच्छापर रही । ये लोग विष्णु तथा शिव दोनोंको एक स्वरूप समझकर पूजते हैं । कुछ भी विभिन्नता नहीं जानते । यह शंकराचार्य शिवजीका अवतार है । वेदधर्मके स्थिर करनेके निमित्त हुवा है ।
रामानुजस्वामीका वृत्तान्त ।
रामानुजस्वामी शेषजी के अवतार थे । विष्णुकी आज्ञासे शेषजी अवतार लिया । केशव यज्वा ब्राह्मणके गृह जन्म लेकर वैष्णव धर्म पृथ्वीपर चलाया । वेदधर्म तथा ठाकुरपूजनका भली भाँति प्रचार किया । बडी धूम धामसे आपका धर्म पृथ्वीपर प्रचलित हुवा । भक्तमालमें आपका वृत्तान्त बहुत कुछ लिखा है । इस धर्मके लोग बहुत बचाव रखते हैं । यहाँ लो कि, अपने हाथकी पकाई हुई रोटी खाते हैं । ऐसा कि, किसी दूसरे अयोग्य मनुष्यकी परछाई पर्यन्त पड़ने न पावे । परदेके भीतर रोटी पकाते और खाते हैं । ये लोग शिवको ईश्वर नहीं मानते विष्णुकी मूर्तिका पूजन किया करते हैं । ये और रामानुजस्वामीकी श्रेष्ठता संसारमें प्रगट है । आपके लाखों शिष्य भारतमें हैं । कबीर साहिबभी इसी परंपरामें आजाते हैं ।
शिवतन्त्रका प्रमाण ७ अ० विष्णुभगवान्
रामानन्द स्वामी ।
रामानुजस्वामीके सम्प्रदायमें रामानन्दस्वामी कबीर साहबके भी गुरु उत्पन्न हुए । रामानन्दस्वामी काशीधाममें रहा करते थे । रुणावस्थामें उनके आचार्यमें कुछ भेद पड़ गया था । फिर जब आप दक्षिणके आचार्योंमें गए तब उन लोगोंने आपको अपने समूहसे पृथक् कर दिया । तब रामानन्दजीने अपने गुरु राघवानन्दसे पूछा कि, अब क्या करूँ ? तब राघवानन्दने कहा कि, तुम आचार्योंसे पृथक् हो जाओ । तुम्हारी एक न्यारी सम्प्रदाय चलेगी । इस दिवससे रामानुज और रामानन्दके लोग पृथक् हुए । रामानुज और रामानन्दकी सम्प्रदाय पृथक् हुई । रामानुज सम्प्रदायके आचार्यकी कड़ाई रामानन्दके सम्प्रदायमें नहीं । इस सम्प्रदायमें प्रत्येक जातिका मनुष्य सरलतापूर्वक मिल जाता है । रामानुजके सम्प्रदायमें जातिका विशेष ध्यान रहता है । इन दोनों सम्प्रदायोंके लोग एकही हैं तथापि उनकी रीति भौति पृथक् पृथक् हैं ।
तीन सम्प्रदाय ।
इन सम्प्रदायोंके रीतिव्यवहारमें तनिक विभिन्नता है । एक दूसरे से अपनी रीति भौतिको श्रेष्ठ जानते हैं । विष्णुश्याम माधवाचार्य निम्बार्क रामानुजके लोगोंके सदृश ये सब ठाकुरपूजा करते हैं । इन चारों सम्प्रदायोंके मनुष्य, कुछ २ पृथक् २ ध्यान रखते हैं । सब रामकृष्णकी मूर्तिपूजते हैं । कोई भीतरी पूजा करता है चार प्रकारकी मुक्तिके अभिलाषी हैं । इसका समस्त विवरण ग्रंथ कबीरभानुप्रकाशमें सविस्तार लिखा गया है । इन चारों साम्प्रदायोंकी चाल पूर्णतया सतोगुणी हैं । सतोगुणी चाल और ढङ्ग मुक्तिमार्ग दिखलानेवाले हैं । जबलें मनुष्य सतोगुणकी चलन स्वीकार न करे तबलें उचित स्थानपर्यन्त पहुँच नहीं सकता । इसी कारण कबीर साहबने समस्त धर्मोंपर इस धर्मको श्रेष्ठ समझा है ।
अध्याय ९ ।
पश्चिमके महापुरुष ।
यद्यपि कबीर मन्शूर में उन्हीं पुरुषोंके प्रसंग आने उचित थे जो कि, कबीरसाहिबकी दिव्य वाणीसे सम्बन्धित हैं, पर पश्चिम देशके महात्माओंका जीवन केवल इसीलिये यहाँ रखा गया है कि, कबीर दर्शनके प्रेमियोंको पश्चिमके महात्मा पुरुषोंके जीवनका भी पता चल जाय कि, पश्चिमके निवासी इन
व्यक्तियोंमें विशेष भाव रखते हैं। तथा इनमेंसे बहुतोंका प्रकरण उनकी वाणीमें आ भी गया है यह भी एक कारण इस प्रसंगके यहाँ रखनेका है।
हजरत आदम तथा नूह महात्मा ।
हजरत आदम तथा नूह दोनों श्रेष्ठ महात्मा हुए। आपकी बातें परमेश्वरके साथ हुवा करती थीं। विष्णु प्रत्यक्षमें आपको दर्शन दिया करते तथा आपसे वार्तालाप किया करते थे। कबीर साहबने कहा कि, आदम ब्रह्माका अवतार है। आदमके बाद हजरत नूह आदमके समान हुए। जिससे समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति तथा स्थिति है। सांसारिक वासनाओंमें फँसे हुए तथा पूरे और पक्के दुनियाँदार थे।
हजरत इबराहीम और इसहाक आदि।
हजरत नूहके उपरान्त इबराहीम बड़ा धार्मिक हुवा, एक परमेश्वरके माननेमें बड़ा सच्चा था। परमेश्वरपर भरोसा रक्खा करता था। ये पश्चिमीय देशोंके भविष्यवक्ता गण प्रायः गृहस्थ थे। स्वच्छ हृदय तथा भले थे अपने आन्तरिक प्रकाशसे बहुतसी बातोंको जान लेते थे। हजरत इबराहीमके साथ परमेश्वर बातें किया करता था बरन् आपके शिष्टाचारको भी ग्रहण किया करता था। इबराहीमका पुत्र इसहाक भी ऐसाही अपने पिता इबराहीमके सदृश भला आदमी एवं ईश्वरपूजक था, दोनोंके गुण तौरीतमें देखो।
इसहाकका पुत्र याकूब अपने श्वशुरकी भेड़ बकरियाँ चराता था। स्त्रीके निमित्त उसने चौदह वर्षपर्यन्त अपने श्वशुरकी सेवा की।
याकूबका दूसरा नाम इसराईल हुवा। परमेश्वरने उसको आशीर्वाद दिया, उसके बारह पुत्र हुए, वही यहूदियोंके बारह सरदार कहलाते हैं। ये सब गृहस्थ और सांसारिक वासनाओंमें सने हुए हैं।
इसराईलकी परिश्रम सेवा पर परमेश्वरने दया की कि, उसके बारह पुत्र, बरन् कनआनके सम्भ्राद् हो गए।
हजरत दाऊन और सुलेमान।
हजरत दाऊन बादशाह और नबी था। परमेश्वरके प्रेममें गाता नाचता और रोता था। उसने बादशाहीमें बहुत रक्तपात और काटकुटकिया। दाऊदके गानेमें बड़ा प्रभाव था, जैसा कि मने इतः पूर्व दिखलाया है। दाऊदका पुत्र सुलेमान बादशाह हुवा। इन दोनों महाशयोंकी परमेश्वरसे आपसमें वार्तालाप हुवा करती थी। सुलेमान बादशाहको परमेश्वरने तीनों पदार्थ प्रदान किये। अर्थात् बुद्धिमानी, अनागतवक्तृता और बादशाही। इन दोनों महाशयोंका वृत्तान्त पुराने अहदनामा और मुसलमानी हदीसोंमें देखो।
दाऊद बादशाहकी निन्यानवें स्त्रियाँ थीं। परन्तु उरियाह अपने भृत्यकी स्त्रीको अपने कार्यमें लानेके कारण वह विशेषतः बंधनमें पड़ा। परमेश्वर उससे रुष्ट हो गया। परन्तु उसके रोने धोनेके कारण परमेश्वर उसपर दयालु हो गया।
दाऊदका पुत्र मुलेमान जब सिंहासनारूढ़ हुवा तब उसने आनन्द सम्भोगके अनेक आयोजन किये, उसकी जो सातसौ स्त्रियाँ और तीन सौ वेश्याएँ थीं, उन सबने मिलकर मुलेमानकी बुद्धि भ्रष्ट कर दीं। मूर्तिपूजा करवाई। ये दोनों महाशय सांसारिक शारीरिक विकारोंके वशीभूत हुए इस लोकसे विदा हुए।
हजरत मूसा।
हजरत मूसा का जन्म मिश्रदेशमें हुआ। इबराहीमके घरानेमें मूसा श्रेष्ठ नबी (भविष्यवक्ता) हुवा। उसको फ़िरऊनके बंधनसे इबराहीमकी सन्तानको छुडानेके निमित्त परमेश्वरकी आज्ञा हुई। यह फ़िरऊनकी सेवामें उपस्थित हुवा परमेश्वरकी आज्ञासे अनेक कौतुक दिखलाये। इब्रानियोंको फ़िरऊन बादशाहके बंध बंधनसे छुडाकर कनआऊनके वास्तविक देशमें पहुँचा दिया। इसका पूर्णतया विवरण किताब तौरीतकी उत्पत्तिमें लिखा है।
चालीस वर्षके वयमें मूसाने एक मिसरीको इक इब्रानीके बदले मार डाला। इस भयसे कि, अब फ़िरऊन (परमात्मा बांगीशाह) मुझको मार डालेगा भयसे वह भागा। चालीस वर्षपर्यन्त महमानियामें अपने श्वशुर पतरूकी भेड़ बकरियाँ चराता रहा। अस्सी वर्षके वयमें मूसाने अपूर्व तत्त्ववक्ताकी पदवी पाई। परमेश्वरकी आज्ञासे पुनः मिश्र देशको गया। मूसाका वृत्तान्त तौरीत और गुलजार मूसा और अहादीस मुहम्मदियामें इस प्रकार लिखा है कि, जब इब्रानियोंका आधिक्य देखा गया तब फ़िरऊन नितान्तही भयभीत हुवा कि, यह सब चढ़ाई करके मेरा राज्य न छीनलें। उनको बालकोंकी हत्या वह करने लगा। जब इब्रानियोंकी रोलार्डका शब्द आकाशपर्यन्त पहुँचा तब परम दयालु परमेश्वरको दया आई। कुतुबमुहम्मदियामें लिखा है कि, एक दिवस फ़िरऊनने ऐसा स्वप्न देखा कि, शाम देशमें एक ऐसी अग्नि आई है कि, जिसने मेरे मिश्र देशको जलाकर भस्म कर दिया है। यह स्वप्न देखकर वह नितान्तही भयभीत हुवा। बुद्धिमानोंसे पूछा कि, इस स्वप्नका तात्पर्य कहो? उन लोगोंने कहा कि, इब्रानियोंमें एक ऐसा मनुष्य उत्पन्न होगा जो फ़िरऊनके राज्यको
मिटादेगा । इस भयसे फ़िरऊन नितान्तही भयभीत हुवा । इब्रानियोंके बच्चोंको मारने लगा । सदैव ज्योतिषियों पण्डितोंसे पूछा करता था कि, वह बालक किस दिवस और किस समय गर्भमें आवेगा । तब उन लोगोंने बतलाया कि, अमुक दिवस रात्रिके समय वह बालक गर्भमें आवेगा । जिस दिन इन लोगोंने बतलाया था उस रात्रिके दिवस फ़िरऊनने आज्ञा दी कि, कोई पुरुष स्त्रीसे संभोग करने न पावे । समस्त इब्रानियोंको नगरके बाहर निकाल दिया । बड़ी चौकसीसे पहारा खड़ा कर दिया । एक इब्रानी जिसके वीर्यसे मूसा उत्पन्न होनेवाला था उसका नाम उमरान था । इस उमरानको फ़िरऊनने अपनी निजकी पल्लेगके समीप अपने शयनागार में खड़ा कर रक्खा । जब अर्ध निशाका समय हुवा तब एक दूत इस उमरानके निकट उसकी स्त्रीको ले आया, उसने अपनी स्त्रीके साथ संभोग किया । इसके उपरान्त वह दूत उस स्त्रीको उठाकर पुनः उसी स्थानपर उसके गृह रख आया । इस अवसर फ़िरऊन ऐसा घोरनिद्राके वशीभूत हो रहा था कि, उसको तनिक भी सुध न रही कि, वह स्त्री किधरसे आई किधर गई और क्या हुवा ।
जब प्रातःकाल हुआ तब फ़िरऊन पुनः ज्योतिषियों और बुद्धिमानोंसे प्रश्न करने लगा कि, उस बालकका वृत्तान्त कहो ? उन लोगोंने उत्तर दिया कि, वह बालक तो माताके गर्भमें आचुका । मेरी कोई युक्ति नहीं चली । तब दाइयोंको सचेत किया कि, बच्चा उत्पन्न होतेही मार डालो, अन्तमें जब गर्भ-काल समाप्त हुआ तब उमरानकी स्त्रीके गर्भसे एक अत्यंत सुन्दर बालक उत्पन्न हुआ । तब माता पिताने बच्चाके प्रेमसे तीन मासपर्यन्त छिपाकर रक्खा । फिर इनके मनमें इस अत्याचारी बादशाहका भय उत्पन्न हुवा । तब इन्होंने एक सरकण्डेकी टोकरी बनाई उसमें उस बच्चेको रख दिया अपनी पुत्री मरियमसे कहा कि, तू इस टोकरीको बच्चेसहित नीलनदीके तटपर रख आ । तब मरियम गई, उस बालकको नदी तटपर झाऊके वृक्षोंमें रखकर चली आई । मरियम दूर खड़ी होकर देख रही थी कि, देखिए इस बालकको क्या होता है ? इतनेमें क्या देखा कि, फ़िरऊनकी बेटी अपनी लौंडियोंको साथ लिए स्नानार्थ नदी तटपर आपहुँची । उस बच्चेको उस टोकरीमें देखा उसके मनमें उस बच्चेका प्रेम उपजा और दया आई । उसने कहा कि, यह किसी इब्रानीका पुत्र है । अपनी लौंडियोंको आज्ञा दी कि, इस बच्चेको ले चलो । वह अपने गृह ले आई इस बच्चेको अपना मुंहवोला पुत्र मान लिया, इस समस्त घटनाको मरियम दूसरे खड़ी होकर देख रही थी । जब फ़िरऊनकी पुत्री उस बालकको अपने
गृहमें ले गई उस समय मरियम उसके पास दौड़ी गई और कहा कि, यदि आज्ञा दो तो मैं इस बच्चेके निमित्त एक दूध पिलानेवाली दाई ले आऊँ। तब राजकुमारीने आज्ञा दी कि, ले आओ। तब मरियम उसी समय गई और अपनी माताको बुललाई। राजकुमारीने उसे सेवा तथा दूध पिलानेके निमित्त रख लिया। जो उस बालककी माता थी वही दूध पिलाई दाई बन गई। इस बच्चेको अत्यंत प्रेम सहित पालने लगी। इस बच्चेका नाम मूसा रक्खा गया मिसरी भाषामें मूसाके अर्थ जलसे निकलाके होते हैं। मूसा इस राजकुमारीका मुंहबोला पुत्र होकर पलने लगा। जब फ़िरऊनने उस बालकको देखा तब ज्योतिषियों से पूछा कि, इस लड़केका हाल कहो कि, कैसा है? तब ज्योतिषियोंने कह दिया कि, यह वही बालक है जो तुझे तथा तेरे राज्यको चौपट करेगा। यह बात सुनकर फ़िरऊन उस बालकके मारनेपर प्रस्तुत हुवा। पर उसकी पुत्रीने उसकी ओरसे निवेदन किया कि, यह अनजान बालक है यह आपका कोई दोष नहीं करेगा। समस्त ज्योतिषी झूठे हैं। तात्पर्य यह कि, अपनी पुत्रीके कहने सुननेसे उस बालककी हत्या नहीं की। एक दिन फ़िरऊनने मूसाको अपना नाती समझ अपने क्रोडमें प्यार करने लगा। इतनेमें मूसाने फ़िरऊनकी दाढ़ीको पकड़कर इतने जोरसे खींचा कि, फ़िरऊनके नेत्रोंसे जल निकलने लगा। इस पर उसको निश्चय हो गया कि, यह बालक मेरा बँरी है। आज्ञा दी कि, इसका बध करो। तब पुनः फ़िरऊनसे लड़कीने प्रार्थना की कि, यह अनजान बालक है। यह मैंत्री अथवा द्वेष क्या जाने इस अनजानको न मारिये। फ़िरऊनने कहा कि, यदि यह अनजान बालक है तो इसकी परीक्षा ली जावे। इस बालकके सामने दो ढेर लगा दिये एक तो अग्निके लाल कोयलोंका और दूसरा लाल लालोंका ढेर लगा दिया और कहा कि, यदि यह बच्चा लाल अङ्गारोंके ढेर पर हाथ डालेगा तो मैं समझूंगा कि, यह बच्चा अबोध है, यदि इसने लालोंको पकड़ा तो बेसुध नहीं है इस कारण यह मारा जावेगा। जब दोनों ढेर मूसाके सामने लगाये गये मसाने चाहा कि, लालोंके ढेरपर हाथ डालें। तब परमेश्वरकी ओरसे इतने गुप्तरीतिसे मूसाका हाथ पकड़कर शीघ्रतापूर्वक अग्निपर डाल दिया। उस अग्निमेंसे एक अङ्गारा पकड़कर मूसाकी जिह्वापर रख दिया। उसकी जिह्वा जल गई। इसी कारण मूसाकी जिह्वा तोतली हो गई। फ़िरऊनने जान लिया कि, वास्तवमें यह अबोध बालक है, मूसाकी हत्या नहीं की। उस बच्चेका लालन पालन होने लगा। फ़िरऊनकी पुत्रीने उसके पढ़ानेके निमित्त एक शिक्षक रक्खा, वो भली भाँति शिक्षा पाने लगा, अत्यंत सावधानीपूर्वक पाला गया, फ़िरऊनके नातीके
इस्लाममें विष्णुकी प्रधानता
नामसे विख्यात हुवा । मूसा सुबूद्ध सुदृढ तथा बलिष्ठ था । ये जब वह मिश्र-देशसे भाग अपने बाप दादेके देशमें आया तब उसका विवाह पितरू नामक एक भले आदमीकी लड़कीके साथ हुवा । फिर अस्सी वर्षके वयसमें परमेश्वरकी आज्ञानुसार वह पुनःमिश्र देशमें गया । अपनी जातिको फिरऊनके बंधनसे छुडाकर लेआया । जब सीना पर्वतके समीप आया तब परमेश्वर आकाशसे उत्तरा मूसाको तौरीतकी पुस्तक प्रदान की । जब इब्रानियोंने परमेश्वरकी आज्ञा उल्लंघन की तब उनपर ईश्वरीय क्रोध उपस्थित हुआ । वे चालीस वर्षपर्यन्त इधर उधर वनमें भटकते फिरे । तबतक न उनके वस्त्र जीर्ण हुए, न उनका जूता फटा । जो उनके पुत्र उत्पन्न होते, सब वस्त्र सहित उत्पन्न होते जैसे वे बढ़ते जाते वैसेही उनका वस्त्र भी बढ़ता जाता था । प्रातःकाल उनके भोजनके निमित्त आकाशसे एक वस्तु ओसकी बूंदके समान बरसती थी । जिसको इब्रानी भाषामें मन्न बोलते हैं । इस मन्नका स्वाद गुंधे हुए मायदे मधुके सहित हो, उस मन्नको इब्रानी प्रातःकाल उठकर एकत्रित होकर खाते हैं । संध्या समय बटेरे आते थे । उन बटेरोंका झुंड इतनी अधिकतासे आता कि, उनके पडावके निकट गज गज भर ऊँचा ढेर लग जाता था । वे इब्रानी सदैव मांस खाया करते थे, इस कारण उनकी प्रार्थनापर परमेश्वर उन्हें बटेरें दिया करता था । वे लोग मांसभक्षणके निमित्त परमेश्वरके सामने रोए, परमेश्वरने उनको वह भोजन प्रदान किया वे सदैव मांस भक्षण करते रहे । इससे उनपर परमेश्वरका प्रकोप उपस्थित हुवा कि, बीस वर्षके वयके जो ऊपर थे सो सब मर गये । मूसा इब्रानियोंको लेकर कनआँदेशमें पहुँचा पर्वतपर चढ़ गया वह एक सौ बीस वर्षका वय पाकर मर गया । उसका भांजा मरियमका पुत्र यशू उसका स्थानापन्न हुवा, वह इब्रानियोंको लेकर कनआँ देशमें आया बत्तीस बादशाहोंको नष्ट करके देशको इब्रानियोंके सरदारोंमें बाँट दिया ।
मूसाको साढ़ेतीन सहस्र वर्षका समय बीता । जिस समय मूसा मिश्र-देशसे यहूदियोंको लेकर चला था उस समय फिरऊन बादशाहने मूसाका पीछा किया । परमेश्वरने ससैन्य फिरऊनको लालसमुद्रमें डुबाकर मार डाला । फिरऊन दलबल सहित मारडाला गया । यहूदियोंने प्रसन्नतापूर्वक अपना पथ पकड़ा । जैसी घटनाएँ मूसापर उसके उत्पत्तिकालमें बीती थी वैसेही कृष्ण तथा इब्रानीमके साथ भी बीती थी । जबलों मूसा जङ्गलमें था तबलों आसमानी रङ्गका परमेश्वर उसके साथ था । बराबर मूसाको उपदेश देता जाता था । मूसा तथा आसमानी रङ्गके परमेश्वरमें बराबर बात होती जाती थी । धर्म तथा
संसारके समस्त नियमोंको बराबर बतलाता जाता था। सांसारिक सद्भावोंके सदृश उसकी आज्ञाएँ बराबर प्रचलित हुवा करती थीं।
हज़रत ईसा।
इन पश्चिमदेशीय अनागत वक्ताओंमें हज़रत ईसा सबमें बड़े श्रेष्ठ हैं। इज्जीलमें हज़रत ईसाकी उत्पत्ति इस प्रकार लिखी है कि, मरियम नामी एक बालिका थी। वह सूरूप नामका एक पुरुषके साथ भौंगी हुई थी। उन दोनोंकी केवल भैंगनी हुई थी विवाह नहीं हुआ था अबलों स्त्री पुरुष एकत्रित नहीं हुए थे कि, जिबराईल फ़िरिस्तःमरियमके समीप आकर उससे कहने लगे कि, ए मरियम ! सलाम, तू धन्य है। तू एक पुत्र प्रसव करेगी, उसका नाम तू ईसा रखना और वह परमेश्वरका पुत्र कहलाएगा। जैसा कि, फ़िरिस्ताने कहा, बिनशादी मरियम गर्भवती हुई उससे पुत्र उत्पन्न किया। जिसका नाम ईसा हुवा।
जैसे मूसाकी हत्याके निमित्त फ़िरऊन, बादशाह उद्यत हुवा था वही घटना हज़रत ईसाके साथ हुई। हेरुदेश बादशाह आपकी हत्याके निमित्त उद्यत हुवा। परमेश्वरने अपना दूत भेजकर बालककी प्राण रक्षा किया।
देखो इज्जीलमें हज़रतने आपको परमेश्वरका पुत्र कहा है इस कारण यहूदी आपके बैरी हो गए शूलीपर चढ़ाया। बत्तीस वर्षके वयसमें आप अपनी कबसे पुनः जीवित होकर तीसरे दिवस सशरीर वैकुण्ठको गए। पश्चिम देशके समस्त महात्माओंसे आप श्रेष्ठ हैं, क्वारीके गर्भसे उत्पन्न भी हुए। स्त्री गर्भकी उत्पत्ति महाभयानक यन्त्रणा है। जो स्त्री गर्भमें आता है वह निश्चय कठिन कष्टका अनुभव करता है जो गर्भमें रहता है उसको तीन प्रकारके ताप घेरते हैं।
(१) प्रियतप वह अत्यंत प्रबल जैसे गरम भट्ठा होता है। इस अग्निसे ऐसे बच्चा जलता है कि, जैसे गरम और लाल तावा हो उसपर किसी जीवको रखदो। वह तड़पता रहे पर उसके प्राण न निकलें।
(२) राद रक्त और भ्रष्टतामें शिरसे पौवपर्यन्त भरा रहता है।
(३) हाथ पौव उसके बंधे रहते हैं वह उल्टा लटका करता है। इन तीन तापोंके कारण वह अत्यंत व्यथित रहता है दुःख पाता है। जब यह गर्भसे बहिर्गत होता है तब मूत्रमार्गसे बाहर निकलता है। निकलनेके समय वायुकी ऐसी चोट लगती है कि, जैसे तीर लगकर शरीरसे पार हो जाता है। इस कष्टसे बालक चिल्ला २ कर रोता है। इस संकीर्ण मार्गसे निकलनेके समय अत्यंत कष्ट होता है कि, उसकी देह छोटी हो जाती है चाहे परमेश्वरका पुत्र हो, चाहे
प्राचीन नियम पत्र व खरकैल नवीकी पुस्तकका सार
मनुष्यका । जो कोई गर्भमें आवेगा वो सब दुःख उठावेगा, उत्पत्ति और मृत्युके समय आपने कैसा दुःख पाया था । यह अपने वशकी बात नहीं बरन् विश्व होनेकी बात है । प्राण देनेके समय आपको कैसा दुःख जान पडा । मृत्युसे कैसे भयभीत हुए कि, पुकार कर कहा । देखो मतीकी इञ्जीलका (२७) बाब (४६) आयत (एली एली लमासतक बानी) अर्थात् तू ए मेरे परमेश्वर ! से मेरे परमेश्वर ! ! तूने मुझे क्यों छोड़ दिया (५०) आयत ईसूने बडे जोरसे चिल्लाकर प्राण त्यागे ।
फिर मरक्कसका (१४) बाब और (३३) आयत, पीटर्स याकूब योहन्नाको ईसाने साथ लिया । वह घबराने और बहुत उदास होने लगे ।
(३५) इसने थोड़े आगे जाकर पृथ्वीपर गिर प्रार्थनाकी कि, यदि होसके तो यह घडी मुझसे टल जावे ।
(३६) कहा कि, ए पिता ! तुझसे सब कुछ हो सकता है इस प्यालेको मुझसे टालदे लूकाकी इञ्जीलका (२२) बाब (४२) आयत ए, पिता ! यदि तू चाहे तो यह प्याला मुझसे टल जावे परन्तु मेरी इच्छा नहीं बरन् तेरी इच्छाके अनुसार है ।
(४३) आकाशमें उसे एक दूत दिखलाई दिया जो उसको बल देता था ।
(४४) मृत्युके कष्टसे विह्वल होकर बहुत गिड़गिड़ाकर परमेश्वरसे प्रार्थना करता था, उसका पसीना रक्तके बूंदके सदृश पृथ्वीपर गिरता था ।
उन बातों से प्रगट होता है कि, वे महाशय अपनी मृत्युसे भयभीत होते थे परन्तु मारे जानेके वश नहीं था । मृत्युके समय दूत आपको सन्तोष दे रहा था । इससे आपके मनमें बड़ा ढाढ़स था । जो कोई माताके गर्भसे उत्पन्न होता है कोई निरापराध नहीं तथा निर्दोष नहीं मारा जा सकता है । देखो पुराना अहमदनामा इस्तसनाकी पुस्तक । (१८) बाब (२०) आयत वह भविष्यद्वक्ता जो ऐसी धूण्टता करे कि, कोई बात मेरे नामसे कहे कि, जिसके कहनेकी आज्ञा मैंने नहीं दी, अथवा अन्यान्य परमेश्वरोंके नामसे कहे तो भविष्यद्वक्ता मारा जावेगा ॥
(१) सला तीन (८) बाब (६४) आपत कोई मनुष्य ऐसा नहीं जो कि, दोषी न हो । मईकी नबीकी पुस्तक (७) बाब (२) आयत बनी, आदममें कोई सत्यवादी नहीं । रोमियोंका (३) बाब (१०) आयत, कोई सत्यवादी नहीं ॥
युसायाहनबी (६४) बाब (६) आयत, हमतो सबके सब ऐसे हैं जैसे कोई घृणित पदार्थ हमारी समस्त सत्यता गन्दी धज्जीके समान है।
अयूबका (९) बाब। (२) आयत मनुष्य परमेश्वरके समक्ष किस प्रकार सत्यवादी ठहरेगा? अयूबका (२५) बाब (२) आयत परमेश्वरके समक्ष मनुष्य किस प्रकार सत्यवादी समझा जावे? वह जिसकी उत्पत्ति स्त्रीसे है यह किस प्रकार पवित्र ठहरे?
अयूबका (१४) बाब (१) से (५) आयतपर्यन्त मनुष्य जो स्त्रीगर्भसे उत्पन्न होता है वह अल्पकाल पर्यन्त जीवित रहता है। पूर्णतया दुःखमें है। वह पुष्पके समान निकलता और तोड़ा जाता है। वह छायाके समान जाता रहता है। नहीं ठहरता है क्या इसीपर अपनी आँखें खोलता और मुझे अपने साथ न्यायालयमें लाता है।
कौन है जो अपवित्रसे पवित्र निकाले? कोई नहीं।
अयूबका (१५) बाब (१४) आयत, मनुष्य कौन है कि, जो पवित्र होसके वह जो स्त्रीसे उत्पन्न हुवा, वह कैसे सत्यवादी ठहरे?
मरकसकी इज्जील (१०) बाब (१७) (१८) आयत। भला कोई नहीं वरन् एकभी नहीं, अर्थात् एक परमेश्वरही भला है।
मतीकी इज्जील (१९) बाब (१६) आयत। ऊपरकी बात लूकाकी इज्जील (१८) बाब (१८) वही बात।
इज्जीलका पोलूस भविष्यवक्ताका दूसरा पत्र (२) करनतियोंके (१३) बाब (४) आयतमें लिखा है कि, ईसा निर्बलताके कारण सलीबपर मारा गया।
फिर पोलूस भविष्यवक्ताका पत्र फिलपियोनको (१) बाब (१७) (१८) आयत, प्रेमवाले यह जानकर इज्जीलको सुनाते हैं कि, मैं इज्जीलको प्रमाणित करनेके निमित्त नियत हुवा हूँ। अतः क्या है? सब प्रकारसे मसीहका समाचार दिया जाता है। चाहे मक्कारी हो चाहे सत्यतासे हो। मैं इसमें अप्रसन्न नहीं हूँ वरन् प्रसन्न रहूँगा।
अट्ठारह करोड़ साठ सहस्र योजन पृथ्वीसे ऊपर आकाशमें हजरत ईसा रहते हैं। इस स्थानका नाम जिब्रूत है और वही झाँझरी द्वीप समस्त सृष्टिके सन्नाद् निरञ्जनकी राजधानी है, उसीकी सभामें चारों दूत और सिद्ध साधु उपस्थित रहते हैं।
अनिको विष्णुरूप कहना
मुसद्दस—वह आग जो पैदायशके पहले है पैदा ।
जब था नहीं कुछ शून्यमें थी हुई हवैदा ॥
उसहीके ऊपर आलम कुल होमया शैदा ।
बैजा है वही जिसने दिया था यदेबेजा ॥
सोई आग लगा याद किया खिरमने खाली ।
आया है ज़मींपे वही जिबरूत जलाली ॥
पितरसको बनाया है जो इनसोंका शिकारी ।
और सारे जो शागिर्द लगे बातसो प्यारी ॥
इस आदतसे नफसकुशीसे हुए आरी ।
बेबंदगी दीदार न हो किबरिया बारी ॥
मूसाकी शरीअंतसे किया और है चाली ।
आया है ज़मींपे वही जिबरूत जलाली ॥
हर जानिब हर मुल्कमें तलवार चलाया ।
आपसमें मरें लड़के बिन आदमको गलाया ।
बाकी न रहे कोई सभी आग जलाया ।
घर घरमें नफाक उसने ही सब दिलको हलाया ॥
मा बेटी बहिन भाईमें आग अपनी सो डाली ।
आया है ज़मींपे वही जिबरूत जलाली ॥
कह और नहीं चोर चोरानेको मैं आया ।
कातिलहूँ मैं तलवार चलानेको मैं आया ॥
हर जानिबमें आग लगानेको मैं आया ।
पहचान मुझे भेड़ चुरानेको मैं आया ॥
आ मेरे पनह आदम सबका हूँ मैं पाली ।
आया है ज़मींपर वही जिबरूत जलाली ॥
हर चारतरफ गुल खिला और बाग बरोमन्द ।
दुःख द्रंद नहीं मानते हरजानिब आनन्द ॥
पहचान उसे खूब वदम अपनी फरहबन्द ।
पावे न पता आजिज दूढे कोई हरचन्द ॥
तस्वीर उसीकी है यह जो बागका माली ।
आया है ज़मींपर वही जिबरूत जलाली ॥
वेद तथा पुस्तकें स्पष्ट रूपसे प्रगट करती हैं कि, यह परमेश्वर आग है। जो कोई इस अग्नि परमेश्वरका पूजन करेगा सो बिना कृपाप्राप्तिके कैसे त्राण पासकता है। इस अग्नि परमेश्वर उसके अनुगामियोंने तीनों लोकमें आग लगा रखी है। जो कोई बड़ा भाग्यशाली हो बचे। षट्दर्शनका परमेश्वर और मूसाइयोंका परमेश्वर ईसाइयों और मुहम्मदियोंका परमेश्वर यही अग्नि है। सो बिना उपदेशके सत्यगुरुके उस अग्नि परमेश्वरको कोई पहचान नहीं सकता। जिस किसीने उसे न पहचाना तथा सत्यगुरुके वचनको न माना उसपर न जाने कौसी कठिनाई हुई। पहचानना उसीका उचित तथा यथेष्ट है जो कि, उसे पहचानकर उससे भाग जावे। फिर उस ओर पैर न रखे जहाँ कि, उसको जलानेवाली आग आ घरे। यह इसी मुसद्दसका भाव है।
पाँच तत्त्व और तीन गुणों द्वारा यह तीनों लोक भवसागर बसा हुआ है। जबलें पाँच तत्त्व तीनगुणसे मनुष्य पृथक् न हो तबलो कदापि छुटकारा न होगा। जब पाँच तत्त्व और तीन गुणोंसे पृथक् होना चाहेगा तब जीवनकी आशा नहीं। इसी कारण हजरत ईसाने इज्जीलमें कहा है कि, जो जीवितही मरेगा वो सदैवके निमित्त जी जावेगा।
मती १०-३८-जो कोई सलीब उठाकर मेरे पीछे नहीं आता वह मेरे योग्य नहीं।
मरक़स १०२१ सलीब उठाकर मेरे पीछे हो ले।
लुका ९-२३ अपनी सलीब प्रतिदिवस उठाकर मेरा अनुसरण करो।
रोमियों ६-६-मनुष्यता उसके साथ सलीबपर खिंचेगी।
इस पश्चिमदेशमें दो अपूर्ववक्ता प्रतिष्ठित और सर्वप्रिय हुए। प्रथम ईसा, दूसरे मूसा। ईसा तो स्वयम् निरंजनके अवतार हुए। मूसा विष्णुके साथ वैकुण्ठमें मानेगए।
योहन नबी।
योहन, जकरिया भविष्यद्वक्ताका पुत्र था। हजरत ईसाका कथन है कि, योहन्नासे श्रेष्ठ और कोई अनागतवक्ता नहीं हुआ। यह योहन्ना जभी माताके गर्भमें था, उसी समय वह आन्तरिक प्रकाशसे भर गया। यह मनुष्य रातदिन ईश्वरीयभयसे रोया करता था। यहाँलॉक, रोते रोते अशुचिह्व उसके गालोंपर पड़ गए, चमड़ेपर घाव पड़ गया। यह व्यक्ति वनमें रहा करता था टीडी मधु खाया करता था, बालोंका वस्त्र पहना करता था। इस योहनके मुसलमानी धर्मकी पुस्तकोंमें नबीयहि्या कहते हैं। उसके बाबमें बहुत कुछ लिखा है। यह
भगवान् विष्णुके विषयमें कबीरसाहिबके शब्द
योहन बपत्तिसम देता फिरता था । यह मनुष्य बनमें अधिक तथा नगरमें बहुत कम रहा करता था । इसकी शिक्षा तथा उपदेश प्रभाव शाली हैं । हीरोद बादशाहने उसको बंधनमें डाल दिया था, यह बड़ा उपदेशक था, एक स्त्रीको व्यभिचारके लिये उपदेश दिया, यह स्त्री उसकी बैरिन होगई, उसीकी सटसे योहन्ना मारा गया ।
मुहम्मद साहब ।
मुसलमान लोग मुहम्मद साहबको अन्तिम अनागतवक्ता समझते हैं । ये तीनों श्रेष्ठ भविष्यद्वक्ता हैं मूसा ईसा मुहम्मद इबराहीमकी संतान हैं मुसलमानोंकी पुस्तकमें लिखा है कि, इबराहीमसे लेकर मुहम्मदपर्यन्त इस घरानेमें चालीस सहस्र अनागतवक्ता होगए । कबीरजीके सांप्रदायी कहते हैं कि, मुहम्मद महादेवका अवतार है, महादेव भूत, प्रेत, जिन, परी, राक्षस, दैत्य इत्यादिका बादशाह है । देखो तवारीखमुहम्मदीमें । जब मुहम्मदसाहबने पृथ्वीपर अपना धर्म प्रचलित किया, उस समय सहस्रों जिन परी इत्यादि आपसे आप आकर मुहम्मद साहबके शिष्य होगए । सबोंने मुहम्मदी कलमः पढ़ा । यह मुहम्मद भूत प्रेतादिकके प्राचीन गुरु हैं । सुतरां तुलसीकृत रामायण बलकाण्डमें लिखा है, कि, जब शिवजीका विवाह राजा हिमालचलके घर हुवा, तब शिवजी जब विभूति रमाए सर्प इत्यादि गलेमें डाले बैलपर सवार होकर चले, उस समय ब्रह्मा, विष्णु, कुबेर, इन्द्र, वरुण आदिक देवता बड़े ठाठके साथ बन ठनकर बरातके साथ साथ चले । उस समय विष्णु महाराज जो बड़े हँसोड हैं हँसकर बोले कि, ए भाई ! समस्त देवताओ ! अपना अपना समाज लेकर पृथक् २ चलो । यह बात सुनकर समस्त देवतागण पृथक् २ होके चले । तब शिव अकेले रह गए । उस समय शिवजीने अपना शंख फूँका उसकी ध्वनि सुनतेही सहस्रों भूत प्रेत तथा जिन इत्यादि आनकर उनके चारों ओर एकत्रित होगए । शिवकी विचित्र बरात देखकर विष्णु तथा समस्त देवतागण हँसने लगे । पथमें बड़े बणे कौतुक होते चले । इसी प्रकार मुहम्मद साहबने जब मक्का नगरके बाहर जा, एक टीलेपर खड़े होकर हाँकें लगाई, तब सहस्रों जिन और परी इत्यादि आकर मुहम्मद साहबके शिष्य हुए । विष्णुके उपरान्त महादेव समस्त देवताओंकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं । सांसारिक वासनाओंपर आपकी श्रेष्ठ रुचि रहती है । महादेव तथा मुहम्मदका गुण एकही है । मार काट रक्तपात विनाश करनाही आपके धर्म हैं । सृष्टिके आरम्भमें शिवजीने भक्ति चलायी, मनुष्य जातिके गुरु बने, वही अन्तिम अनागतवक्ता हुए । संस्कृतमें महादेवजीका नाम महामदमय है ।
अर्थात् अत्यंत क्रोधी वही महासद अरबीमें मुहम्मद हुवा। यह महादेव वही है जिसने सृष्टिके आरंभकालमें पूजा तथा योगमुक्ति संसारमें प्रचलित की। भविष्य-पुराणमें इन्हें एक विप्रकुमार कहा है। जो कि, एक गोलोमके दूधमें पीजानेके कारण ऐसा बनना पड़ा था।
सत्यकबीर—आदिभक्त शिव योगी केली। राखी गुप्त न जगमें फेरी ॥
सांसारिक मनुष्योंको शिवजीने पूजा पाठकी वह युक्ति न बतलाई जिसको वे स्वयम् जानते हैं इसी प्रकार मुहम्मद साहबने अपना यथार्थ भेद किसी मुसलमान को न बतलाया, छिपा रक्खा।
मुहम्मद साहब अरबमें, शंकराचार्य भारतवर्षमें ये दोनों शिवजीके अवतार हैं। इसी शिव तथा विष्णुका धर्म समस्त पृथ्वीपर प्रचलित हुवा करता है। इन्हीं दोनोंका पूजन समस्त संसारमें होता है। ब्रह्माको कोई नहीं पूजता।
कबीर साहबका कथन है कि, एक लाख अस्सी सहस्र पीर पैगम्बर और सिद्ध साधु ऋषि मुनि होगाए हैं। जिन लोगोंने आकर पृथ्वीपर मनुष्योंको उपदेश दिया उनमेंसे कुछ महाशयोंका थोड़ा विवरण मैंने लिखा है। येही सब निरञ्जनके पुत्र तथा दोनों बातोंके माननेवाले हैं। कोई कोई महाशय जैन इत्यादिके समान हैं। जो वेदको नहीं मानते वे भी निरञ्जनके पञ्जेमें हैं। बाहर जानेका किसीको भी सामर्थ्य नहीं हो सकता।
इनमेंसे अनेक महाशय सदैव निर्गुण सगुणकी श्रेष्ठता प्रगट करते आए हैं। चार प्रकारकी मुक्ति और स्वर्ग नरकके दुःख सुख बतलाते आए हैं, इनमेंसे अनेकों को सत्य पुरुषकी भक्तिकी सुध रही है। इन लोगोंको छुटकारे और बंधनका ज्ञान तनिक नहीं बहुत कुछ हुवा है। समस्त मनुष्य वेद तथा पुस्तकोंको पढ़कर मस्त हो रहे। किसीने वेद और पुस्तकोंका वास्तविक तात्पर्य नहीं समझा, बहुत लोग अपनेको वेद और पुस्तकोंके विद्वान् समझते हैं। वह यथार्थमें व्यञ्जन और स्वर से भी अनभिज्ञ हैं। सभी मनुष्य स्वबुद्ध्यानुसार तथा अपने गुरुओंके शिक्षापर मनुष्योंको पथ बतलाते हुए सुकर्म सिखलाते चले आते हैं। परन्तु यह कोई नहीं बतलाता कि, यह पथ निरापत्ति है। यद्यपि समस्त उपदेशकोंका प्रण होता है सभी अपनी २ विद्या तथा बुद्धिके अनुसार लोगोंको मुक्तिका अभिलाषी बनाते हैं। जितने सिद्ध साधु और लिया भविष्यद्वक्ता पृथ्वीपर हुए तथा अब हैं सब निरञ्जन और विष्णु भगवानको परमेश्वर तथा निराकार बनाते आए हैं, पर विना तत्त्व समझे समस्त मनुष्य भटक भटककर चौरासीके बंधनमें पड़े। इनको क्या खबर कि, यथार्थ परमेश्वरकी सच्ची राह कौन है? अथवा किसके पूजनसे आवागमन
भगवान् रामचन्द्रजी महाराज
का बंधन कटता है ? वहाँका सम्बाददाता कोई न मिला कि, आगेको समाचार देवे, जिसकी कुछ सुध और पता ठिकाना वेदमें स्पष्टरीतिसे नहीं । इसकी सूचना तो बेही साधु देंगे जो उस देशके होंगे । दूसरेमें क्या सामर्थ्य है ?
ज्योतिःस्वरूपी अलख निरञ्जन प्रज्वलित प्रदीपके समान है । समस्त जीवधारी पतङ्गके सदृश हैं । यदि पतङ्गको इतनी बुद्धि और इतना ज्ञान हो कि, मैं इस प्रदीपपर गिर गिर जल मरूँगा तो व्यर्थही अपने प्यारे प्राणोंको क्यों नष्ट करे ? सब पतङ्ग अज्ञानता तथा मूर्खताके कारण जल जल कर इस ज्योतिमें अपने प्राण विसर्जित करते हैं । उन्होंने सच्चे सत्यगुरुको नहीं ढूँढ़ा । यदि वे ढूँढ़, कहना मानते तो निश्चय सदैव बंधनसे छूट जाते । सत्यगुरुका कहना न माना स्वेच्छानुसार कार्य किए इस कारण प्रदीपके पतङ्गके ढङ्ग सब जलकर भस्म हो गए । उनके गुरुओंने उन्हें धोखा धडी देकर मार लिया । भ्रांति भ्रांति के धर्म सिखलाकर समस्त संसारको मारा स्वयंभी मर गए । जिन गुरुओंने दूसरोंको सुपथसे भटकाया वे स्वयं उसी पथमें भटकते रहे । अंधकारमें पड़ गए । सांसारिक मनुष्योंका तो कुछ ठिकानाही नहीं । जिस वाक्य अथवा नामके प्रभाव से लोग अपनी मुक्ति समझते हैं वही वाक्य नाम प्रत्यक्षमें धोखा तथा कष्टके निमित्त रक्खा है । जिसको वे छुटकारा समझते हैं वही उनका बंधन है । लोग पूर्णतया अनभिज्ञ हैं कि, छुटकारा ये क्या है किस प्रकार है यदि जानते तो आपसे आप अपने ऊपर किस निमित्त आपत्ति उपस्थित करते ? इसी कारण ज्ञानके साथ उपासना करनेको विशेष महत्त्व दिया है ।
अध्याय १०.
विराट् पुरुषके पहिले अवतारवाला । सत्यपुरुष ।
विराट्पुरुषका चित्र स्थानान्तरमें बनाया गया है कि, इस विराट्पुरुषके पेटमें तीन लोक बसे हैं और इसी विराट्पुरुषको मैंने कालपुरुष, निरञ्जन, निराकार, निर्गुण, राम, अल्लाह, ओंकार इत्यादिका पहिला अवतार कहा । इस पुरुष की प्रशंसा चारों वेद समस्त पुस्तकें करती हैं । यही तीनों लोकके रचयिता तथा स्वामी हैं । यह विराट्के भी ऊपर आकाशमें बैठता है । नीचे आदिभवानी और उसके पेटके भीतर तीनों देवता, अर्थात् ब्रह्मा विष्णु शिव ये तीनों रहते हैं । इस सत्यपदार्थको किसीने नहीं पहचाना है । जिसका प्रथमावतार यह विराट् पुरुष है उसकी प्रशंसा चारों वेद किया करते हैं । देखो ऋग्वेदमें इस संबंधको लिये हुए १६ मंत्र हैं । यजुर्वेदके ३१ अध्यायमें बाईस मंत्र हैं । सामवेदमें उसके
तेरह मंत्र हैं और अथर्वणमें सात मंत्र हैं। वेदने इसी पुरुषको परमात्मा रचयिता और समस्त संसारका राजा कहा है।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहलाक्षः सहलपात् ।
सभूमि ठं. सर्वत स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशांगुलम् ॥ १ ॥
जो यह अनेकों शरीरोंवाला तथा अगणित ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियवाला विराट् दीख रहा है यह उसके स्वरूपसे भिन्न नहीं है। जिसके भीतर यह विराट् विलास कर रहा है वो इस जैसे शरीरोंमें नाभिसेबारह अंगुल ऊंचे हृदयमें विराजा हुवा है यद्यपि यहां खुलासा नहीं कहा है तथापि पांचवें मंत्रमें जो यह कहा है कि, "ततो विराडजायत" इससे मालूम होता है कि, विराट्का उत्पादक दूसरा ही है। अनेकों शिरपाद आदि विराट्में ही देखे जाते हैं, इस कारण यह पता चलता है कि, यहां कार्यमुखसे कारणका विचार चला है। भागवत आदि ग्रन्थोंमें भी यही लिखा है कि—'आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य' यानी, यह विराट् उसका पहिला अवतार है।
(२) मंत्र—यह समस्त परमेश्वरही संसार है जो कुछ बीत चुका वही है और जो कुछ होगा वही है। वही मोक्षका मालिक है। उसीकी कृपासे भोग भी मिल जाते हैं।
सायनाचार्य—जो कुछ भूतपूर्व था परमेश्वर था। जो कुछ अब है परमेश्वर है। इस समय भूतपूर्वकालकी शरीरें परमेश्वरही थीं। जो कुछ भविष्यत्कालमें होगा सब परमेश्वर है। वह समस्त देवताओंका देवता है। उस वस्तुसे जो लोग खाते हैं वही बढ़ रहा है। मायाके कारण वस्तुओंका स्वरूप और का और दीख पड़ता है। परन्तु प्रत्येक वस्तु परमेश्वर है। भोग मोक्ष भी उसीकी कृपासे होते हैं।
(३) मंत्र—संसारमें जो था जो है तथा जो होगा वो समस्त उसके तेजकी परछाई मात्र है। इससे पृथक् जो हम देखते हैं वही है। समस्त सृष्टि उसका एक चौथाई भाग है और शेषके तीन भाग आकाश मुक्तिस्थान सत्यलोकमें है जहां सत्य कबीर पहुँचाते हैं।
इस प्रकार समस्त मंत्रोंके साथ चारों वेद इसकी प्रशंसा बराबर करते हैं कि, तूही सबका रचयिता तथा भोजन पहुँचानेवाला है तुझसे पृथक् और दूसरा कोई नहीं है। इसीके अवतार विराट्की देहमें समस्त रचना समा रही है। इस विराट्हीके शरीरका नाम भवसागर है। वेदके किनारे पर तो विराट्पुरुष निर-ञ्जन बैठे हैं। लोकके किनारेपर आदि भवानी चौसठ लाख योगिनियोंकी सैन्य
पूरण ब्रह्म भगवान् कृष्ण
लिये राज्य कर रही है । तीनों शिकारी रज तम सत्त्व जाल लगाकर शिकार खेलते फिरते हैं । इसी विराट्के पेटमें कबीर साहब अपनी नाव लिये फिरते हैं । चारों युगसे बराबर पुकारते आते हैं कि, ए मनुष्यो मेरी नावपर सवार हो मैं तुमको पार उतारूँगा । कोई भाग्यवान दौड़कर उस नावपर सवार होता है । उसका बेडा पार होता है, समस्त मनुष्य इसी विराट्पुरुषकी पूजामें संलग्न रहते हैं । किसीको इस बातकी सुध नहीं कि, यह विराट्पुरुष कौन है । किसका अवतार है उसकी बंदनासे कौनसी श्रेणी प्राप्त होती है ! इस विराट् पुरुषका शरीर उनचास करोड़ योजनका है । उसका शरीरही यह भवसागर है । ग्रंथ कबीरवाणीमें कबीर साहब कहते हैं —
बारह पालग कूर्म शरीरा । षट् पालङ्ग देहधर्म धीरा ॥
धर्मधीरा और धर्मराय इत्यादि नाम इसी विराट्पुरुषके हैं ।
षट् अर्थात् छः पालङ्गका उनचास करोड़ योजन होता है । इतना बड़ा शरीर इस विराट्पुरुषका है । आकाश पाताल और मृत्युलोक इसके भीतर बसे हैं । चारों प्रकारकी मुक्ति इसके वशमें है जो कोई इस विराट्की आज्ञानुसार भलाईको उच्च श्रेणीपर पहुँचावे वह चारों मुक्ति संसार, धन, राज्य, और वैकुण्ठ इत्यादिका अधिकारी हो जाता है । जो कुछ विराट् पुरुषके शरीरमें है वही सब मनुष्य देहमें भी है । अतः प्रत्येक मनुष्योंका शरीर इसी विराट्पुरुषका शरीर है । यद्यपि उससे छोटी दिखाई देती है, जो कुछ विराट्में वही गुण ब्रह्माण्डके भीतर है । कुछ न्यूनाधिक नहीं । पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों कच्चे हैं । जबलों यह जीव कच्चा है कच्चे के साथ प्रेम कर रहा है तबतक पक्का पथ कैसे मिल सकता है ? यह पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनों ही झूठे हैं फिर यह झूठा जबलों झूठेसे प्रेम करता है तबलों सच्चेके साथ प्रेम कैसे उत्पन्न हो ? पर इसे भी सत्य पुरुषही समझ प्रेम किया जाय तो यह भी सत्यपुरुषकी ओर ही बढ़ाता है ।
इस विराट्पुरुषने अपना तेज प्रताप और गुण आदि भवानोंको दिए, विष्णुको दिये, राम और कृष्णको दिये और ईसाको भी दिये । सुतरां देवी भागवत में देखो ।
जब महामायाने अपना विराट् स्वरूप देवताओंको दिखलाया तब समस्त देवते औंधे मुँह गिर पड़े ।
शरीर और विराट्की एकता ।
रामचन्द्रने कागभुशुण्डको अपना विराट्रूप दिखलाया । देखो रायमंणमें लिखा है कि, जब कागभुशुण्ड अयोध्यामें गये तब रामचन्द्र छोटे बालक थे, दूध
भात खाते फिरते खेलते थे। कागभुशुण्ड रामचन्द्रके जूठे चावल जहाँ गिरते चुन कर खालिया करते थे। रामचन्द्रने कागभुशुण्डको अपना कौतुक दिखलाया। जब हंसकर अपना मुँह खोला तब कागभुशुण्ड रामचन्द्रके मुखमार्गसे पेटमें चले गये। उस पेटके भीतर चिरकालपर्यन्त घूमते रहे। जो कुछ बाहर दिखाई देता है। वही सब कौतुक भीतर दिखलाई दिया। तीनों लोकका कौतुक रामचन्द्र भगवान् के पेटके भीतर देखा। जब रामचन्द्रने खाँसा फिर पेटके बाहर निकल पड़ा। जब कागभुशुण्ड पेटके बाहर निकल पड़े तब रामचन्द्रको फिर देखा तो उसी प्रकार छोटे बालकके स्वरूपमें आँगनमें खेलरहे हैं दूधभात खाते फिरते हैं। रामचन्द्रके पेटमें कागभुशुण्डको सहस्रों वर्ष बीते तो भी एक पलभरसे विशेष नहीं था। ऐसाही कृष्णचन्द्रने जब छोटे बालक थे, बालकोंका यह नियम है कि, मिट्टी खाते हैं, जब यशोदाने यह देखा कि, कृष्ण छोटा बालक है, मिट्टी खारहा है। तब यशोदा मारने चलीं कि, तू मिट्टी न खा मना किया। तब कृष्णने अपना मुँह खोलकर दिखलाया कि, देख माँ ! मैंने मिट्टी नहीं खाई। जब कृष्णजीने मुँह खोला तब यशोदाने कृष्णके मुँहके भीतर तीनों लोकोंका कौतुक देखा। समस्त रचना पृथ्वीं आकाश सूर्य चन्द्र नक्षत्रादि सभी दिखाई दिये। यह कौतुक देखकर यशोदा अत्यंत अश्चर्यान्वित हुई कि, मेरे पुत्रके पेटमें यह कैसा आश्चर्यभय कौतुक दिखाई देता है।
ऐसाही अर्जुनको कृष्णजीने जब अपना विराट् स्वरूप दिखलाया तब अर्जुन औंधे मुँह गिरकर कहने लगे कि, ए कृष्ण ! मुझसे तुम्हारा यह स्वरूप देखा नहीं जाता, मैं भयभीत तथा कम्पित हूँ। तब फिर कृष्णने अपना यथार्थ स्वरूप दिखलाया। वह महाकालका स्वरूप छिपा लिया।
पश्चिमके महात्माओंको विराट् दर्शन।
फिर विष्णुने मूसाको अपना विराट्स्वरूप दिखलाया।
तूर नामक पर्वतपर मूसाने निवेदन किया कि, ऐ परमेश्वर ! दर्शन दे। तब आज्ञा हुई कि, तू देख न सकेंगा। फिर मूसाने निवेदन किया कि, ऐ परमेश्वर ! तू मुझे तू दर्शन दे उस समय वहाँ विराट् रूप उत्पन्न हुवा। जिसे देखकर मूसा औंधे मुँह गिर पड़े। उसको देख नहीं सके। फिर जब कृपा दृष्टि हुई तब मनुष्यके स्वरूप में आसमानी रङ्गके परमेश्वरने मूसाहारुं इत्यादिको दर्शन दिया। वे दर्शन पाकर परम आनन्दित हुए।
इसी प्रकार खरकैलनबीको नदी किनारेके तटपर विराट्पुरुषने दर्शनर दिया। देखतेही खरकैल औंधे मुँह गिर पड़े अचेत हो गये। फिर जब परमेश्वरकी
विष्णुके उपकार
कृपादृष्टि हुई तब परमेश्वरने अपना मानुषिक स्वरूप दिखलाया । तब खरकैलने देखा और वार्तालाप किया ।
ऐसाही ईसाने अपना विराट् रूप पोटर्स योहन्ना और याकूबको दिखलाया । जब मसीहने अपना तेज प्रगट किया । वह स्वरूप जो नितान्तही तेजमय और सूर्य के आकाशके सदृश जगमगाता था ऐसा स्वरूप जब दिखाई दिया तब पोटर्स, योहन्ना और याकूब मुँहके बल गिर पड़े । ईसूका वह तेज देख नहीं सके । फिर जब दया हुई तब ईसाने अपना पहिला स्वरूप प्रगट किया । उससे आपके शिष्यगण प्रसन्न हो गये ।
इस प्रकार जिस किसीको विराट्पुरुषका पूर्णतया ज्ञान हो गया वह स्वयम् विराट् स्वरूप हो गया । पिता और पुत्र सब एकही स्वरूप हैं । विद्या और कार्य के दोषसे ऊँचे नीचे भूतय तथा स्वासी बने हैं । जो पिता है सो पुत्र है और जो पुत्र है सो पिता है । जब पिता पुत्र मर गया तब आपही आप हैं ।
विराट्की उपासना ।
इस विराट्को साधुलोग शून्यमें देखते हैं । जब उसकी साधना करते हैं, तब समीप चला आता है तथा वार्तालाप करता है । तीनों कालका समाचार देता है । विराट्पुरुष साधनेसे सिद्ध कहलाता है । गुप्तबातोंको प्रगट करता है, परन्तु जब साधनेमें बाधा न उपस्थित हो तब कार्य पूर्ण हो ।
इस विराट्पुरुषसे सब कुछ उत्पन्न हुवा हैं । चार खानचौरासी लाख योनिके जीव सब इसी पुरुषने बनाए हैं । वेदपुस्तकें और समस्त साधन इसीसे हुये हैं । इस विराट् देहके सब जीव कीड़े हैं । समस्त साधन और सब सांसारिक तथा धार्मिक पदार्थ उसके शरीरके मल हैं सब उसके निर्मित किये हुए हैं । भला उसके शरीरके कीड़ोंमेंसे किसको सामर्थ्य है कि, उसको अधीन करके उसके मस्तकपर लात धर कर पार चला जावे । किसी ऋषि मुनि सिद्ध साधु और पीर पंजम्बरमें यह बल नहीं कि, इसके आगे हो जावे । उसपर श्रेष्ठता पावे । सबके सब उसके सेवक उसका भोजन हैं । यदि वह सत्यगुरु हाथ न पकड़े तो किसीको सत्यपुरुषका घर न मिले, चार स्थानसे बाहर कोई न जासके । मच्छर और मक्खीमें यह सामर्थ्य कहाँ है कि, उड़कर सातवें आकाशपर जो बैठे ? कदापि नहीं । चौरासी लाख योनिसे तो वही पार करे कि, जो स्वयम् उससे पार जानेका सामर्थ्य रखता हो । जो माली वाटिका लगाता है उसकी वाटिकामें जितने वृक्ष पौधे इत्यादि हैं उनमें मालीसे बढ़कर किसीमें विशेषता नहीं है । एक मिट्टीसे कुम्हार सहस्रों प्रकारके
८ अध्याय प्राचीन भक्त
वर्तन और मूर्त बनाता है। कुम्हारसे बढ़कर कोई वर्तन अथवा मूर्त नहीं हो सकती। कारणसे कार्य बढ़कर नहीं हो सकता है।
अतः इस विराट् पुरुषने समस्त संसारको बनाया है। उससे बढ़कर उसकी सृष्टि कदापि नहीं हो सकती। इस कारण समस्त ऋषि मुनि सिद्ध साधु इत्यादि सर्वे उसकी गुलामी किया करते हैं, तथा प्रशंसा किया करते हैं।
सत्य पुरुषका प्रतिपादक पुरुषसूक्त।
सहस्रशीर्षापुरुषःसहस्राक्षःसहस्रपात् ॥ सभूमि ठं. सर्वतःस्पृत्वात्यतिष्ठद्-
शांगुलम् ॥ यजुर्वेद अध्याय ३१॥ मंत्र १ ॥ नारायण ऋषिः निचूदाव्य-
नुष्ठन्दः पुरुषो देवता। सब लोगोमें व्यापक जो प्रधान सत्य पुरुष नारायण
सर्वात्मा होनेसे अनन्त शिर और पाँववाला, व्यष्टि समष्टि सबमें व्यापकर नामिसे
दश अंगुल परिमित हृदयदेशको अतिक्रमण कर अन्तर्यामी रूपसेस्थित हुवा।
पुरुषऽएवेदठं.सर्वयद्भूतं यच्चभाव्यम् ॥ उतामृतत्वस्येशानोयदत्रे नातिरोहति ॥
यजुर्वेद अध्याय ३१ ॥ मंत्र २ ॥ यह जो अतीत ब्रह्मसंकल्प जगत् है जो
भविष्यत् ब्रह्मसंकल्प जगत् है। जो जगत् बीज अन्न परिणामसे वृक्ष नर पशु
आदिकरूपको प्राप्त होता है वह मोक्षका स्वामी महानारायणही है क्योंकि,
उससे भिन्न कोई भी नहीं है। एतावानस्य महिमातोज्यायय्यांश्चपुरुषः ॥
पादोस्यविश्वाभूतानित्रिपादस्यामृतन्दिवि ॥ य० अ० ३१ ॥ मंत्र ३ ॥ इस
महानारायणकी विभूति इतनीही है ऐसा नहीं बल्कि यह नहीं चित्
आत्मा महानारायणका इस संसारसे अतिशय करके अधिक है इस कारण समस्त
ब्रह्माण्ड इस महानारायणका चौथा अंश है। सत्यलोकमें इस त्रिपातकास्वरूप
बिनाशरहित है जिस कारणसे अनन्त सत्य पुरुष परब्रह्मही अपने भागमें अपनी
ज्योतियोंमें महानारायणरूप हुवा। त्रिपादूर्ध्वऽउदैत्यूरुषःपादोस्येहाभवत्पुनः ॥
तत्रोविष्वङ् व्याक्रामत्साशनानशनने। अभि ॥ य० अ० ३१ मं० ४ ॥
यह त्रिपातमहानारायण प्रथम ब्रह्माण्डसे ऊपर उत्कर्षतासे स्थित हुवा
फिर इस महानारायणका चतुर्थीश संसार विषे व्याप्त हुवा मायाप्रवेशके अनन्तर
देव तिर्यक आदिरूपोंकरके अनेक प्रकारका हुवा चेतन (प्राणीमात्र) और
अचेतन (पर्वत नदी आदि) को देखकर उनमें व्याप्त हुआ तथा जड़ चेतन सबमें
घुस गया। ततो विराडजायत विराजोअऽधिपुरुषः ॥ स जातोऽअत्यरिच्यत
पश्चादभूमिमध्येपुरः ॥ यजुर्वेद अध्याय ३१ मंत्र ५ ॥ पश्चात् उस महानारा-
यणसे ब्रह्माण्डदेह तथा उस देहको अधिकरणकरके उसका अभिमानो विराट्
पुरुष अतिश्रेष्ठ उत्पन्न हुवा। वह विराट् पुरुष प्रथम भूमिको रचता भया