कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 417, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंका बंधन कटता है ? वहाँका सम्बाददाता कोई न मिला कि, आगेको समाचार देवे, जिसकी कुछ सुध और पता ठिकाना वेदमें स्पष्टरीतिसे नहीं । इसकी सूचना तो बेही साधु देंगे जो उस देशके होंगे । दूसरेमें क्या सामर्थ्य है ?
ज्योतिःस्वरूपी अलख निरञ्जन प्रज्वलित प्रदीपके समान है । समस्त जीवधारी पतङ्गके सदृश हैं । यदि पतङ्गको इतनी बुद्धि और इतना ज्ञान हो कि, मैं इस प्रदीपपर गिर गिर जल मरूँगा तो व्यर्थही अपने प्यारे प्राणोंको क्यों नष्ट करे ? सब पतङ्ग अज्ञानता तथा मूर्खताके कारण जल जल कर इस ज्योतिमें अपने प्राण विसर्जित करते हैं । उन्होंने सच्चे सत्यगुरुको नहीं ढूँढ़ा । यदि वे ढूँढ़, कहना मानते तो निश्चय सदैव बंधनसे छूट जाते । सत्यगुरुका कहना न माना स्वेच्छानुसार कार्य किए इस कारण प्रदीपके पतङ्गके ढङ्ग सब जलकर भस्म हो गए । उनके गुरुओंने उन्हें धोखा धडी देकर मार लिया । भ्रांति भ्रांति के धर्म सिखलाकर समस्त संसारको मारा स्वयंभी मर गए । जिन गुरुओंने दूसरोंको सुपथसे भटकाया वे स्वयं उसी पथमें भटकते रहे । अंधकारमें पड़ गए । सांसारिक मनुष्योंका तो कुछ ठिकानाही नहीं । जिस वाक्य अथवा नामके प्रभाव से लोग अपनी मुक्ति समझते हैं वही वाक्य नाम प्रत्यक्षमें धोखा तथा कष्टके निमित्त रक्खा है । जिसको वे छुटकारा समझते हैं वही उनका बंधन है । लोग पूर्णतया अनभिज्ञ हैं कि, छुटकारा ये क्या है किस प्रकार है यदि जानते तो आपसे आप अपने ऊपर किस निमित्त आपत्ति उपस्थित करते ? इसी कारण ज्ञानके साथ उपासना करनेको विशेष महत्त्व दिया है ।
अध्याय १०.
विराट् पुरुषके पहिले अवतारवाला । सत्यपुरुष ।
विराट्पुरुषका चित्र स्थानान्तरमें बनाया गया है कि, इस विराट्पुरुषके पेटमें तीन लोक बसे हैं और इसी विराट्पुरुषको मैंने कालपुरुष, निरञ्जन, निराकार, निर्गुण, राम, अल्लाह, ओंकार इत्यादिका पहिला अवतार कहा । इस पुरुष की प्रशंसा चारों वेद समस्त पुस्तकें करती हैं । यही तीनों लोकके रचयिता तथा स्वामी हैं । यह विराट्के भी ऊपर आकाशमें बैठता है । नीचे आदिभवानी और उसके पेटके भीतर तीनों देवता, अर्थात् ब्रह्मा विष्णु शिव ये तीनों रहते हैं । इस सत्यपदार्थको किसीने नहीं पहचाना है । जिसका प्रथमावतार यह विराट् पुरुष है उसकी प्रशंसा चारों वेद किया करते हैं । देखो ऋग्वेदमें इस संबंधको लिये हुए १६ मंत्र हैं । यजुर्वेदके ३१ अध्यायमें बाईस मंत्र हैं । सामवेदमें उसके