कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसका आधिक्य विशेष है । ब्रह्मा और चीन इत्यादि देशोंमें भरे हैं । योगी तथा संन्यासियोंके समान समाधि लगाते हैं । और बंदनामें डूब जाते हैं ।
शङ्कराचार्यजीका वृत्तान्त ।
शंकराचार्यजी ब्राह्मणके घरमें उत्पन्न हुए । लड़कपनहीसे आपमें बड़प्पन तथा श्रेष्ठताके चिह्न प्रगट थे । पढ लिखकर आप अच्छे पण्डित हुए योग साधन भी किया और अपने योग तथा विद्याबलसे प्रत्येक स्थानपर जाकर विजयी हुए । समासधर्म चलाया, वेदधर्मका भली भाँति प्रचार कराया । जैन तथा बौद्ध दोनोंके अप धर्मोंके भलीप्रकार पददलित किया । वेदधर्म तथा संन्यासी ब्राह्मणोंकी मर्यादा बढ़ाई । राजा अमिरुके मृतशरीरमें अपने योगबलसे घुसकर योगसिद्धि दिखाते हुए कोकशास्त्र पढा, कोकशास्त्रके पण्डित होकर मण्डनमिश्रकी स्त्रीको परास्त किया । उसके साथ बहुत विवाद हुवा । तब मण्डन और उसकी स्त्री दोनों शंकराचार्यके सेवक बन गए । बदरीनाथकी मूर्तिको गङ्गाभेंसे बहिर्गत करके स्थापित कर दिया । मूर्तिपूजाको प्रचलित किया । वेदान्तशास्त्रको भी उज्ज्वल किया । जैसे दत्तजीने वेदान्त, सिखलाया और फिर शिवलिङ्गकी पूजाका प्रचार किया, वही कार्य शंकराचार्यजीने भी प्रचलित रक्खा कि, मूर्ति-पूजा भी होती और 'एकं ब्रह्म द्वितीयं नास्ति' भी कहते । जिसका मन चाहे वह 'एकं ब्रह्म द्वितीयं नास्ति' कहा करे । ये बात उसकी इच्छापर रही । ये लोग विष्णु तथा शिव दोनोंको एक स्वरूप समझकर पूजते हैं । कुछ भी विभिन्नता नहीं जानते । यह शंकराचार्य शिवजीका अवतार है । वेदधर्मके स्थिर करनेके निमित्त हुवा है ।
रामानुजस्वामीका वृत्तान्त ।
रामानुजस्वामी शेषजी के अवतार थे । विष्णुकी आज्ञासे शेषजी अवतार लिया । केशव यज्वा ब्राह्मणके गृह जन्म लेकर वैष्णव धर्म पृथ्वीपर चलाया । वेदधर्म तथा ठाकुरपूजनका भली भाँति प्रचार किया । बडी धूम धामसे आपका धर्म पृथ्वीपर प्रचलित हुवा । भक्तमालमें आपका वृत्तान्त बहुत कुछ लिखा है । इस धर्मके लोग बहुत बचाव रखते हैं । यहाँ लो कि, अपने हाथकी पकाई हुई रोटी खाते हैं । ऐसा कि, किसी दूसरे अयोग्य मनुष्यकी परछाई पर्यन्त पड़ने न पावे । परदेके भीतर रोटी पकाते और खाते हैं । ये लोग शिवको ईश्वर नहीं मानते विष्णुकी मूर्तिका पूजन किया करते हैं । ये और रामानुजस्वामीकी श्रेष्ठता संसारमें प्रगट है । आपके लाखों शिष्य भारतमें हैं । कबीर साहिबभी इसी परंपरामें आजाते हैं ।