कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 413, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुसद्दस—वह आग जो पैदायशके पहले है पैदा ।
जब था नहीं कुछ शून्यमें थी हुई हवैदा ॥
उसहीके ऊपर आलम कुल होमया शैदा ।
बैजा है वही जिसने दिया था यदेबेजा ॥
सोई आग लगा याद किया खिरमने खाली ।
आया है ज़मींपे वही जिबरूत जलाली ॥
पितरसको बनाया है जो इनसोंका शिकारी ।
और सारे जो शागिर्द लगे बातसो प्यारी ॥
इस आदतसे नफसकुशीसे हुए आरी ।
बेबंदगी दीदार न हो किबरिया बारी ॥
मूसाकी शरीअंतसे किया और है चाली ।
आया है ज़मींपे वही जिबरूत जलाली ॥
हर जानिब हर मुल्कमें तलवार चलाया ।
आपसमें मरें लड़के बिन आदमको गलाया ।
बाकी न रहे कोई सभी आग जलाया ।
घर घरमें नफाक उसने ही सब दिलको हलाया ॥
मा बेटी बहिन भाईमें आग अपनी सो डाली ।
आया है ज़मींपे वही जिबरूत जलाली ॥
कह और नहीं चोर चोरानेको मैं आया ।
कातिलहूँ मैं तलवार चलानेको मैं आया ॥
हर जानिबमें आग लगानेको मैं आया ।
पहचान मुझे भेड़ चुरानेको मैं आया ॥
आ मेरे पनह आदम सबका हूँ मैं पाली ।
आया है ज़मींपर वही जिबरूत जलाली ॥
हर चारतरफ गुल खिला और बाग बरोमन्द ।
दुःख द्रंद नहीं मानते हरजानिब आनन्द ॥
पहचान उसे खूब वदम अपनी फरहबन्द ।
पावे न पता आजिज दूढे कोई हरचन्द ॥
तस्वीर उसीकी है यह जो बागका माली ।
आया है ज़मींपर वही जिबरूत जलाली ॥