भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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मुसद्दस—वह आग जो पैदायशके पहले है पैदा ।

जब था नहीं कुछ शून्यमें थी हुई हवैदा ॥

उसहीके ऊपर आलम कुल होमया शैदा ।

बैजा है वही जिसने दिया था यदेबेजा ॥

सोई आग लगा याद किया खिरमने खाली ।

आया है ज़मींपे वही जिबरूत जलाली ॥

पितरसको बनाया है जो इनसोंका शिकारी ।

और सारे जो शागिर्द लगे बातसो प्यारी ॥

इस आदतसे नफसकुशीसे हुए आरी ।

बेबंदगी दीदार न हो किबरिया बारी ॥

मूसाकी शरीअंतसे किया और है चाली ।

आया है ज़मींपे वही जिबरूत जलाली ॥

हर जानिब हर मुल्कमें तलवार चलाया ।

आपसमें मरें लड़के बिन आदमको गलाया ।

बाकी न रहे कोई सभी आग जलाया ।

घर घरमें नफाक उसने ही सब दिलको हलाया ॥

मा बेटी बहिन भाईमें आग अपनी सो डाली ।

आया है ज़मींपे वही जिबरूत जलाली ॥

कह और नहीं चोर चोरानेको मैं आया ।

कातिलहूँ मैं तलवार चलानेको मैं आया ॥

हर जानिबमें आग लगानेको मैं आया ।

पहचान मुझे भेड़ चुरानेको मैं आया ॥

आ मेरे पनह आदम सबका हूँ मैं पाली ।

आया है ज़मींपर वही जिबरूत जलाली ॥

हर चारतरफ गुल खिला और बाग बरोमन्द ।

दुःख द्रंद नहीं मानते हरजानिब आनन्द ॥

पहचान उसे खूब वदम अपनी फरहबन्द ।

पावे न पता आजिज दूढे कोई हरचन्द ॥

तस्वीर उसीकी है यह जो बागका माली ।

आया है ज़मींपर वही जिबरूत जलाली ॥