भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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भात खाते फिरते खेलते थे। कागभुशुण्ड रामचन्द्रके जूठे चावल जहाँ गिरते चुन कर खालिया करते थे। रामचन्द्रने कागभुशुण्डको अपना कौतुक दिखलाया। जब हंसकर अपना मुँह खोला तब कागभुशुण्ड रामचन्द्रके मुखमार्गसे पेटमें चले गये। उस पेटके भीतर चिरकालपर्यन्त घूमते रहे। जो कुछ बाहर दिखाई देता है। वही सब कौतुक भीतर दिखलाई दिया। तीनों लोकका कौतुक रामचन्द्र भगवान् के पेटके भीतर देखा। जब रामचन्द्रने खाँसा फिर पेटके बाहर निकल पड़ा। जब कागभुशुण्ड पेटके बाहर निकल पड़े तब रामचन्द्रको फिर देखा तो उसी प्रकार छोटे बालकके स्वरूपमें आँगनमें खेलरहे हैं दूधभात खाते फिरते हैं। रामचन्द्रके पेटमें कागभुशुण्डको सहस्रों वर्ष बीते तो भी एक पलभरसे विशेष नहीं था। ऐसाही कृष्णचन्द्रने जब छोटे बालक थे, बालकोंका यह नियम है कि, मिट्टी खाते हैं, जब यशोदाने यह देखा कि, कृष्ण छोटा बालक है, मिट्टी खारहा है। तब यशोदा मारने चलीं कि, तू मिट्टी न खा मना किया। तब कृष्णने अपना मुँह खोलकर दिखलाया कि, देख माँ ! मैंने मिट्टी नहीं खाई। जब कृष्णजीने मुँह खोला तब यशोदाने कृष्णके मुँहके भीतर तीनों लोकोंका कौतुक देखा। समस्त रचना पृथ्वीं आकाश सूर्य चन्द्र नक्षत्रादि सभी दिखाई दिये। यह कौतुक देखकर यशोदा अत्यंत अश्चर्यान्वित हुई कि, मेरे पुत्रके पेटमें यह कैसा आश्चर्यभय कौतुक दिखाई देता है।

ऐसाही अर्जुनको कृष्णजीने जब अपना विराट् स्वरूप दिखलाया तब अर्जुन औंधे मुँह गिरकर कहने लगे कि, ए कृष्ण ! मुझसे तुम्हारा यह स्वरूप देखा नहीं जाता, मैं भयभीत तथा कम्पित हूँ। तब फिर कृष्णने अपना यथार्थ स्वरूप दिखलाया। वह महाकालका स्वरूप छिपा लिया।

पश्चिमके महात्माओंको विराट् दर्शन।

फिर विष्णुने मूसाको अपना विराट्स्वरूप दिखलाया।

तूर नामक पर्वतपर मूसाने निवेदन किया कि, ऐ परमेश्वर ! दर्शन दे। तब आज्ञा हुई कि, तू देख न सकेंगा। फिर मूसाने निवेदन किया कि, ऐ परमेश्वर ! तू मुझे तू दर्शन दे उस समय वहाँ विराट् रूप उत्पन्न हुवा। जिसे देखकर मूसा औंधे मुँह गिर पड़े। उसको देख नहीं सके। फिर जब कृपा दृष्टि हुई तब मनुष्यके स्वरूप में आसमानी रङ्गके परमेश्वरने मूसाहारुं इत्यादिको दर्शन दिया। वे दर्शन पाकर परम आनन्दित हुए।

इसी प्रकार खरकैलनबीको नदी किनारेके तटपर विराट्पुरुषने दर्शनर दिया। देखतेही खरकैल औंधे मुँह गिर पड़े अचेत हो गये। फिर जब परमेश्वरकी

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