कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 422, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्तन और मूर्त बनाता है। कुम्हारसे बढ़कर कोई वर्तन अथवा मूर्त नहीं हो सकती। कारणसे कार्य बढ़कर नहीं हो सकता है।
अतः इस विराट् पुरुषने समस्त संसारको बनाया है। उससे बढ़कर उसकी सृष्टि कदापि नहीं हो सकती। इस कारण समस्त ऋषि मुनि सिद्ध साधु इत्यादि सर्वे उसकी गुलामी किया करते हैं, तथा प्रशंसा किया करते हैं।
सत्य पुरुषका प्रतिपादक पुरुषसूक्त।
सहस्रशीर्षापुरुषःसहस्राक्षःसहस्रपात् ॥ सभूमि ठं. सर्वतःस्पृत्वात्यतिष्ठद्-
शांगुलम् ॥ यजुर्वेद अध्याय ३१॥ मंत्र १ ॥ नारायण ऋषिः निचूदाव्य-
नुष्ठन्दः पुरुषो देवता। सब लोगोमें व्यापक जो प्रधान सत्य पुरुष नारायण
सर्वात्मा होनेसे अनन्त शिर और पाँववाला, व्यष्टि समष्टि सबमें व्यापकर नामिसे
दश अंगुल परिमित हृदयदेशको अतिक्रमण कर अन्तर्यामी रूपसेस्थित हुवा।
पुरुषऽएवेदठं.सर्वयद्भूतं यच्चभाव्यम् ॥ उतामृतत्वस्येशानोयदत्रे नातिरोहति ॥
यजुर्वेद अध्याय ३१ ॥ मंत्र २ ॥ यह जो अतीत ब्रह्मसंकल्प जगत् है जो
भविष्यत् ब्रह्मसंकल्प जगत् है। जो जगत् बीज अन्न परिणामसे वृक्ष नर पशु
आदिकरूपको प्राप्त होता है वह मोक्षका स्वामी महानारायणही है क्योंकि,
उससे भिन्न कोई भी नहीं है। एतावानस्य महिमातोज्यायय्यांश्चपुरुषः ॥
पादोस्यविश्वाभूतानित्रिपादस्यामृतन्दिवि ॥ य० अ० ३१ ॥ मंत्र ३ ॥ इस
महानारायणकी विभूति इतनीही है ऐसा नहीं बल्कि यह नहीं चित्
आत्मा महानारायणका इस संसारसे अतिशय करके अधिक है इस कारण समस्त
ब्रह्माण्ड इस महानारायणका चौथा अंश है। सत्यलोकमें इस त्रिपातकास्वरूप
बिनाशरहित है जिस कारणसे अनन्त सत्य पुरुष परब्रह्मही अपने भागमें अपनी
ज्योतियोंमें महानारायणरूप हुवा। त्रिपादूर्ध्वऽउदैत्यूरुषःपादोस्येहाभवत्पुनः ॥
तत्रोविष्वङ् व्याक्रामत्साशनानशनने। अभि ॥ य० अ० ३१ मं० ४ ॥
यह त्रिपातमहानारायण प्रथम ब्रह्माण्डसे ऊपर उत्कर्षतासे स्थित हुवा
फिर इस महानारायणका चतुर्थीश संसार विषे व्याप्त हुवा मायाप्रवेशके अनन्तर
देव तिर्यक आदिरूपोंकरके अनेक प्रकारका हुवा चेतन (प्राणीमात्र) और
अचेतन (पर्वत नदी आदि) को देखकर उनमें व्याप्त हुआ तथा जड़ चेतन सबमें
घुस गया। ततो विराडजायत विराजोअऽधिपुरुषः ॥ स जातोऽअत्यरिच्यत
पश्चादभूमिमध्येपुरः ॥ यजुर्वेद अध्याय ३१ मंत्र ५ ॥ पश्चात् उस महानारा-
यणसे ब्रह्माण्डदेह तथा उस देहको अधिकरणकरके उसका अभिमानो विराट्
पुरुष अतिश्रेष्ठ उत्पन्न हुवा। वह विराट् पुरुष प्रथम भूमिको रचता भया