कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 423, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतिसके अनंतर देव मनुष्य आदिकोंके शरीरोंको बनाया ॥ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः
सम्भूतंपृषदाज्यम ॥ पशूस्तौश्चक्रेवायव्यानारण्याग्राम्याश्चये ॥ य० अ० ३१
मंत्र ६ ॥ महानारायणसे दधिभिश्च आज्य (घृत) अथवा प्राण संपादन किये तैसे
ही वह महानारायण वायु अथवा प्राण हैं देवता जिनके ऐसे जो हरिण आदिक
वनपशु हैं अथवा आरण्यकांडसंबंधी इंद्रियें हैं तिनको और ग्राममें होनेवाले अश्व-
आदिक पशु अथवा प्रवृत्तिमार्गसंबंधी इंद्रियोंको उत्पन्न करते भये ॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतऽऋचःसामानि जज्ञिरे ॥ छन्दाऽऽसिजज्ञिरेतस्माद्यजुस्तस्मा-
दजायत ॥ य० अ० ३१ मंत्र ७ ॥ पश्चात् उस यज्ञपुरुष (महानारायण)
से साम (सामवेद) उत्पन्न हुवा उसके पीछे महानारायणसे छंद उत्पन्न हुए
उसके अनंतर महानारायणसे यजुष् (यजुर्वेद) उत्पन्न हुआ ॥ तस्मादशवाऽअ-
जायन्तयेकेचोभयादतः ॥ गावोहजज्ञिरेतस्मात्तस्माज्जाताऽअजावयः ॥ य०
अ० ३१ मंत्र ८ ॥ अश्व और अश्वोंसे अतिरिक्त जोगर्दभ आदिक और
खर्रचर हैं वे सब उत्पन्न हुए जो ऊपर नीचे दातोंवाले पशु हैं वे भी उत्पन्न हुए ।
तिस महानारायणसे गौवें उत्पन्न हुई बकरों व भेड़ भी उसी से उत्पन्न हुई ॥
तंयजम्बर्हिषिप्रौक्षन्पुरुषज्जातमग्रतः ॥ तेनदेवाऽअयजन्तसाध्याऋषयश्चये ॥
य० अ० ३१ मंत्र ९ ॥ जो साध्य देवता व सनकादिक ऋषि हैं वे सृष्टिसे
पूर्व उत्पन्न हुए उस यज्ञके साधनभूत विराट्पुरुषको अपने लोकमें प्रोक्षणआदि
संस्कारों करके संस्कृत किया और उस विराट्पुरुषरूप पशुद्वारा मानस योग
निष्पादन (सिद्ध) किया ॥ यत्पुरुषव्यदधुःकतिधाव्यकल्पयन् ॥ मुखडिकमस्या-
सीत्किम्बाहू किमूरूपादाऽउच्यते ॥ य० अ० ३१ मंत्र १० ॥ प्रश्न-महानारा-
यणसे प्रेरित हुए महत् अहंकार आदिसे विराट्पुरुषको उत्पन्न किया उस
समयसे कितने प्रकारोंसे अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ की इस विराट्पुरुषके मुख
क्या हुवा ? बाहु क्या हुए, तथा ऊरू (जंवा) क्या हुए और पाद (पावें)
क्या था ॥ ब्राह्मणोऽस्यामुखमासीद्वाहुराजन्यः कृतः ॥ ऊरूतदस्यायद्वैशः
पद्मच ॐशूद्रोऽअजायत ॥ य० अ० ३१ मंत्र ११ ॥ उत्तर-इस विराट्पुरुषके
मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुवा, भुजाओंसे क्षत्रिय उत्पन्न हुवा, ऊरू (जंघाओं) से
वैश्य उत्पन्न हुवा, पावोंसे शूद्र उत्पन्न हुवा ॥ चन्द्रमामनसोजातश्चक्षोऽसूर्योऽ-
अजायत ॥ श्रोत्राद्वायुश्चप्रणश्चमुखादग्निर जायत ॥ य० अ० ३१ मंत्र १२ ॥
और विराट्पुरुषके मनसे चंद्रमा उत्पन्न हुवा, नेत्रोंसे सूर्य उत्पन्न हुवा, कानोंसे
वायु और प्राण उत्पन्न हुए, मुखसे अग्नि उत्पन्न हुवा ॥ नाभ्याऽआसीदन्त-
रिक्ष ॐशीर्षागोऽधौः समवर्तत ॥ पद्मचाम्भूमिदिशः श्रोत्रात्तथालोकां ॥ २ ॥