भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

उपदेश, अंग्रेजी वर्णमाला

कच्चे होना ।

जब इसने अपनी सुन्दरताका विचार किया तो इसको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ यह आनन्दमें निमग्न हो गया । अपने शरीरकी भी सुधि जाती रही । अपनी देहकी सुधि भूलनेसे असली देह पलट गई, पक्कीसे कच्ची हो गई । तत्व प्रकृति सब बदल गये, अर्थात् धैर्यसे आकाश उत्पन्न हो गया । शीलसे अग्नि, विचारसे जल, दयासे वायु और सत्यसे पृथिवी हो गई । इसी तरह पक्के गुणोंसे कच्चे गुण होगये, फिर तो पच्चीस प्रकृति आदि कच्चे आकारका प्रादुर्भाव हुआ । जीवको कच्ची देह मिलतेही भ्रममें पड़ गया । इसी भ्रमको धारण करके वेद शास्त्र आदि वर्णित सच्चिदानन्द कैवल्य भूमिपर अधिष्ठित होकर सारे संसारका अधिष्ठाता एवं हर्त्ता कर्त्ता और स्वामी हुआ ।

मायासे संयोग – जिस समय देहकी ज्योति प्रभाव और प्रकाशको देखकर आनन्दमें बसुध होनेके बाद फिर सचेत होतेही इसने आँख उठाकर देखा । दृष्टिसे देखतेही इसे अपनी छाया शून्यमें देख पड़ी, वही स्त्री स्वरूप होकर इसके निकट आई दोनोंका संयोग हुआ इसीको माया और ब्रह्म का संयोग कहते हैं, इसीसे समस्त संसारकी रचना हुई, इसी सच्चिदानन्द ब्रह्मकी समस्त संसारमें पूजा और भक्ति होती है ।

पतन – जीवसे अहंकार उत्पन्न हुआ यह जानने लगा कि, सब मैंही हूँ । फिर स्वाभाविक “एकोऽहं बहुस्याम्” की फुरना उठी, इसी ब्रह्म सच्चिदानंदकी बात सब वेद शास्त्र, किताब, कुरान आदि करते हैं पर इसके यथार्थ स्वरूपको स्वसम्बेदके अतिरिक्त दूसरा कोई भी नहीं जानता । यह सच्चिदानन्द ब्रह्म स्वयं बन्धनमें है । जबसे यह जीव अपने सत्य स्वरूपसे गिरा तबसे बहुत प्रकारके स्वरूप पाये और इसकी अवस्ति ही होती गई जबसे इसको अहं फुरता है तभीसे यह नीचेकी ओर गिरता जाता है । जबसे यह सूक्ष्मसे स्थूल देहमें आया, तबसे अनन्त भ्रममें पड़ गया उसी अवस्थामें वेद किताब ग्रन्थ आदि वाणी बनायी, जिनका कि, कुछ पारावारही नहीं । जब सर्वोत्कृष्ट मनुष्य शरीरको प्राप्त हुआ, तो नाना प्रकारके मत मतान्तरोंकी स्थापना की । ब्रह्म, जीव, माया, सब कुछ ठहराया । योग समाधि और नवधा भक्ति आदि नानाप्रकारके उपाय और युक्तियोंसे इसी ब्रह्मके पदको प्राप्त करता है, फिर नीचे गिर जाता है । जब कभी भाग्य उदय होता है। सद्गुरु पर पूर्ण श्रद्धा होती है तब सत्यगुरुकी दया होती है । तभी यह सत्य पन्थका अधिकारी होता है उसी समय यह ज्ञान प्राप्तकर इस ब्रह्म सच्चिदानन्दसे सम्बन्ध छोड़ सत्य पदको प्राप्त हो सर्वदाके लिये आवागमनका सम्बन्ध नाशकर, सच्चे आनन्दके पदपर स्थित होता है ।

इसी सच्चिदानन्द ब्रह्मकी समस्त संसार कथा करता है, सारा संसार इसीमें उत्पन्न होता, स्थित रहता और नाश हो जाता है। यह सच्चिदानन्द इस जीवका केवल भ्रम मात्र है, यह जीव भ्रमकोही ब्रह्म मानकर उसकी भक्ति और पूजा करता है। इसीके भ्रमने इसको अधा कर रखा है। सच्चे सन्त और गुरुकी सेवा बिना इसका छुटकरा होना असम्भव है; जैसे कस्तूरी मृग, अपनी कस्तूरीके सुगन्धको दूसरे पदार्थोंमें जानकर इधर उधर घासोंको सूँघता फिरता है, महान कष्ट उठाता है, पर जबतक अपनी कस्तूरीको नहीं पहचानता तब तक वैसेही घूमा करता है।

उन्नति और अवनतिके कारण — जब यह एकसे अनेक होता है तब अज्ञानी हो जाता है, जब अद्वैतकी ओर मुख फेरता है आत्मज्ञानके लिये प्रयत्न करता है, तो इसमें ज्ञानका प्रकाश आजाता है संसार लय हो जाता है। क्योंकि, जिसकी ओर ध्यान न होगा वह अवश्यही नाश हो जावेगा। सन्त लोग इसी कारण बाहर की वृत्तियोंका निरोधकर अन्तरमुखी वृत्ति करलेते हैं। जिस प्रकार कछुआ अपने हाथ पाँवको समेटकर एक जगह बैठ जाता है, उसी प्रकार सन्त लोग अपनी वासनाओंका निरोधकर ब्रह्मपदमें बैठ जाते हैं समय पाकर कछुआके समान हाथ पाँवोंको बाहर निकालते हैं संकल्प करके सृष्टि रचते हैं। इसी प्रकार अनन्त वार हुआ करता है। जबतक वासनाका बीज नष्ट नहीं होता जबतक जीव सूक्ष्मसे स्थूल स्थूलसे सूक्ष्म हुआ करता है। यह सर्वदा अपने कम्मोंके वश हो कभी ऊपर और कभी नीचे आता है, कभी मध्यमें लुढ़कता हुआ ठोकरें खाता फिरता है। जब यह अन्तिम देह स्थूल शरीर पाकर उत्तम कम्मोंसे ईश्वरकी भक्तिमें प्रवृत्त होता है, तो पुनः शनैः शनैः ऊपरको चढ़ जाता है। जब यह अशुभ कम्मोंकी ओर झुकता है तो चौरासी योनियोंमें भटकता हुआ विकल और दुःखित रहता है।

तत्त्वमसिका अर्थ — जब यह प्रथम अपने सत्यस्वरूपसे गिरा, “तत्त्वमसि” में इसने अपना घर बनाया, यह “तत्त्वमसि सामवेदका महावाक्य है। तत्त्के अर्थ ईश्वर और त्वं—जीवको कहते हैं—असि—दोनोंका एकता करने वाला ब्रह्मपद है। तत्—पद जैसे समुद्र—त्वं—पद जैसे कुवा और तालाब आदि और असि—पद जैसे दोनोंमें जल। तत्—पद—ब्रह्म अविनाशी ज्ञानी और पूर्ण है। त्वं पद जीव नाशमान और अल्पज्ञ है। असि—पद शुद्ध ज्ञान स्वरूप है

खण्डन — ये दोनों उपाधि छूटे तो आत्मा जैसेका तैसा हो। ये तीनों पद वेदने ठहराये हैं, इन्हीं तीनों पदोंमें सब जीव फँस रहे हैं। आगेकी सुधि किसीको भी न मिली, इसी तीनों पदोंतक संसारका ज्ञान है। अरब और फारस आदिकके

पेगम्बर आदि यहांही तक पहुँचे हैं। हक्कुल यकीन — और मारफतका पद भी यही है। ज्ञानीके लिये किसी प्रकारका आवर्ण नहीं सब ब्रह्मका प्रकाश है। ज्ञानी को किसी प्रकारकी रक्षावट नहीं जहां देखो वहां वही उपस्थित है। जीव विचारा अज्ञानके कारण बंध रहा है, इसे अज्ञानके अंधेरेमें कोई राह नहीं सूझती। इस अवस्थामें यह एक द्वारसे बाहर हो सकता है, वह द्वार शास्त्र है, शास्त्रके बिना कोई मार्ग नहीं मिलता। शास्त्र माताके दूधके समान है; जिस समय बालक दूध पीता होता है वह केवल अपनी माँके स्तनोंसेही दूध पीना जानता है उसको दूसरी कोई युक्ति नहीं सूझती, जब वही बालक अपनी अवस्थाको पहुँचता है तो स्तनों का कुछ काम नहीं पड़ता, अपने आप अपनी शरीर यात्राका उपाय कर लेता है। इसी प्रकार यह जीव दूधपी वा बच्चेके समान है और ईश्वर युवकके समान। जीव और ईश्वर दोनों आवरण और विशेष शक्तियोंमें बंधे हैं। जीव अल्पज्ञ है, ईश्वर सर्वज्ञ है, विद्या और अविद्यामें दोनों बंधे हैं। यह जीव नाना प्रकारके प्रयत्न और युक्तियोंसे ईश्वर हो जाता है, ईश्वर अपनी भूलसे जीव हो जाता है। इसका कारण ब्रह्म और जीव दोनों एकही बात है, ब्रह्म बिना जीव नहीं, जीव बिना ब्रह्म नहीं। जब ब्रह्मके पदपर स्थित हो जाता है—तो सृष्टिका कर्ता हर्त्ता कहलाता है, इसी पदतक इसकी पहुँच है, यही जीवन मोक्षका पद है। अपने उपायों और युक्तियोंसे ज्ञानानि को उठाता है ज्ञानाग्नि प्रगट होकर कम्मेंके बनको जला देती है। वह आग बहुत प्रबल होता है, जिस प्रकार लाल अंगारा अपनी चमक दमकमें एकही होता है पर अंगारेकी अग्नि शनः शनः ठण्डी होती जाती है, अन्तमें पूर्ण ठण्डी हो जाती है। इसी प्रकार यह जीव ब्रह्मपदको प्राप्त करके भी फिर जीव पदको प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार बारम्बार जीवसे ब्रह्म और ब्रह्मसे जीव हुआ करता है। कभी लाभ और कभी हानि उठाया करता है, इसको कभी सुख नहीं मिलता। ज्ञान प्राप्त होनेपर नाममात्रके लिये जीवन्मुक्त कहते हैं, सर्वदा वन्धनमें रहे उसको जीवन्मुक्त कहनेसे क्या फल? वह तो सर्वदा जीव-नबन्ध है। इस हेतु “तत्त्वमसि” के उक्त तीनों पद भ्रम और धोखा है। क्योंकि उसे स्थिरता नहीं है। कभी होता है कभी जाता है।

जीवन्मुक्त तथा विदेहमुक्त — इस प्रकार जीवन्मुक्त और विदेह मुक्त केवल इस जीवका भ्रम मात्र है। इस जीवन्मुक्तका वृष्टान्त ऐसा समझना चाहिये कि, जैसे एक बन्दरको जङ्गीरमें बाँससे बाँध देते हैं, कभी वह बाँसके ऊपर चढ़ता है, कभी नीचे उतर आता है, इसी प्रकार जीवन्मुक्त अपने कम्मेंके बन्धनमें बाँधा हुआ कभी ब्रह्मपदको प्राप्त होता है, कभी नीचे गिर जाता है। जब यह नीचेसे

साधुओंके हंसनेवाले

ऊपरको जाता है तो भली प्रकार दृष्टि करके अपनी छायाको देखता है अज्ञान वश उसको अपना स्वरूप समझता है। यद्यपि वह उसकी छाया नहीं होती तथापि अपने ज्ञानके जोरसे अपना स्वरूप जान तदाकार हो जाता है अपनेको परमानन्द समझने लगता है। उसके ज्ञानमें जो अभीतक अन्धकार शेष है उससे यह बेसुध है। वही अन्धकार अविद्या उसके आवागमनका बीज है। जबतक अविद्या नष्ट न होगी तबतक वह अपने भ्रमको ही अपना स्वरूप समझता रहेगा। उसी भ्रमको ब्रह्म बोलते हैं, उसी भ्रममें समस्त संसार बन्धा है, उसीसे जगत्की उत्पत्ति हुई है। यह संसार भ्रमरूप है, इसकी जीवके भ्रमसे ही उत्पत्ति है। जीवही भ्रमसे एकसे अनेक और अनेकसे एक होता है। आदिमें केवल एक जीव था दूसरा कोई नहीं था, उसीसे अनन्त सृष्टि हो गई। एक वीर्यमें अनन्त वीर्य हैं। एक ब्रह्मसे अनन्त ब्रह्म हो गये। पहले एक ब्रह्म प्रगट हुआ उसीसे समस्त भ्रमरूप संसारका प्रादुर्भाव हुआ। वही भ्रम समस्त संसारकी माता है, उसीसे उत्पत्ति और लय हैं। वही जगत्का ईश्वर और कर्त्ता कहलाता है, समस्त संसारमें उसीकी भक्ति होती है। भ्रमकी भक्ति करनेसे कुछ फल नहीं मिलता, नर्क स्वर्ग और मोक्ष सब कुछ भ्रम मात्र है, जिन्होंने तत्त्वमसिके तीनों पदोंको जान लिया उनको यह सब है। भ्रमकी भक्ति करनेसे कुछ फल नहीं मिलता, नर्क स्वर्ग और मोक्ष सब कुछ भ्रम मात्र है, जिन्होंने तत्त्वमसिके तीनों पदोंको जान लिया उनको यह सब तुच्छ जान पड़ता है। इस कारण वे उनके लिये प्रयत्न नहीं करते।

भ्रम ब्रह्म — जब स्त्री गर्भवती होती है तो उससे बालक उत्पन्न होता है गर्भका रहना जोड़े बिना नहीं हो सकता। बीज ही शेष न रहा तो बालक किस-प्रकार उत्पन्न होगा। यदि जीवनमुक्तको वह ज्ञान प्राप्त होता जिससे कि आवागमनका मूलही न रहे तो उनका आवागमन क्यों न छूटेगा?। जबतक बीज हैं तबतक वृक्ष होगा, डाल, पात, फल, फूल आदिककी आशा रहेगी। भ्रमहीकी दशामें जीव 'तत्त्वमसि' के पदको सत्य मान रहा है। इसको उसके ऊपर विश्वास हो रहा है इसलिये उसको सत्य करके मानता है। यह साधारण नियम है कि, मनुष्यकी बुद्धि जिस बातको स्वीकार करलेती है उसीको वह सत्य मान बैठता है। झूठ हो अथवा सच्चे जिसपर मनुष्य विश्वास कर लेता है वह झूठ भी सचही देख पड़ता है। यदि किसी बातको न माने तो उसकी दृष्टिमें झूठही है, जैसे किसी दरिद्रीका नाम राजा रखदिया तो वह कदापि राजा नहीं हो सकता, वह तो यथार्थ में दरिद्रीही है। इस जीवने भी भ्रमकी दशामें जो कुछ निश्चय किया है वह भ्रमरूप ही है, इसी कारण सब जीवनमुक्त वासनामें बंधे आधीन रहते हैं। जो

सूठ साँचकी एकता, मायाही रामबनी

लोग स्वयं बन्धनमें पड़े हैं उनकी उपदेशसे किस प्रकार मुक्ति हो सकती है ? कीचड़से कीचड़ नहीं धोया जा सकता, कीचड़ धोनेके लिये पानी चाहिये । ऐसेही बन्धनसे छूटनेके लिये पारखगुरुके उपदेशकी आवश्यकता है, जिससे कि आवागमनका बीज नष्ट हो जाता है । इस जीवने असत्यको सत्य मान लिया है इसी कारण झूठका सत्य देख पड़ता है ।

दृष्टान्त—एक गांवमें किसी स्त्रीका पति मर गया था । वह सती होने चली स्मशानमें पतिकी चितापर बैठ गई तब आग लगा दी गई । संयोग वश उसी समय प्रबल आंधी आई, मृतकके साथ आये हुये लोग भाग गये । आगकी गर्मी बढ़ी स्त्री चितासे उतरकर एक झाड़ीमें छिप गई थोड़ी देर बाद अंधेरीके बीत जानेपर झाड़ीसे निकलकर किसी दूसरे नगर चली गई । उसमें पहुंचकर किसी पुरुषके साथ रहने लगी, जिससे उसके कई लड़के लड़कियाँ उत्पन्न हुईं ।

अब उधरका हाल सुनो । जब अन्धडके बीत जानेपर घरके लोग आये लकड़ियोंको जला देखकर अनुमान करलिया कि, वह सती होगई । चिताकी राख जमाकरके उसपर मकान बना दिया । अब सतीचोराकी पूजा होने लगी, लोग मन्त्रत मनाने लगे, बहुतोंकी इच्छाएँ पूर्ण भी हुईं, इसी प्रकारका सतीकी पूजा दिन दिन बढ़ने लगी । कई वर्ष बीतनेपर उस स्त्रीके मायकेका एक मनुष्य उस नगरमें गया उसको शिरपर पानीका घड़ा, गोदमें लड़का और दूसरे लड़केको उँगली पकड़ाये हुये जाते देखा । आदमीने उसको देखकर पहचान लिया उसका नाम लेकर पुकारा । वह खड़ी होगई, उस पुरुषने उसका नाम पूछकर पूरा निश्चय कर लेनेपर कहा कि, यदि तू तो सती होगई थी, यहां किस प्रकार आगई ? उसने लज्जित होकर कहा कि, यदि तू मेरा समाचार मेरे घरके लोगोंसे न कहे तो मैं अपना सारा हाल सुनाऊँ । उसने किसीसे न कहनेका वचन दिया । स्त्रीने अपना सारा हाल कह सुनाया. कहा कि, मैं इस नगरमें एक पुरुषके साथ रहती हूँ, उसीसे यह दो सन्तानें उत्पन्न हुई हैं, यह बात सुनकर वह गांवमें आकर सबसे कहने लगा । शनैः शनैः उस स्त्रीके मँके और समुरारवालोंने भी यह समाचार जान पाया, वहांसे कुछ लोग आकर उसको देख गये । तबसे उस सतीकी पूजा छोड़ दी गई, लोगोंकी मन वाञ्छित पूरी होनी बन्द होगई । जबतक लोगोंका विश्वास सतीमें था तबतक सब कुछ था । जब विश्वास हट गया कुछ भी न हुआ ।

इसी प्रकार यह तत्त्वमसि है इसके तीनों पदोंमें जीवोंने अपना विश्वास दृढ़ कर लिया है इनको इसीका विश्वास सत्य होकर भासता है दूसरी बात नहीं है ।

पहिले पुरुष

ज्ञानके साधन ।

सम, सन्तोष, विचार और सत्संग ये चारों मुक्तिके पौरिये हैं । जो इनको धारण करेंगे उनको सब कुछ प्राप्त होगा । इनसे अन्तःकरण शुद्ध होता है अन्तः-करणके शुद्ध होनेसे सब कुछ शुद्ध हो जाता है, इन बिना किसीको भी मुक्ति मार्ग नहीं मिल सकता । इन्हींसे मनुष्य विचार करता है, मेरे गुरुकी कहाँतक पहुँच है ? उसमें मुझे मुक्त करनेकी सामर्थ्य है वा नहीं ? वह किस देवताकी भक्ति बतलाता है ? उसकी सामर्थ्य कहाँतक है ? जो लोग अपनेको ब्रह्म कहते हैं उनमें ब्रह्म का कुछ लक्षण है या नहीं ? यदि कोई किसी पदार्थ को कपूर बतलावे उसमें कपूरकोसी सुगन्धि न हो, उसके समान गुण भी न हों तो उसे किसी प्रकार भी कपूर नहीं कह सकते । यह जीव अपने बन्धनके लिये आपही जाल रचता है उसमें आपही फँसकर मर जाता है । जो मनुष्य मनुष्यत्वको न धारण करे उसमें मनुष्यके गुण न हों, वह कैसे मनुष्य ठहरेगा ? मनुष्य अपने मनुष्यत्वके गुणोंको जान लेता है तब धारण करता है । पक्षपात और धर्मद्वेषके निकट नहीं जाता, सत्य स्वीकार करता है असत्यसे दूर भागता है । लोग प्रायः मिथ्या बकबक झकझकमें लगे रहते हैं । वे अपने मनमें तनिक भी विचार नहीं करते । न समझते हैं कि, अविद्यासे तीनोंको उत्पत्ति है, इन्हींसे सारा व्यवहार चल रहा है फिर ज्ञान और मुक्तिका मार्ग बतलानेवाला कौन हो सकता है ? यदि तीनों देवताएं अज्ञानके घेरेसे बाहर होते तो उनसे मनुष्योंको मुक्ति प्राप्त होजाती । सब पक्षपातमें फँसे हुये हैं कौन सत्यका खोज करता है ? कौन गुरु है ? किसके उपदेशसे अज्ञान दूर होकर ज्ञान प्राप्त होता है ? इसका विचार निरपक्षही कर सकता है । विद्या और अविद्या दोनोंका प्रगट करनेवाला ब्रह्म है, सो दोनों ही मिथ्या हैं । विद्या अविद्याको नष्ट कर देती है, अविद्या विद्याको मिटा देती है जैसे कि, बाँसके रगड़नेसे आग निकलती है, वो सारे बनको जलाकर अन्तमें आप भी शान्त हो जाती है ।

वह आग कौन है, कहाँ है ? जो सबको जलाकर भी शान्त न हो सर्वदा एक समान प्रकाशित रहे । यदि सब कुछ मैंही होता तो बन्धनमें डालनेवाला दूसरा कौन था, सीखनेवाला कौन है ? सीखता कौन है ? अज्ञान किसको लगा ? एक ब्रह्म अज्ञानी और दूसरा ज्ञानी क्यों हुआ ? एक ब्रह्म द्वितीयो नास्ति, यह क्योंकर कहना ठहरा ? अद्वैत न रहा तो अनन्त ब्रह्म हो सकते हैं । वेदान्ती कहते हैं कि, सब जगत्में है एकही ब्रह्म । जैनी कहते हैं कि, अनन्त ब्रह्म हैं अर्थात् जितने जीव हैं उतनेही ब्रह्म हैं । वेदान्तियोंके एक और जैनियोंके अनेकों का न्याय किस प्रकार हो ? क्या एक ब्रह्मका बाप आकर वेदान्तियोंसे कह गया है कि, एक

बबके लोग, सदाचारी, दुराचारी सच्चे ईश्वरकी ओरसे रक्तपातकी आज्ञा नहीं, सब मायामें हैं

ब्रह्म है अथवा क्या अनेक ब्रह्मका पिता जैनियोंसे आकर कह गया है कि, अनेक आत्मा हैं। यह सब आनुमानिक बातें हैं किसीके पास न एकका और न अनेकका प्रमाण है। जिसको ब्रह्म अथवा आत्मा कहते हैं वह क्या पदार्थ है? समस्त संसारमें द्वन्द्व फैला रहा है। आत्मा २ सब कोई कहते हैं पर उसका रूप रङ्ग कोई वर्णन नहीं करता। परमात्मा आत्मा आदिक सब कल्पित नाम हैं, जिसके मनमें जैसा निश्चय हुआ कहने लगा अथवा लिख दिया। उसका नाम ठिकाना रूप रङ्ग कोई नहीं जानता। यदि वह अकहं है तो उसका कहना व्यर्थ है। यदि वह एक होता तो एकके दुखी सुखी होनेसे सभी दुखी सुखी होते। यदि वह भिन्न २ अनेक होता तो ज्ञानदशामें भी एकके अन्तरकी बात दूसरा नहीं जान सकता। यदि एक होता तो सब कोई जो चाहता सो करलेता। यदि अनेक होता तो किसी पर किसी का बल नहीं चलता। इस विचारसे एक अनेक कहना सुनना सब मिथ्या है। जो मन इन्द्रियोंसे परे सबमें पूर्ण हो उसका समाचार कौन कह सके? जो अलख है वह कैसे लखा जाये? अलखके लखनेका कोई शास्त्र नहीं जो बात कहने सुननेसे बाहर है वह कैसे कही सुनी जाय? गूं गोंने गुड़ खाया वे उसके स्वादको कैसे वर्णन कर सकें? गूं गोंने तो खाया, उसके स्वादको जाना पर स्वयं गुड़ नहीं होगया, स्वयं तो अलगही रहा। यदि गुड़ खानेसे गूं गा गुड़ हो जाता तो तत्वमसिके ज्ञानसे अपने स्वरूपका ज्ञान अवश्य होता। गुड़से और गूं गोंसे विभिन्नता है, उसी प्रकार तत्वमसिका जाननेवाला भी तत्वमसिसे भिन्न है, जीवन्मुक्तका ज्ञान भिन्न है, उसका स्वरूप भिन्न है। इसी कारण उसपर आधार रखनेसे विपत्तिमें फँसा।

गजल - जो हद पहुँचा दिया हदको अभी कुछकाज बाकी है।

न टूटा रिश्ताए दुनिया तेरा मुहताज बाकी है ॥

हज़ारों पीर पैगम्बर हिदायत आदमी की कर।

अभी सब सर गरोहोंका तू एक सिरताज बाकी है ॥

हुये सूरालख तन बरतन जतन कर बन्द करले को।

न आई ज़रगरी कुछ काम पुखता पाज बाकी है ॥

बनी आदम ब क्रिस्मत खुद बसे जा फ़र्श अशौपर।

मगर हंसोंके उस अकलीमका मआराज बाकी है ॥

रहे दौरा तेरा दायम ब दौरे दैर फानीमें।

कि जबतक कौल अइयामे निरञ्जन राज बाकी है ॥

अदाकर खुद खजानासे छुडाले अपने बन्दो को।

ब यवज जूर्म जूर्मना जो उनके बाज बाकी है ॥

पढ़े इल्मों अमल सारे चढ़े जा लामकाँ ऊपर ।
बजुज तुझ रहनुमाई रह न सूझे दाज बाकी है ॥
न रह रौशन ब सदहा मशअल व महताब अख़्तरके ।
कि अबतक नूर सूरै सारशबद व हाज बाकी है ॥
हुई काफूर दिल आजिजसे ख्वाहिशे दीन दुनियांकी ।
मगर सतगुरु सना ख्वानी हवस यह आज बाकी है ॥

कबीर साहिब कृत षड् देह वर्णन ।

कबीर साहिबने अपने शब्दोंमें छः प्रकारके देहोंका वर्णन किया है जिनमें आकर यह जीव पूर्ण पतित हो गया था, । साथके साथही उनका अर्थ भी कर दिया है जिससे पाठक गण आनन्दसे समझ लें । “सन्तों ! षट् प्रकारकी देही, स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण, कैवल्य हंसकी लेही।” कबीर साहिब कहते हैं कि, ए महात्माओ ! छः प्रकारकी देहें हैं । वे स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण, ज्ञान और विज्ञान ये हैं ।

स्थूल शरीर या कच्चे तत्त्वकी देह ।

सन्तों षट् प्रकारकी देही ।

स्थूल सूक्ष्म कारण महाकारण कैवल्य हंसकी लेही ॥
साढ़े तीन हाथ प्रमाना देह स्थूल बखानी ।
राता वरण जाग्रित वस्था वैखरी बाचा जानी ॥
रजो गुणी ॐ कार मात्राका त्रिकुटी है अस्थाना ।
मुक्ति सालोक प्रथम पद गायत्री ब्रह्मा वेद बखाना ॥
पृथिवी तत्व खेचरी मुद्रा मग पील घट कासा ।
क्षर निर्णय बड़वाग्नि दशेन्द्रो देव चतुर्दश बासा ॥
और अहै ऋग्वेद बताऊँ अर्द्ध शून्य सञ्चारा ।
सत्यलोक विषया अभिमानी विषयानन्द हंकारा ॥
आदि अन्त ओ मध्य शब्द है लखै कोई बुद्धि बीरा ।
कहैं कबीर सुनो हो सन्तों इति स्थूल शरीरा ॥ १ ॥

स्थूलदेह, साढ़े तीन हाथ, रक्तवर्ण, ब्राह्मी देवता, रजोगुण, ओंकार मात्रिका, जाग्रत अवस्था, वैखरी वाचा, त्रिकुटी स्थान, पृथिवीतत्त्व, खेचरी मुद्रा, कपिल मार्ग, मठाकाश, नेत्र स्थान, सत्यलोक, विश्वअभिमानी, गायत्री प्रथम पद, क्षर निर्णय, बड़वाग्नि, विषयानन्द आकार, आप तत्व, दश इन्द्रो, रहस मात्रिका, अर्द्ध शून्य, ऋग्वेद, चौदह देवता, पचीस प्रकृति ।

लिङ्गदेह या सूक्ष्म शरीर ।

सन्तो सूक्ष्म देह प्रमाना ।

सूक्ष्म देह अंगुष्ठ बराबर स्वप्न अवस्था जाना ॥
श्वेत वर्ण ॐ कार मात्रका सतोगुण विष्णू देवा ।
उर्द्ध और अर्द्ध यजुर्वेद है कण्ठ स्थान अहैवा ॥
मुक्ति सामीप लोक वैकुण्ठ है पालन किरिया राखी ।
मारग बिहैंग भूचरी मुद्रा अक्षर निर्णय भाखी ॥
आप तत्व कोहं हंकारा मदाग्नी कहिये ।
पञ्च प्राण द्वितीया पद गायत्री मध्यम वाणी लहिये ॥
शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध मन बुद्धि चित्त हंकारा ।
कहैं कबीर सुनो हो सन्तो, यह तन सूक्ष्म सारा ॥ २ ॥

लिङ्ग देह, अंगुष्ठके बराबर, ॐ कार मात्रिका, शुक्ल वर्ण, विष्णु देवता, श्रीहठ स्थान, मध्यमा, वाचा ऊर्ध्व, शून्य यजुर्वेद, वैकुण्ठ लोक, कण्ठस्थान, पालन क्रिया, आप तत्व, भूचरी मुद्रा, विहङ्ग साग, द्वितीय पद गायत्री, क्षर निर्णय, मन्दाग्नि, कोहं अहंकार, सामीप्य मुक्ति, पञ्च भूत, सूक्ष्म प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, चारों अन्तःकरण मन बुद्धि, चित्त, अहंकार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध यह सूक्ष्म नौ तत्व हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पञ्च कर्मेन्द्रिय यह सब जड़ अर्थात् अनात्म हैं जिसकी सत्तासे ये चैतन्य होते हैं उसको जीव कहते हैं ।

कारण शरीर ।

सन्तो कारण देह सरेखा ॥

आधा पर्व प्रमाण तमोगुण कारावर्ण परेखा ॥
मध्य शून्य है मकार मात्रका हृदया सो अस्थाना ।
महंदाकाश चाचरी मुद्रा इच्छा शक्ति जाना ॥
उददा अग्नि सुषुप्ति अवस्था निर्णय कण्ठ स्थानी ।
कपि मारग तृतीया पद गायत्री अहै प्राज्ञ अभिमानी ॥
सामवेद पश्यन्ती वाचा मुक्ति स्वरूप बखानी ।
तेज तत्व अद्वैतानन्द अहंकार निखानी ॥
अहै विशुद्ध महात्म जामे तामे कछु न समाई ।
कारण देह इति समपूरण कहैं कबीर बुझाई ॥ ३ ॥

चक्रोंसे स्वर व्यंजनोंका प्राकट्य

कारण देह, आधा पर्व, श्याम वर्ण, मकार मात्रिका, गोलाहठ स्थान, पश्यन्ति वाचा, सद्य शून्य, तमोगुण, सामवेद चाचरी मुद्रा, कपिमार्ग, महदाकाश, हृदयस्थान, प्राज्ञ अधिमानी, कण्ठस्थान, निर्णय अविद्याऽग्नि, तृतीय पद गायत्री, अद्वैतानन्द, इच्छा शक्ति सुधुप्ति अवस्था, सारूप मुक्ति ।

महाकारण ।

सन्तो महाकारण तन जाना ।

नीलवरण और ईश्वर देवा है मसूर परमाना ॥

नाभस्थान विकार मात्रिका चिदाकाश परमानी ।

मारग मीन अगोचरी मुद्रा वेद अथर्वण जानी ॥

ज्वाला कल चतुर्थ पद गायत्री आदि शक्ति तन वार्ई ।

आश्रय लोक विदेहानन्द मुक्ति सायुज्य बताई ॥

निरणय प्रकाश तुरीअवस्था प्रत्यक्ष आत्म अभिमानी ।

॥शवहंकार महाकारण तन इति कबीर बखानी ॥ ४ ॥

महाकारण देह, मसूर प्रमाण, विकार मात्रिका, गोलाहठ स्थान, परा वाचा शून्य अद्वै मात्रिका, अथर्वण वेद, पवन तत्त्व, अगोचरी मुद्रा, ज्वाला काला, मीन मार्ग, चिदाकाश, आश्रय लोक नाभस्थान, प्रत्यज्ञ अभिमानी, चतुर्थ पद गायत्री, आदि शक्ति, विदेह आनन्द, सोहं ओहं अहंकार, तुरिया वस्था, प्रकाशक, सायुज्य मुक्ति ।

ज्ञान देह ।

सन्तो कौवल्य देह बखाना ।

कौवल्य सकल देहका साक्षी भँवर गुफा अस्थाना ॥

निराकाश औ लोक निराश्रय निरणय ज्ञान विशेषा ।

स्वसम्बेद है उन मुनि मुद्रा उनमुनि वाणी लेखा ॥

ब्रह्मानन्द कहिये हंकारा ब्रह्म ज्ञानको माना ।

पूर्णबोध अवस्था कहिये ज्योति स्वरूपी जाना ॥

पूर्णगिरी अनुचरी मात्रिका निरञ्जन अभिमानी ।

परमारथ पञ्चम पद गायत्री परामुक्ति पहचानी ॥

सदाशिव औ मार्ग सिखा है कहैं कबीर मतिधीरा ।

कलातीत कला सम्पूर्ण कौवल्य कहैं कबीरा ॥ ५ ॥

उपरोक्त चारों साक्षी ज्ञान देह, स्वसम्बेद, उनमुनि वाचा, भँवर गुफा स्थान, सदाशिव पूर्ण गिरी, अनुचर मात्रा, पूर्ण बोध अवस्था. कलातीत, सखमार्ग,

बर्णोंकी मा सबसे पहिलेका वर्णमाला, नलकीके तोंतेका दृष्टान्त

निराकाश, सिद्ध स्थान, निराश्रय लोक, निरञ्जन अभिमानी, पञ्चम परमार्थ पद गायत्री, ज्ञान निर्णय, ब्रह्मज्ञान, ब्रह्मानन्द अहंकार, इसी ज्ञान देहको ज्योति स्वरूपी कहते हैं। मुक्तिमय ब्रह्ममय सर्व साक्षी।

षष्ठ विज्ञान देह — विज्ञान देह, आकाश स्वरूप है, न उसका रेख है वा रूप है, न उत्पन्न है न मरे, न आवे, न जावे न भीतर न बाहर, अहंकार रहित मान अपमान रहित रूप अरूप हैं तू, वाच्य अवाच्य, इच्छा अनिच्छा, सबसे रहित नहं नत्वं, न मैं कर्ता न मैं भोक्ता, जैसाका तैसा। न जीव न ब्रह्म न भाया। क्योंकि, विज्ञान देहमें ऐसाही विचार होता है।

इस पर कबीर साहिब — इसके आगे भेद हमारा। जानेगा कोई जानन हारा।

कहैं कबीर जानेगा सोई। जापर दया गुरूकी होई॥

सब ज्ञानी और ध्यानियोंकी दौड़ यहां तक होती है, किसीको इसके आगे की सुधि नहीं। विज्ञान देहके आगे केवल एक पद शेष रहता है, उसीके प्राप्त करनेसे यथार्थमें लीन हो जाता है। यह पारख गुरुकी सहायता बिना नहीं प्राप्त होता, यही सर्वोच्च मुक्तिपद है, शेष सब बन्धन हैं। जब जीव अपने सत्य स्वरूपसे पतित हुआ तो इसकी स्थिति इन छः शरीरोंमें हुई इसीमें भटकने लगा। जो कोई विचार पूर्वक स्वसम्बेदको पढ़ता है उसको सब बातोंका सार मालूम हो जाता है। किसी दूसरी किताब या वेदमें नहीं मिल सकता। जब स्थूल शरीरमें आया तो भ्रममें ऐसा अचेत हुआ कि, कुछ भी सुधि न रही कि, मैं कौन हूँ। कहाँसे आया हूँ? किस कारण उत्पन्न हुआ? फिर इसको गुरुआ लोगोंने भटकाया कर्म उपासना और ज्ञानके नाना उपदेश दिये जब अत्यन्त परिश्रमसे अपने ईश्वरको ढूँढ़ने लगा कुछ प्राप्त न हुआ तो कहने लगा कि, मेरा ईश्वर निर्गुण निराकार वेचून और वेचारा है। कभी तो वेद निर्गुण निराकारकी बन्दना करते हैं। कभी सगुण ईश्वरकी स्तुति करते हैं, न उनको कभी निर्गुणकी सुधि है न कभी सगुणका ठिकाना है। यदि निर्गुण कहा जाय तो उससे सृष्टिका उत्पन्न होना असम्भव है। सगुण कहा जाय तो नाशमान है जो कुछ देखने मुननेमें आता है वो सब विनाशी है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सनकादि सब धोखेमें पड़े हैं। इसीमें सब वेद और वाणी बनाई गई जो पर अपने स्वरूपकी सुधि नहीं पाई। पांच तत्व और तीन गुणका जाननेवाला अलग है। इसने पांचतत्व और तीन गुणोंकी कोठरीमें अपना घर बनाया। वेद पढ़ने लगा नानाप्रकारसे निर्गुण सगुणकी उपासना करने लगा। भिन्न २ मतावलम्बियोंने नानास्वरूपोंमें विविध प्रकारसे उपासना आरम्भ की। कोई तीर्थ व्रत, कोई यज्ञ योग, कोई जप तप आदिके भ्रममें पड़े। मुसलमान

समन्वय, विद्याभिमानी जनोंको पता नहीं साधुसे वाक्फल

आदि अन्य धर्मवाले भी उसी सगुण निर्गुणका गुण गाते हैं । जब इस अचेतताकी अवस्थामें यह जीव पड़ा तो महादेव (मुहम्मद) इसके गुरु बने सब जीवोंको उपदेश करने लगे । भ्रमकी वाणी और कलमेका प्रचार किया इसका यही भ्रम पथ दर्शक तथा उपदेशक हुआ ।

हिन्दुओंकी तरह मुसलमान भी भ्रममें — देखो मुसलमानी हदीसोंमें लिखा है आदि उत्पत्तिमें कलमेने लौहपर यह लिखा (इल्लाह लाइला) इसका अर्थ है नहीं खुदा मगर खुदा । पहले शब्द-ला-का अर्थ नहीं, दूसरे शब्द अल्लाह का अर्थ खुदा, तीसरे शब्द-इल्ला-का अर्थ मगर, चौथ शब्द-अल्ला-का अर्थ खुदा । आशय यह कि, नहीं खुदा, मगर खुदा नहीं खुदा, है खुदा-नहीं खुदा, है खुदा-नहीं खुदा, है खुदा-नहीं खुदा, है खुदा । यही भ्रमका कलमा सब मुसलमान पढ़ने लगे तब उस भ्रमका कलमा पढ़ानेवाला हुआ फिर कलमेने लौहपर उसका नाम लिखा अर्थात् जब महम्मद रसूलिल्लाह प्रगट हुआ तो पूरा महम्मदी कलमा

لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ مُحَمَّدٌ الرَّسُولُ

हुआ जैसे हिन्दू पड़े हुए हैं वैसेही मुसलमान भी भ्रममें पड़े ।

उन दोनोंमें ऐसा सोच और सम वाला कौन है ? जो इस बात पर विचार करे. दोनों भ्रमका कलमा पढ़ते हैं । इसके द्वारा तो कुछ प्राप्त होता है वह सब भ्रम है । नर्क, स्वर्ग और मुक्ति आदि सब भ्रमहीमें हैं सब पूजा सेवा भ्रमहीकी है भक्ति करके भ्रमही लाभ होता है । हानि लाभ सब भ्रम है । जिस कलमेसे लोगोंने अपनी २ मुक्तिका अनुमान किये हैं निर्गुण और सगुण कलमा भ्रम है तो मुक्ति किस प्रकार सत्य ठहर सकती है । इस प्रकार सब मनुष्य भ्रममें पड़े, भ्रमही के ग्रन्थ वाणी और कलमा पढ़ने लगे भ्रमका कलमा पढ़ पढ़ कर भ्रमके घरोंमें पड़ नित्य बन्धे हुये ।

सब भ्रम मात्र — तीनों लोकोंमें भ्रमसे छुड़ानेवाला पारख गुरुके बिना दूसरा कोई नहीं है । जीव तीर्थ, व्रत, वेद पाठ, योग, युक्ति, हृज्ज, रोजा निमाज सिजदा तथा कर्म उपासना, योग ज्ञान आदिक कर थक कर बैठ गया, कुछ हाथ न लगा तो उसने नौकोशोंमें अपना घर बनाया, जिनका वर्णन बिस्तार सहित लिख आया हैं । यहाँ केवल नाम मात्र लिखे देता हूँ, १ अन्नमय कोश, २ शब्दमय कोश, ३ प्राणमय कोश, आनन्दमय कोश, ५ मनोमय कोश, ६ प्रकाशमय कोश, ७ ज्ञानमय कोश, ८ आकाशमय कोश, ९ विज्ञानमय कोश । अब इस जीवने इन्हीं

प्राचीन कालके और आजके महाराजा-ओंके मन्त्री

छः देहों और नौकोशोंमें अपना घर बनाया। येही छः देह और नौ कोशोंतक, जीवकी सीमा ठहरी, किसीमें इसके पार जानेकी सामर्थ्य नहीं, न इसके आगेका समाचार जाननेकी शक्तिही है। इनके ज्ञानका अन्त यहाँही तक है। छः देहसे परे कोई नहीं जा सकता, बरन् इनका भेदभी जाननेवाला कोई कोईही होगा।

१—स्थूल देह पच्चीस तत्त्वकी होती है। वे तत्त्व ये हैं—पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, दश इन्द्रिय, पाँच प्राण, चारों अन्तःकरण और जीव जाग्रित अवस्था है।

२—सूक्ष्म शरीर सत्तरह तत्त्वकी है। वे ये हैं—पञ्च प्राण, दश इन्द्रिय, मत बुद्धि और स्वप्न अवस्था है।

३—कारण देह तीन तत्त्वकी है—चित्त अहङ्कार और जीवात्मा, मुषुष्टि-अवस्था।

४—महाकारण देह दो तत्त्वकी है—अहङ्कार जीवात्मा, तुरियावस्था।

५—कैवल्य देह एक तत्त्वकी है—चित्त जीवात्मा तुरियातीत अवस्था जिस प्रकाशमें यह जीव समष्टि रूप था उसीको इसने अपना स्वरूप माना इसका ऐसा मानना भ्रम मात्र है।

हंस देह।

इस शब्दमें कबीर साहिबने बताया है कि, ए महात्माओ ! साहिबके हंसोंका ऐसा रूप हुआ करता है—

सन्तो सुनो हंस तन ब्याना।

अवरण बरण रूप नहीं रेखा ज्ञान रहित विज्ञाना ॥
नहीं उपजे नहीं विनशे कबहूँ नहीं आवे नहीं जाहीं।
इच्छ अनिच्छ न दृष्टि अदृष्टी नहीं बाहर नहीं माहीं ॥
मैं तू रहिन न करता भोगता नहीं मान अपमानी।
नहीं ब्रह्म नहीं जीव न माया ज्योंका त्यों वह जानी ॥
मन बुधि गुन इन्द्रिहु नहीं जाना अकह अलख निर्बाना ॥
अकह अनेह अनादि अभेदा निगम नेति फिरि जाना ॥
तत्वरहित रविचन्द्र न तारा नहीं देवी नहीं देवा।
स्वयं सिद्धि प्रकाशक कह्यो है नहीं स्वामी नहीं सेवा ॥
हंस देह विज्ञान भाव यह सकल वासना त्यागे।
नहीं आगे नहीं पीछे कोई निज प्रकाशमें पागे ॥
निज प्रकाशमें आप अपन पौ भूली भये विज्ञानी।

भूलके न लजाना ठन ठनाना ही हैं, हजरतईशाको साधुका आशीर्वाद, मुहम्मद साहिबको राहिबका आशीर्वाद

उन्मत्त बाल पिशाच मूक जड दशा पञ्च यह लानी ॥
खोय आप अपन पौ सर्वश निज रूप नहि जानी ।
फिर कैवल्य कारण महकारण सूक्ष्म स्थूल समानी ॥
स्थूल सूक्ष्म कारण महकारण कैवल पुनि विज्ञाना ।
भये नष्ट यहि हेरफेरमें कतहूँ नहि कल्याना ॥
कहें कबीर सुनोहो सन्तो खोज करो गुरु ऐसा ।
जेहिते आप अपनपौ जानों मेटो खटका रैसा ॥

साहिबके हंस ऐसेही होते हैं उनकी देहके ये ही गुण क्यों ऐसेही अनेकों गुण होते हैं कोई छटे देहको ही हंसोंका देह मानते हैं यह उनकी भूल है तुमको हंस देह न प्राप्त होगी । जिसको तुमने हंस देह अनुमान कर रखा. वो तुम्हारी भूल और भ्रम है । सद्गुरुकी दया बिना हंसका स्वरूप नहीं प्राप्त हो सकता । हंस रूपके अकथ गुण हैं ।

पाँचों भूमिकाओंके नाम—गता भूमिका, अगता भूमिका, प्राप्ति भूमिका, समता भूमिका, शुद्धि भूमिका ।

पांचदेहके नाम—स्थूल, सूक्ष्म कारण, महाकारण और ब्रह्मरन्ध्र ।

पाँचों वाणियोंका नाम—परा, पश्यन्ति, मध्यमा, वैखरी, और अन्ूपम ।

सर्व मनुष्य अपने २ धर्म—मजहब—और गुरुकी प्रशंसा करते आते हैं, सब कहते हैं कि, हम बड़े, हम बड़े, हमारा गुरु बड़ा, हमारा मजहब बड़ा । यही चरचा चारों ओर फैल रही है अपने २ रङ्गमें सब मस्त हो रहे हैं ।

बीजकका शब्द ।

सबही मदमाते कोई न जाग । सङ्गहि चोर घर मूसनलाग ॥

योगी माते धरि धरि ध्यान । पण्डितमाते पढ़ी पुरान ॥

तपसी माते तपके भेव । सन्यासी माते करी हमेव ॥

मुल्ला माते पढ़ि मसहा । काजी माते करि इनसाफ़ ॥

संसार मति मायाके धार । राजामाते करि हंकार ॥

माते शुक्र देव ऊधो अकरूर । हनुमत माते ले लंगूर ॥

शिवमाते हरि चरणन सेव । कलमा माते निमाजके भेव ॥

सत्य सत्य कह स्मृतीवेद । जस रादण मारे घरके भेद ॥

चञ्चल मनके येहि काम । कहे कबीर भजु सत्य नाम ॥

मद कहिये जिसमें यह जीव मत्त होजावे आगे कुछ न सूझे सब मत्त होकर अचेत होगये मन चोरने सबको लूटा । धैर्य, दया, शील, विचार और सत्य

आदि धनको चुरा लिया। चोरको कोई नहीं पहचानता। सबके साथ रहके लूटता रहता है। पर उसको कोई नहीं पकड़ता। किस किस मदमें कौन कौन मस्त हुये यह सुन लो पहले योगके मदमें शिव गोरख आदि मस्त हुये, उसीमें अचेत होगये, योग क्रिया करते और उन मुनी ध्यान धरते धरते सब अचेत हो गये पारख पदको न पहुँचे। जब पिण्ड और ब्रह्माण्डका नाश हुआ तो योग क्रिया भी नाश होगई। देह छूटी योगी गर्भको प्राप्त हुये। दूसरे, विद्यामें व्यास आदि सर्व पण्डित मस्त हुये। तीसरे, तपके मदमें तपस्वी लोग मस्त हुये। मरकर बनके पशु बनें। चौथे, लोग ब्रह्माण्डका ध्यान करते हैं वे ब्रह्माण्डके संकल्पसे मरकर पक्षी होजाते हैं। पाँचवें, पुराणके अभिमानी लोग गीदड़ हुये। छठे, संन्यासी जो ब्रह्माका दृढ़ संकल्प करते हैं वे भ्रमरूप हो आवागमनमें रहेंगे। कोई भक्तिके मद कोई रूप, कोई बल, कोई धन आदि अनेक भेदोंमें मस्त हो रहे हैं। अपने मनमें अभिमान रखते हैं कि, मैं पूर्णताको पहुँच गया हूँ। इसी तरह सब मस्त हो रहे हैं एक दूसरेको कुछ नहीं समझते। सब कहते हैं कि, मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। जिसने चार पुस्तकें पढ़ली वह जानता है कि, मेरे तुल्य दूसरा कोई नहीं, मैंही सबसे बड़ा बुद्धिमान हूँ, पुस्तकोंके न पढ़नेवाले मूर्ख हैं। जो जिसका उद्यम है जिसको जो हुनर आता है वह उसीमें मस्त हो रहा है, दूसरोंको तुच्छ समझता है। यही मत्तपना अज्ञानी होनेका कारण है। यदि जीव अपने रूप पर न इत-राता उसके आनन्दमें अचेत न होता तो विषय वासनाका बगला न बनता। जब तक इसमें भक्ति न आवे और भली प्रकार अहंकार न छूट जावे तब तक प्रकाशका मार्ग न मिलेगा। सच्चे सन्तोंकी सेवा और सङ्गति तो सन्तोंकी दयासे साहबकी कृपा हो, नहीं तो सतसङ्ग बिना दरदर भटकता फिरता है।

गजल — भटकते कोह दामों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता।
कभी जंगल व्याबों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
जो ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादि उसके बहर कुदरतमें।
है खाते गोता समान कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
चौरासी सिद्ध नौ नाथो अबस तदबीर जम द्वारे।
पड़े जँजीर दरमों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
यती जङ्गम समाधी सिद्ध सन्यासी सती सूरै।
हैं फिरते सब परीशों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
वली अल्लाह गौसो कुतुब काज़ी पीर पैगम्बर।
है सबकी अलक हैरों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥

योरोपमें साधुओंका दान, पादरियोंकी हंसी, जान मिल्टन साहिबका कथन

चले यह चर्ख चक्की और दले जाते बनी आदम ।
तले गदूर्नगर्दा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
कोइ रोजा निमाजो तीर्थो हज्जो हजाज़ी है ।
हिर्म दैरौ खरामौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
पढ़े कुरआन पोथी है सोसारी बात थोथी है ।
हर्फ एक नाम सुबहौ कुछ नहीं बनता ॥
उठाते पाँव आगे को पड़े एकदाम पीछेको ।
हुआ आदमको खफ़कान कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
यहूदी और नसारा है कोई गुरु पीर प्यारा है ।
कोइ हिन्दू मुसलमानौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
पढ़े हैं वेद बानी सारै खाते गोता पानीमें ।
अमीके बहर पैमौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
हुआ इल्मों अमल सारा, मुआ तौ भी अजल मारा ।
हो अगर इल्म उर्फा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
यह मलकुल मौत घेरा है करे जिस जाय फेरा है ।
हरदो कून हिरमौ कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
जफाये चर्ख बर मन दर कफाय शख्त दुश्मन है ।
वफाय यार फर्मा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
बचशमें जाहिरो बातिन लिया यह देख आजिजने ।
बुजुज मुशिर्द मिहरर्बा कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥

कबीर साहबकी साखी ।

बैठा रहे सो लानियाँ, खड़ा रहे सो ग्वाल ।
जागत रहे सो पाहूर, तेहि धरि खायो काल ॥

इसी प्रकारसे सब मनुष्योंमें अहङ्कारकी दुर्गन्धि भर गई । मनुष्यके बन्धन का कारण यही है, इसीके कारण सब मनुष्य आवागमनमें रहते हैं । इसी मन शत्रुका सब छल है । इसीने सब मनुष्योंमें अहङ्कारकी दुर्गन्धि भरी है । इसीके फन्देमें सब बँध रहे हैं ।

नज़म - वारब यह देह क्या बला है । है झूठ और बरमला है ॥
जो रिश्तः रहते शिकत है । सब रंजको गंज पंज तन है ॥
जो लेवे क्रार पंजके धार । दीदार तो यार हो पदीदार ॥
है कर्जको फर्ज मर्दों जनमें । आदम न अदा हुआ अदनमें ॥

आफ़त है प्रसाफ़त यह नौ कोश । दोजख़ है किसी किसीको फिर दौस ॥
कोई बन्दः हुआ कोई मौला । मफलूक है कोई शुजाअ दौला ॥
राहत नहीं जीवकी जराहत । मुफ़लिस हुआ छोड़ वादशाहत ॥
हिर्स हैवान रुख़ रवाँ हो । यह खुमस ख़वीस दिले दवाँ हो ॥
दिलदार हिला मिला न दिलदार । को गौहर जोहरी खरीदार ॥
क्या जाने कोई भेद अन्दर । बन्दर है बदस्त दिल कलन्दर ॥
जेरीं व ज़बर खबर से मसरूर । महबूव से डूब के हुआ दूर ॥
गुफ़लत में गरकी गीते जन है । खुश हो कि मेरा कमाल फ़न है ॥
यह उजुव अजब अमक़ि दरिया । सद औज के मौज मय लहरिया ॥
खुद करदः से खुद ऊपर सितम है । जाने के मेरा यह जाम जम है ॥
बातिल को रास्त कर कहे जब । यह इल्म के जेल्ह है मुरकब ॥
भर जाम पिलादे मेरे साक़ी । फिर कोई हवस रहे न बाकी ॥
जा बैठे जो तेरे अनजुन में । सदहा गुल वे लाला जिस चमनमें ॥
हर सिम्त बहार है गुलो मुल । दिल दौरे जहाँ न आव कुल कुल ॥
जह पहुँचे न शेख कुत्बो काज़ी । दिल हलक्का के बीच सब है राज़ी ॥
मक़बूल होय हवस है दिल में । फिर आन फँसे है आबो गिल में ॥
पर बाल न हाल मन गरीबी । क्यों कर करे मेरी तबीबी ॥
तू बन्दः निवाज़ बन्दः परवर । सब औलिया अम्बिआय सरनर ॥
जा पहुँचे जो अपनेही वतन में । फिर आवे कभी न सो वतनमें ॥
जब तक लगे न वह यारका रंग । कर जंग वजहाद नफ़सके संग ॥
जान करदे निसार माल क्या माल । हक्क तेरा यही कभी बहर हाल ॥
दिल देश भदेश भेष दे छोड़ । सब लागसे बाग अपनी को मोड़ ॥
तब देख तमाशा सब जो अपना । हर कूनो मकान मिसल सपना ॥

धर्मकी खोज ।

जब यह जीव अपने स्वरूपको भूलकर भ्रममें पड़ा योगी, जड़म सेवड़ा आदिकके निकट गया, उनको गुरु मानकर उनसे उपदेश लेने लगा, तो उन्होंने कपट करके नानाप्रकारके कम्मेंमें लगाया, उन नानाप्रकारके महात्म सुनाये; जिससे इसके मनमें लोभ उत्पन्न हुआ बुद्धिने उनके वचनपर विश्वास दिलाया । निश्चय हो जानेसे अहङ्कार दृढ़ हो गया । इसको यह पक्षपात उत्पन्न हुआ कहने लगा मेरे तुल्य कोई नहीं मेरा मत सबसे उत्तम है, मेरी मुक्ति सबसे पहले होगी । इसी प्रकार ज्ञानी और ध्यानी घोखेमें पड़े बार बार जनमते और मरते रहते हैं,

साधु फकीरीकी हंसी सच्चे साधुओंके लुप्त होनेका कारण, संग्रह विश्वमित्र

गुरुआ लोगोंने जो मिथ्या विचार बतलाया उसको इस प्रकार दृढ़ कर सत्य मान लिया, उसपर ऐसा दृढ़ विश्वास किया कि, पारख पदको समझाया जाय तो कोई नहीं मानता । जैसे किसीने एक काँचके टुकड़ेको हीरा समझा। बुद्धिने निश्चय करा दिया कि, यह अमूल्य रत्न है इसी मिथ्या विश्वासमें आनन्द मानता रहा । यदि कोई अपनी मूर्खतासे पत्थरको रोटी समझले तो भूखके समय वह काम न आवेगी । जिस समय गुरुआ लोगोंने निकट गया तो उन्होंने नाना प्रकारकी मुद्रा आदि बतलाई, इसने उन्हें बड़े अनुरागसे धारणकर अभ्यास करने लगा । त्राटक करके दृष्टिको एक स्थानमें जमाकर देखने लगा । ऐसा परिश्रम किया कि, पलक न झपके । कुछ देर इस प्रकार देखनेसे पित्त ऊपरको चढ़ा नाना प्रकारके रङ्ग व चकचकाहट दीखने लगे, दृष्टिमें नाना प्रकारके रूप आने लगे । अब और भी अनुराग बढ़ा कि, रात बहुत परिश्रमसे अभ्यास करने लगा । पित्त भी शनैः शनैः बढ़ते बढ़ते यहाँ तक बढ़ा उसकी ऐसी गर्मी फैली कि, उस पर कचेतता प्रगट हुई । अपना आप भूलकर अचेत होकर गिर पड़ा । फिर जब चित्त शान्त हुआ चेत आया तो कहने लगा मैंने समाधि लगाई, गुरुजीकी बड़ी कृपा हुई कि, निर्गुण अलख ब्रह्मको लखा दिया, सहज समाधि उनमनीमें लगा दिया, जिससे सहजानन्दको पहुँचा आत्मा पर प्रमात्माकी एकता हुई यह यथार्थमें भ्रम है, केवल अपनीही कल्पना द्वारा पित्तमें विकार आनेसे अचेतता होगई थी । इसी प्रकारके धोखेमें बड़े बड़े योगी विद्वान् साधु आदिक फँसे हैं, पारख पदकी ओर ध्यान न देनेसे सत्य पदसे वञ्चित रहते हैं ।

जो स्त्री इस जीवकी झाईसे प्रगट हुई थी उसीके साथ यह पागल बना, उसीके संयोगसे एकसे अनेक हुआ, यह न समझा कि मैं जिसको ब्रह्म ठहराता हूँ वह केवल मेरी छाया है, सत्य नहीं भ्रम मात्र है ।

जो लोग विराट पुरुषको साधते हैं वह दूसरा कुछ भी नहीं केवल उसीकी छाया है अपनी ही छाया अपना गुरु बनकर अपनेको सिखलाती है । अपनीही छायाका सिखलाया हुआ सिद्ध बनता है । इसी प्रकार सारा संसार अपनी छायाकी पूजा करता है । इसीकी छाया इसके ऊपर ईश्वरी करती है, उसीका दास बनकर उसीका भजन करता है, भ्रमकी ही सेवा भक्ति है, भ्रमकी ही मुक्ति प्राप्त होती है । जीव क्या है ? इसका भ्रम क्या है ? ब्रह्म जीव और ईश्वर क्या है ? यह अपने भ्रमसे सब कुछ हो गया है यही एक है यही अनेक है इसीके भ्रमने इसको बन्धनमें डाला है । सब सिद्ध साधु भ्रममें पड़े हैं भ्रमसे छूटने की औषधी नहीं मिलती । केवल एक कल्पित नाम ठहरा लिया है ।

सांबर

यदि ब्रह्मको निर्विकल्प कहा जाय तो अन्तःकरणका गम नहीं, यदि सविकल्प कहा जाय तो चित्तका विषय है। यदि ज्योंका त्यों माना जाय तो बुद्धिका विषय है। द्वैत मनका विषय है। देहाभिमान अहङ्कारका विषय है। यदि आनन्द आदि कहो तो वायुका विषय है, रूप प्रकाश ठहरावे तो अग्निका विषय है। रस, प्रेम आदि जलका विषय है। गन्ध सर्वदेशी माने तो पृथिवीका विषय है यदि इन सबको ब्रह्म बतलावे तो यह सब तुच्छ हैं, इस कारण जब देह छूटेगी तब अवश्य गर्भको प्राप्त होगा। जहां मन बुद्धि और किसी इन्द्रियकी पहुँच नहीं वहां ब्रह्मकी किस प्रकार खोज हो? न कहीं ब्रह्म है, न कहीं ईश्वर है, यह सब जीवके संकल्प हैं, जीव सत्य है सब झूठ है। जैसे २ यह आगेको संकल्प करता गया उसी प्रकार भ्रम भी बढ़ता गया, जिससे भिन्न भिन्न निश्चय होते गये, जहां पर यह थक कर बैठ गया, आगे खोज करना बाकी न रहा, वहां ब्रह्मका संकल्प करके बैठ गया। उसीको ब्रह्मका स्वरूप निश्चय करके अपने विचार विवेक और खोजको समाप्त कर दिया उसीको अन्त पद समझ बैठ, ऐसेही यह चौरासीमें पड़ा है।

तत्पदसे दो प्रकारका ज्ञान है और त्वं पद दो प्रकारका ज्ञान है अस्ति पद दो प्रकारका विज्ञान है। तत्-त्वं-और-अस्ति, यह तीनों पद भ्रम रूप हैं। इन तीनोंसे भिन्न चौथा पद पारख है। जिसके द्वारा इस जीवको अपना शुद्ध स्वरूप दृष्ट आता है वह उनसे अलग है सो पारख गुरु इसको उन तीनों पदोंके भ्रमको नष्ट कर देता है। जब तक यह जीव पारख गुरुको नहीं प्राप्त होता तब तक सात ज्ञान और सात अज्ञान भूमिकामें भटकता फिरता है।

अज्ञानकी सात भूमिका।

१ अशुचि जाग्रत, २ जाग्रत, ३ महा जाग्रत, ४ स्वप्न, ५ स्वप्न जाग्रत, ६ स्वप्न, ७ सुषुप्ति। ये सात अज्ञानकी भूमिकाके नाम हैं।

१ अशुचि जाग्रत भूमिका—उसे कहते हैं जिसमें जीव पूरा अज्ञानतामें फँसा होता है, जगतको सत्य समझता है शरीरके पोषण पालनको अपना कर्तव्य जानता है।

२ जाग्रत भूमिका—वह है जिसमें जीवको देहाभिमान, वर्णाभिमान, जात्याभिमान, विद्याभिमान तथा रूप और बलका विशेष अहंकार होता है।

३ महाजाग्रत भूमिका—में प्राप्त जीवको यह अहंकार होता है कि, लोक परलोकमें कुछ कर सकता हूँ, मुझमें अमुक प्रकारकी कला कौशल है गुणविद्यामें पूर्ण हूँ अमुकके ऊपर अधिकार धराता हूँ आदि।

पठित मूर्ख, हजरत ईसाकी वाणी

४ जाग्रत स्वप्न भूमिका—वह है जिसमें जीव ऐसा समझता है कि, जो कुछ मैं जानता बूझता हूँ वह सब सत्य है। जो कुछ दूसरे करते हैं वह सब असत्य हैं। मनुष्यको ऐसे समझना चाहिये, जैसे ज्वरकी अधिकतासे मदिराको जल समझता हो।

५ स्वप्न जाग्रतवाला जीव—जो स्वप्न देखता है उसे ज्योंका त्यों याद रखता है।

६ स्वप्न भूमिका—वह है जिसमें प्राप्त हुआ जीव देखे हुये स्वप्नको भूल जाता है।

७ सुषुप्ति—गाढ़ निद्राके समान अचेताको कहते हैं।

अज्ञानकी इन सात भूमिकासे अपनेको बचाना, उनके फन्देसे बाहर होना इनके बदले सात ज्ञानकी सात भूमिकाओंकी इच्छा और उन्हींके लिये प्रयत्न करना उचित है।

ज्ञानकी सात भूमिकाएँ।

१—शुभइच्छा, २—स्वविचारना, ३—समानता, ४—शिशिरान्ति, ५—असंशक्ति, ६—पदार्था भाविनी, ७—तुरिया ये सात ज्ञानभूमिकाएँ हैं।

१ शुभ इच्छा भूमिका—उसको कहते हैं जिसमें प्रवेश करनेसे शुभ कामना उत्पन्न होती हो अज्ञानताको दूर करनेकी इच्छा होती है, ज्ञान और मुक्ति प्राप्त करनेकी सच्ची अभिलाषा होती है, अपनी बीती हुई आयु और किये हुये अशुभ कामोंके ऊपर पश्चात्ताप होता है। कुसङ्गतिसे दूर भागता है शास्त्र विहित शुभ कर्मोंमें लग जाता है।

२ स्वविचारना भूमिका—मैं मनुष्य जब पहुँचता है उस समय यह सत्सङ्गति और शुभकर्मोंको खोजकर उनमें प्रविष्ट हो जाता है।

३ समानता अर्थात् तनुमानसा भूमिका—मैं पहुँचनेपर संसारसे वैराग्य हो जाता है, विषय वासनाको मिथ्या दुःखदाई समझकर उससे विरक्त हो जाता है। वैराग्य करके सब प्रकारके सुखोंको तुच्छ जान ईश्वरमें निमग्न हो जाता है।

५ असंशक्ति भूमिका—मैं पहुँचकर ईश्वरमें भी अधिक निमग्नता होती है।

६ पदार्थाभाविनी भूमिका—मैं पहुँचकर ऐसी दशा हो जाती है कि, बड़े परिश्रमसे दूसरे के जगानेसे आगता है नहीं तो ध्यानमें मग्न रहता है।

७ तुरिया भूमिका—इस भूमिका—मैं पहुँचनेपर दूसरोंके जगानेसे भी नहीं जागता, गुप्त प्रगट ब्रह्ममें लय हो जाता है।