कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1116, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदि ब्रह्मको निर्विकल्प कहा जाय तो अन्तःकरणका गम नहीं, यदि सविकल्प कहा जाय तो चित्तका विषय है। यदि ज्योंका त्यों माना जाय तो बुद्धिका विषय है। द्वैत मनका विषय है। देहाभिमान अहङ्कारका विषय है। यदि आनन्द आदि कहो तो वायुका विषय है, रूप प्रकाश ठहरावे तो अग्निका विषय है। रस, प्रेम आदि जलका विषय है। गन्ध सर्वदेशी माने तो पृथिवीका विषय है यदि इन सबको ब्रह्म बतलावे तो यह सब तुच्छ हैं, इस कारण जब देह छूटेगी तब अवश्य गर्भको प्राप्त होगा। जहां मन बुद्धि और किसी इन्द्रियकी पहुँच नहीं वहां ब्रह्मकी किस प्रकार खोज हो? न कहीं ब्रह्म है, न कहीं ईश्वर है, यह सब जीवके संकल्प हैं, जीव सत्य है सब झूठ है। जैसे २ यह आगेको संकल्प करता गया उसी प्रकार भ्रम भी बढ़ता गया, जिससे भिन्न भिन्न निश्चय होते गये, जहां पर यह थक कर बैठ गया, आगे खोज करना बाकी न रहा, वहां ब्रह्मका संकल्प करके बैठ गया। उसीको ब्रह्मका स्वरूप निश्चय करके अपने विचार विवेक और खोजको समाप्त कर दिया उसीको अन्त पद समझ बैठ, ऐसेही यह चौरासीमें पड़ा है।
तत्पदसे दो प्रकारका ज्ञान है और त्वं पद दो प्रकारका ज्ञान है अस्ति पद दो प्रकारका विज्ञान है। तत्-त्वं-और-अस्ति, यह तीनों पद भ्रम रूप हैं। इन तीनोंसे भिन्न चौथा पद पारख है। जिसके द्वारा इस जीवको अपना शुद्ध स्वरूप दृष्ट आता है वह उनसे अलग है सो पारख गुरु इसको उन तीनों पदोंके भ्रमको नष्ट कर देता है। जब तक यह जीव पारख गुरुको नहीं प्राप्त होता तब तक सात ज्ञान और सात अज्ञान भूमिकामें भटकता फिरता है।
अज्ञानकी सात भूमिका।
१ अशुचि जाग्रत, २ जाग्रत, ३ महा जाग्रत, ४ स्वप्न, ५ स्वप्न जाग्रत, ६ स्वप्न, ७ सुषुप्ति। ये सात अज्ञानकी भूमिकाके नाम हैं।
१ अशुचि जाग्रत भूमिका—उसे कहते हैं जिसमें जीव पूरा अज्ञानतामें फँसा होता है, जगतको सत्य समझता है शरीरके पोषण पालनको अपना कर्तव्य जानता है।
२ जाग्रत भूमिका—वह है जिसमें जीवको देहाभिमान, वर्णाभिमान, जात्याभिमान, विद्याभिमान तथा रूप और बलका विशेष अहंकार होता है।
३ महाजाग्रत भूमिका—में प्राप्त जीवको यह अहंकार होता है कि, लोक परलोकमें कुछ कर सकता हूँ, मुझमें अमुक प्रकारकी कला कौशल है गुणविद्यामें पूर्ण हूँ अमुकके ऊपर अधिकार धराता हूँ आदि।