भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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आदि अन्य धर्मवाले भी उसी सगुण निर्गुणका गुण गाते हैं । जब इस अचेतताकी अवस्थामें यह जीव पड़ा तो महादेव (मुहम्मद) इसके गुरु बने सब जीवोंको उपदेश करने लगे । भ्रमकी वाणी और कलमेका प्रचार किया इसका यही भ्रम पथ दर्शक तथा उपदेशक हुआ ।

हिन्दुओंकी तरह मुसलमान भी भ्रममें — देखो मुसलमानी हदीसोंमें लिखा है आदि उत्पत्तिमें कलमेने लौहपर यह लिखा (इल्लाह लाइला) इसका अर्थ है नहीं खुदा मगर खुदा । पहले शब्द-ला-का अर्थ नहीं, दूसरे शब्द अल्लाह का अर्थ खुदा, तीसरे शब्द-इल्ला-का अर्थ मगर, चौथ शब्द-अल्ला-का अर्थ खुदा । आशय यह कि, नहीं खुदा, मगर खुदा नहीं खुदा, है खुदा-नहीं खुदा, है खुदा-नहीं खुदा, है खुदा-नहीं खुदा, है खुदा । यही भ्रमका कलमा सब मुसलमान पढ़ने लगे तब उस भ्रमका कलमा पढ़ानेवाला हुआ फिर कलमेने लौहपर उसका नाम लिखा अर्थात् जब महम्मद रसूलिल्लाह प्रगट हुआ तो पूरा महम्मदी कलमा

لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ مُحَمَّدٌ الرَّسُولُ

हुआ जैसे हिन्दू पड़े हुए हैं वैसेही मुसलमान भी भ्रममें पड़े ।

उन दोनोंमें ऐसा सोच और सम वाला कौन है ? जो इस बात पर विचार करे. दोनों भ्रमका कलमा पढ़ते हैं । इसके द्वारा तो कुछ प्राप्त होता है वह सब भ्रम है । नर्क, स्वर्ग और मुक्ति आदि सब भ्रमहीमें हैं सब पूजा सेवा भ्रमहीकी है भक्ति करके भ्रमही लाभ होता है । हानि लाभ सब भ्रम है । जिस कलमेसे लोगोंने अपनी २ मुक्तिका अनुमान किये हैं निर्गुण और सगुण कलमा भ्रम है तो मुक्ति किस प्रकार सत्य ठहर सकती है । इस प्रकार सब मनुष्य भ्रममें पड़े, भ्रमही के ग्रन्थ वाणी और कलमा पढ़ने लगे भ्रमका कलमा पढ़ पढ़ कर भ्रमके घरोंमें पड़ नित्य बन्धे हुये ।

सब भ्रम मात्र — तीनों लोकोंमें भ्रमसे छुड़ानेवाला पारख गुरुके बिना दूसरा कोई नहीं है । जीव तीर्थ, व्रत, वेद पाठ, योग, युक्ति, हृज्ज, रोजा निमाज सिजदा तथा कर्म उपासना, योग ज्ञान आदिक कर थक कर बैठ गया, कुछ हाथ न लगा तो उसने नौकोशोंमें अपना घर बनाया, जिनका वर्णन बिस्तार सहित लिख आया हैं । यहाँ केवल नाम मात्र लिखे देता हूँ, १ अन्नमय कोश, २ शब्दमय कोश, ३ प्राणमय कोश, आनन्दमय कोश, ५ मनोमय कोश, ६ प्रकाशमय कोश, ७ ज्ञानमय कोश, ८ आकाशमय कोश, ९ विज्ञानमय कोश । अब इस जीवने इन्हीं