भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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लोग स्वयं बन्धनमें पड़े हैं उनकी उपदेशसे किस प्रकार मुक्ति हो सकती है ? कीचड़से कीचड़ नहीं धोया जा सकता, कीचड़ धोनेके लिये पानी चाहिये । ऐसेही बन्धनसे छूटनेके लिये पारखगुरुके उपदेशकी आवश्यकता है, जिससे कि आवागमनका बीज नष्ट हो जाता है । इस जीवने असत्यको सत्य मान लिया है इसी कारण झूठका सत्य देख पड़ता है ।

दृष्टान्त—एक गांवमें किसी स्त्रीका पति मर गया था । वह सती होने चली स्मशानमें पतिकी चितापर बैठ गई तब आग लगा दी गई । संयोग वश उसी समय प्रबल आंधी आई, मृतकके साथ आये हुये लोग भाग गये । आगकी गर्मी बढ़ी स्त्री चितासे उतरकर एक झाड़ीमें छिप गई थोड़ी देर बाद अंधेरीके बीत जानेपर झाड़ीसे निकलकर किसी दूसरे नगर चली गई । उसमें पहुंचकर किसी पुरुषके साथ रहने लगी, जिससे उसके कई लड़के लड़कियाँ उत्पन्न हुईं ।

अब उधरका हाल सुनो । जब अन्धडके बीत जानेपर घरके लोग आये लकड़ियोंको जला देखकर अनुमान करलिया कि, वह सती होगई । चिताकी राख जमाकरके उसपर मकान बना दिया । अब सतीचोराकी पूजा होने लगी, लोग मन्त्रत मनाने लगे, बहुतोंकी इच्छाएँ पूर्ण भी हुईं, इसी प्रकारका सतीकी पूजा दिन दिन बढ़ने लगी । कई वर्ष बीतनेपर उस स्त्रीके मायकेका एक मनुष्य उस नगरमें गया उसको शिरपर पानीका घड़ा, गोदमें लड़का और दूसरे लड़केको उँगली पकड़ाये हुये जाते देखा । आदमीने उसको देखकर पहचान लिया उसका नाम लेकर पुकारा । वह खड़ी होगई, उस पुरुषने उसका नाम पूछकर पूरा निश्चय कर लेनेपर कहा कि, यदि तू तो सती होगई थी, यहां किस प्रकार आगई ? उसने लज्जित होकर कहा कि, यदि तू मेरा समाचार मेरे घरके लोगोंसे न कहे तो मैं अपना सारा हाल सुनाऊँ । उसने किसीसे न कहनेका वचन दिया । स्त्रीने अपना सारा हाल कह सुनाया. कहा कि, मैं इस नगरमें एक पुरुषके साथ रहती हूँ, उसीसे यह दो सन्तानें उत्पन्न हुई हैं, यह बात सुनकर वह गांवमें आकर सबसे कहने लगा । शनैः शनैः उस स्त्रीके मँके और समुरारवालोंने भी यह समाचार जान पाया, वहांसे कुछ लोग आकर उसको देख गये । तबसे उस सतीकी पूजा छोड़ दी गई, लोगोंकी मन वाञ्छित पूरी होनी बन्द होगई । जबतक लोगोंका विश्वास सतीमें था तबतक सब कुछ था । जब विश्वास हट गया कुछ भी न हुआ ।

इसी प्रकार यह तत्त्वमसि है इसके तीनों पदोंमें जीवोंने अपना विश्वास दृढ़ कर लिया है इनको इसीका विश्वास सत्य होकर भासता है दूसरी बात नहीं है ।