भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1114

आफ़त है प्रसाफ़त यह नौ कोश । दोजख़ है किसी किसीको फिर दौस ॥
कोई बन्दः हुआ कोई मौला । मफलूक है कोई शुजाअ दौला ॥
राहत नहीं जीवकी जराहत । मुफ़लिस हुआ छोड़ वादशाहत ॥
हिर्स हैवान रुख़ रवाँ हो । यह खुमस ख़वीस दिले दवाँ हो ॥
दिलदार हिला मिला न दिलदार । को गौहर जोहरी खरीदार ॥
क्या जाने कोई भेद अन्दर । बन्दर है बदस्त दिल कलन्दर ॥
जेरीं व ज़बर खबर से मसरूर । महबूव से डूब के हुआ दूर ॥
गुफ़लत में गरकी गीते जन है । खुश हो कि मेरा कमाल फ़न है ॥
यह उजुव अजब अमक़ि दरिया । सद औज के मौज मय लहरिया ॥
खुद करदः से खुद ऊपर सितम है । जाने के मेरा यह जाम जम है ॥
बातिल को रास्त कर कहे जब । यह इल्म के जेल्ह है मुरकब ॥
भर जाम पिलादे मेरे साक़ी । फिर कोई हवस रहे न बाकी ॥
जा बैठे जो तेरे अनजुन में । सदहा गुल वे लाला जिस चमनमें ॥
हर सिम्त बहार है गुलो मुल । दिल दौरे जहाँ न आव कुल कुल ॥
जह पहुँचे न शेख कुत्बो काज़ी । दिल हलक्का के बीच सब है राज़ी ॥
मक़बूल होय हवस है दिल में । फिर आन फँसे है आबो गिल में ॥
पर बाल न हाल मन गरीबी । क्यों कर करे मेरी तबीबी ॥
तू बन्दः निवाज़ बन्दः परवर । सब औलिया अम्बिआय सरनर ॥
जा पहुँचे जो अपनेही वतन में । फिर आवे कभी न सो वतनमें ॥
जब तक लगे न वह यारका रंग । कर जंग वजहाद नफ़सके संग ॥
जान करदे निसार माल क्या माल । हक्क तेरा यही कभी बहर हाल ॥
दिल देश भदेश भेष दे छोड़ । सब लागसे बाग अपनी को मोड़ ॥
तब देख तमाशा सब जो अपना । हर कूनो मकान मिसल सपना ॥

धर्मकी खोज ।

जब यह जीव अपने स्वरूपको भूलकर भ्रममें पड़ा योगी, जड़म सेवड़ा आदिकके निकट गया, उनको गुरु मानकर उनसे उपदेश लेने लगा, तो उन्होंने कपट करके नानाप्रकारके कम्मेंमें लगाया, उन नानाप्रकारके महात्म सुनाये; जिससे इसके मनमें लोभ उत्पन्न हुआ बुद्धिने उनके वचनपर विश्वास दिलाया । निश्चय हो जानेसे अहङ्कार दृढ़ हो गया । इसको यह पक्षपात उत्पन्न हुआ कहने लगा मेरे तुल्य कोई नहीं मेरा मत सबसे उत्तम है, मेरी मुक्ति सबसे पहले होगी । इसी प्रकार ज्ञानी और ध्यानी घोखेमें पड़े बार बार जनमते और मरते रहते हैं,