कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1112, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि धनको चुरा लिया। चोरको कोई नहीं पहचानता। सबके साथ रहके लूटता रहता है। पर उसको कोई नहीं पकड़ता। किस किस मदमें कौन कौन मस्त हुये यह सुन लो पहले योगके मदमें शिव गोरख आदि मस्त हुये, उसीमें अचेत होगये, योग क्रिया करते और उन मुनी ध्यान धरते धरते सब अचेत हो गये पारख पदको न पहुँचे। जब पिण्ड और ब्रह्माण्डका नाश हुआ तो योग क्रिया भी नाश होगई। देह छूटी योगी गर्भको प्राप्त हुये। दूसरे, विद्यामें व्यास आदि सर्व पण्डित मस्त हुये। तीसरे, तपके मदमें तपस्वी लोग मस्त हुये। मरकर बनके पशु बनें। चौथे, लोग ब्रह्माण्डका ध्यान करते हैं वे ब्रह्माण्डके संकल्पसे मरकर पक्षी होजाते हैं। पाँचवें, पुराणके अभिमानी लोग गीदड़ हुये। छठे, संन्यासी जो ब्रह्माका दृढ़ संकल्प करते हैं वे भ्रमरूप हो आवागमनमें रहेंगे। कोई भक्तिके मद कोई रूप, कोई बल, कोई धन आदि अनेक भेदोंमें मस्त हो रहे हैं। अपने मनमें अभिमान रखते हैं कि, मैं पूर्णताको पहुँच गया हूँ। इसी तरह सब मस्त हो रहे हैं एक दूसरेको कुछ नहीं समझते। सब कहते हैं कि, मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। जिसने चार पुस्तकें पढ़ली वह जानता है कि, मेरे तुल्य दूसरा कोई नहीं, मैंही सबसे बड़ा बुद्धिमान हूँ, पुस्तकोंके न पढ़नेवाले मूर्ख हैं। जो जिसका उद्यम है जिसको जो हुनर आता है वह उसीमें मस्त हो रहा है, दूसरोंको तुच्छ समझता है। यही मत्तपना अज्ञानी होनेका कारण है। यदि जीव अपने रूप पर न इत-राता उसके आनन्दमें अचेत न होता तो विषय वासनाका बगला न बनता। जब तक इसमें भक्ति न आवे और भली प्रकार अहंकार न छूट जावे तब तक प्रकाशका मार्ग न मिलेगा। सच्चे सन्तोंकी सेवा और सङ्गति तो सन्तोंकी दयासे साहबकी कृपा हो, नहीं तो सतसङ्ग बिना दरदर भटकता फिरता है।
गजल — भटकते कोह दामों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता।
कभी जंगल व्याबों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
जो ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादि उसके बहर कुदरतमें।
है खाते गोता समान कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
चौरासी सिद्ध नौ नाथो अबस तदबीर जम द्वारे।
पड़े जँजीर दरमों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
यती जङ्गम समाधी सिद्ध सन्यासी सती सूरै।
हैं फिरते सब परीशों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥
वली अल्लाह गौसो कुतुब काज़ी पीर पैगम्बर।
है सबकी अलक हैरों कुछ नहीं बनता कुछ नहीं बनता ॥