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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

१२ अध्याय : विश्वास

देखो ज्ञानगुदरीके अन्तमें ।

श्रद्धा चँवर^१^ प्रेमके धूपा । नौतम^२^ सूरत साहबका रूपा ॥
गुदरी पैर आप अलेखा । जिन यह प्रगट चलाई भेखा^३^ ॥
साहब कबीर बक्स^४^ जब दीन्हा^५^ । सुरनर मुनि सब गुदरी^६^ लीना ॥

देखो ग्रंथ भवतारण धर्मदास वचन ।

संशय^७^ किए एकही ओरा^८^ । तुमही थे कि, है कोई औरा^९^ ॥
सत्य सत्य सा मोसे कहिए । संशय रहत^१०^ सोई पद^११^ गहिए^१२^ ॥

सत्य कबीर वचन ।

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । सकल भेद^१३^ मैं कीन्ह प्रकासा^१४^ ॥
जौन^१५^ परतीत होय जिव^१६^ तोरा । भवको मेट संग रहो मोरा ॥
धरमदास तुम छोड़ो माया । अस्थिर^१७^ अमर अखण्डित काया^१८^ ॥
भक्ति मुक्ति उपजी^१९^ है जासों । प्रेमको लगन^२०^ लगाओ तासों ॥
साखी—अब तो वह ठौर^२१^ बतावहुँ^२२^, निर्मल ठौर निनार^२३^ ।

सबसे पर^२४^ सबसे ऊपर^२५^, जहाँ एक ओंकार ॥

चौपाई—पुरुष कहो तो पुरुषौ^२६^ नहीं । पुरुष भया^२७^ मायाके माहीं ॥
शब्द कहो तो शब्दौ^२८^ नहीं । शब्द भया मायाके माहीं ॥
द्वै विन होय न ओम् आवाजा^२९^ । कहिए कहासु^३०^ काज अकाजा ॥
नाम कहो तो नाम न ताका^३१^ । नाम राय काल है जाका ॥
है अनाम^३२^ अक्षरके माँही । निह अक्षर कोई जानत नहीं ॥
धर्मदास तहाँ बास हमारा । काल अकाल न पावे पारा^३३^ ॥
ताकी भक्ति करै जो कोई । भवते^३४^ छूटे जन्म न होई ॥

साखी—भवतारन^३५^ भरमै^३६^ नहीं, यही परताप^३७^ हमार ।

निश्चय करिके मानि^३८^ है, तो उतरे भवनिधि पार^३९^ ॥

धर्मदास वचन ।

हे स्वामी यह अकथ^४०^ कहानी । आगे सुनी न काहू^४१^ जानी ॥
जहाँ वहाँ तुम समरथदाता^४२^ । मोको जान^४३^ परी^४४^ यह बाता ॥


१ चमर, बीजना, २ नूतन, ३ भेष, पन्थ, ४ दान, ५ दिया, ६ ज्ञान गुदरी, ७ सन्देश, ८ तरफ, ९ दूसरा, १० हीन, ११ स्थान, १२ स्वीकार करिये, १३ हाल, १४ जाहिर, १५ जो, १६ दिल । १७ स्थिर, १८ शरीर, १९ पैदा हुई, २० लौ, २१ जगह, २२ बताओ हूँ, २३ निराला, २४ परे, २५ शिरमोर, २६ पुरुष भी, २७ हुआ, २८ शब्द भी, २९ शब्द, क्या, ३० जिसका, ३१ नाम बिना, ३२ बिना, ३३ थाह, ३४ संसारसे, ३५ संसारके पार करनेमें, ३६ भूले, ३७ प्रताप, ३८ मानेगा, ३९ किनारे पर, ४० नहीं कहीं जानेवाली, ४१ किसीने भी, ४२ सामर्थ्यवान् ४३ मालूम, ४४ हुई, ।

नाम कबीर धरयो सो काहे^१^ । कारण कौन देह धरि आए ॥
देहधरे^२^ सबही दुख पाया । तुमका काहेन व्यापी माया ॥

सत्य कबीर वचन ।

हो धर्मदास कहो तुम साचा । मिथ्या^३^ नहीं तुम्हारे बाचा^४^ ॥
तुमहो अंसवंस पति राजा । तुम्हारे मोह करनेके काजा ॥
आदि अनादि समीपै^५^ मोरा । अब मैं कारज करिहौँ^६^ तोरा^७^ ॥
वहोंसे तुमको दीन्ह^८^ पठाई । यहाँ आनके लागी काई^९^ ॥
कालपुरुष राख्यो^१०^ विलम्हाई^११^ । जो सब सृष्टि बनाए खाई ॥
जग जीवनसे तुम हो न्यारा । तुम्हारे काज^१२^ लीन्ह^१३^ औतारा ॥
और कारज मोरे कछु नाहीं । रहूं निरन्तर^१४^ जगके माँही ॥
मोहि न व्यापी^१५^ जगकी माया । कहन सुननको है यह काया^१६^ ॥
देह नहीं और दरसे^१७^ देही । रहूं सदा जहाँ पुरुष विदेही^१८^ ॥
यह गतिको नहि जानै कोई । धरमदास तुम राखौ गोई^१९^ ॥
आदि पुरुष निह अच्छर जानो । देही धरि मैं प्रगट बखानो^२०^ ॥
गुप्त^२१^ रहूं नाहीं लिखपाया^२२^ । सो मैं जगमें आन चिताया ॥
जुगन जुगन आयो संसारा । रहूं निरन्तर प्रगट पसारा ॥
सत्ययुग सत्य सुकृत वही खेरा । त्रेतानाम मुनिन्दर^२३^ मेरा ॥
द्रापर करुणामय^२४^ नामधराया । कलियुगनाम कबीर कहाया ॥
चारों युगमें चारों नावन^२५^ । माया रहित रहूं सब ठावन^२६^ ॥
सो जग पहचाने नहि भाई । सुर नर मुनि रहे मुखगाई^२७^ ॥

बीजक शब्द ।

नरको नहि परतीत^२८^ हमारी ॥
झूठे बनज^२९^ कियो झूठे सँग, पूंजी सबन मिल हारी ॥
षट्दर्शन^३०^ मिल पंथ चलायो, तिरदेवा^३१^ अधिकारी ॥
राजा देश बड़ो परपञ्ची^३२^, रैयत^३३^ रहत उजारी^३४^ ॥

१ क्या, २ शरीर धारण किये पीछे, ३ हे झूठ, ४ वचन, ५ समीपी, ६ करुणा, ७ तेंरा, ८ दिया, ९ माया । १० रखा, ११ विरमा, १२ लिये, १३ लिया, १४ हमेशा, १५ लगी, १६ शरीर, १७ प्दीबे, १८ सत्यपुरुष, १९ छिपा, २० कहो, २१ छिपा, २२ देख, २३ मुनीन्द्र, २४ करुणाके खजाने, २५ नामोसे, २६ जगह, २७ कह रहे हैं, २८ विश्वास, २९ व्यापार, ३० जोगी, जंग, सवेग, सन्यासी, दरवेश और ब्राह्मण, ३१ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, ३२ बखेडी, ३३ प्रजा, ३४ ऊजड, ।

उतते' इत इतते' उत राखन, यमकी साट सँवारी ॥
जीवनकपि' डोर बाँधे बाजीगर, अपनी खुशी परारी' ।
यही टेटरुं उतपत' परलयको', विषया' सभैं बिकारा' ॥
जैसे श्वान अपावन' राजी, तेवन' लागी संसारी ।
अजहूँ'' लेऊँ छोड़ाय कालसे, जो करसुरत'' सम्हारी'' ॥

प्रतिज्ञा अङ्गकी साखी ।

कबीर- शब्द'' हमारा आदिका'', इनसे बली न कोय ।

आगा पीछा सो करे, जो बलहीन'' होय ॥

कबीर- घर घर हम सबसे कहा, शब्द न सुने हमार ।

ते भवसागर बुडहीं'', लख चौरासी धार ॥

कबीर- हङ्ग त्वङ्गके बीचमें, मेरा नाम कबीर ।

जीव मुक्तावन'' कारण'', अविगत'' दासकबीर ॥

कबीर- झहां करतमन'' था, धरती'' हती न नीर ।

उतपत परलय नाहती, तबके कथी'' कबीर ॥

हम कर्ता सब सृष्टिके, हम पर दूसरा नाहिं ।

कहैं कबीर हमें चीन्हे'', नहिंपरे चौरासी माहिं'' (बीजक६२९)

कबीर- लोहा चुम्बक प्रीति, जस'' लोहा लेत उठाय ।

ऐसा शब्द कबीरका, कालसे लेत छुड़ाय ॥

कबीर- यह संसारको, समझायो सौबार, ।

पूँछ जो पकड़ी भेड़की, उतरा चाहे पार ।

कबीर- मैं कलिका कोतवाल'' हूँ, लेहहो शब्द हमार ।

जो या शब्दको मानि है उतरै भवजल पार ॥

कबीर- शब्द उपदेश जो मैं कहूँ, जो गोई माने सन्त ।

कहैं कबीर बचावके, ताही'' मिलावन'' कन्त'' ॥

कबीर- हिन्दू तुर्कके बीचमें, मेरा नाम कबीर ।

जीव मुक्तावन कारणे, अविगत धरा शरीर ॥


१ इससे उस जोनमें, २ उससे इस योनमें, ३ बन्दर, ४ पड़ा हुआ, ५ उत्पत्ति, ६ प्रलय,
७ विषय रूप रस आदि, ८ परिवर्तनशील, ९ अपवित्र हाड़ आदि, १० तँसेही, ११ अवभी,
१२ याद, १३ सावधान । १४ रामनाम, १५ अनादि, १६ कमजोर, १७ डूवेंगे, १८ मुक्तकराने
१९ लिये, २० विचारनेमें न आये, २१ कृत्य, २२ पृथ्वी, २३ कहीं, २४ जाने, २५ भीतर,
२६ जँसी, २७ रखवाला, २८ उसीको २९ मिलाने, ३० मालिक,

कबीर- जाय मिल्यो परिवारमें, सुखसागरके तीर ।
वरण पलट हंसा किया, सद्गुरु शब्द कबीर ॥
प्रेम पि^१^ छौरी तानके, सुख मन्दिरमें सोय ।
घर कबीरको पायके, कहा मुक्तिको रोय ॥

कबीर- बहुत गुरु भए, जगतमें, कोई न लागे तीर ।
वै गुरु वह^२^ जायगे, जाग्रत^३^ गुरु कबीर ॥

कबीर- पीर पैगम्बर औलिया, धर धर मरे शरीर ।
अजर अम्बर^४^ पलटे नहीं, ताका नाम कबीर ॥
मैं कबीर । बिचलों^५^ नहीं, शब्द मोर^६^ समरर्थ^७^ ।
ताको लोक पठाइहों, जो चढ़े शब्दके रथ^८^ ॥

कबीर- ओंकार निश्चय किया, यह कर्ता मत^९^ चान ।
साँचा शब्द कबीरका, परदेमें^१०^ पहचान ।
अनन्त कोटि ब्रह्मण्डका, एक रती नहि भार ।

साहब पुरुष कबीर है, कुलका सर्जनहार^११^ ॥ [क. वी. ६३८]

इसी प्रकार समस्त सूक्ष्म वेदमें कबीर साहबकी प्रशंसा भरी हुई है, भली भाँति खोल खोल पुकार पुकार बारम्बार कबीर साहबने कहा है कि, मैं स्वयम् सत्यपुरुष हूँ, स्वयम् मैं ही सृष्टिका रचयिता तथा समस्त जगत्का स्वामी हूँ, मेरे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है । जो कोई मुझको पहचानेगा वो भव-सागरके पार हो जावेगा ।

वेदमें कबीर ।

आशुः शिशानो वृषभो न भीभो, घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्, संकन्दनो निमिष ए कबीरः शतं सेना अजयत् साकमिन्द्रः ॥ य० अ० १७-३६ ॥

हे कबीर ! आप चारों ओरसे अविगत शब्द रूप हो । देहसे रहित रूप विदेह हो, विना शरीरके हो, समस्त पवित्रावतार आपके हैं, सैकड़ों बार प्रकट होते हो सबके ज्ञान रूप और परम विजयी हो यही मन्त्र सामवेदमें भी आया है, यहाँ इसका जो अर्थ है वही वहाँ भी अर्थ है ।

सुकृत नाम ।

अधज्मोऽधवादिवो बृहतो राचनादधि अया वर्धस्व,

तन्वा गिरा ममाजाता सुकृतो पृण ॥ सा. १. ८. ॥ प्र. १ ॥


१ चादर, २ पानीसे खिंचे, ३ जगता हुआ, ४ अमर, ५ चलायमान, ६ मेरा, ७ भक्तिवाला,
८ रथ, ९ न, १० दिलके भीतर, ११ रचनेवाला ।

विश्वासकी झलक जीवकी हालत

अग्रनाम ।

सोमः पुनान ऊर्मिणा व्योवारं विधावति, अग्रेवाचः पवमानः कनिन्द्रत् ॥
अग्रे सिन्धूनां पवमानोऽतिपतिर्दिवः शतधारो विचक्षणः । हरिर्मित्रस्य सदनं
षु सीदति मर्मजानो विभि- सिन्धुभिर्वृषा ॥

उग्रनाम ।

उच्चातेजातमंधसोदिर्विसधभूम्या ददे उग्र शर्म महि खवः ॥ सामवेद
उत्तर अ० ॥ प्र० ५ ॥ मन्त्र १ ॥

युध्वाहिवृत्रहंतमंहीरिद्रंदपरावताः । अर्वाचीनोमघनसोमपीतय उग्रक्रुध्यै-
हिराग साम १ ॥ प्र० ४ ॥ मन्त्र ९ ॥

आवृंदंवृत्राहाददे जातः पृच्छातद्विमातरंक उग्रके शृणीरे ॥

सामवेद अ १० ॥ प्र० ३ ॥ मन्त्र ३ ॥

इस तरह वेदोंमें भी कबीर, अग्र, उग्र, और मुनीन्द्र शब्द आजाते हैं ऐसी
रीतिसे वेद भी बाकी नहीं रह जाते ।

कबीर शब्दके अर्थ ।

‘कबीरैकोत्तरशतक’ इस नामके ग्रन्थमें कबीर शब्दके अर्थकी निरुक्ति
१०३ श्लोकोंमें की है इसकी और वरामजीने बड़ी सुन्दर भाषा की है उसके
कुछ एक श्लोक यहाँ भी उद्धृत करते हैं ।

श्रीपार्वत्युवाच- अक्षर त्रितय स्वामिन् कबीर इति को भवेत् ॥

किं देव उपदेवो वा तन्मे ब्रूहि जगत्पते ॥

पार्वतीजीका प्रश्न-ऐ स्वामीजी ! जो तीन अक्षर कबीर हैं वो कबीर
कौन हैं तथा किन देवताओंमेंसे हैं ।

श्रीमहादेव उवाच-कोब्रह्मा प्रोच्यते बीचं विद्यमानो विशिष्यते ॥

रमन्ते सर्व भूतानि यत्कवीरस्य चोच्यते ॥

महादेवजीका उत्तर (क) ब्रह्म (ब) प्रगट, (र) समस्त जीवोंमें समान-
रूपसे रम रहा है ऐसेको कबीर कहते हैं ।

कश्चैवकेवलं ब्रह्म विशेषं बीजमव्ययम् ॥

अंतर्वहिरमन्ते च यत्कवीरस्स चोच्यते ॥

(क) ब्रह्मरूप है, । (ब) अमर बीजरूप है । (र) भीतर बाहर
सब स्थानोंमें समभाव है, उसको कबीर कहते हैं ।

क सुखसागरो दाता बीजं ज्ञान तथैव च ॥

रहित आदिनान्तेन यत्कवीरस्स चोच्यते ॥

(क) का अर्थ—सुख रूप समुद्रका देनेवाला है। (ब) ज्ञानका देनेवाला है। (र) उसका आरम्भ अन्त कुछ नहीं, ऐसेको कबीर कहते हैं।

कस्तुकायापतिश्चैववीशेषः समतिजयः ॥

रकारो रतिसर्वस्य यत्कवीरस्स चोच्यते ॥

(क) समस्त शरीरोंका स्वामी है, प्रत्येक स्थानमें वर्तमान है। (बी) सबका विजयकर्ता है। (र) सबका प्यारा है उसको कबीर कहते हैं।

कस्तु वायुरजश्चैव विज्ञानं ज्ञानमीर्यते ॥

रसना ध्यायते नाम्ना यत्कवीरः स चोच्यते ।

(क) वायु और जलके साथ मिलकर एक रूप हो रहा है। (ब) ज्ञानरूप हो रहा है अर्थात् लद्दुनी विद्यासे पूर्ण है। (र) जिह्वा द्वारा रटा जाता है। जिसमें एकता है, जल, वायु, ज्ञान और ध्यान उसकी प्रशंसा करते हैं परन्तु वह उन सबसे जुदा है उसको कबीर कहते हैं।

कः पियूषरसाधीशो वीतृष्णामोहनाशकृत् ॥

रक्षिताऽखिललोकानां यत्कवीरः स चोच्यत ॥

जो (क) स्वच्छ अमृत स्वरूप है। (बी) कांक्षा स्वाद और बुरे ध्यानोंको दूर करनेवाला है। (र) सबकी रक्षा और सतर्कता करनेवाला है, उसको कबीर कहते हैं।

कः करुणामयः सिन्धू, विर्मुक्तो मनसी स्थितः ।

रसास्मरचयोगेषु यत्कवीरस्स चोच्यते ॥

जो (क) केवल एक दयाका समुद्र है। (बी) मुक्तिको देनेवाला है। (र) समाधि करानेवाला है, उसको कबीर कहते हैं।

कः कामाद्यखिलादीनां वीबिहंगो जितेंद्रियः ।

रमाय निगमाश्चैव यत्कवीरस्स चोच्यते ॥

(क) जो अच्छी कामनाको पूर्ण करने वाला है। (ब) बिहङ्ग एक पक्षीका नाम है। वह चित्त, मन और इन्द्रीके बन्द करनेके निमित्त होता है और समस्त मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करने वाला है। समस्त संसारमें एक प्रकारका है। उसे कबीर कहते हैं।

कः कन्दर्पो वीर्ययुक्तो दयामुक्तोह्यनामयः ॥

सत्यरत्नसमायुक्तो यत्कवीरस्स चोच्यते ॥

जो (क) कामरूप कामनासे पृथक्, दयाकरके समझ, नाम और रूपसे रहित, सत्यरूपी रत्नसे मिला हुआ है उसे कबीर कहते हैं।

चार पशु

कः कल्पद्रुमसत्त्वेषु विशदं भावसाक्षिणम् ।

रजति ह्यक्षरश्चैव यत्कबीरस्स चोच्यते ॥

जो (क) कल्पवृक्ष है, समस्त पदार्थोंका देनेवाला है (बी) उत्कृष्ट भावका जाननेवाला है (र) समस्त दुःख चिन्ताका दूर करनेवाला है, उसको कबीर कहते हैं ।

कश्च कलाकरोत्येवं विवकाललनामयम् ।

रसभारा भूता येन यत्कबीरस्स चोच्यते ॥

जो (क) समस्त शब्द हो रहे हैं । समस्त स्थानोंमें पूर्ण है । (बी) मिलाव, शब्दसे रहित चैतन्य रूप है (र) समस्त रसोंको धार रहा है, उसको कबीर कहते हैं ।

कः कर्मोद्धारमेतेषु विरंच्यो मुक्तिमार्गणम् ।

रसनासिंधुनामेषु यत्कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) केवल मुक्तिदाता है आनन्दका आनन्द देनेवाला है (बी) मुक्तस्वरूप है । (र) जिह्वा प्रशंसामें आप परमेश्वरके सद्गुण हैं, समुद्रके समान जैसे, अनन्त नाम परमेश्वरके हैं उसको कबीर कहते हैं ।

कः कर्णामयः कायो विविधभावविशारदः ।

रमन्ते यत्समास्तेषां यत्कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) समस्त शरीरोंमें है (बी) बहुत स्वच्छ तथा अच्छा है । (र) अनेक होकर रम रहा है, उसको कबीर कहते हैं ।

कोभवसिन्धुकेर्बर्तो विविधो ह्यघदाहकः ।

रकारो केशवो नाम यत्कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) इस उत्पत्ति सागरका मल्लाह है । (बी) समस्त पापोंका पृथक् करनेवाला है । (र) अद्वितीय है उसीका नाम कबीर है ।

कः कुन्दः स्मरते तेषां विहर्तुं सुखसागरात् ।

रहस्योमरलोकेषु यत्कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) समस्त शास्त्रोंमें प्रकाशमान है । (बी) सुखरूप समुद्रमें रम रहा है । (र) अमरलोकमें आनन्द और सुखरूप समुद्र है, उसको कबीर कहते हैं ।

कलिकर्मविनाशी च विमलश्चित्तनिर्मलः ।

रागद्वेषविनिर्मुक्तो यः कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) कलियुगमें समस्त पापोंका नाश करनेवाला है । (बी) समस्त पापोंसे पृथक् है । (र) समस्त भेदी तथा बँरसे पृथक् है, उसको कबीर कहते हैं ।

नरपशु, दुष्टांत

कः कमनीयो भावेषु विसर्गः सर्वभावनः ।

रः सशान्तः समाधानो यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) अक्षरसे यह तात्पर्य है कि, जो समस्त गुणोंसे पूर्ण है । (बी) समस्त संसारका रचयिता तथा स्वामी है । (र) आनन्द स्वरूप है, उसको कबीर कहते हैं ।

कलौनाम प्रिये प्रोक्तं विवर्णं यागधारणम् ।

रागद्वेषपरित्यागी यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) प्रेम और प्रेमसे उत्पत्ति करनेवाला तथा (बी) सब ओर देख रहा है । (र) मैत्री तथा विरोधसे पार है उसको कबीर कहते हैं ।

कमलोद्भवसंभूतौ वीक्षते मृदुमंजुलः ॥

समर्थः सर्वलोकानां यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) कमलसे उत्पन्न हुआ, कमलोंके दलोंसे प्रगट हुआ । (बी) देख रहा है, समसृष्टि है, (र) सर्वलोकमें समर्थ है, उसको कबीर कहते हैं ।

मुक्तिमार्गविनोदश्च भक्तिमार्गललामयः ।

रसनामृतमूलेषु यः कबीरः स चोच्यते ॥

मुक्ति तथा सत्यका दिखानेवाला है । भक्ति पक्षका उजियारा करनेवाला है । जो अमृतका निचोड़ है, उसको कबीर कहते हैं ।

कंटकैभ्यो विनिर्मुक्तो विश्वासोच्छ्वास एव च ।

रमन्ते सर्वभूतानि यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) दुःख तथा कष्टसे अलग (बी) श्वासमें होकर जगत्में जगत् रूप हो रहा है । (र) समस्त जीवोंको आनन्द देनेवाला है, उसको कबीर कहते हैं ।

कैवर्तः सर्वलोकानां विदेहस्य प्रकाशकः ।

रजनी भव उत्साहो यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) समस्त संसारका मल्लाह है । (बी) देहका प्रकाश करनेवाला है । (र) ज्ञानरूप है । यानी संसार सागरसे पार उतारनेको जो खेवट है उसीको कबीर कहते हैं ।

कपाटस्यपटच्छेता विचारः परमार्थकः ।

रागद्वेषविनाशश्च यः कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) अज्ञानके द्वारोंका तखता तोड़नेवाला है (बी) परमार्थरूप है, परमार्थके निमित्त है । (र) मैत्री तथा विरोधको पृथक् करनेवाला है, उसे कबीर कहते हैं ।

दूसरा दुष्टांत

कथितो ज्ञानध्यानेषु बीजमंत्रसुसंग्रहः ।

राजीवलोचनश्चेह यत्कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) ज्ञान और ध्यानका देनेवाला है । (ब) बीज मंत्रोंका मुख्य-स्वरूप है । (र) कमलरूप है उनको शब्द कहते हैं उसीको कबीर कहते हैं ।

कुरुते नित्य ज्ञानं च विमला निर्मला मतिः ।

रमणीयः सदाचारो यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) उसका ज्ञान सदैव स्थिर और नित्य है । (ब) वैराग्य होता है । (र) ऋद्धि और सिद्धि पवित्रता देनेवाला है । एक स्वरूपसे बहता है, उसको कबीर कहते हैं ।

कः कलौ केवलः सार्थो विद्वेषपरिकीर्तितः ।

ऋद्धि शुभसमासेन यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) कलियुगमें जीवोंके साथ है । (ब) बोधरूप होकर पापोंका नाश करता है । (र) सबके हृदयोंमें मिल रहा है । उसको कबीर कहते हैं ।

कः कलौ सर्वकल्याणं विवेकज्ञानसंहितम् ।

रागयुताहृता वार्ता यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) कलियुगमें जीवोंको कल्याण देता है । (ब) विवेक तथा ज्ञानके साथ संयुक्त हो रहा है । (र) प्रेमके साथ सबमें रम रहा है । उसको कबीर कहते हैं ।

कविः पुराणः वपुषो विदेहो देहवान्सुधीः ।

गुरुयोगी सुराणां च यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) जो है सो स्वयम् चैतन्यस्वरूप है उसका आरम्भ तथा अन्त कुछ नहीं । विदेहसे भी दूर है और उसके साथ भी है । (र) ज्ञान स्वरूप है समस्त देवताओंको गुरु है उसको कबीर कहते हैं ।

कबीनां प्रवरौ ज्ञाता धाता माता पितामहः ।

जनकः सर्वलोकानां यः कबीरः स चोच्यते ॥

कबीर नाम है अत्यन्त उत्तम श्रेष्ठ तथा सबका जाननेवाला है । सबका पिता है, पितोंका पिता है । समस्त संसारका रचयिता है । (र) सबका जाननेवाला है उसको कबीर कहते हैं ।

असद्भा इदमग्र आसीत् ततो वै सदजायत ।

तदात्मानं स्वयमकुरुत तस्मात्तत्सुकृतमुच्यते ॥

यह जगत् अपनी उत्पत्तिसे पूर्व अव्याकृत नामरूपवाला था, इसीसे यह

पैदा हुआ, उसने स्वयं अपनेको किया इस कारण उसे सुकृत कहते हैं। जब आत्माने अपना रूप पाया और निर्गुणसे सगुण हुवा, आपसे अपनेको प्रगट किया। इस कारण उसका नाम सुकृत है।

यहाँलो तो मैंने परसंवेद अथवा प्रकृत वेदका प्रमाण लिखा। अब जानना चाहिये कि, कुल प्रकृत वेद बराबर इस बातकी साक्षी देते हैं कि, ये कबीर ! तू ही समस्त संसारका सर्जनकर्ता तथा प्रबंध कर्ता है। अनन्त करोड़ ब्रह्माण्ड सब तेरी रचना है। एकोत्रके कुछ श्लोक जो मैंने लिखे हैं, वे एक सौ श्लोक पर्यन्त बराबर शिवजी कबीरके नामकी प्रशंसा करते गए हैं। पार्वतीजीका मन रख गए हैं। इसी प्रकार याज्ञवल्क्य और समस्त ऋषि मुनि आरम्भसे आजलों बराबर करते आए हैं। जबभी करते रहे तथा करेंगे।

ऋषीश्वरोंका वचन।

रामानन्द—कर्ता तुमही साधू हो, सत कबीर है देव।

तनमन हों तुमें अपि हौं, कुलदिक्षा तोहि देव ॥ [क. १० आ. ४३]

धर्मदास—बाजा बाजे रहितका, परा नगरमें शोर।

सद्गुरु खसम कबीर हैं, नजर न आवे और ॥ [क. १० आ. ४०]

गोरखनाथ—नौनाथ चौरासी सिद्ध, इनका अनहद ज्ञान।

अविचल घर कबीरका, यह गति विरला जान ॥

झोरी झण्डा कूबरी, शैली टोपी साथ।

दया भई जब कबीरकी, चढ़ाई गोरखनाथ [क. १० आ. ४]

नाभाजी—बानी अरब व खरबलौं, ग्रंथों को हज़ार।

कर्ता पुरुष कबीर है नाभे किया विचार ॥ [क. १० आ. ४९]

राग महला पहला।

नानकशाह—यक अर्ज गुफ्तम पेश तू दर गोश कुन करतार।

हक्का कबीर करीम तू वे ऐब परवरदिगार ॥

दुनियाँ मुकाम फानी तहकीक दिलदानी।

मन सर मूह इजराईल गिरफ्त दिलबीच नदानी ॥

जन पिसर बेरादर कसनेस्त दस्तमगीर।

आखिर बेयफ्तम कस नदारम चूंशब्द तकबीर ॥

शप्रोरोज गशतम दरहवा करदेमबदीख्याल।

गाहेन नेकी कारकरदम मन ईंचुनी अहवाल ॥

बदबस्तहमचू दखील शाफिल बेनजर बेबाक।

नानक बगोयदजीं तोरों पातरा चाकरा पाखाक ॥

गुरुपशु अन्धोंका पन्य

साचक अङ्गकी साखियाँ ।

दादूराम— जै जै शरण कबीरके, तरगए अनन्त अपार ।
दादूगुण कीता^१^ कहै, कहत न आवै पार ॥
कबीर कर्ता आप है, दूजा नाही कोय ।
दादू पूरन जगतको, भक्ति दृढ़ावन^२^ सोय ॥
ठीक पूरन^३^ होय जब, सब कोइ तजै शरीर ।
दादूकाल^४^ गँजे नहीं, जपै जो नाम कबीर ॥
आदमकी आया^५^ कटे, तब यम घेरै आय ।
सुमिरन किए कबीरका, दादू लियो बचाय ॥
मेट दिया अपराध सब, आय मिले छनमाँह^६^ ।
दादूको सँग ले चले, कबीर चरणकी छाँह ॥
सेव^७^ देव^८^ निज चरणकी, दादू अपना जान ।
भूङ्गी सत्यकबीरके, कीन्हा आप समान^९^ ॥
दादू अधम अनेक हैं, भगत दानतप हीन ।
कबीर साहब सहजमें, ताहि अपन^१०^ करलीन ॥
दादू अन्तरगत सदा, छिन छिन सुमिरन ध्यान ।
वारूँ^११^ नाम कबीर पर, पल पल मेरा प्रान ॥
सुन सुन साखि कबीरकी, मगन^१२^ भया मन मोर^१३^ ।
दादू थाके खोजके, जैसे चन्द्र चकोर ॥
सुन सुन साखि कबीरकी, काल नवावे माथ ।
धन्य धन्य हो तिन लोकमें, दादू जोड़े हाथ ॥
केहरि नाम कबीरका, विषम^१४^ काल गजराज ।
दादू भजन प्रतापते, भागे सुनत आवाज ॥
पल^१५^ तै नाम कबीरका, दादू मनचित लाय ।
हस्तीके अवसारको, श्वान काल नहीं खाय ॥
सुमिरत नाम कबीरका, कटे कालकी पीर ।
दादू दिन दिन ऊंचे, परमानन्द सुख सीर ॥
दादू नाम कबीरका जो कोई लेवे ओट^१६^ ।
तिनको कबहुँ न लागई, काल बज्रकी चोट ॥
और सन्त सब कूप हैं, कोते^१७^ सरिता नीर ।

१ कितना, २ मजबूत करते, ३ पूरा, ४ मारे, ५ उग्र, ६ क्षण, ७ सेवा, ८ दो, ९ बराबर, १० अपना,

११ बारह, १२ प्रसन्न, १३ आपके, १४ वैरी, १५ पलभर, १६ ओढ, १७ कितनेक ।

नकटोंका पन्य

दादू अगम अपार है, दरिया सत्यकबीर ॥
हिन्दू अपनी हृद चलें, मुसलमान हृद मांहि ।
दादू चाल कबीरकी, दोनों दीनमें नाहिं ॥
हिन्दूके सदगुरु सँही, मुसलमानके पीर ॥
दादू दोनों दीनमें, अस्ली नाम कबीर ॥
अबही तेरी सब मिटै, जन्म मरन की पीर ।
श्वास उश्वासा सुमिरले, दादू नाम कबीर ॥
कोई सगुनमें रीझ' रहा, कोई निर्गुन ठहराय ।
दादू गति कबीरकी, मोते कही न जाव ॥
दादू गति कबीरकी, मोते कही न जाय ॥
भवजल तारन जीवको, खेवट' आए कबीर ।
अनन्त कोट सुख भावसे, दादू उतरे तीर ॥
मुखसे ज्ञान कबीरका, कोई मोहि कह समुझाय ॥
दादू वाको चरणरज, लइहों शील चढ़ाय ॥
नाम कबीर जो नर जपै, मैं बलिहारी ताहि ।
तन मन वारुं तासु पर, दादूप्रान लगाय ॥
सुमिरत नाम, कबीरका, जिह्वा मोर सुखाय ।
विरह अग्नि तनमें तपै, दादू कौन बुझाय ॥
दादू नाम कबीरका, सुनिके कौपे काल ।
नाम भरोसे नर चले, बङ्क' न होवे बाल ॥
जिन मोको निज नाम दर्ई, सदगुरु सोइ हमार ।
दादू दूसर कौन है, कबीर सर्जनहार ॥
कबीर साहब कह गए, ढोल बजाय बजाय ॥
दादू दुनियाँबावरी, ताके सङ्ग न जाय ।
दादू बैठि जहाज पर, गये समुद्रतीर' । [क. १० आ. ४९]
जलमें मच्छी जो रहें, कहे कबीर कबीर ॥
स्वाती शब्द कबीरका, सूरति जो सीप विचार ।
दादू तनमन जोड़के, लेत बूंद अनुसार ॥
स्वाती शब्द कबीरका, चात्रक' मन भवहास ।
दादू और पिपै नहीं, स्वाति बूंदकी आस ॥

वेद पशु

स्वाती शब्द कबीरका, सो हम पिया आघाय ।
मनकी प्यासा सब मिठी, दादू रहे समाय ॥
जैसे मिरगा^१^ नाद^२^ सुन, तन मन भूले प्रान ।
दादू भूले देह गुन, सुन कबीरको ज्ञान^३^ ॥
केवल नैन कबीरका, उज्ज्वल रूप अनूप ।
दादू अन्तर निर्मला, देखे सहज स्वरूप ॥
शोभा देखि कबीरकी, नैन रहे ललचाय ।
कहा कहूँ छवि रूपकी, दादू कही न जाय ॥
एकै रोम कबीरका, कोटिभानु^४^ छवि छाया ।
दादू^५^ कौतुक चन्द ते, शीतलता अधिकाय ॥
बन्दों चरनकबीरके, कोटि बार पल माँहि ।
दादू हवस मनमें रही, कोटिक रसना नाँहि ॥
कोटि कर्म पलमें कटें, नाम कबीर जो लेह ।
दादू सच्चे होत है, सुफल मनोरथ देह ॥
परमारथके कारनै, आप स्वार्थी नाहि ।
कबीर आए भगति लै, दादू भवजल माहि ॥
भगति करै संसारमें, युग युग नाम धराय ।
दादू तारन जीवको, काशी प्रगटै आय ॥
बहुत जीव अटके^६^ रहे, विन सद्गुरु भव माहि ।
दादू नाम कबीर विन, छूटे एकौ नाहि ॥
सद्गुरु बहियाँ जीवको, मंशधार भवसिन्ध ।
दादू नाम कबीरका, छोड़ आवे भवफंद ॥
साचा शब्द कबीरका, मीठा लागै मोय ।
दादू सन्ता परम सुख, कीता^७^ आनंद होय ॥
साचा शब्द कबीरका, सब सुखदाई सोय ।
दादू गुरु परतापते, कीता भरोसा होय ॥
साचा शब्द कबीरका, सन्त सुना चित लाय ।
दादू भ्रम सब मिटगया, कर्मकाल नहि खाय ॥
साचा शब्द कबीरका, सबका होय सहाय^८^ ।
रोग दुःख तरे ताप सब, दादू दूर पराय^९^ ॥

त्रिया पशु

साचा शब्द कबीरका, तोल, मोलमें नौहिं ।
दाढ़ दूसर ना मिलै, जो खोजे' घट' माँहिं ॥
साचा शब्द कबीरका, युग युग अटल अभूल ।
दाढ़ पावै पारखू', परम पुरुष निजमूल ॥

गरीबदासजीकी साखियाँ

गरीब- नमो नमो सत्पुरुषको, नमस्कार गुरु कीन ।
सुरनर मुनि जन साधुवा, सन्तों सर्वश' दीन ॥
गरीब, पुर पठन सतलोक है, "अदली सद्गुरुसार ।
भगति हेत सो ऊतरे, पाया हम दीदार ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमे मिला, सुन्न विदेशी आप ।
रोम रोम परकाशहै, दीना अजपा' जाप ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमे मिला सुरत'सिन्धुके सैन ।
उर' अन्तर परकाशिया', जअव सुनाए वैन' ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमे मिला, सुरतसिन्धुके नाल' ।
गौन' किया सतलोकसे, अनलपंखकी चाल ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमे मिला, सुरतसिन्धुके तीर ।
सब संतन "शिरताज है, सद्गुरु, अटल कबीर ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमें मिला, वेपरवाह अबंध' ।
परम हंस पुरन पुरुष, रोम रोम रविचंद ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमें मिला है जिन्द ' जगदीश ॥
सुन्न विदेशी मिल गया छत्र मुकुट है शीश ॥
गरीब, जिन्दा जोगी जगत गुरु, मालिक मुरशिद पीव ।
कालकर्म लागै नहीं, "सनका नाही शीव ॥
गरोब जिन्दा जोगी जगत गुरु मालिक मुरशिद पीव ।
दोहूं' झगरा पड़ा, पाया नहीं शरीर ॥
गरीब, ऐसा सद्गुरु हमें मिला, तेज पुञ्जको अङ्ग ।
झिलमिल नूर जहूर है, रूप रेख नहिं रङ्ग ॥


१ ढूँढे, २ दिलमें ३ पारखी, ४ सब कुछ, ५ कबीर, ६ दर्शन, ७ शवासपर होने वाला हंस
सोहम् आदि स्वाभाविक जप, ८ स्मृति, ९ हृदय, १० प्रकाश ११ वाणी, १२ ऊपर,
१३ गमन, १४ श्रेष्ठ, १५ वन्धनरहित, १६ नदीमें नानकदेवजीको दर्शन देनेवाला, १७ डर,
१८ हिन्दू मुसलमान दोनोंमें ।

उद्धारकी दवा

गरीव, ऐसा सद्गुरु हमें मिला, खोले वज्रकपाट ।
अगम भूमिकी गम करे, उतरे औघट घाट ॥
गरीव, सद्गुरु मारचो वान कसि, महवर गाँसी खींच ।
कर्म भरम सब हीनसे, ज्ञानीको ब्रूधि सब एँच ॥
गरीव, सद्गुरु आय दया करि, ऐसे दीन दयाल ।
बन्दीछोर विरद किया, जठराग्नी प्रतिपाल ॥
गरीव, यम जोरा, जासे डरे, धरमराय धर धीर ।
ऐसा सद्गुरु एक है, अदली अदल कवीर ॥
गरीव यम जोरा जास डरे, मिटे करमको रेख ।
अदली अदल कवीर है, कुलका सद्गुरु एक ॥
गरीव, ऐसा सद्गुरु हम मिला, भवसागरके बीच ।
खेवट सबको खेवता, क्या उत्तम क्या नीच ॥
गरीव, मायाको रस पीयके, डूब गए दो दीन ॥
ऐसा सद्गुरु हम मिला, ज्ञान योग परवीन ॥
गरीव, साहबसे सद्गुरु भये, सद्गुरुसे भय साध ।
ये तीनों एक अङ्ग हैं, गति कुछ अगम अगाध ॥
गरीव, अंधे गूंगे गुरु घने, लोभी लँगड़े लाख ॥
साहबसे परिचय नहीं, काहि बनवावैं साख ॥
गरीव, ऐसा सद्गुरु सेविये, शब्द समाना होय ।
भौसागरमें डूवते, पार लँघावैं सोय ॥
गरीव, सद्गुरु पूरण ब्रह्म हैं, सद्गुरु आप अलेख ।
सद्गुरु रमता राम हैं, यामें मीन न मेख ॥
गरीव बङ्कनालके अन्तरै, तिरवेणीके तीर ।
जहाँ हमें सद्गुरु लेगया, बन्दी छोड़ कवीर ॥
गरीव, शून्यमण्डल अनुराग है, शून्यमण्डल रह थीर ।
दाम गरीव उधारिया, वंदीछोड़ कवीर ॥
गरीव, या मुखते मुख सगुण, ब्रह्म शब्दके माँहि ।
सद्गुरु मिले कवीरसे सतलोकलें जाँहि ॥
गरीव, जैसे ब्रादल गगनमें, चलतें हैं बिन पाँय ।

ऐसे पुरुष कबीर हैं, शून्यमें रहे समय ॥
गरीब, गगनमण्डलसे ऊतरे, साहब पुरुष कबीर ।
चोला धरा खवासका, तोड़े यम जञ्जीर ॥
गरीब, आदौ आदि कबीर हैं, चौदह भुवन विशाल ।
हीरे मोती बहुत हैं, कबीर लालनके लाल ॥
गरीब, ऐसा निर्मल ज्ञान है निर्मल करे शरीर ।
और ज्ञान मण्डल सबै, चक्के ज्ञान कबीर ॥

चौपाई— दास गरीब कबीर को चेरा । सत्य लोक अमरपुर डेरा ॥
अमृत पान अमिय रस चोखा । पीवे हंसा नाही धोखा ॥

पर प्रकट हो कि, समस्त सिद्ध साधु ऋषि मुनि पीर पैगम्बर जिस किसी सत्यगुरुको पहचाना उसकी श्रेष्ठताको जाना, वो मृत्युजित् हो गया । तीनों कालके औलिया अम्बिया साधु ऋषि मुनि बराबर इसी प्रकार उसकी प्रशंसा करते चले आते हैं । भली भाँति जाँच करते और पवित्र पुस्तकों तथा हदीसों इत्यादिसे मालूम हो जावेगा । चारों वेद पुराण आदि सब सत्यगुरुकी प्रशंसा किया करते हैं । कबीर साहबके भिन्न भिन्न नामोंसे सब ग्रंथों तथा पुस्तकोंमें उसकी प्रशंसा लिखी हुई है । जो सत्यगुरुका हंस अड़कुरी जीव होगा सो तुरन्त इस सत्यगुरुको पहचान लेगा तनिक विलम्ब न लगेगा, कोई सन्त जौहरीही मणिकी पहचानमें होता है । घेदों और पुस्तकोंमें कबीर साहबकी प्रशंसा तो अनेक स्थानोंमें लिखी देखते हैं । कोई पण्डित पढ़कर सोचता हुआ अर्थ लगाता है कि, कबीर नाम रामचन्द्रका है । कोई कहा है कि, कबीर नाम विष्णु किम्बा राम चन्द्रका है । पण्डितोंमेंसे कोई यों कहता है कि, इन महाशयोंमें कोई कबीरके नामके योग्य नहीं दिखाई देता; पर शून्य चैतन जो ब्रह्म है उसको कबीर कहते हैं । अब विचारना उचित है कि, यदि चैतन्य ब्रह्म उस सर्वशक्तिमान् जगदीश्वरका नाम है तो वह कौन है कौन गुरु उससे मिलता है, कौन शास्त्र उससे संयुक्त होनेका पथ दिखाता है ? यदि उसको निर्गुण निराकार ठहराते कि, जिसके श्वाससे चारों वेद निकले तो यह बात भी नहीं दीखती सो कि, वेदकी आज्ञाएँ, स्पष्ट प्रकट करती है कि, वह पुण्यात्मा परमेश्वर जिसकी, आज्ञाएँ नितान्तही स्वच्छ तथा निर्दोष होनी चाहिँएँ वह कलुषित कार्योंके करनेकी आज्ञा कदापि नहीं देगा । वह किसीको धोखा तथा दगा नहीं देता । किसीसे मैत्री वर नहीं रखता । इस प्रकारके कार्य तो मायाके हैं । शुद्ध ब्रह्म कदापि ये काम नहीं

करता, वह सब दोषोंसे विशुद्ध है उसका नाम कबीर है, दूसरेका नहीं हो सकता । यदि वह कबीर रामचन्द्रका नाम होता तो रामचन्द्रका उपासना करनेवाले कबीरका नाम जपते । यदि वह शुद्ध ब्रह्म कृष्ण अथवा विष्णु होता तो विष्णुके उपासकोंमेंसे कोई कदापि कबीरका नाम लेते । यदि कबीर नाम निर्गुण ब्रह्मका होता तो योगी लोग कभी कबीरका नाम लेते । इसी प्रकार प्रत्येक धर्मावलम्बियोंसे भली-भाँति जाँच कर लेना चाहिये कि, शुद्ध ब्रह्मका नाम कबीर है क्या इस ब्रह्मकी उपासना कौन लोग करते हैं ? जिस धर्मका मनुष्य उस कबीरका नाम लेता है, उसकी चाल चलन कैसी है ? हों वास्तवमें जो उस शुद्ध ब्रह्म कबीरका नाम लेता है उसके समस्त कार्य विशुद्ध हो जावेंगे कुछ दोष तथा भ्रष्टता न रहती । प्रत्यक्ष प्रगट है कि, उस शुद्ध ब्रह्म कबीरके उपासक केवल कबीरपंथी है दूसरा कोई नहीं, वही विद्वान वही सुविज्ञ तथा बुद्धिमान् और बहुत तात्त्विक है जो इस सत्यगुरुको पहचानकर कालपुरुषके धोखे तथा धूर्ततासे दूर भागे, फिर उधर कभी दृष्टि न करे शुद्ध ब्रह्म, कबीरका चरण दृढ़ताके साथ पकड़े फिर कभी न छोड़े । जिस किसीने इस सत्यगुरुको पहचान लिया फिर भी उसके शरणमें नहीं आया तो उसके दुर्भाग्यने उसको दूर कर दिया । उसका कोई वश नहीं, ऐसा समझना चाहिये । जितने नाम सत्यपुरुषके हैं उन सब नामोंसे कालपुरुषने आपको प्रकट किया वही नाम अपना रक्खा, सत्यपुरुषका नाम छिपाया, सत्यपुरुषकी भक्ति तथा मुक्तिकी राह रोक ली । समस्त मनुष्योंको अपनी भक्तिमें लगाया, वेद तथा उसकी आज्ञाओंमें फँसा लिया । सत्यपुरुषका पथ किसीसे पहचाना नहीं जाता । वे नहीं जान सकते कि, कालपुरुषका पंथ किसीसे पहचाना नहीं जाता । वे नहीं जान सकते कि, कालपुरुष कौन है, सत्यपुरुष कौन है ? दिनरात वेद पुस्तक पढ़ा करते हैं कभी किसीका स्वच्छ हृदय नहीं हुआ है, दिन प्रतिदिन बरबादी और हैरानी होती है, सबके सब अन्धकारमें चले जाते हैं । समस्त ऋषि मुनि स्वसंवेदकी बराबर प्रशंसा करते चले आते हैं पर स्वसंवेदके पहचाननेवाले लोग बहुत थोड़े हैं, बहुत कम आदमी इस पर चलते हैं । इसे बिना पढ़े किसीको सुख नहीं मिलेगा । कोई वेद अथवा पुस्तक पढ़ो पर स्वसंवेदके पाठसे ही हृदयका संतोष होगा, बिना इसके कालपुरुष तथा सत्यपुरुषकी तनिक भी भिन्नता न मालूम होगी । उन्हींका हृदय तथा मस्तक प्रकाशित होता है जो स्वसंवेदकी आज्ञाओंपर चलते हैं, उसको पढ़कर भलीभाँति सोचते समझते हैं । वेही बुद्धिमान् दूरदर्शी मनुष्य हैं जो कालकी दुष्टता और जालसाजियोंको जानकर उससे दूर भागते हैं वेही लोग

महम्मद साहबकी मांग भृंगीकीटका दूष्णंतकी कविता

सच्चे मनुष्य हैं जिनमें बुद्धि है, जिनमें बुद्धि नहीं वे सब मनुष्यत्वसे परे हैं वे सब पूरे पशु समझे जाते हैं। इन्हीको डांगर ढोर कोड़े मकोड़े इत्यादि कहा गया है—

तमीजो अकल वनइसां अताय खुदावन्दी ।
वशकल आदम अलीं खुवासतो नरिन्दी ॥
बरुं खलोकु दरुं देख उसकी नीयत क्या ।
अगर तमीज नहीं फिर तो आदमियत क्या ॥

यह मनुष्य ज्ञानअन्ध हो एक ओरसे भागकर दूसरी ओर जाता है जिसमें कि, उसको सुख तथा आराम मिले, जब उधर भागकर जाता है तो देखता है कि, वही आग जिसमें पहले जल रहा था, वही उधर भी दिखाई देती है। यहाँ तक दशोंदिशा है यह दौड़ता फिरता है। जिधर जाता है उधर वही आग वही शूली और वही कसाई छूरी लिये गला काटनेको उपस्थित है, जब वह दूढ़ते दूढ़ते थक जाता है तब कहीं पड़कर आँख बंदकर बैठ रहता है, अपने मनमें सोचता है कि, अब मैं किधर भाग कर जाऊँ? कहीं पता ठिकाना नहीं लगता न कोई सत्य तथा सन्तोषका उपाय ही दिखाई देता है? इसी प्रकार षट्दर्शनके लोग, एक मतको छोड़ कर दूसरे मतको पसंद करते हैं। वही अग्नि उधर भी देखते हैं। हिन्दुओं तथा सैकड़ोंही पंथके लोगोंकी यही दशा है। कितने लोग हिन्दू धर्म छोड़कर मुसलमान तथा ईसाई आदि हो जाते हैं जब उधरका वृत्तान्त भलीभाँति मालूम हो जाता हो तो उनके अग्निस्वरूप दिखाई देता है। फिर क्या करें कोई वश नहीं रहा। जिस किसी भाग्यवान्को पारखगुरु मिलजाता है वो उसकी शिक्षा स्वीकार करता है तो सुख पाता है; इसी प्रकार इन तीनों लोकोंके समस्त जीव कालपुरुषकी अग्निमें जल रहे हैं वह सबको भून भूनकर खाया करता है। उसके धोखे दगाओंसे कोई किसी प्रकार भी नहीं बच सकता।

सारे स्वसंवेद का यह कथन है कि, सत्यपुरुषने कालपुरुषको तीनों लोकका राज्य प्रदान किया है यह अपने पूजा पाठसे बड़ाही बलिष्ठ हो गया है यहाँ तक कि, जब कबीर साहबके हंस पृथ्वीपर देह धरते हैं मनुष्योंको मुक्ति-प्रदानार्थ उनका पृथ्वीपर अवतार होता है तो कालपुरुष उनको धोका तथा दगा देता है। जब वे धोखेमें पड़ जाते हैं, तब स्वयम् कबीर साहब शरीर धारण करके इनको मुक्त कराकर कालकी पहुँचसे बाहर खींचकर सत्यस्वरूपी देह प्रदान करते हैं जिससे कालपुरुषका कोई वश नहीं चल सकता है। वे लोग सत्य-

पुरुषकी भक्तिके प्रचार संसारमें करते हैं । जो शिक्षा स्वयम् कबीर साहबकी है वही शिक्षा उनके हंसोंकी भी है ।

वेदोंसे तो भलीभाँति प्रमाणित हो चुका कि, संस्कृत भाषामें किसको कबीर कहते हैं ? वह अद्वितीय तथा बेजोड़ है ।

अब मैं कबीरशब्दके माअनी अरबीमें प्रगट करता हूँ—कबीर किन्निया कुबरा अकबर एकही बात है । कबीर उसे कहते हैं जिसमें किन्न, (गौख) हो उसका किन्न सदैव एक रस रहे न कभी घटे एवं न बढ़े । कबीर साहबने स्वसंबेदमें ऐसीही आज्ञा की है कि केवल मैंही एक कबीर हूँ दूसरा कोई नहीं हो सकता जिस किसी दूसरेमें किन्न होवेगा उसका शिर मैं तोड़ूंगा । अतः तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ निरञ्जन है । जब उनके मनमें किन्नसमाया कबीर साहबसे सामना करनेके निमित्त प्रतुस्त हुआ तब कबीर साहबने एकही ऐसी चोट लगाई जिससे वे झोंझरी द्वीपको छोड़कर पातालको भाग गए । फिर दूसरा किन्न आदि भवानीमें पाया गया । तब कबीर साहबने उनको ऐसा ललकारा कि चरणों पर गिर पड़ी । फिर ब्रह्मा यम और शिवका किन्न (घमण्ड) दूर किया रामचन्द्रने जब राजा रावणको विजय किया तब उनमें कुन्न समाया अपनी भुजा पुजवाने लगे तब उनका भी कुन्न जाता रहा । कृष्णचन्द्रका किन्न नौसाल जरासिंधकी लड़ाईमें दूर हो गया । ऐसाही हिरण्यकशिपु, रावण, कंस, नमरुद, शदाद, फिरञ्जन इत्यादिका कुन्न दूर हो गया, किसीका न रहा । जिस किसीमें तनिक भी कुन्न होगा उसका छुटकारा कभी न होगा । निश्चय उसका शिर टूटेगा । केवल कबीरही कबीर है, दूसरा कोई कदापि नहीं हो सकता । इसीका कुन्न सदैव समान रहता है दूसरे किसीका नहीं । इस संसारमें जितनी सृष्टि है सब कबीर है । कुन्नसे खाली कोई नहीं, जिसपर वह सत्यगुरु दयालु हो वही कुन्नसे खाली हो सकता है । जिसको वह कुन्नसे खाली करता है उसको वह अपने तेजसे भर देता है । इस कारण किन्न उसीके योग्य है दूसरेके नहीं ; क्योंकि, कुन्नहीसे इस संसारका खेल खुल रहा है । इस कबीरके गुणकी तीनों कालके सिद्ध साधु और ऋषि मुनि इत्यादि बराबर बढ़ाई और प्रशंसा करते आए हैं । कोई कोई उनकी कृपासे उसको पहचान सकता है, उसकी प्रशंसा तो केवल वह स्वयम्ही जानता है, मैं तुच्छ दुर्बुद्धि मनुष्य क्या लिख सकूँ एवं क्या कह सकूँगा ? यदि मेरी अनगिनती जिह्वाएँ होतीं तो कुछ कह सकता । अतः मेरे निमित्त इतनाही यथेष्ट है कि इस विशुद्ध जगदीश्वरके चरणोंपर गिर अपने अपराधोंके निमित्त क्षमाप्रार्थी हो जाऊँ ।

मनुष्यताका उपदेश

गजल—ऐरूप शब्द अबद बः तकवीर । कौनेन तु नुक्तः एक तफ़सीर ॥
शरमिन्दः सरेम दर गरेवाँ । तरादामन तर बतर बतकसीर ॥
मामूरहूं सर बसर व असियाँ । तरसाँ हूं जे मालिकाने तहरीर ॥
रख अपने शरण चरणके नजदीक । कर चाक तु फ़ेल नामे तकदीर ॥
अफज्रू जे अदद मेरे गुनाहों । दे वख्श बफजल कर न ताखीर ॥
म निगर फेलम ब रह्य ब निगर । कर नेक नजर ब बन्दए पीर ॥
अज विसविसए जे नफ़स शैतों । रख अपने पनः गुनह बताफीर ॥
बस मेरी नजुस्तजू अवस है । मल्लाह मेरे जहाज़ कर तीर ॥
ले देख बचशम चार गुलाखार । वख्शिन्दः है सत्रका सत्य कबीर ॥
तुझ विन न किसीका है ठिकाना । करे कोई अमल हज़ार तदवीर ॥
हरशै भरी साई की लहर है । सब मुरदः हुए ज़हर की तासीर ॥
मैं मुरदा जला पिला पेयाला । भर दीजे अपनी अब शकर शीर ॥
है लोक व वेदमें खबर जो । सो कालपुरुष की सारी जागीर ॥
सब हस्त रसी उनसे जबरदस्त । दिल खौफोखतरसे उसके दिलगीर ॥
तन तेरे कदम पड़ा फ़िरोतन । आजिज को न छोड़ ऐ खबरगीर ॥

अध्याय १४.

कबीर साहिबके शिष्यजन

कबीर साहिबके शिष्योंको हंस कहते हैं । क्योंकि, हंसका नियम है कि, वो जल तथा दुग्धको पृथक् पृथक् कर देता है, दूधको पी जाता है, जलको छोड़ देता है । उसमें और भी अनेक गुण हैं । ऐसेही हंस कबीर हैं कि, यह जगत् जो मिथ्या तथा सत्यसे मिला हुआ है वे अपनी बुद्धि एवं ज्ञानसे पहचानकर मिथ्याको छोड़ देते हैं, सत्यको ग्रहण कर लेते हैं । हंस तथा बकुले इस संसारमें एक साथ घूमते फिरते हैं दोनों बुद्धि तथा ज्ञानसे पहचाने जाते हैं । इसी विषय पर कबीर साहिबने एक साखी कही है—

कबीर, हंसा 'बक' लखे एक सँग, चरै हरि'अरे ताल' ।

हंस क्षीरते 'जानिये, बक 'उधरें तेहि काल ॥

जिनको सत्यगुरुका पूरा पता लग चुका है वो कदापि वासना बन्धनमें नहीं फँसते, उनका आवागमन नहीं होता, उनको तनिक भी कालका भय नहीं ।

१ बगुला, २ देखे, ३ कमलोंके सर सज, ४ तालाब, ५ पानीसे दूधके अलग करनेपर,
६ मालूम हो ।