कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 531, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकः कल्पद्रुमसत्त्वेषु विशदं भावसाक्षिणम् ।
रजति ह्यक्षरश्चैव यत्कबीरस्स चोच्यते ॥
जो (क) कल्पवृक्ष है, समस्त पदार्थोंका देनेवाला है (बी) उत्कृष्ट भावका जाननेवाला है (र) समस्त दुःख चिन्ताका दूर करनेवाला है, उसको कबीर कहते हैं ।
कश्च कलाकरोत्येवं विवकाललनामयम् ।
रसभारा भूता येन यत्कबीरस्स चोच्यते ॥
जो (क) समस्त शब्द हो रहे हैं । समस्त स्थानोंमें पूर्ण है । (बी) मिलाव, शब्दसे रहित चैतन्य रूप है (र) समस्त रसोंको धार रहा है, उसको कबीर कहते हैं ।
कः कर्मोद्धारमेतेषु विरंच्यो मुक्तिमार्गणम् ।
रसनासिंधुनामेषु यत्कबीरः स चोच्यते ॥
जो (क) केवल मुक्तिदाता है आनन्दका आनन्द देनेवाला है (बी) मुक्तस्वरूप है । (र) जिह्वा प्रशंसामें आप परमेश्वरके सद्गुण हैं, समुद्रके समान जैसे, अनन्त नाम परमेश्वरके हैं उसको कबीर कहते हैं ।
कः कर्णामयः कायो विविधभावविशारदः ।
रमन्ते यत्समास्तेषां यत्कबीरः स चोच्यते ॥
जो (क) समस्त शरीरोंमें है (बी) बहुत स्वच्छ तथा अच्छा है । (र) अनेक होकर रम रहा है, उसको कबीर कहते हैं ।
कोभवसिन्धुकेर्बर्तो विविधो ह्यघदाहकः ।
रकारो केशवो नाम यत्कबीरः स चोच्यते ॥
जो (क) इस उत्पत्ति सागरका मल्लाह है । (बी) समस्त पापोंका पृथक् करनेवाला है । (र) अद्वितीय है उसीका नाम कबीर है ।
कः कुन्दः स्मरते तेषां विहर्तुं सुखसागरात् ।
रहस्योमरलोकेषु यत्कबीरः स चोच्यते ॥
जो (क) समस्त शास्त्रोंमें प्रकाशमान है । (बी) सुखरूप समुद्रमें रम रहा है । (र) अमरलोकमें आनन्द और सुखरूप समुद्र है, उसको कबीर कहते हैं ।
कलिकर्मविनाशी च विमलश्चित्तनिर्मलः ।
रागद्वेषविनिर्मुक्तो यः कबीरः स चोच्यते ॥
जो (क) कलियुगमें समस्त पापोंका नाश करनेवाला है । (बी) समस्त पापोंसे पृथक् है । (र) समस्त भेदी तथा बँरसे पृथक् है, उसको कबीर कहते हैं ।