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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कः कल्पद्रुमसत्त्वेषु विशदं भावसाक्षिणम् ।

रजति ह्यक्षरश्चैव यत्कबीरस्स चोच्यते ॥

जो (क) कल्पवृक्ष है, समस्त पदार्थोंका देनेवाला है (बी) उत्कृष्ट भावका जाननेवाला है (र) समस्त दुःख चिन्ताका दूर करनेवाला है, उसको कबीर कहते हैं ।

कश्च कलाकरोत्येवं विवकाललनामयम् ।

रसभारा भूता येन यत्कबीरस्स चोच्यते ॥

जो (क) समस्त शब्द हो रहे हैं । समस्त स्थानोंमें पूर्ण है । (बी) मिलाव, शब्दसे रहित चैतन्य रूप है (र) समस्त रसोंको धार रहा है, उसको कबीर कहते हैं ।

कः कर्मोद्धारमेतेषु विरंच्यो मुक्तिमार्गणम् ।

रसनासिंधुनामेषु यत्कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) केवल मुक्तिदाता है आनन्दका आनन्द देनेवाला है (बी) मुक्तस्वरूप है । (र) जिह्वा प्रशंसामें आप परमेश्वरके सद्गुण हैं, समुद्रके समान जैसे, अनन्त नाम परमेश्वरके हैं उसको कबीर कहते हैं ।

कः कर्णामयः कायो विविधभावविशारदः ।

रमन्ते यत्समास्तेषां यत्कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) समस्त शरीरोंमें है (बी) बहुत स्वच्छ तथा अच्छा है । (र) अनेक होकर रम रहा है, उसको कबीर कहते हैं ।

कोभवसिन्धुकेर्बर्तो विविधो ह्यघदाहकः ।

रकारो केशवो नाम यत्कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) इस उत्पत्ति सागरका मल्लाह है । (बी) समस्त पापोंका पृथक् करनेवाला है । (र) अद्वितीय है उसीका नाम कबीर है ।

कः कुन्दः स्मरते तेषां विहर्तुं सुखसागरात् ।

रहस्योमरलोकेषु यत्कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) समस्त शास्त्रोंमें प्रकाशमान है । (बी) सुखरूप समुद्रमें रम रहा है । (र) अमरलोकमें आनन्द और सुखरूप समुद्र है, उसको कबीर कहते हैं ।

कलिकर्मविनाशी च विमलश्चित्तनिर्मलः ।

रागद्वेषविनिर्मुक्तो यः कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) कलियुगमें समस्त पापोंका नाश करनेवाला है । (बी) समस्त पापोंसे पृथक् है । (र) समस्त भेदी तथा बँरसे पृथक् है, उसको कबीर कहते हैं ।

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