कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 544, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंगजल—ऐरूप शब्द अबद बः तकवीर । कौनेन तु नुक्तः एक तफ़सीर ॥
शरमिन्दः सरेम दर गरेवाँ । तरादामन तर बतर बतकसीर ॥
मामूरहूं सर बसर व असियाँ । तरसाँ हूं जे मालिकाने तहरीर ॥
रख अपने शरण चरणके नजदीक । कर चाक तु फ़ेल नामे तकदीर ॥
अफज्रू जे अदद मेरे गुनाहों । दे वख्श बफजल कर न ताखीर ॥
म निगर फेलम ब रह्य ब निगर । कर नेक नजर ब बन्दए पीर ॥
अज विसविसए जे नफ़स शैतों । रख अपने पनः गुनह बताफीर ॥
बस मेरी नजुस्तजू अवस है । मल्लाह मेरे जहाज़ कर तीर ॥
ले देख बचशम चार गुलाखार । वख्शिन्दः है सत्रका सत्य कबीर ॥
तुझ विन न किसीका है ठिकाना । करे कोई अमल हज़ार तदवीर ॥
हरशै भरी साई की लहर है । सब मुरदः हुए ज़हर की तासीर ॥
मैं मुरदा जला पिला पेयाला । भर दीजे अपनी अब शकर शीर ॥
है लोक व वेदमें खबर जो । सो कालपुरुष की सारी जागीर ॥
सब हस्त रसी उनसे जबरदस्त । दिल खौफोखतरसे उसके दिलगीर ॥
तन तेरे कदम पड़ा फ़िरोतन । आजिज को न छोड़ ऐ खबरगीर ॥
अध्याय १४.
कबीर साहिबके शिष्यजन
कबीर साहिबके शिष्योंको हंस कहते हैं । क्योंकि, हंसका नियम है कि, वो जल तथा दुग्धको पृथक् पृथक् कर देता है, दूधको पी जाता है, जलको छोड़ देता है । उसमें और भी अनेक गुण हैं । ऐसेही हंस कबीर हैं कि, यह जगत् जो मिथ्या तथा सत्यसे मिला हुआ है वे अपनी बुद्धि एवं ज्ञानसे पहचानकर मिथ्याको छोड़ देते हैं, सत्यको ग्रहण कर लेते हैं । हंस तथा बकुले इस संसारमें एक साथ घूमते फिरते हैं दोनों बुद्धि तथा ज्ञानसे पहचाने जाते हैं । इसी विषय पर कबीर साहिबने एक साखी कही है—
कबीर, हंसा 'बक' लखे एक सँग, चरै हरि'अरे ताल' ।
हंस क्षीरते 'जानिये, बक 'उधरें तेहि काल ॥
जिनको सत्यगुरुका पूरा पता लग चुका है वो कदापि वासना बन्धनमें नहीं फँसते, उनका आवागमन नहीं होता, उनको तनिक भी कालका भय नहीं ।
१ बगुला, २ देखे, ३ कमलोंके सर सज, ४ तालाब, ५ पानीसे दूधके अलग करनेपर,
६ मालूम हो ।