कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 535, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाचक अङ्गकी साखियाँ ।
दादूराम— जै जै शरण कबीरके, तरगए अनन्त अपार ।
दादूगुण कीता^१^ कहै, कहत न आवै पार ॥
कबीर कर्ता आप है, दूजा नाही कोय ।
दादू पूरन जगतको, भक्ति दृढ़ावन^२^ सोय ॥
ठीक पूरन^३^ होय जब, सब कोइ तजै शरीर ।
दादूकाल^४^ गँजे नहीं, जपै जो नाम कबीर ॥
आदमकी आया^५^ कटे, तब यम घेरै आय ।
सुमिरन किए कबीरका, दादू लियो बचाय ॥
मेट दिया अपराध सब, आय मिले छनमाँह^६^ ।
दादूको सँग ले चले, कबीर चरणकी छाँह ॥
सेव^७^ देव^८^ निज चरणकी, दादू अपना जान ।
भूङ्गी सत्यकबीरके, कीन्हा आप समान^९^ ॥
दादू अधम अनेक हैं, भगत दानतप हीन ।
कबीर साहब सहजमें, ताहि अपन^१०^ करलीन ॥
दादू अन्तरगत सदा, छिन छिन सुमिरन ध्यान ।
वारूँ^११^ नाम कबीर पर, पल पल मेरा प्रान ॥
सुन सुन साखि कबीरकी, मगन^१२^ भया मन मोर^१३^ ।
दादू थाके खोजके, जैसे चन्द्र चकोर ॥
सुन सुन साखि कबीरकी, काल नवावे माथ ।
धन्य धन्य हो तिन लोकमें, दादू जोड़े हाथ ॥
केहरि नाम कबीरका, विषम^१४^ काल गजराज ।
दादू भजन प्रतापते, भागे सुनत आवाज ॥
पल^१५^ तै नाम कबीरका, दादू मनचित लाय ।
हस्तीके अवसारको, श्वान काल नहीं खाय ॥
सुमिरत नाम कबीरका, कटे कालकी पीर ।
दादू दिन दिन ऊंचे, परमानन्द सुख सीर ॥
दादू नाम कबीरका जो कोई लेवे ओट^१६^ ।
तिनको कबहुँ न लागई, काल बज्रकी चोट ॥
और सन्त सब कूप हैं, कोते^१७^ सरिता नीर ।
१ कितना, २ मजबूत करते, ३ पूरा, ४ मारे, ५ उग्र, ६ क्षण, ७ सेवा, ८ दो, ९ बराबर, १० अपना,
११ बारह, १२ प्रसन्न, १३ आपके, १४ वैरी, १५ पलभर, १६ ओढ, १७ कितनेक ।