कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 529, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्रनाम ।
सोमः पुनान ऊर्मिणा व्योवारं विधावति, अग्रेवाचः पवमानः कनिन्द्रत् ॥
अग्रे सिन्धूनां पवमानोऽतिपतिर्दिवः शतधारो विचक्षणः । हरिर्मित्रस्य सदनं
षु सीदति मर्मजानो विभि- सिन्धुभिर्वृषा ॥
उग्रनाम ।
उच्चातेजातमंधसोदिर्विसधभूम्या ददे उग्र शर्म महि खवः ॥ सामवेद
उत्तर अ० ॥ प्र० ५ ॥ मन्त्र १ ॥
युध्वाहिवृत्रहंतमंहीरिद्रंदपरावताः । अर्वाचीनोमघनसोमपीतय उग्रक्रुध्यै-
हिराग साम १ ॥ प्र० ४ ॥ मन्त्र ९ ॥
आवृंदंवृत्राहाददे जातः पृच्छातद्विमातरंक उग्रके शृणीरे ॥
सामवेद अ १० ॥ प्र० ३ ॥ मन्त्र ३ ॥
इस तरह वेदोंमें भी कबीर, अग्र, उग्र, और मुनीन्द्र शब्द आजाते हैं ऐसी
रीतिसे वेद भी बाकी नहीं रह जाते ।
कबीर शब्दके अर्थ ।
‘कबीरैकोत्तरशतक’ इस नामके ग्रन्थमें कबीर शब्दके अर्थकी निरुक्ति
१०३ श्लोकोंमें की है इसकी और वरामजीने बड़ी सुन्दर भाषा की है उसके
कुछ एक श्लोक यहाँ भी उद्धृत करते हैं ।
श्रीपार्वत्युवाच- अक्षर त्रितय स्वामिन् कबीर इति को भवेत् ॥
किं देव उपदेवो वा तन्मे ब्रूहि जगत्पते ॥
पार्वतीजीका प्रश्न-ऐ स्वामीजी ! जो तीन अक्षर कबीर हैं वो कबीर
कौन हैं तथा किन देवताओंमेंसे हैं ।
श्रीमहादेव उवाच-कोब्रह्मा प्रोच्यते बीचं विद्यमानो विशिष्यते ॥
रमन्ते सर्व भूतानि यत्कवीरस्य चोच्यते ॥
महादेवजीका उत्तर (क) ब्रह्म (ब) प्रगट, (र) समस्त जीवोंमें समान-
रूपसे रम रहा है ऐसेको कबीर कहते हैं ।
कश्चैवकेवलं ब्रह्म विशेषं बीजमव्ययम् ॥
अंतर्वहिरमन्ते च यत्कवीरस्स चोच्यते ॥
(क) ब्रह्मरूप है, । (ब) अमर बीजरूप है । (र) भीतर बाहर
सब स्थानोंमें समभाव है, उसको कबीर कहते हैं ।
क सुखसागरो दाता बीजं ज्ञान तथैव च ॥
रहित आदिनान्तेन यत्कवीरस्स चोच्यते ॥