कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 542, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसच्चे मनुष्य हैं जिनमें बुद्धि है, जिनमें बुद्धि नहीं वे सब मनुष्यत्वसे परे हैं वे सब पूरे पशु समझे जाते हैं। इन्हीको डांगर ढोर कोड़े मकोड़े इत्यादि कहा गया है—
तमीजो अकल वनइसां अताय खुदावन्दी ।
वशकल आदम अलीं खुवासतो नरिन्दी ॥
बरुं खलोकु दरुं देख उसकी नीयत क्या ।
अगर तमीज नहीं फिर तो आदमियत क्या ॥
यह मनुष्य ज्ञानअन्ध हो एक ओरसे भागकर दूसरी ओर जाता है जिसमें कि, उसको सुख तथा आराम मिले, जब उधर भागकर जाता है तो देखता है कि, वही आग जिसमें पहले जल रहा था, वही उधर भी दिखाई देती है। यहाँ तक दशोंदिशा है यह दौड़ता फिरता है। जिधर जाता है उधर वही आग वही शूली और वही कसाई छूरी लिये गला काटनेको उपस्थित है, जब वह दूढ़ते दूढ़ते थक जाता है तब कहीं पड़कर आँख बंदकर बैठ रहता है, अपने मनमें सोचता है कि, अब मैं किधर भाग कर जाऊँ? कहीं पता ठिकाना नहीं लगता न कोई सत्य तथा सन्तोषका उपाय ही दिखाई देता है? इसी प्रकार षट्दर्शनके लोग, एक मतको छोड़ कर दूसरे मतको पसंद करते हैं। वही अग्नि उधर भी देखते हैं। हिन्दुओं तथा सैकड़ोंही पंथके लोगोंकी यही दशा है। कितने लोग हिन्दू धर्म छोड़कर मुसलमान तथा ईसाई आदि हो जाते हैं जब उधरका वृत्तान्त भलीभाँति मालूम हो जाता हो तो उनके अग्निस्वरूप दिखाई देता है। फिर क्या करें कोई वश नहीं रहा। जिस किसी भाग्यवान्को पारखगुरु मिलजाता है वो उसकी शिक्षा स्वीकार करता है तो सुख पाता है; इसी प्रकार इन तीनों लोकोंके समस्त जीव कालपुरुषकी अग्निमें जल रहे हैं वह सबको भून भूनकर खाया करता है। उसके धोखे दगाओंसे कोई किसी प्रकार भी नहीं बच सकता।
सारे स्वसंवेद का यह कथन है कि, सत्यपुरुषने कालपुरुषको तीनों लोकका राज्य प्रदान किया है यह अपने पूजा पाठसे बड़ाही बलिष्ठ हो गया है यहाँ तक कि, जब कबीर साहबके हंस पृथ्वीपर देह धरते हैं मनुष्योंको मुक्ति-प्रदानार्थ उनका पृथ्वीपर अवतार होता है तो कालपुरुष उनको धोका तथा दगा देता है। जब वे धोखेमें पड़ जाते हैं, तब स्वयम् कबीर साहब शरीर धारण करके इनको मुक्त कराकर कालकी पहुँचसे बाहर खींचकर सत्यस्वरूपी देह प्रदान करते हैं जिससे कालपुरुषका कोई वश नहीं चल सकता है। वे लोग सत्य-