कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
गायत्रीका प्रकट होना
च्छीर ताय जस परत मलाई । अस जलपर प्रिथ्वी ठहराई ॥
बारह दंत रहु महिकर सूला । पवन प्रचंड मही अस्थूला ॥
अंड सरूप अकासको जानो । ताके बीच प्रिथ्वी अनुमानो ॥
कूर्म उदर सुत कूर्म उत्पानो । तापर सेस बराहको थानो ॥
सेस तीस या प्रिथ्वी जानो । ताके हेठ कूर्म बरियानो ॥
किरतम कूर्म अंडके माँही । कूर्म अंस सो भिन्न रहाही ॥
आदि कूर्म रह लोक मंझारा । तिन पुनि पुरुष ध्यान अनुसारा ॥
कूर्म बचन—सत्पुरुष प्रति ।
निरंकार कीन्हो बरियाया । काल कला धरि मोपहैं आया ॥
उदर विदार कीन्ह उन मोरा । आज्ञा जानि कीन्ह नहि थोरा ॥
पुरुष बचन—कूर्म प्रति ।
पुरुष अवाज कीन्ह तेहि बारा । छोटा बन्धु वह आहि तुम्हारा ॥
आहि यही बडनका रीती । औगुन ठावैं करहि वह प्रीती ॥
कबीरबचन—धर्म प्रति ।
पुरुषबचन सुनि कूर्मअनन्दा । अमी सरूप सो आनन्दकन्दा ॥
पुरुष ध्यान पुनि कीन्ह निरञ्जन । जुग अनेक किये सेवा संजन ॥
स्वार्थ जानि सेवा तिन लाई । करि रचना बैठे पछताई ॥
धर्म राय तब कीन्ह विचारा । कहवालो त्रयपुर विस्तारा ॥
स्वर्ग मृत्यु कीन्हों पाताला । विनाबीज किमिकीजे क्याला ॥
कौन भांति कस करब उपाई । किहि विधि रचों शरीर बनाई ॥
कर सेवा माँगो पुनि सोई । तिहुँ पुर जीवित मेरो होई ॥
करि विचार अस हठ तिन धारा । लाग्यो करने पुरुष विचारा ॥
एक पाँव तब सेवा कियेऊ । चौसठ जुगलो ठाढे रहेऊ ॥
बहुरि पुरुषका सहजको निरञ्जनके निकट भेजना ।
छन्द—दयानिधि सतपुरुष साहिब, बस सु सेवाके भये ॥
बहुरि भाष्यो सहज सेती, कहा अब जाँचत नये ॥
जाहु सहज निरंजन पहैं, देउ जो कुछ मांगई ॥
कराहच बना पुरुष बचना, छल मता तब त्यागई ॥ १४ ॥
सहजका निरञ्जनके निकट पहुँचना ।
सोरठा—सहज चले सिर नाय, जबहि पुरुष आज्ञा कियो ।
तहैंवां पहुँचे जाय, जहाँ निरंजन ठाढरह ॥ १४ ॥
ब्रह्मा गायत्री और पुष्पावतीकी कथा
देखत सहज धर्म हरपाना । सेवा बस पुरुष तब जाना ॥
सहजवचन ।
कहै सहज सुनु धर्मराया । केहि कारन अब सेवा लाया ॥
निरञ्जनवचन ।
धर्म कहे तब सीस नयायी । देहु ठौर जहँ बैठौं जायी ॥
सहजवचन
तब सहज अस भाषे लीन्हा । सुनहु धर्म तोहि पुरुष सब दीन्हा ॥
कूर्म उदर सो जो कछु आवा । सो तोहि देन पुरुष फरमावा ॥
तीनों लोक राज तोहि दीन्हा । रचना रचहु होहु जनि भीना ॥
निरञ्जनवचन ।
तबै निरंजन विनती लायी । कैसे रचना रचूँ बनायी ॥
पुरुषहि कहौ जोरि युग पानी । मैं सेवक दुतिया नहि जानी ॥
पुरुष सो विनती करो हमारा । दीजे खेत बीज निज सारा ॥
मैं सेवक दुतिया नहि जानू । ध्यान पुरुषको निसिदिन आनू ॥
पुरुषहि कहो जाइ यह बानी । देहु बीज अम्बर सहिदानी ॥
कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।
सहज कह्यो पुनि पुरुषहि जाई । जस कछु कह्यो निरंजनराई ॥
गयो सहज निज दीप सुखासन । जबहि पुरुष दीन्हें अनुशासन ॥
सेवा वश सतपुरुष दयाला । गुण औगुण नहिंचित्ति किरपाला ॥
अद्याको उत्पत्ति ।
इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा । अष्टंगी कन्या उपचारा ॥
अष्ट बाहु कन्या होय आई । बायें अंग सो ठाढ़ रहाई ॥
अद्यावचन ।
माथ नाइ पुरुष सो कहई । अहो पुरुष आज्ञा कस अहई ॥
पुरुषवचन अद्या प्रति । सत्यपुरुषको अद्याको मूलबीज देना ।
तबहीं पुरुष वचन परगासा । पुत्री जाहु धरमके पासा ॥
देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी । रचहु धर्म मिलि उत्पत्ति वारी ॥
कबीरवचन-धर्मदास ।
दीन्हो बीज जीव पुनि सोई । नाम सोहँग जीव कर होई ॥
जीव सोहँगम दूसर नाहीं । जीव सो अंस पुरुषको आही ॥
सकती पुनि तीन पुरुष उत्पाना । चेतनि उलंघनि अभया जाना, ॥
छन्द-पुरुष सेवावश भये तब अष्टंगहि दीन्ह हो ॥
मानसरोवर जाहु कहिया देहु धर्महि चीन्ह हो ॥
अष्टंगी कन्या हती जेहि रूप शोभा अति बनी ॥
जाहु कन्या मानसरवर करहु रचना अति घनी ॥ १५ ॥
सोरठा-चौरासी लख जीव, मूल बीज तेहि संग दे ॥
रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिर नायके ॥ १५ ॥
यह सब दीन्हे आदि कुमारी । मान सरोवर चलि भइ नारी ॥
ततछिन पुरुष सहज टेरावा । धावत सहज पुरुष पहिं आवा ॥
पुरुषवचन सहजप्रति ।
जाइ सहज धरम यह कहहूँ । दीन्ही वस्तु जस तुम चहहूँ ॥
मूल बीज तुम पहुँ पठवावा । करहु स्लिष्टि जस तुम मन भावा ॥
मान सरोवर जाइ रहाहूँ । तहँते होइ हैं स्लिष्टि उराहूँ ॥
पुनि सहजका निरञ्जनके ढिग जाना ।
चले सहज तहवाँ तब आये । धर्म धार जहँ ठाढ रहाये ॥
कहेउ सु वचन पुरुषको जबहीं । धर्मराय सिर नायो तबहीं ॥
निरञ्जनका मानसरोवरमें अच्छाको पाकर मोहवश हो उसे निगल
जाना और सत्पुरुषका शाप पाना ।
पुरुष वचन सुन तबहीं गाजा । मान सरोवर आन विराजा ॥
आवत कामिनि देख्यो जबहीं । धरमराय मन हरण्यो तबहीं ॥
कला उभय अष्टंगी केरी । धरमराय तिहिं दिदकै हेरी ॥
कला उदोत अंत कछु नाहीं । काल मगन हँ निरखे ताही ॥
निरखत धरम सुभयो अधीरा । अंग अंग सब निरखसरीरा ॥
धरमराय कन्या कह ग्रासा । काल स्वभाव सुनो धर्मदासा ॥
कीनो ग्राह काल अन्याई । तब कन्या चित विस्मय आई ॥
ततछन कन्या कीन्ह पुकारा । काल निरंजन कीन्ह अहारा ॥
तबही धर्म सहज लग आई । सहज सून्य तब लीन्ह छुड़ाई ॥
पुरुष ध्यान कूर्म अनुसारा । मोसनकाल कीन्ह अधिकारा ॥
तीन शीश मम भच्छन कीन्हो । हो सत्पुरुष दया भल चीन्हो ॥
यही चरित्र पुरुष भल जानी । दीन्ह सापसों कहीं बखानी ॥
निरंजनका आद्याको शाप देना
पुरुषका शाप निरंजन प्रति ।
लच्छ जीव नित प्राप्त करहू । सवा लच्छ नित प्रति विस्तरहू ॥
छन्द-पुनि कीन्ह पुरुष तिवान किमि मेटि डारो काल हो ॥
कठिन काल कराल जीवन बहुत करइ बिहाल हो ॥
यहि मेटत मुहि अब ना बने नाल । इक सुत षोडसा ॥
एक मेटत सबै मिटिहैं वचन डोल अडोलसा ॥ १६ ॥
सोरठा-डोले वचन हमार, जो अब मेटों धरमको ।
वचन करौं प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहै ॥ १६ ॥
सत्पुरुषका योगीतजीको निरञ्जनके पास उसे मानसरोवरसे
निकाल देनेकी आज्ञा देकर भोजना ।
जोगजीत कहैं पुरुष बुलावा । धर्म चरित सब कहि समुझावा ॥
सत्पुरुषवचन-योगजीत प्रति ।
जोगजीत तुम बेगि सिधारो । धर्मरायको मारि निकारो ॥
मानसरोवर रहन न पावै । अब यहि देस काल नहि आवै ॥
जाके रहे धरम वहि देसा । स्वर्ग मृत्यु पाताल नरेसा ॥
धर्मके उदर माहि है नारी । तासो कहो निज शब्द सम्हारी ॥
उदर फारिकै बाहर आवै । कूर्म उदर विदारि फल पावै ॥
धरमरायसे कहो विलोई । वहै नारि अब तुम्हरी होई ॥
कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।
जोग जीत चल भे सिर नाई । मानसरोवर पहुँचे जाई ॥
जोगजीत कहैं देखा जबहीं । अति भो काल भयंकर तबहीं ॥
निरञ्जनवचन-योगजीत प्रति ।
पूछा काल कौन तुम आहू । कौन काज तुम यहाँ सिधाहू ॥
योगजीतवचन-निरंजन प्रति ।
जोगजीत अस कहे पुकारी । अहो धरम तुम प्राप्त नाारी ॥
आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही । इहिते बेगि निकारों तोही ॥
जोग जीतवचन-अद्या प्रति ।
जोगजीत कन्या सो कहिया । नारि काहे उदरमहँ रहिया ॥
उदर फारि अब आवहु बाहर । पुरुष तेज सुमिरो तेहि ठाहर ॥
विष्णुका पिताके दर्शन राज्य पाना आदि विष्णुको पिताका दर्शन होना
कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।
सुनिके धर्म क्रोध उर जरेऊ । जोगजीत सो सन्मुख भिरेऊ ॥
जोग जीत तब किन्हे ध्याना । पुरुष प्रताप तेज उर आना ॥
पुरुष आज्ञा भई तोह काला । मारहु माँझ लिलार कराला ॥
जोगजीत पुनि तँसो कीन्हा । जस आज्ञापुरुष तेहि दीन्हा ॥
छन्द-गहि भुजा फटकार दीन्हों, परेउ लोकते न्यारहो ॥
भयो त्रासित पुरुष ढरते, बहुरि उठेउ सम्हार हो ॥
निकसि कन्या उदरते पुनि, देख धर्महि अति डरी ॥
अब नाहि देखों देस वह, कहो कौन विधि कहैंवां परी ॥ १७ ॥
सोरठा-कामिनि रही सकाय, त्रासित काल डर अधिक ॥
रही सो सीस नवाय, आस पास चितवत खडी ॥ १७ ॥
निरञ्जनवचन-अद्या प्रति ।
कहे धर्म सुनु आदि कुमारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी ॥
पुरुष रचा तोहि हमरे काजा । इकमति होय करहु उपराजा ॥
हम हैं पुरुष तुमहिं हौ नारी । अब जनिडरपो त्रास हमारी ॥
अद्यावचन-निरञ्जन प्रति ।
कहे कन्या कस बोलहु बानी । भ्राता जेठ प्रथम हम जानी ॥
कन्या कहै सुनो हो ताता । ऐसी विधि जनि बोलहु बाता ॥
अब मैं पुत्री भई तुम्हारी । तँ उदर मांझु लियो डारी ॥
जेठ बंधु प्रथमहिके नाता । अब तो अहो हमारे ताता ॥
निरमल द्विष्ट अब चितवहु मोही । नहिंतो पाप होय अब तोही ॥
मंद द्विस्टिन चितवहु मोही । नातो पाप होय अब तोही ॥
निरञ्जनवचन-अद्या प्रति
कहे निरंजन सुनो भवानी । यह मैं तोहि कहों सहिदानी ॥
पाप पुन्य डर हम नहिं डरता । पाप पुन्यके हमहीं करता ॥
पाप पुन्य हमहींसे होई । लेखा हमार न लेवे कोई ॥
पाप पुन्य हम करंब पसारा । जो बाझे सो होय हमारा ॥
ताते तोहि कहों समुझाई । सीख हमार लो सीस चढाई ॥
पुरुष दीन तोहि हम कहैं जानी । मानहु कहा हमार भवानी ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
विहैंसी कन्या सुन अस बाता । इक मति होय दोइ रंगराता ॥
शिवका शाप और वर पाना
रहस वचन बोली म्निदु बानी । नारि नीच बुधि रति विधि ठानी ॥
रहस वचन सुनि धरम हरषाना । भोग करनको मनमें आना ॥
छन्द-भग नहिं कन्याके हूती, अस चरित कीन्ह निरंजना ।
नख घात किये भगद्वार तत छिन, घाट उत्पति गंजना ॥
नखरेष शोनिता चला, तिहूँको सब खास आरंभनी ।
आदि उत्पति सुनुहु धर्मनि, कोउ नहिं जानत जम मनी ॥
त्रिबार कीन्ही रति तवैं, भये ब्रह्मा विस्तु महेस हो ।
जेठे विधि विस्तु लघु तिहि, तीजे सम्भू सेषहो ॥ १८ ॥
सोरठा-उत्पति आदि प्रकास, यह विधि तेहि प्रसंग भो ॥
कीन्हो भोगविलास इक मति कन्या काल ह्वै ॥ १८ ॥
भवसागरकी रचना ।
तेहि पीछे ऐसा भो लेखा । धर्मदास तुम करो विवेखा ॥
निरञ्जनवचन-अद्या प्रति ।
अगिन पवन जल मही अकासा । कूर्म उदरते भयो परगासा ॥
पाँचों अंस ताहि सन लीन्हा । गुन तीनो सीसनसो कीन्हा ॥
यहि विधि भये तत्व गुन तीनो । धर्मराय तब रचना कीनो ॥
कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।
गुन तत सम कर देविहि दीन्हा । आपन अंस उत्पन कीन्हा ॥
बुन्द तीन कन्या भग डारा । ता सँग तीनो अंस सुधारा ॥
पाँच तत्व गुण तीनो दीन्हा । यहि विधि जगकी रचना कीन्हा ॥
प्रथम बुन्दते ब्रह्मा भयऊ । रज गुण पंच तत्व तेहि दयऊ ॥
दूजो बुन्द बिस्तु जो भयऊ । सतगुण पंच तत्व तिन पयऊ ॥
तीजे बुन्द रुद्र उत्पाने । तमगुण पंच तत्व तेहि साने ॥
पंच तत्व गुण तीन खमीरा । तीनों जनको रच्यो सरीरा ॥
ताते फिरि फिरि परलय होई । आदि भेद जाने नहिं कोई ॥
कहै धर्म कामिनि सुन बानी । जो मैं कहूँ लेहु सो मानी ॥
जीव बीज आहै तुव पास । सोले रचना करहु प्रगासा ॥
कहै निरंजन पुनि सुनु रानी । अब अस करहु आदिभवानी ॥
तीनो सुत सौप तोहि दीना । अब हम पुरुष सेव चित लीन्हा ॥
राज करहु तुम लै तिहुँ बारा । भेद न कहियो काहु हमारा ॥
कर्मका बदला
मोर दरस तिहुँ सुत नहिं पैहँ । जो मुहि खोजत जन्म सिरैहँ ॥
ऐसो मता दिढेहो जानी । पुरुष भेद नहिं पावै प्रानी ॥
त्रय सुत जबहिं होहि बुधिवाना । सिधु मथन दे पठहु निदाना ॥
कबीरबचन धर्मदास प्रति ।
छन्द-कहेउ बहुत बुझाय देविहि गुप्त भये तब औहिहो ॥
सून्य गुफहि निवास कीन्हों भेद लह को ताहि हो ॥
वह गुप्त भा पुनि संग सबके मनै निरंजन जानिये ॥
मन पुरुष भेद उच्छेद देवे आपु परगट आनिके ॥
सोरठा-जीव भये मति हीन, परसि अगम सो कालको ।
जनम जनम भय खीन, मुरुचा करम अकर्मको ॥ १९ ॥
जीव सतावे काल, नाना कर्म लगायके ।
आप चलावै चाल, कस्ट देइ पुनि जीवको ॥ २० ॥
सिन्धुमथन और चौदह रत्न उत्पत्तिकी कथा ।
त्रय बालक जब भये सयाने । पठये जननी सिधु मथाने ॥
बालक मातै खेल खिलारी । सिन्धुमथन नहिं गयेउ खरारी ॥
तेहि अंतर इक भयो तमासा । सो चरित बूझो धर्मदासा ॥
धान्यो योग निरंजन राई । पवन अरंभ कीन्ह बहुताई ॥
यागो पवन रहित पुनि जबहीं । निसरे उवेद स्वास संग तबहीं ॥
स्वास संग आयेउ सो वेदा । विरला जन कोई जाने भेदा ॥
अस्तुति कीन्ह वेद पुनि ताहां । आज्ञा का मोहि निरगुन नाहां ॥
कह्यो जाय कर सिधु निवासा । जेहि भेंटे जैहौ तिहि पास ॥
उठी अवाज रूप नहिं देखा । जोति अगम दिखलावत भेखा ॥
चलेउ वेद पुनि तेज अपाने । तेज अन्न पुनि विष संधाने ॥
चले वेद तहँवा को जाई । जहँवा सिधु रचा धर्मराई ॥
पहुँचे वेद तब सिन्धु मँझारा । धर्मराय तब युक्ति विचारा ॥
गुप्त ध्यान देबिहिं समुझावा । सिन्धु मथन कहँ कस विलमावा ॥
पठवहु बेगि सिन्धु त्रय वारा । दिठकै सोचहु बचन हमारा ॥
बहुरि आप पुनि सिन्धु समाना । देवी कीन्ह मथन अनुमाना ॥
तिहुँ बालक को कहा समुझायी । आसिष दे पुनि तहाँ पठायी ॥
पैहो वस्तु सिन्धुके माहीं । जाहु बेगि तीनों सुत ताहीं ॥
चलिभौ ब्रह्मा मान सिखाही । दोइ लहुरा पुनि पाछे जाई ॥
विष्णुका ब्रह्माको आश्रय देना माया सृष्टिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त
छन्द-त्रय सुत बाल खेलत चले ज्यों सुभग बाल मरालहो ।
एक गहि छोडत मही पुनि एक कर, गहि चलत लटपट चालहो ॥
छनहिं धावत छन अस्थिर खड़े छनभुजहिं गर लावहीं ।
तेहि समयकी सोभा भली नहिं देवता कहैं गावहीं ॥
सोरठा-गये सिन्धुके पास, भये ठाढ तीनों जने ।
जुगति मथन परकास, एक एकको निरखहीं ॥ २१ ॥
प्रथम बार सिन्धुमंथन ।
तीनों कीन्ह मथन तब जाई । तीन वस्तु तीनों जन पाई ॥
ब्रह्मा वैद तेज तेहि छोटा । लहुरा तासु मिले विष खोटा ॥
भेटी वस्तु त्रय तीनों भाई । चलि भये हर्ष कहत जहैं माई ॥
मातापहैं आये त्रय बारा । निज २ वस्तु प्रगट अनुसारा ॥
माता आज्ञा कीन्ह प्रकासा । राखु वस्तु तुम निज २ पास ॥
द्वितीय बार सिन्धुमंथन ।
पुनि तुम मथहु सिन्धु कहैं जाई । जो जिहि मिले लेहु सो भाई ॥
कीन्ह चरित अस आदि भवानी । कन्या तीन कीन्ह उत्पानी ॥
कन्या तीन उत्पान्यो जबहीं । अंस वारि महैं नायो सबहीं ॥
पठयो सिधुमाहिं पुनि ताहीं । त्रय सुत मरम सो जानत नाहीं ॥
पुनि तिन मथन सिधुको, कीन्हा । भेंटयो कन्या हर्षित ह्वै लीन्हा ॥
कन्या तीनहु लीन्हे साथ । आ जननी कहैं नायउ माथा ॥
सब माताके आगे कीन्हा । माता बाँटि तिन्हन कहैं दीन्हा ॥
माता कहे सुनहु सुत मोरा । यह तो काज भये सब तोरा ॥
एक एक बाँटि तीनहुको दीन्हा । करहु भोग अस आज्ञा कीन्हा ॥
सावित्री ब्रह्मा तुम लेऊ । है लक्ष्मी विष्णु कहैं देऊ ॥
पारवती शंकर कहैं दीन्ही । ऐसी माता आज्ञा कीन्ही ॥
तीनउ जन लीन्ही सिर नार्ई । दीन्ह अद्या जस भाग लगाई ॥
पाई कामिनी भये अनंदा । जस चकोर पाये निश्चिचंदा ॥
काम वसी भए तीनों भाई । देव दैत दोनों उपजाई ॥
धरमदास परखो यह बाता । नारी भयी हती सो माता ॥
तृतीय बार सिन्धुमंथन ।
माता बहुरि कहे समझायी । अब फिर सिंधु मथो तुम जाई ॥
माया सृष्टिका विवरण वंकुण्डकावृत्तान्त
जो जेहि मिलै लेहु सो जाई । अब जनि करो विलंब तुम भाई ॥
त्रय सुत चले तब माथ निवायी । जो कछु कहेउ करब हम जायी ॥
मथ्यो सिंधु कछु विलंब न कीन्हा । निकसे चौदह रतन सो लीन्हा ॥
चौदह रतनकी निकसी खानी । ले माता पहुँ पहुँचे आनी ॥
तीनहु बन्धु हरषित हँ लीन्हा । विस्नुसुधा पायउ हर विष दीन्हा ॥
अद्याका तीनों पुत्रोंको सृष्टि रचनेकी आज्ञा देना और
सब मिलकर पांच खानकी उत्पत्ति करना ।
पुनि माता अस वचन उचारा । रचहु सृष्टि तुम तीनों वारा ॥
अंडज उत्पत्ति कीन्हीं माता । पिंडज ब्रह्मा कर उत्पाता ॥
ऊषमजखानि विस्नु व्यवहारा । सिव अस्थावर कीन्ह पसारा ॥
चौरासी लाख योइन कीन्हा । आधा जल आधा थल दीन्हा ॥
एक तत्त्व अस्थावर जाना । दोय तत्त्व ऊषमज परमाना ॥
तीन तत्त्व अंडज निरमायी । चार तत्त्व पिंडज उपजायी ॥
पाँच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहि माहिँ सवोंरा ॥
ब्रह्माका वेद पढकर निराकारका पता पाना ।
ब्रह्मा वेद पढन तब लागा । पढत वेद तब भा अनुरागा ॥
कहे वेद पुरुष इक आही । निराकार जेहि रूप न छांही ॥
सून्यमाहिँ वह जोत दिखावे । चितवत देह द्विष्टि नहिं आवे ॥
स्वर्ग सीस पग आहि पताला । तेहि मत ब्रह्मा भौ मतवाला ॥
चतुरानन कहि विस्नु बुझावा । आहि पुरुष मोहि वेद लखावा ॥
पुनि ब्रह्मा सिवसों अस कहई । वेद मथन पुरुष एक अहई ॥
अहै पुरुष इक वेद बतावा । वेद कहे हम भेद न पावा ॥
ब्रह्माका मातासे पिताका पता पूछना ।
कबीरबचन धर्मदास प्रति ।
तब ब्रह्मा माता पहुँ आवा । करिपरनाम तिहि टेके पाँवा ॥
ब्रह्माबचन अद्या प्रति ।
हे माता मोहि वेद लखावे । सिरजनहार और बतलावे ॥
छन्द-ब्रह्मा कहे जननी सुनो कहहु कहा कंत तुम्हार है ॥
कीजै कुपा जनि मोहि दुरावो कहाँ पिता हमार है ॥
बहापुरी कौलास और अमरावती अदन आदिका वृत्तान्त
अद्यावचन ब्रह्मप्रति ।
कहे जननि सुनहु ब्रह्मा कोउ नहि जनक तुम्हार हो ॥
हमहि ते भई सबे उत्पति हमहि सब कीन सम्हार हो ॥ २१ ॥
ब्रह्मावचन अद्या प्रति ।
सोरठा-ब्रह्मा कहते पुकार, सुनु जननी तैं चित्त दे ॥
कहत वेद निरुवार, पुरुष एक सो गुप्त है ॥ २२ ॥
अद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।
कहे अद्या सुन ब्रह्मकुमारा । मोसे नहीं स्रष्टा न्यारा ॥
स्वर्ग मृत्यु पाताल बनाई । सात समुन्दर हम निरमाई ॥
ब्रह्मावचन अद्या प्रति ।
माना वचन तुमहि सब कीन्हा । प्रथम गुप्त तुम कस रख लीन्हा ॥
जबै वेद मुहि कहे बुझाई । अलख निरञ्जन पुरुष बनाई ॥
अब तुम आप बनो करतारा । प्रथम काहे न किया विचारा ॥
जो तुम वेद आप कथि राखा । तो कस तुम अलख निरंजन भाखा ॥
आपे आप आप निरमाई । काहे न कथन कीन तुम भाई ॥
अब मोसन छल जनि करहू । सौंचे सौंच सब कहि उच्चरहू ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
जब ब्रह्मा यहि विधि हठ ठाना । तब अद्या मन कीन्ह तिवाना ॥
केहि विधि यहि कहूँ समझाई । विधि नहि मानत मोर बडाई ॥
जो यहि कहौं निरंजन बाता । कंहि विधि समझे यह विख्याता ॥
प्रथम कह्यो निरंजन राई । मोर दरश काहू नहि पाई ॥
अबै जो यही अलख लखावो । कौनी विधि ताको दिखलाओं ॥
अद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।
अस विचारि पुनि ब्रह्मो समझावा । अलख निरंजन नहि दरस दिखावा ॥
ब्रह्मावचन अद्या प्रति ।
ब्रह्मा कहे मोहि ठोर बताओ । आगा पीछा जनि तुम लाओ ॥
मैं नहि मानो तुम्हरी बाता । ऐसी बात न मोहि सुहाता ॥
प्रथम तुम मुहि दीन भुलावा । अब तुम कहो न दरस दिखावा ॥
तासु दरस न पैहो पूता । ऐसी बात कहो अजगूता ॥
छंद-दरस दिखाय तत्काल दीजे मोहि न भरोस तुम्हार हो ॥
संशय निवार यहिकाल दीजे कीजे न विलम्ब लगार हो ॥
अदन क्या है निरंजनने सत्य लोककी नकलपर अपने लोक बनाये
अद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।
कहे जननी सुनो ब्रह्मा कहों तोसों सत्तही ॥
सात स्वर्ग है माथ ताको चरन पताल सप्तही ॥ २२ ॥
ब्रह्माका पिताके खोजको जाना ।
सोरठा-लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तिहिं दरसकी ॥
जाय नवाओ माथ, ब्रह्मा चलै शिर नाइकै ॥ २३ ॥
जननी गुन्यो वचन चितमाहीं । मोरि कही यह मानति नाहीं ॥
या कहैं वेद दीन्ह उपदेशा । पै दरस ते नहिं पावे भेसा ॥
कह अष्टंगि सुनो रे वारा । अलख निरंजन पिता तुम्हारा ॥
तासु दरश नहिं पैहौ पूता । यह मैं वचन कहैं निज गूता ॥
ब्रह्मा सुनि व्याकुल ह्वै धावा । परसन सीस ध्यान हिय लावा ॥
ब्रह्मा चले जननि सिर नाई । सीस परसि आवों तोहि ठाई ॥
तुरतहि ब्रह्मा दीन्ह रिगायी । उत्तर दिशा बेगि चलि जायी ॥
आज्ञा माँगि विस्नु चले बाला । पिता दरशको चले पताला ॥
इत उत चितय महस न डोला । सेवा करत कछू नहिं बोला ॥
तेहि सिव मन अस चित अभावा । सेवा करन जननि चित लावा ॥
यहि विधि बहुत दिवस चलियऊ । माता सोच पुत्र कह कियऊ ॥
विष्णुका पिताके खोजसे लौटकर पिताके चरण तक न पहुंचनेका
बूतान्त अद्यासे कहना ।
प्रथम विस्नु जननी ढिग आये । अपनी कथा कहि समुझाये ॥
भेटचो नाहि मोहि पगु ताता । विष ज्वाला स्यामल भौ गाता ॥
व्याकुल भयउ तबै फिरि आवा । पिता पगु दरस मैं नहिं पावा ॥
सुनि हरषित भई आदिकुमारी । लीन्ह विस्नु कहैं निकट दुलारी ॥
चूमेउ बदन सीस दियो हाथा । सत्य सत्य बोलेउ सुत बाता ॥
धर्मदासवचन कबीर प्रति ।
कहे धरमनि यह संशय बीती । साहब कहहु ब्रह्माकी रीती ॥
पिता सीस तिन पर छन कीन्हा । कि होय निरास पीछे पगु दीन्हा ॥
छन्द-गयऊ ब्रह्मा सीस परसन, कथा ता दिनकी कहो ॥
भयो द्विस्टि मेराव कि नहिं, तासु दरसन तिन लहो ॥
यह बरनन सब कहो सतगुर, एक एक विलोयके ॥
निज दास जानि परगास कीजे, धरहु निज जनि गौयके ॥ २३ ॥
तीनों पुत्रोंकी कृतघ्नता आद्याकी पूजाका प्रचार
सोरठा-प्रभु हम हैं तुव दास, जनम किरतारथ मोर करि ॥
करहु वचन परगास, तेहि पीछे जो चरित भौ ॥ २४ ॥
पिताकी खोजमें गये हुए ब्रह्माकी कथा ।
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
धरमदास मुहि अति प्रिय अहूहू । कहो सँदेस परखि दूढ गहूहू ॥
चलत ब्रह्मा तब बार न लावा । पिता दरसकहूँ अति मन भावा ॥
तेहि स्थान पहुँचिगै जाई । नहिं तहूँ रबि ससि सून्य रहाई ॥
बहु विधि अस्तुति करे बनायी । ज्योति प्रभाव ध्यान तहूँ लाई ॥
ऐसे बहु दिन गये बितायी । नहिं पायो ब्रह्मा दरश पितायी ॥
सून्य ध्यान जुग चार गमावा । पिता दरस अजहूँ नहिं पावा ॥
ब्रह्माके लिये अद्याकी चिन्ता ।
ब्रह्मा तात दरस नहिं पाई । सून्य ध्यानमहूँ जुग बहु जाई ॥
माता चित करत मन माहौं । जेठ पुत्र ब्रह्मा रहू काहौं ॥
किहि विधि रचना रचहुँ बनाई । ब्रह्मा आवे कौन उपाई ॥
गायत्री उत्पत्ति ।
उबटि सरीर मैल गहि काढी । पुत्री रूप कीन्ह रचि ठाढी ॥
शक्ति अंश निज ताहि मिलावा । नाम गायत्री ताहि धरावा ॥
गायत्री मातहिं सिर नाई । चरन चूमि निज सीस चढाई ॥
गायत्रीवचन अद्या प्रति ।
गावत्री विनवै कर जोरी । सुनु जननी 'इक विनती मोरी ॥
कौन काज मो कहूँ निरमाई । कहो वचन लेउँ सीस चढाई ॥
अद्यावचन गायत्री प्रति ।
कहे आद्या पुत्री सुनु बाता । ब्रह्मा आहि जेठहि तुव भ्राता ॥
पिता दरशकहूँ गयो अकासा । आनौ ताहि वचन परगासा ॥
दरश तातकर वह नहिं पावे । खोजत खोजत जन्म गमावे ॥
जौने विधिते इहवौं आई । करो जाय तुम तौन उपाई ॥
गायत्रीका ब्रह्माके खोजमें जाना । कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
चलि गायत्री मारग आई । जननीवचन प्रीति चित लाई ॥
चलत भई मारग सुकुमारी । जननी बचन ध्यान उर धारी ॥
पांचोंकी पूजाका निश्चित होना और निरंजनका सर्वाधिपत्य तपशिलाका वृत्तान्त
छन्द-जाय देख्यो चतुरमुख कहैं नाहि पलक उधारई ॥
कछुक दिन सो रहा तहवाँ बहुरि युक्ति विचारई ॥
कौन विधि यह जागिहै अब करें कौन उपाय हो ॥
मन गुनति सोच बहुत विधि ध्यान जननी लाय हो ॥ २४ ॥
ब्रह्माको जगानेके लिये अद्याका गायत्रीको युक्ति बताना ।
सोरठा-अद्या आयसु पाइ, गायत्री तब ध्यान महैं ॥
निज कर परसेहु जाइ, ब्रह्मा तबहीं जागिहैं ॥
गायत्री पुनि कीन्ही तैसी । माता जुगति बतायी जैसी ॥
गायत्री तब चित्त लगाई । चरण कमल कहैं परसेउ जायी ॥
ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना ।
ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला । व्याकुल भयो बचन तब बोला ॥
कवन अहै पापिन अपराधी । कहा छुडायहु मोरि समाधी ॥
साप देहैं तो कहैं मैं जानी । पिता ध्यान मोहि खंडयो आनी ॥
गायत्रीवचन ब्रह्मा प्रति ।
कहि गायत्री मोहि न पापा । बूझि लेहु तब देहहु सापा ॥
कहों तोहिसो सांची बाता । तोहि लेन पठयी तुव माता ॥
चलहु बेगि जनि लावहु बारे । तुम बिन रचना को बिस्तारे ॥
ब्रह्मावचन गायत्री प्रति ।
ब्रह्मा कहे कौन विधि जाऊँ । पिता दरस अजहूँ नहि पाऊँ ॥
गायत्रीवचन ।
गायत्री कह दरस न पैहो । बेगि चलहु नहि तो पछतैहो ॥
ब्रह्माका गायत्रीको झूठी साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका
ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना ।
ब्रह्मा कहे देहु तुम साखी । परस्यो सीस देख मैं आंखी ॥
ऐसे कहो मातु समुझायी । तो तुम्हरे संग हम चलि जायी ॥
गायत्रीवचन ।
कह गायत्री सुन स्तुति धारी । हम नहिं मिथ्या बचन उचारी ॥
जो मम स्वार्थ पुरवहु भाई । तो हम मिथ्या कहब बनाई ॥
ब्रह्मावचन ।
कह ब्रह्मा नहिं लखी कहानी । कहैं बुझाय प्रगटकी बानी ॥
भवसागरका स्वरूप
गायत्रीवचन ।
कह गायत्री देहु रति मोही । तो कह झूठ जिताऊँ तोही ॥
गायत्री कहै है यह स्वार्थ । जानि कही मैं पुनि परमारथ ॥
सुनि ब्रह्मा चित करै विचारा । अबका जतन करउँ इहि बारा ॥
छन्द—जो विमुख या कह करें अब तो नहीं बनि आवई ॥
साखि तो वह देय नाही जननि मोहि लजावई ॥
यहाँ नाही पिता पायो भयो न एको काज हो ॥
पाप सोचत नहि वनै अब करें रति विधि साजहो ॥
सोरठा—कियो भोग रति रंग, विसरचोसो मन दरसका ॥
दोउ कहैं बढयो उमंग, छल मति बुद्धि प्रगास किये ॥ २६ ॥
सावित्रीउत्पत्तिकी कथा ।
कह ब्रह्मा चल जननी पास । तब गायत्री वचन प्रकासा ॥
औरौ करौ जुगति इक ठानी । दूसरि साखि लेउ उत्पानी ॥
ब्रह्मा कहे भली है वाता । करहु सोइ जेहि मानै माता ॥
तब गायत्री जतन विचारा । देह मैल गहि कीन्ह नियारा ॥
कन्या रचि निज अस मिलावा । नाम सावित्री तासु धरावा ॥
गायत्री तिहि कह समुझावा । कहियो दरस ब्रह्मा पितु पावा ॥
कह सावित्री हम नहि जानी । झूठी साख दै आपनि हानी ॥
यह सुनि दोउ कहैं चिंता व्यापा । यह तो भयो कठिन संतापा ॥
गायत्री बहु विधि समझायी । सावित्रीके मन नहि आयी ॥
पुनि गायत्री कहा बुझाई । तब सावित्री बचन सुनाई ॥
ब्रह्मा कर मोसों रति साजा । तो मैं झूट कहों यहि काजा ॥
गायत्री ब्रह्महि समुझावा । दै रति या कहैं काज बनावा ॥
ब्रह्मा रति सावित्रीहि दीन्हा । पाप मोट आपन शिर लीन्हा ॥
सावित्री कर दूसर नाऊँ । कहि पुहपावति वचन सुनाऊँ ॥
तीनों मिलिके चलि भे तहवों । कन्या आदि कुमारी जहवों ॥
ब्रह्माका गायत्री और सावित्रीके साथ
माताके पास पहुँचना और सबका शाप पाना ।
करि प्रनाम सम्मुख रहे जाई । माता सब पूछी कुसलाई ॥
कहु ब्रह्मा पितु दरसन पाये । दूसरि नारि कहाँसे लाये ॥
दुःखितजीवोंकी पुकार व सत्यपुरुषकी गौहार
ब्रह्मावचन ।
कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी । परस्यो सीस देख इन आँखी ॥
अद्यावचन गायत्री प्रति ।
तब माता बूझे अनुसारि । कहु गायत्री वचन विचारी ॥
तुम देखा इन दरसन पावा । कहो सत्य दरसन परभावा ॥
गायत्रीवचन ।
तब गायत्री वचन सुनावा । ब्रह्मा दरस सीस पितु पावा ॥
मैं देखा इन परसेउ सीसा । ब्रह्महि मिले देव जगदीसा ॥
छन्द-लेइ पुहुप परसेउ सीस पितु इन द्विष्टि मैं देखत रही ।
जल ढार पुहुप चढाय दीन्ह हे जननि यह है सही ॥
पुहुपते पुहुपावती भयी प्रगट ताही ठामते ॥
इनहु दरसन लह्यो पितुको पूछहू इहि वामते ॥ २६ ॥
हो जननी यह है सही तुम पूछि लो पुहुपावती ।
सबही साँच मैं तोसो कहूँ नहि झूठ है एको रती ॥
अद्यावचन पुहुपावती प्रति ।
माता कह पुहुपावतीसो कहो सत्यहि मो सना ।
जो चढे सीसहि पिताके तुम वचन बोलहु ततखना ॥ २७ ॥
सोरठा-कहु पुहुपावति मोहि, दरश कथा निरवारके ॥
यह मैं पूछों तोहि, किमि ब्रह्मा दरसन किये ॥ १७ ॥
सावित्रीवचन ।
पुहुपावती बेचन तब बोली । माता सत्य वचन नहि डोली ॥
दरसन सीस लह्यो चतुरानन । चढेसीस यह धर निश्चय मन ॥
साख सुनत अद्या अकुलानी । भाअचरज यह मरम न जानी ॥
अद्याकी चिन्ता
अलख निरंजन अस प्रण भाखी । मोकहैं कोउ न देखै आँखी ॥
ये तीनहुँ कस कहहि लबारी । अलख निरंजन कहहु सम्हारी ॥
ध्यान कीन्ह अष्टंगी तेहि छन । ध्यान माहिँ अस कह्यो निरंजन ।
निरञ्जनवचन ।
ब्रह्मा मोर दरश नहि पाया । झूठि साखि इन आय दिवाया ॥
तीनो मिथ्या कहे बनाई । जनि मानहु यह है लबराई ॥
अद्याका ब्रह्माको शाप देना ।
यह सुनि माता कीन्हें दापा । ब्रह्मा कंहैं तब दीन्हो सापा ॥
पूजा तोरि करै कोइ नाहीं । जो मिथ्या बोलेउ मम पाहीं ॥
इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा । नरक मोट अपने शिर लीन्हा ॥
आगे होइ जो साख तुम्हारी । मिथ्या पाप करहि बहु भारी ॥
प्रगट करहि बहु नेम अचारा । अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥
विस्नु भक्तसों करहि हँकारा । ताते परिहैं नरक मँझारा ॥
कथा पुराण औरहि समुझैं हैं । चाल बिहून आपन दुखपैहैं ॥
उनसे और मुनै जो ज्ञाना । करि सो भगति कहां परमाना ॥
और देवको अंश लखैहैं । औरन निन्दि काल मुख जैहैं ॥
देवन पूजा बहु विधि लैहैं । दछिना कारण गला कटैहैं ॥
जा कह शिक्ख करै पुनि जायी । परमारथ तिहि नाहिं लखायी ॥
परमारथके निकट न जैहैं । स्वार अर्थ सबै समुझैहैं ॥
आप स्वार्थी ज्ञान मुनैहैं । आपनि पूजा जगत दिदैहैं ॥
आपन पूजा जगहि दिढायी । परमारथके निकट न जायी ॥
आप ऊँच औरहि कंहैं छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होइ खोटा ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
जब माता अस कीन्ह प्रहारा । ब्रह्मा मूरछि मही कर धारा ॥
अद्याका गायत्रीको शाप देना ।
गायत्री साप्यो तिहि वारा । हुइहै तोर पंच भरतारा ॥
गायत्री तोर होइ वृषभ भतारा । सात पाँच और बहुत पसारा ॥
धर औतार अखज तुम खायी । बहुत झूठ तुम वचन सुनायी ॥
निज स्वार्थ तुम मिथ्या भाखी । कहा जानि यह दीन्ही साखी ॥
मानि साप गायत्री लीन्ही । सावित्रिहि तब चितबन कीन्ही ॥
अद्याका सावित्रीको शाप देना ।
पुहुपावति निज नाम धरायेहु । मिथ्या कह निज जन्म नसायेहु ॥
सुनहु पुष्पावति तुम्हरो विस्वासा । नहिं पुजिहैं तुमसे कछु आसा ॥
होय कुगंध ठौर तब बासा । भुगतहु नरक काम गहि आसा ॥
जो तोहिं सींच लगावे जानी । ताकर होय वंशकी हानी ॥
अब तुम जाय धरो औतारा । क्योडा केतकी नाम तुम्हारा ॥
ज्ञानी अर्थात् कबीर साहिबका सत्य- लोकसे तपशिलाके समीप जाना और समस्त जीवोंके ठण्डा करनेका वृत्तान्त जीवोंका भक्ति करनेकी प्रतिज्ञा करना
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
छन्द-भये साप बस तीनों बिकल मतिहीन छीन कुकर्मते ।
यह काल कला प्रचंड कामिनि डस्यो सब कहैं चर्मते ॥
ब्रह्मादि सिव सनकादि नारद कोउं न बचि भागि हो ॥
सुनु धरमनि विरल बाचे सब्द सत सो लागि हो ॥ २८ ॥
सोरठा-सत्य सब्द परताप, कालकला व्यापे नहीं ।
निकट न आवै पाप, मन वच करम जो पर गहे ॥ २८ ॥
साप दे देनेपर अद्याका निरञ्जनके डरसे डरकर पछ्ताना ।
साप तीनौको दैलियो मन माहिं तब पछ्तावई ।
कस करहि मोहि निरंजना पल छमा मोहि न आवई ॥
निरञ्जनका अद्याको शाप देना ।
अकास बानी तब भयी यहु कहा कीन भवानिया ।
उत्पत्ति कारन तोहि पठायी कहा चरित यह ठानिया ॥
सोरठा-नीचहि ऊँच सिताय, बदल मोहि सो पावई ।
द्रापर युग जब आय, तुमहूँ पंच भतारि हो ॥ २९ ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति । अद्याका निडर होना ।
साप ओयल जब सुनेउ भवानी । मन सन गुने कहा नहिं बानी ॥
ओयल प्रभाव साप हम पाया । अब कहा करब निरंजनराया ॥
तोरे वस परी हम आई । जस चाहो तस करो उपाई ॥
विष्णुका गौरसे श्याम होनेका कारण ।
अद्यावचन विष्णु प्रति ।
पुनि माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इक वचन हमारा ॥
सत्य सत्य तुम कहो बुझाई । पितु पद परसन जब गै भाई ॥
प्रथमहु तो तुव गौर सरीरा । कारण कौन स्याम भए धीरा ॥
विष्णुवचन अद्या प्रति ।
आज्ञा पाय हम तत्काला । पितु, पद परसन चले पताला ॥
अक्षत पुहुप लीन्ह करमाहों । चले पताल पंथ मग जाहों ॥
पहुँचि संसनाग पहुँ गयऊ । विषक तेज हम अलसयऊ ॥
भयो स्याम विष तेज समावा । भइ अवाज अस वचन सुनावा ॥
अहो विस्तु माता पहुँ जाई । बचन सत्य कहियो समझाई ॥
सतजुग त्रेता जैहै जबहीं । द्रापर ह्वै चौथा पद तबहीं ॥
पूर्व देशमें काल पुरुषका जीवोंको फसानेके— —लिये नानामत मतान्तरका प्रचार करना
तब तुम होहु कृस्न अवतारा । लैहो ओयलसों कहों विचारा ॥
नाथहु नाग कलिंद्री जाई । अब तुम जाहु विलम्ब न लाई ॥
ऊँच होइके नीच सतावे । ताकर ओयल मोहि सो पावे ॥
जो जिव देह पीर पुनि काहू । हम पुनि ओयल दिबावै ताहू ॥
पहुँचे हम तब तुव पास । कीन्हेट सत्य वचन परगासा ॥
भेटेउ नाहि मोहि पद ताता । विष ज्वाला साँवल भोगाता ॥
व्याकुल भयो तवै फिर आयो । पितु पद दरसन मैं नहि पायो ॥
अद्याका विष्णुको ज्योतिका दर्शन कराना ।
इतना सुनि हरषित भई माई । लीन्ह विस्नु कहैं गोद उठाई ॥
पुनि अस कहेउ आदि भवानी । अब सुनहु पुत्र प्रिय मम बानी ॥
देख पुत्र तोहि पिता भिटावों । तोरे मन कर धोख मिटावों ॥
प्रथमहि ज्ञान द्रिष्टिसो देखो । मोर वचन निज हिये परेखो ॥
मन सरूप करता कहैं जानों । मनते दूजा और न मानो ॥
सरग पताल दौर मन केरा । मन इस्थिर मन अहै अनेरा ॥
छनमहैं कला अनंत दिखावे । मन कहैं देख कोइ नहि पावे ॥
निराकार मनहीको कहिये । मनकी आस दिवस निसि रहिये ॥
देखहु पलटि सून्यमहैं जोती । जहूँ झिलमिल झालर होती ॥
फेरहु स्वास गगन कहैं धाओ । मार्ग अकासहि ध्यान लगाओ ॥
जैसे माता कहि समुझावा । तैसे विस्नु ध्यान मन लावा ॥
छंद-पैठि गुफा ध्यान कीन्हो स्वास संयम लायके ॥
पवन धूँका दियो जबते गगन गरज्यो आयके ॥
बाजा सुनत तब मगन भा पुनि कीन्ह मन कस ख्याल हो ॥
सून्य स्वेत पीत सज्ज लाल दिखाय रंग जंगल हो ॥ ३० ॥
सोरठा-तेहि पीछे धर्मदास, मन पुनि आपे दिखायऊ ॥
कीन्ह ज्योति परकास, देखि विस्नु हरषित भये ॥ ३० ॥
मातहि नायो सीस, बहु अधीन पुनि विस्नु भा ॥
मैं देखा जगदीस, हे जननी परसाद तुव ॥ ३१ ॥
धर्मदास वचन ।
धरमदास गहि टेके पाया । हे साहिब इक संशय आया ॥
कन्या मनको ध्यान बतावा । सो यह सकल जीव भरमावा ॥
पश्चिमके चार किताबोंका वर्णन तौरीतमें उत्पत्तिका वृत्तान्त आदमकी पैदाइश
सद्गुरु वचन ।
धरमदास यह काल स्वभाऊ । पुरुष भेद विस्नु नहिं पाऊ ॥
कामिनिकी यह देखहु बाजी । अम्रित गोय दियो विष साजी ॥
जोत काल दूजा जनि जानहू । निरखि धर्म सत्यहिं उर आनहू ॥
परगट तोहि कहीं समुझाई । धरमदास परखहु चित लायी ॥
जस परगट तस गुपुत सुभाऊ । जो रह हियासो बाहर आऊ ॥
जब दीपक बारै नर लोई । देखहु जोति सुभाव विलोई ॥
देखत जोति पतंग हुलासा । जानि प्रीति आवै तिहि पास ॥
परसत होवे भसम पतंगा । अन जाने जरि मरहि मतंगा ॥
जोति सरूप काल अस आही । कठिन काल वह छाँडत नाही ॥
कोटि विस्नु औतारहि खाया । ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया ॥
कौन विपति जीवनकी कहऊँ । परखि वचन जिन सहजहिं रहऊँ ॥
लाख जीव वह नित्यहि खाई । अस विकराल सो काल कसाई ॥
धर्मदास वचन ।
धर्मदास कह सुनहु गुसाई । मोरे चित संसय अस आई ॥
अष्टंगिहि पुरुष उत्पानी । जिहि विधि उपजी सो मैं जानी ॥
पुनि वहि त्रास लीन्ह धर्म राई । पुरुष प्रताप सु बाहर आई ॥
सो अष्टंगी अस छल कीन्हा । गोइसि पुरुष प्रगट जम कीन्हा ॥
पुरुष भेद नहिं सुनत बतावा । काल निरंजन ध्यान करावा ॥
यह कस चरित कीन्ह अष्टंगी । तजी पुरुष भई कालकि संगी ॥
सद्गुरु कबीर वचन ।
धर्म सुनहु जन नारि सुभाऊ । अब तुहि प्रगट वरणि समझाऊ ॥
होय पुत्री जेहि घर माहीं । अनेक जतन परितोषत ताही ॥
वस्त्र भच्छ सुख सेज निवासा । घर बाहर सब तिहिं विस्वासा ॥
यज्ञ कराय देय पितु माता । बिदा कीन्ह हित प्रीतिसों ताता ॥
गयी सुता जब स्वामी गेहा । राती तासु संग गुन नेहा ॥
माता पिता सबै बिसरावा । धरमदास अस नारि स्वभावा ॥
ताते अध्या भई विगानी । काल अंग ह्वै रही भवानी ॥
ताते पुरुष प्रगट ना लायी । काल रूप विस्नुहि दिखलायी ॥
धर्मदासवचन कबीर प्रति ।
हे साहब यह जान्यो भेदा । अब आगेका करहु उछेदा ॥
आदम और हव्वाकी सन्तान
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
पुनि माता कहि विस्नु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निज वारा ॥
अहो विस्नु तुम लेहु असीसा । सब देवनमें तुमहीं ईसा ॥
जो इच्छा तुम चितमें धरिहौ । सो सब तोर काज मैं करिहौ ॥
मायाका विष्णुको सर्वप्रधान बनाना ।
प्रथम पुत्र ब्रह्मा दुरि गयऊ । अकरम झूठ ताहि प्रिय भयऊ ॥
देवन सेष्ठ तुमहिं कहैं मानहिं । तुम्हरी पूजा सब कोई ठानहिं ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
किरपा वचन अस मातैं भाखा । सबसे सेष्ठ विस्नु कहैं राखा ॥
माता गयी रुद्रके पास । देख रुद्र अति भये हुलासा ॥
अद्याका महेशको बरदान देना ।
पुनि लहुरा कहैं पूछे माता । तुम सिव कहो हृदयकी बाता ॥
माँगहु जो तुम्हरे चित भावे । सो तोहिं देउँ माता फुरमावे ॥
दोइ पुत्रन कहैं मता दृढावा । माँग महेश जोई मन भावा ॥
महेशवचन ।
जोरि पानि सिव कहबे लीन्हा । देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥
कबहिं न विनसे मेरी देही । हे माता माँगों बर एही ॥
हे जननी यह कीजे दाय। कबहुँ न विनशै मेरी काया ॥
अद्यावचन ।
कह अष्टंगी अस नहिं होई । दूसर अमर भयो नहिं कोई ॥
करहु योग तप पवन सनेहा । रहे चार जुग तुम्हरी देहा ॥
जौलौ पृथ्वी अकास सनेही । कबहुँ न विनसे तुम्हरी देही ॥
धर्मदासवचन ।
धर्मदास विनती चित लाई । ज्ञानी मोहि कहो समुझाई ॥
यह तो सकल भेद हम पायी । अब ब्रह्माको कहो उपायी ॥
अद्या साप ताहि कहैं दीन्हा । तेहि पीछे ब्रह्मा कस कीन्हा ॥
कबीरवचन ।
विस्नु महेश जबै वर पाये । भये आनन्द अतिहि हरषाये ॥
दोनों जने हरण मन कीना । ब्रह्मा भयो मान मद हीना ॥
धरमदास मैं सब कुछ जानों । भिन्न २ कर प्रगट बखानों ॥