कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 158, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंअद्यावचन ब्रह्मप्रति ।
कहे जननि सुनहु ब्रह्मा कोउ नहि जनक तुम्हार हो ॥
हमहि ते भई सबे उत्पति हमहि सब कीन सम्हार हो ॥ २१ ॥
ब्रह्मावचन अद्या प्रति ।
सोरठा-ब्रह्मा कहते पुकार, सुनु जननी तैं चित्त दे ॥
कहत वेद निरुवार, पुरुष एक सो गुप्त है ॥ २२ ॥
अद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।
कहे अद्या सुन ब्रह्मकुमारा । मोसे नहीं स्रष्टा न्यारा ॥
स्वर्ग मृत्यु पाताल बनाई । सात समुन्दर हम निरमाई ॥
ब्रह्मावचन अद्या प्रति ।
माना वचन तुमहि सब कीन्हा । प्रथम गुप्त तुम कस रख लीन्हा ॥
जबै वेद मुहि कहे बुझाई । अलख निरञ्जन पुरुष बनाई ॥
अब तुम आप बनो करतारा । प्रथम काहे न किया विचारा ॥
जो तुम वेद आप कथि राखा । तो कस तुम अलख निरंजन भाखा ॥
आपे आप आप निरमाई । काहे न कथन कीन तुम भाई ॥
अब मोसन छल जनि करहू । सौंचे सौंच सब कहि उच्चरहू ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
जब ब्रह्मा यहि विधि हठ ठाना । तब अद्या मन कीन्ह तिवाना ॥
केहि विधि यहि कहूँ समझाई । विधि नहि मानत मोर बडाई ॥
जो यहि कहौं निरंजन बाता । कंहि विधि समझे यह विख्याता ॥
प्रथम कह्यो निरंजन राई । मोर दरश काहू नहि पाई ॥
अबै जो यही अलख लखावो । कौनी विधि ताको दिखलाओं ॥
अद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।
अस विचारि पुनि ब्रह्मो समझावा । अलख निरंजन नहि दरस दिखावा ॥
ब्रह्मावचन अद्या प्रति ।
ब्रह्मा कहे मोहि ठोर बताओ । आगा पीछा जनि तुम लाओ ॥
मैं नहि मानो तुम्हरी बाता । ऐसी बात न मोहि सुहाता ॥
प्रथम तुम मुहि दीन भुलावा । अब तुम कहो न दरस दिखावा ॥
तासु दरस न पैहो पूता । ऐसी बात कहो अजगूता ॥
छंद-दरस दिखाय तत्काल दीजे मोहि न भरोस तुम्हार हो ॥
संशय निवार यहिकाल दीजे कीजे न विलम्ब लगार हो ॥