भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।

कहे जननी सुनो ब्रह्मा कहों तोसों सत्तही ॥
सात स्वर्ग है माथ ताको चरन पताल सप्तही ॥ २२ ॥

ब्रह्माका पिताके खोजको जाना ।

सोरठा-लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तिहिं दरसकी ॥

जाय नवाओ माथ, ब्रह्मा चलै शिर नाइकै ॥ २३ ॥

जननी गुन्यो वचन चितमाहीं । मोरि कही यह मानति नाहीं ॥

या कहैं वेद दीन्ह उपदेशा । पै दरस ते नहिं पावे भेसा ॥

कह अष्टंगि सुनो रे वारा । अलख निरंजन पिता तुम्हारा ॥

तासु दरश नहिं पैहौ पूता । यह मैं वचन कहैं निज गूता ॥

ब्रह्मा सुनि व्याकुल ह्वै धावा । परसन सीस ध्यान हिय लावा ॥

ब्रह्मा चले जननि सिर नाई । सीस परसि आवों तोहि ठाई ॥

तुरतहि ब्रह्मा दीन्ह रिगायी । उत्तर दिशा बेगि चलि जायी ॥

आज्ञा माँगि विस्नु चले बाला । पिता दरशको चले पताला ॥

इत उत चितय महस न डोला । सेवा करत कछू नहिं बोला ॥

तेहि सिव मन अस चित अभावा । सेवा करन जननि चित लावा ॥

यहि विधि बहुत दिवस चलियऊ । माता सोच पुत्र कह कियऊ ॥

विष्णुका पिताके खोजसे लौटकर पिताके चरण तक न पहुंचनेका

बूतान्त अद्यासे कहना ।

प्रथम विस्नु जननी ढिग आये । अपनी कथा कहि समुझाये ॥

भेटचो नाहि मोहि पगु ताता । विष ज्वाला स्यामल भौ गाता ॥

व्याकुल भयउ तबै फिरि आवा । पिता पगु दरस मैं नहिं पावा ॥

सुनि हरषित भई आदिकुमारी । लीन्ह विस्नु कहैं निकट दुलारी ॥

चूमेउ बदन सीस दियो हाथा । सत्य सत्य बोलेउ सुत बाता ॥

धर्मदासवचन कबीर प्रति ।

कहे धरमनि यह संशय बीती । साहब कहहु ब्रह्माकी रीती ॥

पिता सीस तिन पर छन कीन्हा । कि होय निरास पीछे पगु दीन्हा ॥

छन्द-गयऊ ब्रह्मा सीस परसन, कथा ता दिनकी कहो ॥

भयो द्विस्टि मेराव कि नहिं, तासु दरसन तिन लहो ॥

यह बरनन सब कहो सतगुर, एक एक विलोयके ॥

निज दास जानि परगास कीजे, धरहु निज जनि गौयके ॥ २३ ॥

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