कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोरठा-प्रभु हम हैं तुव दास, जनम किरतारथ मोर करि ॥
करहु वचन परगास, तेहि पीछे जो चरित भौ ॥ २४ ॥
पिताकी खोजमें गये हुए ब्रह्माकी कथा ।
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
धरमदास मुहि अति प्रिय अहूहू । कहो सँदेस परखि दूढ गहूहू ॥
चलत ब्रह्मा तब बार न लावा । पिता दरसकहूँ अति मन भावा ॥
तेहि स्थान पहुँचिगै जाई । नहिं तहूँ रबि ससि सून्य रहाई ॥
बहु विधि अस्तुति करे बनायी । ज्योति प्रभाव ध्यान तहूँ लाई ॥
ऐसे बहु दिन गये बितायी । नहिं पायो ब्रह्मा दरश पितायी ॥
सून्य ध्यान जुग चार गमावा । पिता दरस अजहूँ नहिं पावा ॥
ब्रह्माके लिये अद्याकी चिन्ता ।
ब्रह्मा तात दरस नहिं पाई । सून्य ध्यानमहूँ जुग बहु जाई ॥
माता चित करत मन माहौं । जेठ पुत्र ब्रह्मा रहू काहौं ॥
किहि विधि रचना रचहुँ बनाई । ब्रह्मा आवे कौन उपाई ॥
गायत्री उत्पत्ति ।
उबटि सरीर मैल गहि काढी । पुत्री रूप कीन्ह रचि ठाढी ॥
शक्ति अंश निज ताहि मिलावा । नाम गायत्री ताहि धरावा ॥
गायत्री मातहिं सिर नाई । चरन चूमि निज सीस चढाई ॥
गायत्रीवचन अद्या प्रति ।
गावत्री विनवै कर जोरी । सुनु जननी 'इक विनती मोरी ॥
कौन काज मो कहूँ निरमाई । कहो वचन लेउँ सीस चढाई ॥
अद्यावचन गायत्री प्रति ।
कहे आद्या पुत्री सुनु बाता । ब्रह्मा आहि जेठहि तुव भ्राता ॥
पिता दरशकहूँ गयो अकासा । आनौ ताहि वचन परगासा ॥
दरश तातकर वह नहिं पावे । खोजत खोजत जन्म गमावे ॥
जौने विधिते इहवौं आई । करो जाय तुम तौन उपाई ॥
गायत्रीका ब्रह्माके खोजमें जाना । कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
चलि गायत्री मारग आई । जननीवचन प्रीति चित लाई ॥
चलत भई मारग सुकुमारी । जननी बचन ध्यान उर धारी ॥